वनस्पति विज्ञान – एक परिचय
(Botany Introduction)

पौधों से संबंधित सभी प्रकार का अध्ययन वनस्पति विज्ञान के अन्तर्गत किया जाता है। पौधों की वाह्य एवं आन्तरिक अकारिकी का अध्ययन, पौधों में श्वसन क्रिया, जल अवशोषण क्रिया, गति, प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा भोजन का निर्माण एवं उसका स्थानान्तरण, प्रजनन, विकास, जीवन चक्र, वातावरणीय अनुकूलन, पौधों की आनुवंशिकी, पादप प्रजनन विज्ञान, पौधों में उत्पन्न होने वाले रोग एवं उनके उपचारों का अध्ययन पौधों का भौगोलिक वितरण आदि का अध्ययन वनस्पति विज्ञान के अन्तर्गत किया जाता है।

पौधों एवं जन्तुओं में निम्न आधारों पर अन्तर किया जा सकता है-जैसे पादपों में कोशिकाभित्ति पायी जाती है जबकि जन्तुओं में नहीं। पादपों में पर्णहरित पाया जाता है जबकि जन्तुओं में नहीं। हरे पौधे अपना भोजन प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया द्वारा बनाते हैं जबकि जन्तु अपने भोजन के लिए पौधों पर निर्भर रहते हैं। जन्तु कोशिकाओं में लाइसोसोम्स पाया जाता है, जबकि पादप कोशिकाओं में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है। पादप कोशिका में रसधानी पायी जाती है जबकि जन्तु कोशिका में ऐसा नहीं होता है। इसके अलावा, सेण्ट्रोसोम, उत्सर्जन तन्त्र, कोशिका-विभाजन गति, खनिजों का अवशोषण तथा वृद्धि को लेकर अन्तर किया जाता है।

समस्त जीव धारियों को व्हिटेकर (R.H Whittaker) ने निम्नलिखित 5 जगतों में विभाजित किया है-

(1) मोनेरा :- जीवधारी एककोशीय, प्रोकैरियोटिक कोशिका वाले होते हैं। जैसे जीवाणु, सायनो बैक्टीरिया आदि।

(2) प्रोटिस्टा :– पूर्ण विकसित केन्द्रक पाया जाता है। ये भी एक कोशीय होते हैं। जैसे अमीबा, यूग्लीना आदि।

(3) कवक :- इस जगत के सदस्य बहुकोशीय परपोषीय होते हैं। इसमें प्रकाश संश्लेषण नहीं होता है। ये यूकेरियोटिक होते हैं, जैसे राइजोपस, स्लाइम, मोल्ड, यीस्ट आदि।

(4) प्लान्टी :- बहुकोशीय जीवधारी जिनकी कोशिकाओं के चारों ओर सेलुलोस की कोशिका भित्ति होती है तथा कोशिकाओं में रिक्तिका पायी जाती है। ये स्वपोषी होते हैं, जैसे हरे शैवाल, मास, फर्न, बीज वाले पौधे आदि।

(5) ऐनिमेलिया :- बहुकोशीय जन्तु जिसमें प्रकाश संश्लेषण नहीं होता और न ही कोशिका-भित्ति होती है। ये यूकेरियोटिक होते हैं।

मोनेरा का विभाजन बाद में यूबैक्टीरिया  तथा आर्कीबैक्टिरिया  में किया गया। ’वूज’ ने 6 जगतों को 3 मुख्य वर्गों में (1) डोमेन जीवाणु, (2) डोमेन आर्की  (3) डोमेन यूकेरिया में बाँटा।

पुरानी पद्धति के अनुसार पादपजगत का वर्गीकरण इस प्रकार किया गया है-

(a) क्रिप्टोगैम्स :-  इन्हें भी तीन भागों में बांटा गया है। (1) थैलोफाइटा (पादप शरीर का वास्तविक जड़, तना तथा पत्ती में विभाजन न होना) जैसे शैवाल, कवक, बैक्टिरीया तथा लाइकेन (2) ब्रायोफाइटा (इन पौधों में दारु (Xylem) पोषवाह (Pholem) सत्य पत्ती (True leaf) समंद्धि व तने का अभाव होता है। जड़ें भी नहीं पायी जाती हैं, जैसे आद्य उभयचर पौधे। (3) टेरिडोफाइटा (इनका पादप काय जड़, तना व पत्तियों में विभेदित रहता है, इन पौधों में पुष्प व बीज का निर्माण नहीं होता है) जैसे फर्न।

(b) फैनरोगेम्स (पुष्पी पौधे) :- इन्हें दो भागों में बाँटा गया है-

(1) अनावृतबीजी पौधे (Gymnosperms) :- नग्न बीजी, अण्डाशय का अभाव, फलों का निर्माण नहीं होता। बीज सीधे ही पौधे से लगे होते हैं। जैसे चीड़, देवदार आदि।

(2) आवृत्तबीजी पौधे (Angiosperms) :- अण्डाशय एवं बीजाण्ड दोनों उपस्थित, निषेचन के पश्चात् अण्डाशय फल में तथा बीजाण्ड बीज में बदल जाते हैं। इन पौधों का भ्रूण में उपस्थित बीजपत्रों की संख्या के आधार पर दो उप विभागों एकबीजपत्री एवं द्विबीजपत्री में बाँटा गया है।

(1) ऊतक विज्ञान (Histology) में ऊतकों का अध्ययन

(2) कोशिका विज्ञान (Cytology) में कोशिका का अध्ययन

(3) शारीरिकी (Anatomy) में पौधों की सम्पूर्ण आन्तरित संरचना का अध्यय (4) वर्गिकी (Taxonomy) में लक्षणों के आधार पर पौधों का वर्गीकरण

(5) पारिस्थितिकी (Ecology) में पौधे व उसके समुदाय पर वातावरण का प्रभाव व इसके विपरीत पौधे व उसके समुदाय का वातावरण पर प्रभाव एवं वातावरण के अनुसार पौधों में अनुकूलता का अध्ययन

(6) केन्द्रक विज्ञान (Karyology) केन्द्रक संबंधी रचना व कार्यों का अध्ययन

(7) पादप शरीर क्रिया विज्ञान (Plant Physiology) सभी जैविक क्रियाओं का अध्ययन

(8) पादप भूगोल  (Plant Geography) में भूमण्डल के विभिनन भागों में पौधों के वितरण व उसके कारणों का अध्ययन

(9) पादप-प्रजनन विज्ञान ((Plant Breeding)  अच्छे प्रकार के बीजों एवं फसलों को उगाने का अध्ययन

(10) सूक्ष्म जैविकी (Microbiology) में सूक्ष्म जीवों का अध्ययन

(11) पादप रोग विज्ञान  (Plant Pathology) में पौधों के रोग, रोगों के कारण व उपचार का अध्ययन

(12) जीवाश्म वनस्पति विज्ञान (Palaeobotany) में प्राचीन समय के पौधे, जो अब जीवित नहीं, उनकी आकृतियाँ पत्थरों की चट्टानों में छाप के रूप में हैं। इस शाखा के अन्तर्गत उनका अध्ययन होता है।

(13) जीव-रसायन (Bio chemistry)  में जीवधारियों में पाये जाने वाले पदार्थों व उनकी रासायनिक प्रक्रियाओं का अध्ययन।

(14) जीव-भौतिकी  (Biophysics) में भौतिकी के सिद्धान्तों के सन्दर्भ में जैविक-क्रियाओं का अध्ययन

(15) अणु-जैविकी (Molecular Biology)  में जैव रसायन का आण्विक आधार पर अध्ययन

(16) जैव सांख्यिकी (Biomentrics) में जैविक क्रियाओं के परिणामों का सांख्यिकी व गणित के सिद्धान्तों द्वारा अध्ययन।

(17) रासायनिक वर्गिकी  (Chemotaxonomy)  में प्राणियों में उपस्थित विशेष रसायनों के आधार पर वर्गीकरण।

(18) कोशीय-वर्गिकी विज्ञान(Cytotaxonomy) में कोशीय संरचना का उपस्थित गुणसूत्र की संरचना के आधार पर वर्गीकरण।

(19) जीवन-पारिस्थितिकी (Genecology) में किसी आबादी या समष्टि के जीनी संगठन का वास स्थान या वातावरण के संबंध का अध्ययन

(20) खाद्य प्रौद्योगिकी (Food Technology) में भोज्य पदार्थों का वैज्ञानिक ढंग से संरक्षण, भण्डारण तथा स्थानान्तरण।

(21) आनुवंशिकी इंजीनियरिंग ((Genetic Engineering) में आनुवांशिक पदार्थ का जोड़ना, अलग करना अथवा किसी प्रकार बदलना जिससे उस जीव में अच्छे लक्षणों का समावेश हो आदि का अध्ययन।

(22) ओलरीकल्चर (Oblecricuilare) सब्जियां प्रदान करने वाले पौधों का अध्ययन।

(23) फ्लोरीकल्चर (Floriculure) – पुष्प प्रदान करने वाले पौधों का अध्ययन।

(24) सिल्वीकल्चर (Silviculture) – वनों के विकास व देखरेख का अध्ययन।

(25) अरबोरीकल्चर (Arboriculture) वृक्षों तथा झाड़ियों के सम्बर्द्धन से संबंधित अध्ययन (26) पोमोलाजी (Pomology) – फलों के संवर्धन का अध्ययन।

(27) फारमैकोलाजी (Pharmacology) – औषधियाँ देने वाले पौधों का अध्ययन

(28) पेडोलाजी (Pedology) – मृदा का निर्माण, मृदा के प्रकार का अध्ययन।

(29) हार्टीकल्चर (Horticulture)  में पुष्प् व फल देने वाले वृक्षों व बागों का अध्ययन।

(30) माइकोलाजी (Mycology) कवकों का अध्ययन

(31) एलगोलाजी (Algology) शैवालों का अध्ययन

(32) बैक्टीरियोलाॅजी (Bactrtilogy) जीवाणुओं का अध्ययन

(33) स्पर्मोलाजी (Spermolgy) बीजों का अध्ययन

(34) वाइरोलाॅजी(Algology) – विषाणुओं का अध्ययन

(35) एन्थोलाॅजी (Virology) – में विभिन्न प्रकार के पुष्पों का अध्ययन

(36) क्रायोलाजी (Cryology)  में सजीवों में शीत प्रभाव का अध्ययन

(37) लिम्नोलाजी (Limnology)  में स्वच्छ जल में पाये जाने वाले पौधों का अध्ययन

नोट :-

  • भारतीय ब्रायोफाइटा के जनक हैं – एस0आर0 कश्यप
  • भारतीय जीवाश्म वनस्पति-विज्ञान के जनक (Father of Indian Palaenbotany) – वीरबल साहनी
  • के0सी0 मेहता का संबंध था – पाद रोग-विज्ञान
  •  भारत में हरित क्रान्ति के जनक हैं – एम0एस0 स्वामीनाथन
  • ऊतकों का अध्ययन किया जाता है – हिस्टोलाॅजी में
  •  बीरबल साहनी इन्स्टीट्यूट की स्थापना लखनऊ में 1946 में हुई। वीबल साहनी के प्रयत्नों से ही 1946 में पेलियो बोटेनिकल सोसाइटी की भारत में स्थापना हुई।
  • सर जगदीश चन्द्र बोस ने बताया कि डेस्मोडियम (Dsmodimu) गति की तरह इन पौधों में भी स्पन्दन होता है जिससे रसारोहण की क्रिया सम्पन्न होती है।