कांग्रेस की स्थापना के वास्तविक उद्देश्य तथा भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का प्रथम चरण

कांग्रेस की स्थापना के वास्तविक उद्देश्य देश के हितों की रक्षा करने वाले भारतीयों के बीच मित्रता और संपर्क बढ़ाना।  जातिगत, धर्मगत तथा प्रतीय विभेदों को मिटाकर राष्ट्रीय एकता की भावना को विकसित करना।  राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक मुद्दों पर शिक्षित वर्गाें को एकजुट करना।  भविष्य के रानीतिक कार्यक्रमों की रूपरेखा सुनिश्चित करना। भारतीय राष्ट्रीय

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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना ’ कांग्रेस’ शब्द की उत्पत्ति उत्तरी अमेरिका के राजनीतिक इतिहास कीदेन है, जिसका अर्थ है, ’व्यक्तियां का समूह’। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का श्रेय ए.ओ. ह्यूम एक सेवानिवृत ब्रिटिश अधिकारी थे। इन्होंने कलकत्ता बंबई और मद्रास का दौरा करने के उपरांत भारतीय राष्ट्रीय संघ का एक सम्मेलन पुणे में

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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से पूर्व महत्वपूर्ण राजनीतिक संगठन

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से पूर्व महत्वपूर्ण राजनीतिक संगठन दिसम्बर 1885 मे भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की स्थापना अचानक घटी कोई घटना नहीं थी, बल्कि यह राजनीतिक जागृति की चरम पराकाष्ठा थी।काँग्रेस  की स्थापना से पहले भी अनेक राजनीतिक एवं गैर राजनीतिक संगठनों की स्थापना हो चुकी थी। इन संगठनों का विवरण निम्नवत है। बंग

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भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन

औपनिवेशिक शासन का परिणाम: विदेशी शासन के रूपों में  राष्ट्रीय भावना के उदय में योगदान दिया। पहला, विदेशी शासकों की विभेदकारी शोषणकारी आर्थिक नीतियों ने भारतीय कृषि तथा पारम्परिक उद्योगों को नष्ट कर आत्मनिभर्रतामूलक ग्रामीण अर्थव्यवस्था को औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था में परिवर्तन परिणामस्वरूप लोगों में ब्रिटिश शासन के प्रति आक्रोश की भावना का उदय हुआ। ब्रिटिश शासन

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राष्ट्रीय आंदोलन

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारतीयों में राष्ट्रीय राजनीतिक चेतना का विकास बहुत तेजी से हुआ और भारत में एक संगठित राष्ट्रीय आंदोलन का सूत्रपात हुआ। पाश्चात शिक्षा का विस्तार, मध्यवर्ग का उदय रेलवे का विस्तार तथा सामाजिक-धार्मिक आंदोलनों ने राष्ट्रवाद की भावना के विकास में महत्पूर्ण भूमिका निभाई। इसी क्रम में दिसंबर 1885 में

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जाति-प्रथा के विरूद्ध संघर्ष

जाति-प्रथा के विरूद्ध संघर्ष:- जाति व्यवस्था, समाज-सुधार आंदोलन के हमले का एक और प्रमुख निशाना थी। इस समय हिन्दू अनगिनत आकृतियों में बॅटे थे। कोई व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता था उसी के नियमों से उसके जीवन का एक बड़ा भाग संचालित होता था। व्यक्ति किससे विवाह करे तथा किसके साथ भोजन करे, इसका

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सामाजिक सुधार

सामाजिक सुधार:- उन्नीसवीं सदी के राष्ट्रीय जागरणका प्रमुख सामाजिक सुधार के क्षेत्र में देखने को मिला। नवशिक्षित लोगों ने बढ़-बढ़कर जड़ सामजिक रीतियों तथा पुरानी प्रथाओं से विद्रोह किया। वे अब बुद्धिविरोधी और अमानवीय सामकजिक व्यवहारों को और सहने को तैयार न थे। उनका विद्रोह सामाजिक समानता तथा सभी व्यक्तियों की समान क्षमता के मानवतावादी

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सिखों में धार्मिक सुधार

सिखों में धार्मिक सुधार:- सिख लोगों में धार्मिक सुधार का आरंभ 19वीं सदी के अंत में हुआ जब अमृतसर में खालसा की स्थापना हुई। लेकिन सुधार के प्रयासों को बल 1920 के बाद मिला जब पंजाब में अकेली आंदोलन का आंरम्भ हुआ। अकालियों का मुख्य उद्देश्य गुरूद्वारों के प्रबंध का शुद्धिकरण करना था इन गुरूद्वारों

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पारसियों में धार्मिक सुधार

पारसियों में धार्मिक सुधार:- पारसी लोगों में धार्मिक सुधार का आरंभ बंबई में 19वीं सदी के आरंभ में हुआ। वर्ष 1851 में रहमानी मज्दायासन सभा (रिजीजस रिफार्म एसोसिएशन) का आरंभ नौरोजी फरदुनजी दादाभाई नौरोजी, एस.एस. बंगाली तथा अन्य लोगों ने किया। इन सभी ने धर्म के क्षेत्र में हावी रूढ़िवाद के खिलाफ आंदोलन चलाया, और

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मुहम्मद इकबाल का एक सामान्य परिचय एवं कार्य

मुहम्मद इकबाल:-आधुनिक भारत में माहनतम कवितयों में एक, मुहम्मद इकबाल (1876-1938) ने भी अपनी कविता द्वारा नौजवान मुसलमानों तथा हिदंुओं के दार्शनिक एवं धार्मिक दृष्टिकोण पर गहरा प्रीााव डाला। स्वामी विवेकनांदन की तरह उन्होने निरंतर परिवर्तन तथा अबाध कर्म पर बल दिया और विराग, ध्यान तथा एकांतवास की निंदा की। उन्होंने एक गतिमान दृष्टिकोण अपनाने

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