एक परिचय (Introduction) 

एक परिचय मनुष्य की समस्त आर्थिक गतिविधियों का अध्ययन और विश्लेषण करने वाली विधा अर्थशास्त्र कहलाती है। अर्थशास्त्र का व्यवहारिक पक्ष अर्थव्यवस्था है। अर्थव्यवस्था एक ऐसी प्रणाली है जिसकी सहायता से देश में उपलब्ध संसाधनों का दोहन और नये संसाधनों का निर्माण किया जाता है। अर्थव्यवस्था के माध्यम से असीमित आवश्यकता और सीमित संसाधन के बीच की खाईं को पाटने की कोशिश की जाती है ताकि उपभोक्ता अधिक सन्तुष्ट हो सके, उत्पादक को अधिक लाभ मिल सके और समाज के लिए अधिकतम सामाजिक कल्याण को सुनिश्चित किया जा सके।

अर्थव्यवस्था का महत्व:- किसी देश की आर्थिक गतिविधियों का सम्बन्ध अर्थव्यवस्था से होता है। जिससे वह अपने संसाधनों का समुचित उपयोग करते हुये विकास के उच्चतम बिन्दु को प्राप्त करना चाहता है। वर्तमान परिस्थिति में अर्थव्यवस्था एवं आर्थिक गतिविधियों का महत्व बढ़ गया है। आर्थिक उदारीकरण के इस युग में अर्थ मनुष्य की तमाम गतिविधियों के नियामक तथ्य के रूप में उभरकर सामने आया है। किसी देश की नीतियों को समझने के लिये उस देश की अर्थव्यवस्था और आर्थिक प्रणाली को समझना आवश्यक है। सुदृढ़ एवं सक्षम आधार के बिना शक्तिशाली राष्ट्र की कल्पना नहीं की जा सकती। किसी भी राष्ट्र का प्रमुख उद्देश्य राष्ट्र की एकता, अखण्डता को सुनिश्चित रखते हुये राष्ट्र को विकास के मार्ग पर अग्रसर करना और समस्त जनता का कल्याण करना होता है।

अर्थव्यवस्था के प्रकार (Types of Economy)

अर्थव्यवस्था का वर्गीकरण विभिन्न आधारों पर किया जाता है जो निम्नलिखित हैं-

  1. . विकास की रणनीति के आधार पर।
  2.  राज्य व सरकार की भूमिका के आधार पर।
  3.  विकास की अवस्था के आधार पर।
  4. . निर्भरता की प्रकृति के आधार पर।
  5. शेष विश्व के साथ अन्तर सम्बन्ध के आधार पर।

निजी क्षेत्र और बाजार के सापेक्ष राज्य व सरकार की भूमिका के आधार पर अर्थव्यवस्था की तीन श्रेणियां हैं-

1. समाजवादी अर्थव्यवस्थाः– ये अर्थव्यवस्था समाजवादी, समाज की स्थापना की उद्देश्य से प्रेरित होती है। ऐसी अर्थव्यवस्था में संसाधनों पर सार्वजनिक स्वामित्व की अवधारणा लागू होती है। अतः ऐसी अर्थव्यवस्था में राज्य व सरकार का हस्तक्षेप ज्यादा होता है। माँग और पूर्ति (निजी क्षेत्र के साथ बाजार कारक) की भूमिका नगण्य होती है। अपनी नियंत्रणकारी प्रकृति के कारण समाजवादी अर्थव्यवस्था नियंत्रित अर्थव्यवस्था कहलाती है। चीन, क्यूबा, उत्तर कोरिया, समाजवादी अर्थव्यवस्था के उदाहरण हैं।

 2. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था:- पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में माँग व पूर्ति (निजी क्षेत्र व बाजार) कारकों की भूमिका प्रभावकारी होती है। ऐसी अर्थव्यवस्था में राज्य व सरकार की भूमिका सीमित होती है। ऐसी अर्थव्यवस्था अहस्तक्षेप के सिद्धान्त पर आधारित होती है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में जहां लाभ पर जोर होता है वहीं समाजवादी अर्थव्यवस्था कल्याणकारी राज्य की संकल्पना से प्रेरित होती है।

3. मिश्रित अर्थव्यवस्था:- ऐसी अर्थव्यवस्था में समाजवादी एवं पंूजीवादी दोनों के लक्षण पाये जाते हैं। भारत की अर्थव्यवस्था मिश्रित अर्थव्यवस्था का उदाहरण है।

विकास की रणनीति के आधार पर अर्थव्यवस्था की दो श्रेणियां हैं-

1.-योजनाबद्ध श्रेणी:- एक व्यवस्थित रणनीति के साथ विकास की संकल्पना को स्वीकार करने वाले अर्थव्यवस्था योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था की श्रेणी में आती है।

 2-गैर योजनाबद्ध श्रेणी:- ऐसी अर्थव्यवस्था जो आयोजन की संकल्पना को स्वीकार नहीं करती, गैर योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था कहलाती है।

 वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में सभी अर्थव्यवस्थायें योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था की श्रेणी में आती हैं। विकास के विभिन्न अवस्थाओं के आधार पर अर्थव्यवस्था की तीन श्रेणियां हैं- 

1. विकसित अर्थव्यवस्था:- जहाँ औद्योगीकरण की प्रक्रिया औद्योगिक क्रान्ति के पहले व दूसरे चरण में शुरू हुई थी और आज विकास की उच्च अवस्था तक पहुँच चुकी हैं। ऐसी अर्थव्यवस्था विकसित अर्थव्यवस्था की श्रेणी में आती हैं। अमेरिका व अधिकांश यूरोपीय देशों की

अर्थव्यवस्थायें विकसित अर्थव्यवस्था की श्रेणी में रखी जाती हैं। विकसित अर्थव्यवस्थाओं की जी0डी0पी0 में सेवा क्षेत्र का महत्व अधिक होता है और ये आर्थिक विकास के तीसरे चरण में प्रवेश कर चुकी हैं।

2. विकासशील अर्थव्यवस्था:- ऐसी अर्थव्यवस्थायें अपने संसाधनों का समुचित दोहन नही कर पायी। यहाँ पर औद्योगीकरण की प्रक्रिया देर से शुरू हुई। 1940-50 के दशक में औपनिवेशिक स्वतंत्रता प्राप्त करने वाली अधिकांश देशों की अर्थव्यवस्थायें इसी श्रेणी की हैं। ऐसी अर्थव्यवस्था के जी0डी0पी0 में कृषि क्षेत्र का भाग कम हो रहा होता है और औद्योगिक एवं सेवा क्षेत्र का भाग बढ़ रहा होता है। ये अर्थव्यवस्थायें आर्थिक विकास के दूसरे चरण में हैं।

3. अल्प विकसित अर्थव्यवस्था:- ऐसी अर्थव्यवस्थायें जो अपने संसाधनों का दोहन अभी तक नहीं कर पायी हैं तथा अभी वे विकास के आरम्भिक चरण में हैं, अल्प विकसित अर्थव्यवस्था कहलाती हैं। ऐसी अर्थव्यवस्थायें अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अन्य देशों व अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के अनुदान पर निर्भर होती हैं। ऐसी अर्थव्यवस्था वाले देशों के जी0डी0पी0 में प्राथमिक क्षेत्र की भूमिका अभी भी महत्वपूर्ण बनी हुई है।

 निर्भरता के आधार पर अर्थव्यवस्था की तीन श्रेणियां हैं-

1. आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था:- ऐसी अर्थव्यवस्थायें जो अपनी आवश्यकता की आपूर्ति स्वयं के उत्पादन से कर लेती हैं। सामान्यतः ऐसी अर्थव्यवस्था का स्वरूप बन्द अर्थव्यवस्था वाला होता है।

2. आश्रित अर्थव्यवस्था:- ऐसी अर्थव्यवस्था जो अपनी आवश्यकता की पूर्ति स्वयं के उत्पादन से न करके दूसरी अर्थव्यवस्था के अनुदान या सहायता से पूरा करती हैं।

 3. परस्पर निर्भर अर्थव्यवस्था:- जिन अर्थव्यवस्थाओं में आत्मनिर्भर एवं आश्रित दोनों के गुण मौजूद होते हैं। परस्पर निर्भर अर्थव्यवस्था की श्रेणी में आती हैं। वर्तमान परिदृश्य में अधिकांश अर्थव्यवथायें इसी श्रेणी में आती हैं।

 शेष विश्व के साथ अन्तर सम्बन्धों के आधार पर अर्थव्यवस्था की दो श्रेणियां हैं-

1. बन्द अर्थव्यवस्था:- ऐसी अर्थव्यवस्था जो आत्मनिर्भरता पर बल देती हैं और शेष विश्व के साथ आर्थिक क्रियाओं के प्रति उदासीन रहती हैं। बन्द अर्थव्यवस्था कहलाती हैं। 1991 के पूर्व भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत हद तक इसी श्रेणी में थी।

2. खुली अर्थव्यवस्था:- ऐसी अर्थव्यवस्था प्रतिस्पर्धात्मक व्यवस्था को प्रोत्साहन एवं संरक्षणवाद को हतोत्साहित करती है। खुली अर्थव्यवस्था वाले देश शेष विश्व के साथ आर्थिक क्रियाओं को प्रोत्साहित करते हैं। इनका स्वरूप बहुत हद तक नियंत्रण मुक्त होता है। 1991 के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था खुली अर्थव्यवस्था के रूप में अग्रसर हुई।

आर्थिक गतिविधियों का वर्गीकरण  आर्थिक क्रियाकलापों का वर्गीकरण तीन श्रेणियों में किया गया है-

 1. प्राथमिक क्षेत्र:- प्राथमिक क्षेत्र में उन आर्थिक गतिविधियों को शामिल किया जाता है जो प्रत्यक्षतः पर्यावरण पर निर्भर होती हैं। प्राथमिक क्षेत्र का सम्बन्ध भूमि, जल, वनस्पति और खनिज जैसे प्राकृतिक संसाधनों से होता है। इसमें वे क्रियायें सम्मिलित की जाती हैं जो मानव को जीवित रखने के लिए आवश्यक होती हैं। कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन, वन उत्पाद, खनन आदि गतिविधियां प्राथमिक क्षेत्र के अन्तर्गत आते हैं।

2. द्वितीयक क्षेत्र:- द्वितीयक क्षेत्र में उन क्रिया-कलापों को सम्मिलित किया जाता है जिसमें प्राकृतिक संसाधनों का स्वरूप बदलकर मूल्यवान बना देती हैं। द्वितीयक क्रियाओं में उत्पादन सम्बन्धी क्रियाएं सम्मिलित की जाती हैं। द्वितीय क्षेत्र में तीन प्रकार के क्षेत्र सम्मिलित किये जाते हैं।

  1.  विनिर्माण उद्योग
  2.  लघु एवं कुटीर उद्योग
  3. . खनिज उद्योग

3. तृतीयक क्षेत्र:- तृतीयक क्षेत्र का सम्बन्ध क्षेत्र सेवा सम्बन्धी गतिविधियों से जुड़ा होता है। इस क्षेत्र में मानव श्रमशक्ति की  भूमिका अहम होती है। परिवहन संचार व्यापार आदि से सम्बद्धित गतिविधियों को इसके अन्तर्गत सम्मिलित किया जाता है, कारण यह है कि अधिकांश सेवाओं का निष्पादन कुशल श्रमिक को व्यवसायिक दृष्टि से प्रशिक्षित विशेषज्ञों और परामर्शदाताओं के द्वारा किया जाता है। विकास अर्थशास्त्रियों ने तृतीयक क्रियाओं वाले क्षेत्र को सेवा उद्योग कहा है।