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सूर्यातप (Insulation)

सूर्यातप

सूर्यातप (Insulation)

सूर्यातप सूर्य की किरण का वह भाग है जो पृथ्वी को प्राप्त होता है। इसको निम्नलिखित प्रकार से समझ सकते हैं।

  • In-coming〉
  •  Sol-Solar 〉
  •  Ation-Radiation〉

लघु तरंगों के रूप में आने वाली सूर्य की किरणें जो 3 लाख किलो मीटर/सेकण्ड या 1 लाख 86 हजार मील से0 की गति से पृथ्वी की सतह पर पहॅुचती है सूर्यातप कहलाती है। इसी को सौर्य ऊर्जा या सौर्यिक विकिरण कहतें हैं। पृथ्वी को सूर्य की कुल ऊर्जा का 1/2 अरबवां भाग ही प्राप्त होता है जो 23 खरब हार्स पावर ऊर्जा के बराबर है।

  •   सूर्य से प्रथ्वी की दूरी 14 करोड़ 96 लाख किमी0 है। सूर्य को प्रकाश पृथ्वी तक अपने प्रकाश को पहुॅचाने में 8 मि0 3 से0 का समय लगता हैै।
  • सूर्य की किरणें पृथ्वी पर लघु तरंगो के रूप मे आती हैं।
  • इसको ¼ Solar Radiation ½ कहा जाता है। और जब पृथ्वी से विकिरण होता जिसे पार्थिव विकिरण कहतें है जो दीर्घ तरंगों के रूप में होता है।

 सूर्यताप को प्रभावित करने वाले कारक :-

1- सूर्य की किरणों का सापेक्ष तिरक्षापन

2- दिन की अवधि

  • विषुवत रेखा पर सभी परिस्थितियों में 12 घंटे का दिन और 12 घंटे की रात होती है।
  • यदि सूर्य कर्क रेखा पर लम्वबत है तो उत्तरी ध्रुव पर 6 महीने का दिन होगा।
  • पृथ्वी की सूर्य से दूरी (14 करोड़ 96 लाख) है।

प्रकाश का पृथ्वी पर पहुॅचने तक घटित होने वाली घटनायें :-

1- Reflection (परावर्तन) :- सूर्य की किरणों के परावर्तन को एलबिडो कहा जाता है।

  • सूर्य की किरणों का 35 प्रतिशत किरणें परावर्तित हो जाती है।

Reflation (अपवर्तन) :- सूर्य सुबह और शाम अपवर्तन के कारण बड़ा दिखाई पड़ता है।

  • अपर्वतन के कारण गोधूलि बेला होती है।
  •   सूर्याेदय और सूर्यास्त के समय पृथ्वी पर जो प्रकाश रहता अपवर्तन के कारण है।
  • अपवर्तन के कारण मृगमरिचिका होती है।
  • अपवर्तन के कारण ही इन्द्रधनुष का निर्माण होता है।

Observation (अवषोशण) :- Co2 गैस प्रकाश अवशोषित करने वाली गैसों में सबसे महत्वपूर्ण गैस है। इसे ग्रीन हाउस गैस भी कहतें हैं।

Co2, N2 ,CFC, CH4, So2  प्रकाश को अवशोषित करने वाली गैंसे हैं।

Seatering (प्रकीर्णन) :- प्रकीर्णन के कारण ही आकाश का रंग नीला दिखाई पड़ता है।

  • Eraparaton ¼Ok”iu½(वाश्पन)
  • Condueton¼ laogu½ (संवहन)

’’पृथ्वी का ऊश्मा बजट’’ 

सूर्य से जितनी ऊर्जा विकीर्ण होती है, उसका कुछ भाग ही पृथ्वी को प्राप्त होता है, क्योंकि वायुमण्डल द्वारा प्रकीर्णन परावर्तन तथा अवशोषण के कारण कुछ भाग शून्य में लौटा दिया जाता है तथा कुछ भाग वायुमण्डल में बिखेर दिया जाता है।
पृृथ्वी तथा वायुमण्डल के ऊष्मा बजट को निम्न सारणी के रूप में व्यक्त किया जा सकता है।

  •   प्रेवशी सौर्यिक विकिरण की मात्रा- 100%
  • प्रकीर्णन तथा परावर्तन द्वारा क्षय सौर्यिक विकिरण
  1.    बादलों से परावर्तित- 27%
  2. धरातल से परावर्तित- 2% = 35%
  3.    शून्य में वायुमण्डल द्वारा प्रकीर्णन-6%
  • शेष सौर्यिक विकिरण की मात्रा- 65%

पृथ्वी की ऊश्मा बजट-

  1.   सूर्य से प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त – 34%
  2.  विसरित दिवा प्रकाश से प्राप्त- 17%

योग = 51%

वायुमण्डल की ऊश्मा बजट- 

  1.  प्रेवशी सौर्यिक विकिरण का प्रत्यक्ष अवशोषण- 14%
  2.  वहिर्गामी पार्थिव विकिरण द्वारा प्राप्त- 34%

योग = 48%
पृथ्वी द्वारा प्राप्त सौर्यिक ऊर्जा का 51% भाग किसी न किसी रूप में शून्य तथा वायुमण्डल में वापस हो जाता है, ताकि पृथ्वी का औसत तापमान सामान्य रहे-

1-पार्थिव ऊश्मा सन्तुलन- प्राप्त ऊष्मा 51% 9% विक्षोभ तथा संवहन द्वारा, 19% वाष्पीकरण द्वारा

2-वायुमण्डलीय ऊश्मा सन्तुलन- 48% शून्य में विकिरण।

  • सूर्य ताप मापने की इकाई लैगली (Laglay) हैै।
  • सौर्यिक ऊर्जा की माप को सौर्यिक R

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