गांधी युग – कुछ महत्वपूर्ण आन्दोलन

गांधी-दास पैक्ट: नवम्बर 1924 फरवरी 1924 में स्वास्थ्य कारणों से जेल से रिहा होने के पश्चात् नवम्बर 1924 में गांधीजी, सी.आर. दास एवं मोतीलाल नेहरू ने मिलकर एक संयुक्त वक्तव्य प्रस्तुत किया। इसे गांधी-दास पैक्ट के नाम से जाना जाता है। इसकी मुख्य बातों में विधानसभाओं के भीतर स्वराज पार्टी को कांग्रेस के नाम तथा

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गांधी युग – असहयोग आंदोलन, खिलाफ आंदोलन की समाप्ति

असहयोग आंदोलन, 1920-22 गांधीजी द्वारा असयोग आंदोलन की औपचारिक शुरुआत 1 अगस्त, 1920 को की गयी। असहयोग आंदोलन से सम्बन्धित कार्यक्रमों पर विचार करने के लिए सितम्बर 1920 (कलकत्ता) में कांग्रेस कार्यसमिति का अधिवेशन आयोजित किया गया। गांधीजी द्वारा इसी अधिवेशन में असहयोग प्रस्ताव पेश किया गया। इस प्रस्ताव का विरोध एनी बेसेंट, मदनमोहन मालवीय,

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गांधी युग-रौलट एक्ट,  जलियाँवाला बाग हत्याकांड, खिलाफत आंदोलन

रौलट एक्ट, 1919 अंगेजी शासन के विरूद्ध पनप रहे असंतोष तथा पढ़ती हुई क्रांतिकारी गतिविधियों से प्रभावशाली ढंग से निपटने हेतु लार्ड चेम्सफोर्ड द्वारा किंग्स न्यायपीठ के न्यायाधीश सिडनी रौलट की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। इस समिति का कार्य भारत में क्रांतिकारी गतिविधियों के स्वरूप और प्रसार की जाॅच करना तथा

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गांधी युग: 1919-1948

मोहन दास करमचंद गांधी (1869-1948 ई.) 9 जनवरी को दक्षिण अफ्रीका से भारत वापस आए। वे 1893 ई0 में एक भारतीय मुस्लिम व्यापारी दादा अब्दुला का मुकदमा लड़ने दक्षिण अफ्रीका गए थे। वहाॅ पर उन्होंने भारतीयों के साथ हो रहे भेदभावपूर्ण व्यवहार को देखा। एक बार जब वे दक्षिण अफ्रीका में ट्रेन से यात्रा कर

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ब्रिटिश भारत में मजदूर आंदोलन

ब्रिटिश भारत में मजदूर आंदोलन भारत में मजदूर आंदोलन उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में आधुनिक उद्योगों की स्थापना के साथ ही भारत में मजदूर संघों की गतिवधियाॅ एवं उनके अस्थित्व की शुरूआत देखी गई। इस दिशा में सर्वप्रथम कदम था रेलवे का विकास जो आध्ुानिक भारतीय कांमगार वर्ग आंदोलन का अग्रदूत सिद्ध हुआ। औद्योगिक जीवन

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महत्वपूर्ण आंदोलन एवं कुछ महत्वपूर्ण घटनाए

अहरार आंदोलन, 1906 1906 ई. में बंगाल के राष्ट्रवादी मुसलमानों द्वारा इस आंदोलन का आरंभ किया गया। इस आंदोलन का लक्ष्य मुसलमानों की राष्ट्रीय आंदोलन में सहभागियता को प्रोत्साहित करना तथा ब्रिटिश राज्य के प्रति स्वामिभक्ति की भावना को हतोत्साहित करना था। इस आंदोलन का नेतत्व मौलाना मोहम्मद अली, हकीम अजमल खाॅ, मौलाना जफर अली

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स्वदेशी आंदोलन का प्रसार तथा नेतृत्व

स्वदेशी आंदोलन का प्रसार तथा नेतृत्व स्वदेशी आंदोलन का महत्व ; इस आंदोलन में अनेक प्रवृत्तियाँ और शक्तियाँ विद्यमान थीं जिन्होंने बीज रूप में ही सही पर 1947 ई. तथा उसके बाद के समय में भी भारतीय जनमानस को प्रभावित किया। स्वदेशी आंदोलन ने परवर्ती स्वतन्त्रता आंदोलन के लिए नींव रखने का काम किया तथा

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विदेशों में क्रांतिकारी आंदोलन

विदेशों में क्रांतिकारी आंदोलन राष्ट्रवादी क्रांतिकारियों ने ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका, अफगानिस्तान, जर्मनी, पेरिस आदि देशों में अन्य क्रांतिकारियों से संपर्क स्थापित करने, भारत की स्वतंत्रता के विषय में वैध प्रचार करने तथा विदेशियों से सहायता प्राप्त करने के उद्देश्य से अनेक संगठनों की स्थापना की।  इंग्लैंड में क्रांतिकारी गतिविधियाँ भारत के बाहर पहले क्रांतिकारी

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क्रांतिकारी आतंकवाद का प्रथम चरण: 1905-1915

क्रांतिकारी आतंकवाद का प्रथम चरण: 1905-1915 1905.1907द्ध क्रांतिकारी आतंकवाद का उदय 19वीं शताब्दी के अंत में और 20वीं शताब्दी के आरंभ में हुआ। यह उग्रवादी राष्ट्रवाद   का ही अगला चरण था। इसके उदय के प्रमुख कारणों में उदारवादियों द्वारा अपनाई गई निष्क्रिय प्रतिरोध की नीति तथा ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रियावादी एवं दमन की नीतियाँ जिम्मेदार

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भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का द्वितीय चरणः 1905-13

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का द्वितीय चरणः 1905-13 राष्ट्रीय आंदोलन में उग्रवाद का उद्भव- कांग्रेस की स्थापना के कुछ वर्षों बाद ही उदारवादियों की नीतियों की आलोचना आरंभ हो गई थी। अरविंद घोष द्वारा उदारवादी राजनीति की क्रमबद्ध आलोचना उनके एक पेम्फलेट ’न्यू लैम्प्स फाॅर ओल्ड’ में की गई। लाला लाजपतराय ने कांग्रेस के किसी के

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