भुगतान शेष
(Blance of Payment)

भुगतान शेष किसी देश का अन्य देशों के साथ होने वाले समस्त आर्थिक लेन देन का लेखा होता है। जिसमें दोहरी प्रविष्टि की जाती है।

भुगतान संतुलन के अवयव
(Components of Blance of Payment)

भुगतान शेष में चालू खाता एवं पूंजी खाता होतें हैं। चालू खाते में वस्तुगत व्यापार एवं अदृश्य व्यापार अथवा वस्तुगत खाता एवं अदृश्य खाता पाया जाता है। वस्तुगत खातें में वस्तुओं को व्यापार को शामिल किया जाता है जबकि अदृश्य खाते मंे सवायें आय तथा अन्तरण को सामिल किया जाता है।
पूंजी खाते में सभी प्रकार के वित्तीय लेन-देन का शामिल किया जाता है।

यदि जमा पक्ष एवं मांग पक्ष बराबर है तो भुगतान शेष संतुलन में रहता है। यदि जमा पक्ष उधार पक्ष से अधिक है तो भुगतान शेष अनुकूल होता है। परन्तु यदि उधार पक्ष अधिक है तो भुगतान शेष प्रतिकूल हो जाता है। और प्रतिकूल भुगतान संतुलन देश के विकास में बाधक होता है।
भारत की प्रमुख्य आर्थिक समस्या में एक महत्वपूर्ण समस्या चालू खाते का घाटा है। भुगतान शेष में असंतुलन के लिए कई कारण जिम्मेदार होते हैं।

1. जब किसी देश की विकास की प्रक्रिया चल रही हा तो विकासात्मक व्यय अधिक होता है। आयातों पर निर्भरता बढ़ जाती है। और भुगतान शेष प्रतिकूल हो जाता है।
2. भुगतान शेष के प्रतिकूल होने का दूसरा कारण अर्थव्यवस्था की स्थायी एवं दीर्घकालीन प्रवृत्तियाॅ होती हैं। लागते अधिक होने के कारण निर्यातों में वृद्धि नहीं हो पाती है।
3. व्यापार चक्रों में होने वाला परिवर्तन भी भुगतान शेष की स्थिति को प्रभावित करता है।
4. किसी देश की अर्थव्यवस्था में होने वाले संरचनात्मक परिवर्तन के कारण उत्पन्न होने वाले असंतुलन से भी भुगतान शेष असंतुलित हो जाता है।

 सुुधारने के उपाय

1. स्वयत्त

2. किये गये उपाय

(A) मौद्रिक उपाय-
(a) मौद्रिक संकुचन विस्तार
(b)अवमूल्यन विनिमय नियंत्रण
(c) विदेशी विनिमय दर मे परिवर्तन
(B) राजकोषीय उपाय-
(a) सार्वजनिक आय
(b) सार्वजनिक व्यय
(C)व्यापारिक उपाय-
(a) आयात प्रतिस्थापन एवं निर्यात संवर्धन
(b) प्रशुल्क
(c) कोटा
( D)अन्य उपाय-
(a) विदेशी ऋण सहायता
(b) पर्यटन सेवाओं का विस्तार
(c) विदेशी निवेश को बढ़ावा।

प्रतिकूल भुगतान संतुलन को सुधारने के लिए मौद्रिक, राजकोषीय एवं व्यापारिक उपाय किये जाते हैं। मौद्रिक उपायों में मौद्रिक संकुचन एवं विस्तार, अवमूल्यन, विनिमय नियंत्रण विदेशी विनिमय दर में परिवर्तन इत्यादि का प्रयोग किया जाता है।
घरेलू मुद्रा की कीमत को अन्य विदेशी मुद्राओं की तुलना में जान बूझ कर कम करना अवमूल्यन कहलाता है। अवमूल्यन से निर्यातों में वृद्धि एवं आयातों में कमी पायी जाती है। जिससे भुगतान शेष की प्रतिकूलता में कमी पायी जाती है।
भारत में अब तक तीन बार अवमूल्यन किया जा चुका है पहली बार1949 ई0 में दूसरी बार 1966 ई0 में तीसरी बार जुलाई 1991 ई0 में। 1966 का अवमूल्यन सफल नहीं माना जाता है।

विदेशी विनिमय दर में सरकारी स्तर क्षेत्र विनमय नियंत्रण कहलाता है और ऐसे में देश का केन्द्रीय बैंक समस्त विदेशी मुद्रा भंडार को अपने पास रख लेता है। और विदेशी मुद्रा की पूर्ति स्वयं निर्धारित करता है।
जब सरकार विदेशी विनिमय दर को निर्धारित करें तो खुले बाजार में निर्धारित दरों का प्रयोग बंद कर दिया जाय तो इसे विदेशी विनिमय दर में परिवर्तन कहते है।

भुगतान शेष की प्रतिकूलता को सुधारने के लिए सरकार मौद्रिक संकुचन का भी सहारा लेती है। इसके अन्तर्गत साख नियंत्रण की प्रक्रिया को अपना कर साख मुद्रा कीपूर्ति में कमी लाकर आयातों को प्रभावित किया जाता है।

भुगतान शेष की प्रतिकूलता को दर करने के लिए राजकोषीय उपाय के रूप में सरकार सार्वजनिक आय के राजस्व को बढ़ाने का प्रयास करती हैं जबकि दूसरी तरफ सार्वजनिक व्यय में कमी लाने का प्रयास करती है। इस प्रकार राजकोषीय स्थिति को नियंत्रित करके भुगतान शेष की प्रतिकूलता को सुधारने का प्रयास किया जाता है। भुगतान से इसकी प्रतिकूलता को दूर करने केे लिए व्यापारिक उपाय भी प्रयोग में लाये जाते हैं और इसके अन्तर्गत सरकार आयात प्रतिस्थापन और निर्यात संवर्द्धन की नीति अपनानी है अर्थात जिन वस्तुओं को पहले आयात किया जा रहा था उन्हें घरेलू उत्पादों से प्रतिस्थापित करने का प्रयास किया जाता है जबकि निर्यातों को प्रोत्साहित करके अथवा उन्हें सहयोग देकर निर्यातों के संवर्धन का प्रयास किया जाता है।

इस प्रकार आयातों में कमी लाकर एवं निर्यातों को बढ़ाकर भुगतान शेष की प्रतिकूलता को दूर करना आयात प्रतिथापन निर्यात संवर्धन विधि कहलाता है।
आयातों पर लगने वाले कर को प्रशुल्क या तट कर कहा जाता है। इसके लगने से आयातों की कीमतें बढ़ जाती है। और उनकी मात्रा में कमी आ जाती है। जिससे भुगतान शेष संतुलित होता है।
प्रशुल्क लगाने से जहां एक तरफ आयातित वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं वहीं दूसरी तरफ आयातों की मात्रा में कमी पायी जाती है। तथा घरेलू उत्पादन बढ़ जाता है।