कृषि में जैव प्रौद्योगिकी

कृषि में जैव प्रौद्योगिकी, कृषि क्षेत्र में जैव प्रौद्योगिकी का विशेष महत्त्व है। यह कृषि क्षेत्र का वह नवाचार है, जिसके द्वारा हमें ऊतक संवर्धन, भ्रूण संवर्धन एवं पौध प्रवर्धन जैसी विधियां तो प्राप्त हुई ही हैं, ऐसी प्रजातियां भी विकसित की गई हैं, जिनमें हानिकारी दोष कम, लाभकारी गुण ज्यादा हैं।

ऊतक संवर्धन (Tissue Culture) :

ऊतक संवर्धन (Tissue Culture) जैव प्रौद्योगिकी की वह विधा है, जिसके अंतर्गत पौधों एवं जंतुओं की कोशिकाओं, ऊतकों अथवा अंगों को पृथक कर उनका नियंत्रित ताप, दाब तथा अनुकूल परिस्थितियों में संवर्धन किया जाता है। इसके लिए कांच के विशेष पात्रों अथवा संवर्धन माध्यमों का इस्तेमाल किया जाता है। पौधों के लिए यह प्रक्रिया ‘पादप ऊतक संवर्धन’ कहलाती है, किंतु पौधों के अनेक अंगों में से सिर्फ ऊतक को वरीयता दिए जाने के कारण इसे ऊतक संवर्धन (Tissue Culture) नाम दिया गया।

जीन संवर्धित फसलें (Genetically Modified Crops G.M.Crops) :

जीन संवर्धित फसलें (Genetically Modified Crops G.M.Crops), पादप अनुवंशकीय अभियांत्रिकी एवं जैव प्रौद्योगिकी ने जीन संवर्धित फसलों को संभव बनाया है। इन्हें ‘ट्रांसजेनिक फसलें’ या ‘पराजीनी फसलें’ भी कहा जाता है। ये फसलें पराजीनी या आनुवंशिक रूप से परिवर्तित होती हैं। जैसा कि नाम से ही विदित होता है, जीन संवर्धित फसलों से तात्पर्य उन फसलों से है, जो जीन में संवर्धन कर उगाई जाती हैं। इसमें पराजीनी पादपों में इनके  नैसर्गिक जीनों के अलावा अन्य जीन बाहर से प्रविष्ट करा कर इन्हें विकसित किया जाता है। ये रोग-रोधी, कीट-रोधी एवं विषाणु रोधी तो होते ही हैं, अनेक प्रकार के कुप्रभावों के विरुद्ध इनमें प्रतिरोधी क्षमता भी होती है। आनुवंशिक गुणों में फेर-बदल कर जहां अधिक उत्पादकता वाली फसलों को संभव बनाया गया है, वहीं फसलों की पोषण क्षमता में भी वृद्धि संभव हुई है। जीन संवर्धित फसलों की तीन विशिष्टताएं हैं- संरक्षण, सुरक्षा एवं अधिक उत्पादकता।

भारत में बीटी कपास :

भारत में व्यावसायिक कृषि हेतु स्वीकृत जीन संवर्द्धित फसल बीटी कपास की खेती की अनुमति जीईएसी द्वारा 26 मार्च, 2002 को दी गयी थी। सूखारोधी फसलें : सूखा से फसलों को बचाने के लिए वैज्ञानिकों द्वारा सूखारोधी फसलों का विकास किया गया है। जब किसी फसल में सूखारोधी या लवणतारोधी जीन डाल दिया जाता है तब ऐसी फसलें प्राकृतिक रूप से लाभकारी प्रोटीन पैदा करने लगती है | 
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