आनुवांषिक अणु-डी0एन0ए0 (GENETIC MOLECULE-DNA)

आनुवांषिक अणु-डी0एन0ए0 (GENETIC MOLECULE-DNA)

जीवों के वे सब लक्षण जो इनकी एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में जाती हैं, आनुवांशिकी लक्षण कहलाते हैं। आनुवांशिकी लक्षणों के एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में जाने की प्रक्रिया को आनुवांशिकता या वंशागति कहते हैं।

नर एवं मादा लैंगिक कोशिकाएॅ युग्मक कोशिकाएॅ अथवा गैपीट्स कहलाते हैं। प्रजनन में एक नर तथा एक मादा युग्मक कोशिकाओं के संयुग्मन से एक नई कोशिका जाइगोट का निर्माण होता है। जाइगोट रूपी यह अकेली कोशिका ही जीवों की एक पीढ़ी को अगली पीढ़ी से जोड़ने वाली कड़ी का काम करती है।

कोशिकाओं की खोज 1665 में राबर्ट हुक ने कोशिकाओं में केन्द्रक की उपस्थिति का पता राबर्ट ब्राउन द्वारा नायगेली ने विभाजित होती हुई पादप कोशिकाओं में केन्द्रक के द्विविभाजन और इसमें उपस्थित दण्डवत रचनाएॅ देखी। बाद में बाल्डेयर ने इन्हें क्रोमोसोम दिया।

एल्टमान :- ने केन्द्रीय पदार्थ को निकाल कर इसमें प्रोटीन को अलग किया और शेष फास्फोरस युक्त पदार्थ को न्यूक्लीय अम्ल का नाम दिया। कोसेल नेपता लगाया कि न्यूक्लीक अम्लों का विखण्डन करने पर चार प्रकार के नाइट्रोजनी क्षार-एडीनीन एवं गुवानीन प्यूरिन समाक्षर तथा साइटोसीन एवं थयमीन पिरिमिडीन क्षार फास्फोरिक अम्ल तथा कुछ कार्बोहाइडेªट पृथक होते हैं।

लेवीन ने केन्द्रक के न्यूक्लीय अम्ल में उपस्थित शर्करा राबइोस से भिन्न होती है, इसीलिए शर्करा को डीआक्सीराइबोस नाम दिया गया। इस प्रकार केन्द्रीय कोशिकाओं में दो प्रकार के न्यूक्लीय अम्ल- डी आक्सीराइबो न्यूक्लीक अम्ल डी0एन0ए0 तथा राइबोन्यूक्लीय अम्ल आर.एन.ए. होते हैं।

डी0एन0ए0 मुख्यतः केन्द्रक में होता है और इसके न्यूक्लिओटाइड अणुओं में शर्करा डी आक्सीराइबोस तथा नाइट्रोजनीय समाक्षार एडीनीन, गुवानिन साइटोसन अथवा थायमिन होता है। इसके विपरीत आर.एन.ए. मुख्यतः कोशिकाओं के साइटोसाॅल में होता है इसके न्यूक्लियोंटाइड अणुओं में शर्करा राइबोस तथा नाइट्रोजनीय समाक्षार एडीनीय, गुवानिन तथा साइटोसीन अथवा यूरेसिल होता है। डी.एन.ए. आनुवांशिक पदार्थ का काम करता है।
कोशिकाओं के अणुओं में औसतन 14 प्रतिशत अणु प्रोटीन्स के होते हैं।

डी0एन0ए0 अणुओं की आकृति एवं स्थिति

आकृति के अनुसार जीवों में दो प्रकार के डी0एन0ए0 अणु पाये जाते है- वृत्ताकार तथा रेखाकर। पूर्व केन्द्रीय कोशिकाओं जीवाणुओं एवं नीले हरे शैवालों में केवल एक युग्मित और अत्यधिक वलित वृत्ताकार डी0एन0ए0 अणु होता हैै जो कोशिका के मध्यभाग में केन्द्रक की अनुपस्थित के कारण कोशिका द्रव्य के ही एक विशेषकृत क्षेत्र में स्थित रहता है। इसे न्यूक्लिओइड कहते हैं। कुछ जीवाणुओं में न्यक्लिओइड से बाहर भी कोशिका द्रव्य में एक या अधिक छोटे वृत्ताकार डी0एन0ए0 अणु होते है जिन्हें प्लास्पिड्स कहते हैं। यूकैरियोटिक कोशिकाओं में रेखाकार तथा वृत्तकार दोनो प्रकार के डी0एन0ए0 अणु होते हैं।

डी.एन.ए. अणु निम्नलिखित चार प्रकार के डीआक्सीराइबो न्यक्लिओटाइड अणुओं के बहुलक होते हैं।
(1) डीआक्सी एडिनिलिक अम्ल (Damp)  में नाइट्रोजनीय क्षार गुवानिन।
(2) डी आक्सी गुवानिलिक अम्ल (Damp)  में   नाइट्रोजनीय क्षार गुवानिन
(3) डीआक्सी गुवानिलिक अम्ल(Damp)   में नाइट्रोजनीय क्षार साइटोसीन।
(4) थाइमिडिलिक अम्ल(Tmp)  में नाइट्रोजनीय क्षार थायमिन होता है।

प्रत्येक D.N.A अणु स्वयं तीन घटक अणुओं का बना संयुक्त अणु होता है- एक अणु फास्फेट समूह का, एक डीआक्सीराइबोस शर्करा का तथा एक नाइट्रोजनीय समाक्षार की डी0एन0ए0 अणुओं की संरचना ज्ञात करने का प्रथम प्रयास लेवीन ने 1909- 1910 में किया। इन्होंने ट्रेटान्यूक्लिओटाइड परिकल्पना दिया, जिसके अनुसार डी.एन.ए अणुओं में विविधता की गुंजाइश कम हो।

इसे मान्यता नहीं मिली एर्विन शरमाफ ने लेवीन के मत को नकारते हुए बताया कि गुवानिन की संख्या साइटोसीन के बराबर होती है A=T,G=C,A+G=T+Cविभिन्न जीव-जातियों के डी.एन.ए. में एडीनीऩथायमिन तथा गुवानिऩसाइटोसीन का अनुपातA+T:G+Cभिन्न-भिन्न होता है। परन्तु एक ही जीव जाति के सारे सदस्यों में यह समान होता है। डी.एन.ए. का प्रत्येक अण्ुा एक नहीं बल्कि अगल बगल जुड़ी दो पाली न्यूक्लिओटाइड शृंखलाओं का बना अर्थात डी0एन0ए0 द्वैध होता है। एक शृंखला पर का समाक्षर अनुक्रमAGCTTAAGR दूसरी श्रंखला पर के TCGAATTGA अनुक्रम से जुड़ा होगा।

ट्राईलियम :-  के गुणसूत्र लगभग 30μ आकार के होते हैं। गुणसूत्रों की संरचना में निम्न भाग पाये जाते हैं-
प्रत्येक गुण सूत्र दो अर्द्धगुणसूत्रों से बना होता है। ये आपस में सर्पिल क्रम में लिपटे रहते हैं। क्रोमोटिड्स एसिटोकार्मिन क्षारीय फुशिन आदि से स्टेन किये जा सकते हैं। इनका वह भाग जो गहरा स्टेन होता है ‘हैट्रोकोमेटिन’ कहलाता है। इसमें डी0एन0ए0 कम तथा आर0एन0ए0 अधिक मात्रा में होता है। क्रोमेटिड्स का जो भाग हल्का स्टेन लेता है उसे यूक्रोमेटिन कहते हैं। इसमें डी.एन.ए. अधिक मात्रा में पाया जाता है। क्रोमेटिड्स पर अनेक उभार पाये जाते हैं। उन्हें क्रोमोमियर्स कहते हैं।

कोशिका विभाजन की मध्यावस्था व पस्चाताप अवस्था में गुणसूत्र के दोनों क्रोमोटिड्स सेन्टोमियर द्वारा परस्पर जुडे रहते हैं। मध्यावस्था में सेन्ट्रोमियर विभाजित हो जाता है। जब गुण सूत्र पर सेण्ट्रोमियर नहीं पाया जाता तो इसे एसेन्ट्रिक कहते हैं और सेण्ट्रोमियर की संख्या दो या अधिक होती है तो इसे डाइसेन्ट्रिक या पालीसेन्ट्रिक कहते हैं।

सेटेलाइट गुणसूत्र :-  कुछ गुणसूत्रों में द्वितीयक संकीर्णन होता है इसके फलस्वरूप गुणसूत्र का छोटा गोलाकार भाग सैटेलाइट कहलाता है। इस प्रकार के गुणसूत्र को सैट गुणसूत्र कहते है।

टीलोमियर :- गुणसूत्र के विशिष्ट छोर हैं, ये क्रियात्मक भिन्नता एवं धु्रवता को प्रदर्शित करते हैं। गुणसूत्र न्यूक्लिओप्रोटीन्स का बना होता है। इसमें हिस्टोन प्रोटीन लगभग 45-50 प्रतिशत डी0एन0ए0 लगभग 39-40 प्रतिशत अम्लीय प्रोटीन्स लगभग 8-9 प्रतिशत आर0एन0ए0 1-2 प्रतिशत तथा सूक्ष्म मात्रा में धातु आयन्स होते हैं।

डी0एन0ए0 की द्विकुण्डिलत संरचना :

फ्रैंकलिन तथा चिल्किंस ने 1951 एवं 1953 में डी0एन0ए0 अणु की द्विसूत्री कुण्डलिनी की भाॅति बताया।
1953 में वाटसन तथा क्रिक ने डी0एन0ए0 अणु की संरचना का त्रिविम प्रतिरूप प्रस्तुत किया। डी0एन0ए0 दो प्रति समानान्तर पाॅली न्यूक्लियोटाइड शृंखलाओं से बनी कुण्डलित संरचना होती है। प्रत्येक पाॅली न्यूक्लियोटाइड का निर्माण हजारों लाखों न्यूक्लियोटाइडों से होता है। वाटसन तथा क्रिक के अनुसार थयमीन तथा एडीनिन दो हाइड्रोजन बन्धों ज्त्र। द्वारा तथा गुवानिन एवं साइटोसीन तीन हाइड्रोजन बन्धों ळत्रब् द्वारा जुड़ते है। डी0एन0ए0 अणुओं में ध्रुवीय परमाणुओं के कारण जलरागी तथा अधुवीय परमाणुओं के कारण जलरोधी आकर्षण पाया जाता है। डी0एन0ए0 अणु एक दूसरे के ऊपर स्थित होने के कारण समाक्षार जोड़ियों के बीच वान्डरवाल्स बल का आकर्षण होता है।

वाटसन एवं क्रिक ने जिस डी0एन0ए0 अणु संरचना का प्रतिरूप प्रस्तुत किया उसे अबB D.N.A  कहते हैं। इसके प्रत्येक कुण्डल में 10.4 (पहले 10) न्यूक्लियोटाइड जोड़ियाँ होती है। अब एक A.D.N.A का भी पता चला है जिसमें प्रत्येक कुण्डल में 11 न्यूक्लियोटाइड जोडियाँ होती है।B.D.N.A का ऐसा खण्ड जिसमें समाक्षरों का अनुक्रम CG CG CG होता है, उच्च लवणता की दशा में वामार्वत दिशा में कुण्डलित हो जाता है। यह द्विकुण्डलिनी टेढ़ी-मेड़ी होती है, और इसके प्रत्येक कुण्डलों में न्यूक्लियोटाइड्स की बारह जोड़ियाॅ होती है। इर्से Z-D.N.A का नाम दिया गया है।

गुणसूत्र (Chromsome) की संरचना :- कोशिका विभाजन की अन्तरावस्था के केन्द्रक में गुण सूत्र क्रोमैटिन के बने लम्बे पतले-गहरे रंग के तन्तुओं का जाल होता है। कोशिका विभाजन मध्यावस्था में गुणसूत्र स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ते हैं। इन्हें सर्वप्रथम स्ट्रासबर्गर ने देखा वाल्डेयर ने इन्हें गुणसूत्र नाम दिया। सटन एवं बाबेरी ने गुणसूत्रों आनुवंशिकी का गुणसूत्र सिद्धान्त प्रतिपादित किया।

गुणसूत्रों का सामान्य आकार 0.5 से 30μ ग 0ण्2-3μ होता है। मनुष्य 5-6 μ ड्रोसोफिला के गुणसूत्र 3μ होते हैं। न्यूक्लिक अम्ल की खोज फ्रेडरिक मीशर ने की थी। न्यूक्लिक अम्ल नाम अल्टमान ने दिया डी0एन0ए0 दो पाॅली न्यूक्लियोटाइड श्रंखलाओं से बना होता है। पाॅली न्यूक्यिोटाइड शृंखला का निर्माण न्यूक्लियोटाइड से होता है। न्यूक्लियोटाइड न्यूक्लिक अम्ल की संरचनात्मक इकाइयाॅ होती हैं।

प्रत्येक न्यूक्लियोटाइड तीन अणुओं से बना होता है-
(1) पेन्टोज षर्करा :-  डिआक्सीराइबोस या राइबोस प्रकार की होती है। ये क्रमशः डी0एन0ए0 तथा आर0एन0ए0 में पायी जाती है।
(2) नाइट्रोजन समाक्षार :-  प्यूरीन अथवा पिरीमिडिन होते हैं।
(3) फस्फोरिक अम्ल :-  फास्फेट के नाम से जाना जाता है।
नाइट्रोजन समाक्षार तथा पेन्टोज शर्करा अणु मिलकर न्यूक्लियोसाइड बनाते हैं। न्यूक्लियोसाइड को एडीनोसिन गुवानोसीन, थाइमिडीन, साइटिडीन, और यूरिडीन कहते हैं।

न्यूक्लियोसाइड्स एवं फास्फोरिक अम्ल परस्पर मिलकर न्यूक्लियोटाइड बनाते हैं। इस प्रकार न्यूक्लियोटाइड पाँच प्रकार के होते हैं- एडीनीलिक, गुवानिलिक, थाईमिडलिक, साइटिडिलिक तथा यूरिडिलिक अम्ल।

न्यूक्लियोसोम की संरचना अथवा गुणसूत्र की परासंरचना अथवा यूकैरियोटिव गुणसूत्र की अण्विक सरंचना।
क्रोमेटिन संरचना का माॅडल/परिकल्पना कोर्नबर्ग तथा थामस ने प्रस्तुत किया। न्यूक्लियोसोम शब्द का सर्वप्रथम थामस ने प्रस्तुत किया। न्यूक्लियोसोम लिंकर डी0एन0ए0 द्वारा जुडे़ होते हैं। न्यूक्लियोसोम 10 nm व्यास के तस्तरीनुमा होते हैं। प्रत्येक में क्षारीय प्रोटीन से बना कोड कण तथा एक डी0एन0ए0 हेलिक्स होता है।

क्रोड कण आठ अणुओं से अष्टभागी संरचना होती है। ये हिस्टोन प्रोटीन से बने होते हैं। इसमें भ्2। तथा भ्2ठ से बने दो डाइमर तथा भ्3 तथा भ्4 के दो-दो अणुओं से बना टेट्रामर होता है। क्रोड कण का व्यास 11 nm तथा ऊचाई 6 nm होती है।

डी0एन0ए0 हेलिक्स :-  डी0एन0ए0 से बना एक खण्ड होता है। इसका निर्माण लगभग 200 न्यूक्लियोटाइड्स से होता है। डी0एन0ए0 खण्ड के लगभग 160 न्यूक्लियोटाइड्स हिस्टोन क्रोड के चारों ओर दो चक्र बनाते हैं। शेष न्यूक्लियोटाइड्स लिंकर डी0एन0ए0 में अधिकतम 80 न्यूक्लियोटाइड्स होते हैं। H.1 प्रोटीन क्रोड पर लिपटे डी0एन0ए0 के दोनों सिरो से जुड़ा होता है।

गुणसूत्रों के कार्य :- अनुवांशिक लक्षणों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुँचाना, जीवों में उत्परिवर्तन, विभिन्नताएँ उत्पन्न करके जैव विकास में सहायक होना, लिंग निर्धारण लक्षण एवं विकृतियों की जानकारी देना, जैविक क्रियाओं का नियऩ्त्रण एवं नियमन आदि कार्य हैं।

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