ब्रह्माण्ड  (THE UNIVERSE)

1. ब्रह्मांड की उत्पत्ति के संदर्भ में सर्वाधिक मान्यता प्राप्त सिद्धान्त बिग बैंग (Big Bang) सिद्धांत है। इसका प्रतिपादन बेल्जियम के खगोलशास्त्री जार्ज लेमेन्तेयर ने किया था।

2. बिग बैंग सिद्धांत के अनुसार आज से 15 अरब वर्ष पूर्व सभी आकाशगंगायें (तारों के पुंज) एक गर्म मूलभूत बिन्दु पर धनीभूत थी जिसमें विस्फोट से ब्रह्माण्ड की रचना हुई।

ब्रह्माण्ड ( Universe ) – अंतरिक्ष में मौजूद समस्त आकाशीय पिण्डों की सुव्यवस्था है। ब्रह्मांड में सभी आकाशीय पिण्ड एक निश्चित दिशा, निश्चित दूरी तथा एक निश्चित गति से गतिमान पाये जाते हैं।

अंतरिक्ष ( Space ) : पृथ्वी के वायुमंडल के बाहर स्थित असीमित एवं अनंत आकाश को अंतरिक्ष कहा जाता है। यह वायुरहित क्षेत्र होता है।

आंकाशगंगा/मंदाकिनी:- मंदाकिनी असंख्य तारों का पुंज या जमाव होता है।

हमारी मंदाकिनी का नाम आकाशगंगा है। यूनानी भाषा में आकाशगंगा को गलेक्सी (Galaxy) कहा गया है। आकाशगंगा की आकृति तीन प्रकार की होती है-

  1. दीर्घवृत्ताकार
  2. सर्पिलाकार
  3.  विषम आकार

हमारी आकाशगंगा (मंदाकिनी) का आकार सर्पिलाकार है। प्रत्येक आकाशगंगा में करीब 100 अरब तारे पाये जाते हैं।

  • सूर्य की हमारे आकाशगंगा से दूरी 32 हजार प्रकाश वर्ष है।
  • सूर्य की आकाशगंगा के केन्द्र की परिक्रमण गति 250 किमी/से0 है।
  • सूर्य आकाशगंगा के केन्द्र की एक परिक्रमा 221/2 करोड़ वर्ष में पूरा करता है।
  • हमारी आकाशगंगा के सर्पिलाकार आकृति में तीन भुजाएं पाई जाती है।
  • हमारी आकाशगंगा की पहली भुजा पर पुराने लाल नारंगी तारे पाये जाते हैं।
  • इसकी दूसरी भुजा पर युवा पीले तारे पाए जाते हैं।
  • सूर्य की स्थिति इसी दूसरी भुजा पर पायी जाती है।
  • हमारी आकाशगंगा की तीसरी भुजा पर नवजात तारे पाए जाते हैं।

मिल्की वे/दुधिया मेखला (Milkyway)

पृथ्वी से हमारी आकाशगंगा की जो भुजा दृश्यमान होती है उसे मिल्की वे कहा जाता है।

तारा (Stars)

  • तारे चमकदार गैसों के पिण्ड होते है। तारांे में सबसे अधिक हाइड्रोजन गैस 70% की मात्रा पाई जाती है। तत्पश्चात् हीलियम 25% कार्बन, नाइट्रोजन, आक्सीजन 1.5% एवं आयरन 0.5% पाया जाता है।
  • आकाश में सबसे तेज चमकने वाला तारा साइरस है।
  • सूर्य के पश्चात् सबसे निकटवर्ती तारे का नाम प्राक्सिमा सैंटोरी है जिसका प्रकाश पृथ्वी पर लगभग 4 वर्ष में पहुंच पाता है।
  • पृथ्वी के निकटतम् तारे क्रमशः है-प्राॅक्सिमा सैंटोरी, अल्फा, बनार्ड तारा।

पोल स्टार (Pole Star) –पृथ्वी के ध्रुव पर 90 अंश  का कोण बनाने वाला तारा पोल स्टार कहलाता है।

आदि तारा-आदि तारा हाइड्रोज एवं हीलियम गैसों के पिण्ड होते हैं। जिनके अणु परस्पर गुरूत्वाकर्षण शक्ति के कारण संघनित होने लगते हैं। तारे की यह प्रारंभिक अवस्था ही आदि तारा कहलाती है।

लाल भ्रूण तारा-तारे के विकास की यह दूसरी अवस्था होती है। इस अवस्था में हाइड्रोजन तथा हीलियम गैस के अणु-परमाणु के परस्पर टकराव एवं स्ंाघनन की प्रक्रिया के कारण तारों में अत्यधिक ताप वृद्धि हो जाती है। जिससे तारे का रंग लाल सा दिखाई पड़ने लगता है तारे की यह अवस्था ही लाल भू्रण तारा कहलाती है।

युवा पीला तारा-तारे की इस तीसरी अवस्था में तारे में मौजूद हाइड्रोजन गैस का हीलियम गैस के रूप में संलयन प्रारंभ हो जाता है। तारे की यह अवस्था युवा पीला तारा है।

लाल दानव तारा-तारे के विकास की यह अंतिम अवस्था है। इस अवस्था तक पहुंचते-पहुंचते तारे के केंद्र में मौजूद संपूर्ण हाइड्रोजन का हीलियम में संलयन हो चुका होता है, जिससे तारे का रंग लाल हो जाता है। पर तारे के वाह्य कवच में अभी भी हाइड्रोजन का हीलियम में संलयन जारी होता है तो उसका प्रसार होता जाता है।

श्वेत वामन (White dwarf) लाल दावन की अवस्था में पहुंचने के उपरांत तारे के बाह्य कवच का प्रसरण अंतरिक्ष में क्रमशः हो जाता है तो लाल दानव तारे का क्रोड शेष मात्र रह जाता है जिसे श्वेत वामन कहते हैं।

नोवा तथा सुपरनोवा-लाल दानव तारे की अवस्था के पश्चात् जब तारे के केवल बाह्य कवच में विस्फोट की स्थिति उत्पन्न होती है तो उसे नोवा कहते हैं। नोवा की यह घटना तब घटित होती है जब तारे का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान से अधिक हो जाता है। उसके विपरीत जब कभी संपूर्ण तारे में विस्फोट की स्थिति उत्पन्न हो जाती है तो उस घटना को सुपरनोवा कहा जाता है।

चन्द्रशेखर सीमा (Chandrashekhar limit) जब तारे का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के 1.4 गुना से अधिक होता है तो तारा में विस्फोट की घटना होती है। इसी सीमा को चन्द्रशेखर सीमा कहते हैं।

न्युट्रान तारा (Neutron Star) – तारा में विस्फोट के पश्चात् न्युट्रान की मात्रा शेष रह जाती है (अधिकतम पाई जाती है)। इस न्युट्रान युक्त तारा को ही न्युट्रान तारा कहा जाता है।

पल्सर (Pulsors) – पल्सर की खोज एंथनी हैविस तथा बेल महोदय ने 1974 ई0 में की थी। घूमता हुआ या प्रचक्रण करता हुआ न्यूट्रान तारा ही पल्सर कहलाता है।

क्वासर्स (Quasers) – तारीय पदार्थ होता है। जिनसे प्रकाश के साथ-साथ रेडियों तरंगे निकलती है। वस्तुतः क्वासर्स ही रेडियों तरंगों की उत्पत्ति के स्रोत माने जाते हैं।

ब्लैक होल/कृष्ण विवर (Black Hole)- तारा के क्रोड का घनत्व अत्यधिक हो जाता है तो उसकी गुरूत्वाकर्षण शक्ति अत्यधिक उच्च हो जाती है, फलस्वरूप जब भी वहां से कोई प्रकाश की किरण गुजरती है तो वह उसमें समाविष्ट हो जाती है, उसका परावर्तन नहीं हो पाता तो इसी तारे को ब्लैक होल कहा जाता है।

न्यूट्रिनों-ब्रह्मांड या अंतरिक्ष में मौजूद द्रव्यमानहीन कण कहलाते हैं। ऐसी मान्यता है कि खगोलय पिंडों का निर्माण इन्हीं से हुआ।

सौरमण्डल सूर्य और उनके चारों ओर पाये जाने वाले ग्रहों, उपग्रहों तथा अन्य खगोलीय पिण्डो को सम्मिलित रूप से सौरमण्डल कहा जाता है।
सौर मण्डल की उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत तथा प्रतिपादक-

  • वायक्य राशि परिकल्पना-काण्ट
  • निहारिका परिकल्पना-लाप्लास
  • ग्रहाणु परिकल्पना-चेम्बरलिन तथा मोल्टन
  •  ज्वारीय परिकल्पना-जेम्स जिन्स तथा जेफरीज
  • द्वयतारक परिकल्पना-होयल एवं लिटिलटन
  • अन्तरतारक धूल परिकल्पना आटोसिमीड
  • अन्तरतारक मेघ धूल परिकल्पना-अल्फाबेन
  • परिभ्रमण एवं ज्वारीय परिकल्पना-रासगन
  • सिफिड परिकल्पना-बनर्जी