वंशानुगति की विधियाँ Patterns of inheritance

अनुवांशिक लक्षण -: जीवों के वे सब लक्षण जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाते हैं, वंशानुगति या अनुवांशिक लक्षण कहलाते हैं। जीव विज्ञान की वह शाखा जिसके अन्तर्गत सजातीय एवं परस्पर सम्बन्धित जीवों की आनुवांशिक समानताओं एवं विभिन्नताओं का तथा इसकी आनुवांशिकता का अध्ययन किया जाता है, अनुवांशिकी कहलाती है। परिभाषिक शब्द के रूप में इसका सर्वप्रथम वेटसन 1905 में किया। जीवों में वंशागति समानता एवं असमानता के बारे में पाइथागोरस एवं अरस्तू आदि को पहले से जानकारी थी लेकिन वशांगति प्रक्रिया का ज्ञान किसी को नहीं था। पादरी ग्रेगर जान मेंण्डल, ने वंशागति के मूल नियम बनाकर आनुवांशिकी की नींव डाली मेण्डल को इसीलिए अनुवांशिकी का पिता कहा जाता है। मेण्डल ने अपने आठ वर्षों के संकरण प्रयोगों के लिए उद्यान मटर-पीजम सैटाइवम को चुना। उन्होने इन प्रयोगों के लिए मटर के विभिन्नताओं तुलनात्मक या दृश्यरूपों वाले निम्नलिखित सात वंश परंपरागत आनुवाशिक लक्षणों का चयन किया।

(1) जीवों में प्रत्येक आनुवांशिक लक्षण का विकास एक ऐसी सूक्ष्म रचना के प्रभाव से होता है जो युग्मकों के जरिये एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में जाती है। लक्षणों की वंशागति के लिए उत्तरदायी इन एकक रचानाओं या कणों को मेण्डल ने एकक कारक कहा।

(2) एक गुण संकरणों द्वारा मेण्डल ने अपने द्वारा छॉटे गये सभी आनुवांशिक लक्षणों के प्रबल एवं अप्रबल रूपों को पता लगाया।

(3) पृथक्करण (segregation) :-  जब अप्रबल लक्षण का कारक प्रबल लक्षण के कारक से प्रथक होता है तो यह अपने लक्षण की अभिव्यक्ति कर देता है।

मेण्डल के प्रथम पृथक्करण के नियम के अनुसार एक आनुवांशिक लक्षण की विभिन्नताएॅ अर्थात् तुलनात्मक रूपों के कारक कितने ही समय के लिए साथ-साथ रहने पर भी अपरिवर्तित शुद्ध बने रहते हैं जिसके फलस्वरूप युग्मकों में जाने वाले कारक सब शुद्ध होते हैं इसलिए पृथक्करण के नियम को बाद में युग्मकों की शुद्धता का नियम कहा गया। कुछ ने इसे संकरों के विलगन का नियम कहा।

कार्ल कोरेन्स ने मेण्डल के दूसरे प्रबलता एवं अप्रबलता के निष्कर्ष को मेण्डल के द्वितीय प्रबलता के नियम के रूप में घोषित किया।
वंषागति का गुणसुत्रीय मत- जीव कोशिकाओं के केन्द्रक में सूत्रनुमा रचनाओं की उपस्थिति की पुष्टि रूसो तथा बाल वियानी ने की। बाल्डेयर ने इसे गुणसूत्र नाम दिया। गुणसूत्र द्विसूत्री समूह है। मनुष्य जाति के गुणसूत्र प्ररूप अर्थात कैरियोटाइप में 46 गुणसूत्र होते है। परन्तु ये 23 जोड़ियों में होते है। 23वीं जोडी के गुणसूत्र असमान होते हैं। इन्हें लिंग गुणसूत्र कहते हैं। शेष 22 जोड़ियों में प्रत्येक जोड़ी के दो गुणसूत्र आकृति एवं रचना में परस्पर समान अर्थात समजात होते है। परन्तु ये अन्य सभी जोड़ियों के गुणसूत्रों से भिन्न होते हैं। युग्मकों में जोड़ीदार गुणसूत्रों का एक-एक ही सदस्य में होता है। अर्थात् इनमें गुणसूत्रों का एक सूत्री समूह होता है जिसमें कि गुणसूत्रों की संख्या देह कोशिकाओं के केन्द्रक में उपस्थिति गुणसूत्रों की संख्या से आधी होती है।

सटन (sutton 1902) :-  ने वंशागति का गुणसूत्रीय मत प्रस्तुत किया। वैज्ञानिकों को जब यह पता चला कि आनुवांशिक लक्षणों की संख्या गुणसूत्रों की संख्या से कहीं अधिक होती है तब वंशागति के गुणसूत्रीय सिद्धान्त की मान्यता समाप्त हो गयी। सटन ने ही बाद में पता लगाया कि मेण्डल के कारक गुणसूत्रों से बहुत छोटे, परन्तु इन्हीं मे स्थित होते हैं। जानसन ने इन कारकों को जीन्स का नाम दिया। ने वंशागति का जीन मत प्रस्तुत किया। इसके बाद वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि प्रत्येक गुणसूत्र में डी0एन0ए0 का केवल एक अत्यधिक लम्बा व गुण्डलित सूत्रनुमा अणु होता है और इसी अणु के छोटे-छोटे खण्ड जीन्स का काम करते है।

लिंग निर्धारण (sex determination)ः-  लैगिंक जनन में सूत्री नर व मादा युग्मक कोशिकाओं के संयुग्मन से द्विसूत्री युग्मनज अर्थात् जाइगोट बनता है। जाइगोट के भ्रूणीय विकास से नई सन्तान का शरीर बनता है। लैंगिक जनन करने वाले जीव दो प्रकार के होते है-(1) द्विलिंगी तथा (2) एकलिंगी। मैंकलांग ने लिंग निर्धारण का गुणसूत्रीवाद सिद्धान्त दिया।

किसी भी जाति विशेष के सारे सदस्यों की सारी शरीर कोशिकाओं में समान गुण सूत्रों का समूह या ढाँचा गुणसूत्र प्ररूप है। प्रत्येक जोड़ी के दो समान गुणसूत्रों को समजात गुणसूत्र कहते हैं। एकलिंगी जीवों मे प्रत्येक सन्तान को प्रत्येक जोड़ी का एक गुणसूत्र अण्डाणु के द्वारा माता से और दूसरा शुक्राणु के द्वारा पिता से प्राप्त होता है।

मानव जाति में 23 जोड़ी गुणसूत्र पाये जाते है। इसमें 22 जोड़ी गुणसूत्री स्त्री पुरूषों में समान होते है। इसीलिए इन्हें स्वजात गुणसूत्री कहते हैं। 23वें जोडे के गुण सूत्र स्त्री-पुरूषों में असमान होते है। इन्हें विषमजात गुणसूत्र अथवा हेटरोसोम्स या एलोसोम्स कहते हैं। सि़़्त्रयों में 23वी जोड़ी के गुणसूत्र ‘गगष् होते है और पूरे गुणसूत्र समूह को 44़गग द्वारा प्रदर्शित करते हैं। पुरूषों में 23वी जोड़ी का गुण सूत्र गल हैं। इनका गुणसूत्र समूह 44़गन द्वारा प्रदर्शित करते हैं।

स्त्रियों के जनद अण्डाशय होते हैं। इनमें होने वाले युग्मक जनन को अण्डजनन कहते हैं। अंडाणुओं में लिंग गुणसूत्रों की समानता के कारण स्त्रियॉ समयुग्मकों कहलाती हैं। पुरूषों में जन वृषण होते है। इनमें होने वाले युग्मकजनन को शुक्रजनन कहते हैं। शुक्राणुओं में लिंग गुणसूत्रों की भिन्नता के कारण पुरूष विषमयुग्मकी कहलाते हैं।

पुरूष के शुक्राणु वीर्य में पाये जाते हैं सम्भोग के जरिये स्त्री की योनि में पहॅुचने के बाद कोई एक शुक्राणु स्त्री की अण्डवाहिनी में उपस्थित अण्डाणु से मिल जाता है। शुक्राणु का केन्द्रक अण्डाणु के केन्द्रक से मिल जाता है जिससे अण्डाणु में गुणसूत्रों की सामान्य द्विसूत्री संख्या पुनः स्थापित हो जाती है। इस प्रक्रिया को अण्डाणु का निषेचन कहते हैं।

स्तनियों, अधिकांश कीटों एवं उभयचरों, सभी एकलिंगी पादपों तथा कुछ मछलियों के गुणसूत्र में मनुष्यों के समान ही लैंगिक भेद होता है। लेकिन पक्षियों के गुणसूत्र में मनुष्यों के समान ही लैंगिक भेद होता है। लेकिन पक्षियों, सरीसृपों, पतंगों व तितलियों तथा कुछ उभयचरों और कुछ मछलियॉ मैं लैंगिक भेद मनुष्यों से भिन्न होता है। अर्थात नर में लिंग गुणसूत्र समान (zz) तथा मादा में समान (zw) होते हैं।