अहरार आंदोलन, 1906

1906 ई. में बंगाल के राष्ट्रवादी मुसलमानों द्वारा इस आंदोलन का आरंभ किया गया। इस आंदोलन का लक्ष्य मुसलमानों की राष्ट्रीय आंदोलन में सहभागियता को प्रोत्साहित करना तथा ब्रिटिश राज्य के प्रति स्वामिभक्ति की भावना को हतोत्साहित करना था। इस आंदोलन का नेतत्व मौलाना मोहम्मद अली, हकीम अजमल खाॅ, मौलाना जफर अली खान, हसन इमाम, नजरूल हक इत्यादि द्वारा किया गया।

 मार्ले -मिंटो सुधार, 1909

भारत में बढ़ती हुई अशांति और उपद्रव की स्थिति के बीच ही लाॅर्ड मिंटो (द्वितीय) ने भारत जनरल तथा लार्ड मार्ले ने इंग्लैड में भारत सचिव का पद संभाला। भारत परिषद में सुधार हेतु इन दोनों ने एक विस्तृत योजना का निश्चय किया। लाॅर्ड मार्ले की अनुमति प्राप्त कर लार्ड मिण्टो ने एक समिति की गठित की, जिसका कार्य विघान परिषदों में अधिक प्रतिनिधित्व बजट को प्रस्तुत एवं संशोधित करने की प्रक्रिया पर विचार करना तथा बजट पर वाद-विवाद करने के लिए अधिक समय प्रदान करने पर विमर्श करना था। तीन वर्ष के पश्चात् यह योजना 1909 में मार्लें-मिन्टो सुधारों के रूप में दृष्टिगत हुई। यह योजना विधेयक रूप में 25 मई, 1909 को पारित की गई तथा 15 नवम्बर 1909 को भारत परिषद अधिनियम के रूप मे राजकीय अनुमोदन के पश्चात् लागू हो गयी। इस अधिनियम के द्वारा ब्रिटिश सरकार नरम दल कोअपनी ओर आकर्षित करना चाहती थी जबकि इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य मुसलमानों की प्रथक निर्वाचक पद्धति की माॅग को स्वीकार कर संप्रदायिकता को बढ़ावा देना था। कालांतर में अंग्रेजों की यही नीति भारत के विभाजन का कारण बनी। इसी अधिनियम के अंतर्गत केन्द्रीय एवं प्रांतीय विधानमण्डलों के आकार एवं उनकी शक्ति में वृद्धि की गयी। कांगे्रस के द्वारा लाहौर अधिवेशन (1909 ई.) में इन सुधारों का कडा़ विरोध किया गया, जबकि कट्टरपंथी मुसलमानों ने इसका स्वाग किया।

राजद्रोह (रक्षण) सभा अधिनियम, 1911

सन् 1911 ई. का राजद्रोह (रक्षण) सभा अधिनियम क्रांतिकारी गतिविधियों केदमन के लिए लाया गया था। ध्यातव्य है कि मार्ले-मिन्टो सुधारों पर तीब्र प्रतिक्रिया व्यक्त करते हए उग्रवादी राष्ट्रवादियों द्वारा क्रांतिकारी गतिविधियों को काफी तीब्र कर दिया गया था। इस अधिनियम मे सरकार के विरूद्ध सभा करने पर कठोर दण्ड का प्रावधान किया गया। इसी आधार पर लाला लाजपत राय तथा अजीत सिंह को गिरफ्तार किया गया। प्रेस की भूमिका को सीमित करने के उदेश्य से भारतीय प्रेस एक्ट पारित किया गया, जिसके परिणामस्वरूप समाचार-पात्रों की स्वाधीनता छीन ली गई। इन्हीं नीतियों के विस्तार के क्रम में 1913 ई का फौजदारी अधिनियम पारित किया, जिसका उद्देश्य ही राष्ट्रवादी आंदोलन का दमन करना था।

 दिल्ली दरबार,

इंग्लैण्ड के सम्राज जार्ज पंचम तथा महारानी मेरी के स्वागत में लाॅर्ड हांर्डिग द्वारा 12 दिसम्बर 1911 को दिल्ली में एक भव्य दरबार का आयोजन किया। इसी दरबार में बंगाल का विभाजन रद करने की घोषणा की गई तथा बंगाल प्रांत का पुनर्गठन किया गया, जिसमें सिलह के अतिरिक्त सभी बंगाली भाषी जिले शामिल किये गये। असम को उसकी पूर्व स्थिति 1874 ई के अनुसार एक नए प्रांत के रूप में गठित किया गया तथा सिलहट को भी इसमें शामिल किया गया। दिल्ली दरबार की सबसे महत्वपूर्ण घोषणा थी- भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानान्तरित करना। अधिकारिक घोषणा में यह स्पष्ट किया गया कि भागोलिक, ऐतिहासिक एवं राजनीतिक कारणों से दिल्ली को राजधानी के रूप में चुना गया है। स्पष्ट हैकि भौगोलिक कारण कहना निराधार एवं अप्रासंगिक था क्योंकि दिल्ली भारत के केेन्द्र में स्थित नहीं थी। ऐतिहासिक कारण कहने से तात्पर्य उस योजना से था जिसके द्वारा मुगलकालीन गौरवशाली परंपरा को पुनर्जीवित करके भारतीय मुसलमानों का समर्थन हासिल करना एवं उन्हें प्रसन्न करना था। बहरहाल, इसका वास्तविक एवं राजनीतिक उदेश्य बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन के केन्द्र कलकत्ता की प्रतिष्ठा को न्यून करना था। दिल्ली राजनीतिक हलचलों से अप्रभावित शहर था, इसलिए 23 दिसम्बर 1912 से दिल्लाी को नई राजधानी के रूप में परिवर्तित कर दिया गया।

हार्डिंग बम कांड

23 दिसम्बर 1912 को राजधानी परिवर्तन के दिन जब लाॅर्ड हर्डिग ब्रिटेन के शाही राजवंश एवं अपने परिवार के साथ एक भव्य समारोह के साथ दिल्ली में प्रवेश कर रहा था। उस समय लाॅर्ड हार्डिंग के जुजूस पर बम फेंका गया, जिसमें वह घायल हो गया। यह बम बसंत विश्वास एवं मन्मथ नाथ से जाना जाता है। इस मुकदमें में बसंत विश्वास, बाल मुकुंद अवध बिहारी तथा मास्टर अमीरचंद्र को फाॅसी दी गयी। षड्यंत्र केस के नाम से जाना जाता है। इस मुकदमें में बसंत विश्वास, बाल मुकुंद अवध बिहारी तथा मास्टर अमीरचंद्र को फाॅसी दी गयी। षड्यंत्र का भेद खुल जाने के पश्चात् रासबिहारी सन् 1942 में इंडियन इंडिपेेंडेंस लीग का गठन कया। इन्होंने आजाद हिंद फौज की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 प्रथम विश्व युद्ध और भारत

1914 ई. में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान विश्व दो ध्रवों में विभक्त हो गया। प्रथम गुट में जहाॅ जर्मनी, आॅस्ट्रिया, इटली और तुर्की थे, तो वहीं द्वितीय गुट का प्रतिनिधित्व फ्रां, इंग्लैण्ड द्वारा जर्मनी के विरूद्ध युद्ध की घोषणा के उपरांत भारत को स्वमेव युद्धरत  देश मान लिया गया तथा युद्ध के दौरान अंग्रेजों द्वारा भारतीयों एवं यहाॅ के संसाधनों का बुरी तरह शोषण किया गया। उदारवादी नेताओं ने ब्रिटिश सरकार के प्रति पूर्ण निष्ठा की भावना का परिचय दिया। उनका मानना था कि युद्ध समाप्ति के उपरांत ब्रिटिश सरकार को दिए गए सहयोग के बले उनकी स्वराज या स्वशासन की माॅगको पूरा किया जाएगा। युद्धके दौरान देश में फैले राष्ट्रवाद की लहर का यहाॅ की राजनीतिक व्यवस्था पर तात्कालिक प्रभाव पड़ा। इसमें बेसें एवं तिलक द्वारा प्रारंभ किये गये होमरूल आंदोलन का महत्वपूर्ण योगदान था। इसी दौरान क्रांतिकारी एवं आंतकी गतिविधियों ने भी जोर पकड़ा। इससे निपटने के लिए ब्रिटिशसरकार ने भारतीय अपराध कानून संशोधन अधिनियम तथा भारत सुरक्षा अधिनियम जैसे उत्पीड़क कानून लागू किए। आतंकी एवं क्रांतिकारी घटनाओं की न्याय-प्रक्रिया के लिए विशेष न्यायाधिकारों का गठन किया गया। सैकड़ों क्रांतिकारियों को ठीक से मुकदमा चलाए बिना ही कालापानी की सजा या कठोर यात्नांएॅ दी गयी।    प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन की सरकार द्वारा तुर्की के विरूद्ध की गई युद्ध की घोषण सेमुस्लिम लीग,जो अब तक ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा रखती थी, का मोहभंग हो गया। तुर्की में आटोमन साम्राज्य के विघटन एवं पराजय के उपरांत मुस्लिम लीग ने कांग्रेस के साथ संबंधों को घनिष्ट करने का प्रयास किया, जिसकी परिणति लखनऊ समझौता (स्नबादवू च्ंबज ) एवं खिलाफत आंदोलन  के रूप में हुई।

 होमरूल आंदोलन 

1914 ई0 के आठा वर्ष की सजा काटकर तिलक जेल से रिहा हुए। इन परिस्थितियों में स्वराज प्राप्ति के लिए सरकार पर दबाव डालने के उद्देश्य से तिलक एवं ऐनी बेसेंन्ट ने एक ऐसे आंदोलन को आंरभ करने का निर्णय लिया जो व्यवस्था के अधीन रहते हुए संघर्ष कर सके। इसी उद्देश्य से इन दोनों ने आरयरलैंड के होमरूल आंदोलन से प्रेरणा लेते हुए भारत में होमरूल आंदोलन का सूत्रपात किया। होमरूल मूलतः आयरिश आंदोलन था जिसका नेतृत्वकर्ता रेमाण्ड था।

स्वशासन के उदेश्य को महत्व देते हुए धार्मिक स्वतंत्रता, राष्ट्रीय शिक्षा तथा राजनीतिक एवं सामाजिक सुधार को अपना आधारभूत कार्यक्रम कानते हुए दो अलग-अलग होमरूल लीगों की स्थापना की गयी। पहला, अर्पैल 1916 में तिलक ने पूना में तथा दूसरा सिबंर 1916 में एनीबेसेट ने मद्रासमें अखिल भारतीय होमरूल लीग की स्थपना की।ब्रिटिश शासन के अधीन रहते हुए संवैधानिक तरीके से स्वशासन प्राप्त करना इस आंदोलन का उदेश्य था।

  तिलक की होमरूल लीग

तिलक द्वारा स्थापित होमरूल के अध्यक्ष जोसेफ बैपतिस्ता तथा एन0सी0 केलकर थे। इस होमरूल लीग का कार्यक्षेत्र महाराष्ट्र (मुंबई को छोड़कर ) कर्नाटक, मध्य प्रांत एवं बरार तक फैला था। तिलक ने मराठी भाषा में केसरी और अंगे्रजी में मराठा नामक पत्रों के माध्यम से होमरूल की अवधारणा का प्रचारकिया। इन्होंने संूपर्ण भारतवर्ष का भ्रमण कर स्वराजप्रप्ति के लिए जनमत तैयार कने का प्रयास किया और नारा दिया कि ’’ स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और इसे मैं लेकर रहूॅगा’’

एनी बेसेंट की आॅल इंडिया होमरूल लीग

एनी बेसेंट द्वारा स्थापित होमरूल लीग के सचिव जाॅर्ज अरूण्डेल थे तथा अन्य सदस्यों में बी.पी. वाडिया सी.पी. रामास्वामी अय्यर, जवाहरलाल नेहरू, वी. चक्रवर्ती तथा जे. बनर्जी जैसे प्रमुख लोकप्रिय नेता थे। गोपालकृष्ण गोखले द्वारा स्थापित सर्वेंण्ट्स आॅफ इंडिया सोसाइटी   के सदस्यों को लीग की सदस्यता ग्रहण करने से प्रतिबधित कर दिया गया था। एनी बेसंेट की लीग पर तिलक के क्षेत्रों को छोड़कर संपूर्ण भारतवर्ष में अपने कार्यक्रमों का प्रसार करने का दायित्व था। 1917 ई. मे एनी बेसेंट कांग्रेस की अध्यक्षा बनीं। अध्यक्षा के पद पर रहते हुए उन्होंने कहा- ’’ भारत अब अनुग्रहों के लिए अपने घुटनों पर नहीं बल्कि अधिकारांे के लिए अपने पैरों पर खड़ा है।’’

ब्रिटिश सरकार होमरूल आंदोलन की बढ़ती लोकप्रियता से चिंतित हो गई, जिसके परणिामस्वरूप जून 1917 एनी बेसंेट जाॅर्ज अरूण्डेला तथा वी0पी0 वाडिया को गिरफ्तार कर लिया। सर बुब्रहम्ण्यम अय्यर ने इस गिरफ्तारी के विरोध में अपनी नाइटहुड की उपाधि वापस लौटादी। इस आंदोलन की व्यापकता ने भारतीय राजनीति से उदारवादियों के प्रभाव को लगभग समाप्त कर दिया। लीग के गठन से कांग्रेस में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ, जिसने नए वायसराय को व्यापक सुधार कार्यक्रमों की घोषणा करने के लिए बाध्य करदिया। परिणामस्वरूप, भारत सचिव मांटेग्यू ने 20 अगस्त 1917 को ब्रिटिश संसद में इस आशय का प्रस्ताव पारित किया जिसमें भारत को उत्तरदायी शासन देने की बात कही गई थी। इस घोषणा से एनी बेसेंट शांत हो गई जबकि दूसरी और जिलक को इंडिया आनरेस्ट के लेखक वेलेंटाइन चिरोल पर मानहानि का मुकदमा दायर करने के लि लंदन जाना पड़ा। इस प्रकार यह आंदोलन नेतृत्वविहीन होकर खत्म हो गया।

लखनऊ समझौता, 1916

लखनऊ समझौता, 1916  सूरत अधिवेशन (1917) से लेकर 1915 तक कांग्रेस पर उदारवादियों का वर्चस्व रहा तथा ये किसी भी हाल में उग्रवादियों के साथ संबंध स्थापित करना नहीं चाहते थे।

उदारवादियों एव ंउग्रवादियों के इस मतभेद ने राष्ट्रीय आंदोलन को काफी कमजोर कर दिया था। 1915 ईं में उदारवादी नेता गोपालकृष्ण गोखले एवं फिरोशाह मेहता की मृत्यु हो गई। ऐसी परिस्थिति में यह महसूस किया गया कि यदि राष्ट्रीय संघर्ष में तीब्रता लानी हैतो दोनों विचारधारा के नेताओं को एक साथ मंच पर आना होगा। इसके लिए ऐनी बेसेट ने गरम दल एवं नम दल के नेताओं कोएक साथ लाने का प्रयास किया, जिसकी परिणति कांग्रेस के 1916 लखनऊ अधिवेशन में देखने को मिली। इस अधिवेशन की अध्यक्षता अंबिका चरण मजूमदार ने की।

यह अधिवेशन दो दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा। पहला तिलक के नेतृत्व में गरमपंथियों का कांग्रेस में पुनर्प्रवेश तथा दूसरा,कांग्रेस और मुस्लिम लीग के माध्यम समझौता। कांगे्रेस और मुस्लिम ने प्रथक्-पथक् ढंग से वंवैधानिक सुधारों की संयुक्त योजना से संबंधित प्रस्ताव पारित किये और राजनीतिक क्षेत्र में एक-दूसरे के साथ सहयोग करने के संबंध में भी समझौते किये। यह समझौता ’लखनऊ समझौतता’ या लीग-कांग्रेस समझौतता’ नाम से जाना जाता है।

इस समझौते में ही कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए पृथक् निर्वाचन की माॅग स्वीकार कर ली जो कालांतर में भयवाह सिद्ध हुआ। इस समझौते के बाद मुस्लिम लीग ने अपना अलग अस्तित्व बनाए रखा तथा मुसलमानों के लिए पृथक् राजनीतिक अधिकारों की माॅग करता रहा। असहयोग आंदोलन के स्थगित होते ही यह समझौता भंग हो गया तथा कांग्रेस व मुस्लिम लीग एक-दूसरी को प्रतिद्वंद्वी हो गया। यही वह समझौता था जिसने भावी राजनीति के लिए सांप्रदायिकता का बजी बोया। मदन मोहन मालवीय ने लखनऊ समझौता का विरोध किया था।

मांटेग्यू घोषणा, 1917

प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति तथा उसमें प्राप्त भारतीयों के सहयोग, राष्ट्रवादी क्रांतिकारी गतिविधियों को तीव्रता, होमरूल आंदोलन की लोकप्रियता आदि ने ब्रिटिश सरकार को भारत विषयक अपनी नीतियों में परिवर्तन हेतु बाध्य किया। ब्रिटिश प्रधानमंत्री लाॅयड जाॅर्ज द्वारा एडविन मांटेग्यू, जिन्हें भारतीय राष्ट्रीय भावनाओं का समर्थक माना जाता था, को भारत सचिव के पद पर नियुक्त किया गया। 20 अगस्त, 1917 को मांटेग्यू ने ब्रिटेन के हाउस आॅफ काॅमन्स में इस बात की घोषणा की कि भारत में उत्तरदायी सरकार के क्रमिक विकास हेतु भारतीयों को प्रशासन में अधिकाधिक भागीदारी प्रदान की जायेगी और क्रमिक रूप में स्वशासित संस्थाओं का विकास किया जायेगा। मांटेग्यू घोषणा को उदारवादियों ने ’भारत का मैग्नाकार्टा’ कहा है। मांटेग्यू भारतीय नेताओं से विचार-विमर्श करने हेतु भारत-यात्रा पर आये। इसके उपरांत उन्होंने एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की जिसका सम्बंध भारत में संवैधानिक सुधारों से था। कालांतर में यही रिपोर्ट 1919 ई. के भारत सरकार अधिनियम ;ळवअमतदउमदज व िप्दकपं ।बजए 1919द्ध का आधार बनी।

 भारत सरकार अधिनियम, 1919

इस अधिनियम के अंतर्गत सर्वप्रथम उत्तरदायी शासन ;त्मेचवदेपइसम ळवअमतदउमदजद्ध जैसे शब्दों का स्पष्ट उल्लेख किया गया। पहली बार प्रांतों में द्वैध-शासन की स्थापना इसी अधिनियम के अंतर्गत की गयी तथा प्रांतीय विषयों को दो भागों-हस्तांतरित एवं आरक्षित में बाॅट दिया गया। अरक्षित विषयों पर गवर्न जनरल  पने मंत्रियों की सहायता से प्रशासनिक निर्णय लेता था। केन्द्र में भी द्विसदनीय व्यवस्था की गई। ऊपरी सदरन अर्थात काउंसिल आॅफ स्टेट के कुल 60 सदस्यों में से 27 नामांकित तथा 33 निर्वाचित होते थे तथा निचले सदन अर्थात् लेजिस्लेटिव असंबली में कुल 145 सदस्यों में से 41 सदस्य मनोनीति तथा 104 सदस्य निर्वाचित हेाते थे। गवर्नर जनरल तथा उसकी कार्यकारी परिषद (म्गमबनजपअम ब्वनदबपस) पर विधानमंडल का कोई नियंत्रण नहीं था।

भारत सरकार अधिनियम 1919 अंतर्गत ही सर्व प्रथम भारतीय विधानमंडल को बजट पास करने सबंधी धिकार प्रदान किएए गए। भारत में पहली बार लोक सेवा आयोग के गठन का प्रावधान कियागया तथा पंजाब में सिख और मद्रास में गैर-ब्राम्हणों को पृथक निर्वाचन मण्डल का अधिकार प्रदान कया गया।इसी अधिनियम के प्रावधानों के अन्तर्गत प्रत्येक 10 वर्ष पश्चात् शासन-व्यवस्था की कार्य प्रणाली की जाॅच हेतु एक वैधानिक आयोग के गठन का प्रावधान किया गया साइमन कमीशन की नियुक्ति इसी प्रावधान का नतीजा था।

 1919 के अधिनियम का मूल्यांकन:

1919  ई. का भारत सरकार अधिनियम ब्रिटिश औपनिवेशिक हितों से परिचालित था। मांटेग्यू घोषणा के अनुसार इसका उद्देश्य स्वशासी संस्थाओं का विकास करना था, किंतु व्यवहार में इससकी अवहेलना की गईं। स्वशासन को टालनेे के उद्देश्य से प्रांतों में द्वैध शासन लाया गया। अपनी घोषणाओं के विपरीत पृथक निर्वाचन की अवधारणा को न केवल बनाए रख गया, बल्कि उसका विस्तार भी किया गया। भारतीय राजनीति का प्रांतीयकरण तथा संप्रदायवाद को प्रोत्साहन देना इस अधिनियम के उद्देश्य थे। अतः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि 1919 के भारत सरकार अधिनिम में भारतीय जनाकांक्षाओं की अवहेलना कर अंग्रेजो के हितों का ही संवर्धन किया गया।