विदेशों में क्रांतिकारी आंदोलन

राष्ट्रवादी क्रांतिकारियों ने ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका, अफगानिस्तान, जर्मनी, पेरिस आदि देशों में अन्य क्रांतिकारियों से संपर्क स्थापित करने, भारत की स्वतंत्रता के विषय में वैध प्रचार करने तथा विदेशियों से सहायता प्राप्त करने के उद्देश्य से अनेक संगठनों की स्थापना की।

 इंग्लैंड में क्रांतिकारी गतिविधियाँ

भारत के बाहर पहले क्रांतिकारी समिति की स्थापना श्यामजीकृष्ण वर्मा, जो 1897 ई. में लंदन में बस गए थे, के द्वारा ’इंडिया होमरूल’ के नाम से की गई। यह संस्था भारत के लिए स्वशासन प्राप्त करने के उद्देश्य से गठित की गई थी। श्यामजीकृष्ण वर्मा द्वारा लंदन में ’इंडिया हाउस’ की भी स्थापना की गई तथा ’इंडियन सोशियोलोजिस्ट’ नामक एक पत्र भी निकाला गया। लाला हरदयाल, वी.डी. सावर कर तथा मदनलाल ढींगरा जैसे क्रांतिकारी इस संस्था से जुड़े हुए थे। श्यामजी वर्मा के पेरिस में बस जाने के उपरांत ’इडिया हाउस’ का राजनीतिक नेतृत्व वी.डी. सावरकर के कंधों पर आ गया। मदनलाल ढींगरा ने लंदन में कर्जन वाइली की गोली मार कर हत्या कर दी। इसलिए ढींगरा को गिरफ्तार कर लिया गया तथा नासिक षड्यंत्र केस एवं अन्य अभियोगों के मामले में मुकदमा चलाने के लिए भारत भेज दिया गया।

 मैडम भीकाजी कामा का आंदोलन

पारसी समुदाय की महिला मैडम भीकाजी रुस्तम कामा ने ब्रिटिश शासन के विरूद्ध अमेरिका तथा यूरोप के विभिन्न देशों में क्रांतिकारी विचारधारा का प्रचार किया। इन्होंने स्टर्टगार्ट (जर्मनी) में अगस्त 1907 में हुए अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी कांफ्रेंस में भाग लिया एवं वहाँ पर भारत का राष्ट्रीय तिरंगा (हरा, पीला, लाल) ध्वज फहराया।

मैडम भीकाजी कामा को ’मदर आॅफ इंडियन रिवोल्यूशन’ के नाम से भी जाना जाता है।

 अमेरिका में क्रांतिकारी गतिविधियाँ

संयुक्त राज्य अमेरिका तथा कनाडा में 19वीं शताब्दी के अंतिम दशक में बसे भारतीयों ने ब्रिटिश शासन विरोधी राष्ट्रवादी गतिविधियां का प्रारंभ 1906 ई. के आसपास शुरू किया। सन् 1907 ई. में अमेरिका में बसे एक प्रवासी भारतीय तारकनाथ दास द्वारा कैलिफोर्निया में भारतीय में भारतीय स्वतंत्रता लीग का गठन किया गया। उन्होंने 1908 ई. में ’स्वतंत्र हिन्दुस्तान’ नामक समाचार-पत्र भी प्रकाशित किया। इसके परिणामस्वरूप कई नए राजनीतिक संगठनों का उदय हुआ। नवम्बर 1913 में ’हिंद एसोसिएशन आॅफ अमेरिका’ की स्थापना सोहन सिंह भाखना द्वारा की गई तथा ’गदर’ नामक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन सन् 1857 ई. में हुए विद्रोह की स्मृति में किया गया। यह पत्र अंग्रेजी, उर्दू, मराठी तथा पंजाबी में प्रकाशित किया गया। इसी पत्र के नाम पर ’हिंद एसोसिएशन आॅफ अमेरिका’ का नाम ’गदर पार्टी’ पड़ा। इस संगठन द्वारा सैन फ्रांसिस्को में ’युगांतर आश्रम’ की स्थापना की गई। युगांतर आश्रम का नामकरण कलकत्ता से प्रकाशित सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी पत्रिका ’युगांतर’ के नाम पर किया गया था।

गदर पार्टी आंदोलन

गदर पार्टी गठन 1 नवम्बर, 1913 को अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को नगर में किया गया। लाला हरदयाल गदर पार्टी आंदोलन के पथ-प्रदर्शक थे जबकि सोहन सिंह भाखना इसके अध्यक्ष थे। लाला हरदयाल, भाई परमानंद और रामचंद्र गदर पार्टी के प्रमुख कार्यकर्ता थे। यह पार्टी विदेशों में निवास करने वाले भारतीय समुदाय में अत्यधिक लोकप्रिय थी। गदर पार्टी ने प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजों के विरूद्ध योजना बनाई तथा भारत में सक्रिय क्रांतिकारियों से संपर्क स्थापित किया, किंतु यह योजना सफलता प्राप्त नहीं कर सकी। 1914 ई. में इस दल का नेतृत्व रामचंद्र द्वारा किया गया क्योंकि लाला हरदयाल को अमेरिका छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ा था। अमेरिका का ब्रिटेन की ओर से प्रथम विश्व युद्ध में सम्मिलित होने की वजह से गदर पार्टी का प्रभाव समाप्त हो गया तथा इसे गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया।

अफगानिस्तान

. दिसंबर 1915 में काबुल में भारत की प्रथम स्थाई सरकार का गठन राजा महेन्द्र प्रताप के नेतृत्व में किया गया। उनके सहयोगी बरकतुल्ला की इस सरकार के गठन में प्रमुख भूमिका थी। राजा महेन्द्र प्रताप के मंत्रिमण्डल में बरकतुल्ला (प्रधानमंत्री), मौलाना अब्दुल्ला, मौलाना बशीर, सी. पिल्लई, शमशेर सिंह, डाॅ. मथुरा सिंह, खुदाबक्श मुहम्मद अली इत्यादि प्रमुख व्यक्ति थे। इस सरकार को जर्मनी तथा रूस की मान्यता प्राप्त थी।

 कामागाटामारू प्रकरण,

1914. यह कनाडा में भारतीयों के प्रवेश से संबंधित विवाद था। कामागाटामारू एक जापानी जहाज था। इसे भारतीय मूल के व्यापारी गुरुदत्त सिंह ने किराये पर लिया तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया से करीब 376 यात्रियों को बैठाकर वैंकुवर (कनाडा) की ओर प्रस्थान किया। इस प्रकरण की पृष्ठभूमि यह थी कि कनाडा सरकार ने एक कानून पास कर कनाडा में ऐसे भारतीयों के प्रवेश को प्रतिबंधित कर दिया जो भारत से सीधे कनाडा न आये हों। लेकिन 1913 ई. में कनाडा के उच्चतम नयायालय ने अपने एक निर्णय के अंतर्गत ऐसे 35 भारतीयों को देश में प्रवेश करने का आदेश दे दिया जो सीधे भारत से नहीं आये थे। इसी निर्णय से प्रोत्साहित होकर कामागाटामारू हजाज ने वैंकुवर (कनाडा) की ओर प्रस्थान किया।

इस यात्रा के मध्य में दो भारतीय क्रांतिकारियों भगवान सिंह एवं बरकतुल्ला ने जहाज में क्रांतिकारी भाषण देकर यात्रियों को भारत में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोह करने को कहा।

23 मई, 1914 को यह जहाज वैंकुवर पहुँचा, किंतु इसी बीच कनाडा सरकार ने भारतीयों के प्रवेश को पुनः प्रतिबंधित कर दिया। इसे कनाडा में प्रवेश नहीं करने दिया गया। कनाडा मंे इन यात्रियों के पक्ष में हुसैन रहीम, सोहनलाल पाठक और बलवंत सिंह के नेतृत्व में शोर कमेटी या तटीय कमेटी का गठन किया गया।

अमेरिका में भगवान सिंह, बरकतुल्ला, रामचंद्र एवं सोहन सिंह के नेतृत्व में आंदोलन चलाया गया, किंतु कनाडा सरकार की सख्त नीतियों के कारण इसे कनाडा की जल सीमा को छोड़ना पड़ा। भारत की ब्रिटिश सरकार ने जहाज को सीधे कलकत्ता लाने का आदेश दिया। इस जहाज के कलकत्ता में बजबज नामक स्थान पर पहुँचने के उपरांत यात्रियों एवं पुलिस के बीच हुए संघर्ष में 18 यात्री मारे गए तथा 202 यात्रियों को कारावास में डाल दिया गया।

 तोषामारू काण्ड, 1914

1914द्ध  यह प्रकरण गदर पार्टी के नेताओं से संबंधित था। तोषामारू नामक जहाज पर गदर पार्टी के कुछ क्रांतिकारी नेता यात्रा कर रहे थे। अपने सिंगापुर पड़ाव के दौरान भाई परमानंद के क्रांतिकारी भाषणों से भारतीय सैनिकों में ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध विरोध की भावना जाग्रत हुई। परिणामस्वरूप सिंगापुर लाइट इन्फैन्ट्री के जवानों ने जमादार चिश्ती खाँ एवं डुण्डे खाँ के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया तथा उन्होंने अंग्रेजी सैन्य अड्डों पर कब्जा कर तिरंगा ध्वज फहराया। इतिहास में इस घटना को सिंगापुर क्रांति के नाम से भी जाना जाता है।

 सिल्क पेपर षड्यंत्र, 1915

यह प्रकार हिजरत आंदोलन के नेताओं से जुड़ा था जो कालांतर में अफगानिस्तान तथा तुर्किस्तान चले गए थे। वहाँ इन्होंने खुदाई सेना की स्थापना की। इन्होंने भारत से ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने की योजना बनाई। इस योजना के सूत्रधार खुदाई सेना से जुड़े मौलवी उबैदुल्ला सिंधी थे जिन्होंने कुछ गुप्त पत्र महमूद हसन को पीले सिल्क पर फारसी भाषा में लिखे, किंतु ये अंग्रेजों के हाथ लग गए और यह योजना असफल हो गयी। इतिहास में इस समूचे प्रकरण को सिल्क पेपर षड्यंत्र के नाम से जाना जाता है।

 बंगाल विभाजन एवं स्वदेशी आंदोलन

बंगाल विभाजन (1905 ई.) भारतीय राष्ट्रवाद पर किया गया प्रछन्न प्रहार था, जो लाॅर्ड कर्जन के कार्यकाल का सबसे विवादास्पद कार्य माना जाता है। कर्जन का मानना था कि ’’भारतीयों का एकमात्र कत्र्तव्य शासित होना है और इसके अतिरिक्त कुद अन्य सोचना अंग्रेजों के लिए मर्यादा भंग करने के समतुल्य होगा।’’

बंगाल प्रेसीडेन्सी ब्रिटिश भारत का सबसे अधिक जनसंख्या वाला प्रांत था, जिसमें पश्चिमी और पूर्वी बंगाल (आधुनिक बांग्लादेश), उड़ीसा तथा बिहार भी सम्मिलित थे। बंगाल विभाजन के लिए लाॅर्ड कर्जन ने यह तर्क दिया कि इतने बड़े प्रांत पर सुव्यवस्थित ढंग से शासन करना संभव नहीं है किंतु विभाजन का वास्तविक उद्देश्य राष्ट्रीय आंदोलन की तीव्रता को क्षीण करना था। लंदन में लाॅर्ड कर्जन ने इस विभाजन के राजनीतिक उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए अपने अधिकारियों से कहा था कि ’’मैं विभाजन के द्वारा विरोधियों के संगठित समूह को तोड़ना चाहता हूँ। अविभाजित बंगाल एक महाशक्ति है जिसे विभाजन द्वारा खंडित कर दिया जायेगा। चूँकि बंगाल उस समय राष्ट्रवादी क्रांतिकारी गतिविधियों एवं राष्ट्रीय चेतना का गढ़ था, इसिलए इसके विभाजन के माध्यम से कर्जन ने दूरदर्शिता का परिचय दिया।

बंगाल विभाजन की योजना के अनुसार बंगाल को पश्चिमी  एवं पूर्वी  दो भागों में विभाजित कर दिया गया। इसके बाद पूर्वी बंगाल एवं असम को मिलाकर एक नए प्रांत का गठन किया गया, जिसमें राजशाही, चटगाँव तथा ढाका इत्यादि जिले सम्मिलित थे। इस प्रांत की कुल जनसंख्या (3 करोड़ 10 लाख) में एक करोड़ अस्सी लाख मुसलमान तथा एक करोड़ बीस लाख हिंदू थे। इस प्रकार यह प्रांत मुस्लिम-बहुल बन गया। इस प्रांत की राजधानी ढाका को बनाया गया। पश्चिमी बंगाल में आधुनिक पश्चिम बंगाल के 11 जिले, दार्जिलिंग, कलकत्ता सहित संपूर्ण बिहार तथा उड़ीसा का भूभाग सम्मिलित था। इस प्रांत की कुल जनसंख्या (5 करोड़ 40 लाख) में से 4 करोड़ 26 लाख हिन्दू तथा 90 लाख मुसलमान थे। इस प्रकार यह नवगठित प्रांत हिंदू-बहुल जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता था।

देशव्यापी विरोध के बावजूद 20 जुलाई, 1905 को बंगाल विभाजन के निर्णय की घोषणा की गई। इस घोषणा की प्रतिक्रियास्वरूप 7 अगस्त, 1905 को कलकत्ता के टाउन हाल में ’स्वदेशी आंदोलन’ की घोषणा की गई और ऐतिहासिक ’बहिष्कार प्रस्ताव’ पारित किया गया। 16 अक्टूबर, 1905 को एक आधिकारिक घोषणा के द्वारा बंगाल विभाजन प्रभावी हो गया।

 स्वदेशी आंदोलन

बंगाल विभाजन की घोषणा मात्र से ही एक प्रबल राजनीतिक तूफान आ गया जिसकी लहरों ने विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं तथा सामाजिक दृष्टिकोणों वाले व्यक्तियों को एक तट पर ला खड़ा किया। आधिकारिक रूप से यद्यपि बंगाल का विभाजन 16 अक्टूबर, 1905 से लागू हुआ, किंतु विभाजन के निर्णय की घोषणा के तुरंत पश्चात् ही विभाजन के विरूद्ध अनेक विरोध सीााओं का आयोजन किया गया। इस आंदोलन में छात्रों ने अत्यधिक उत्साह से भाग लिया। बंकिमचंद्र चटर्जी द्वारा लिखा गया ’वंदेमातरम्’ रातों-रात संपूर्ण देश का राष्ट्रगान बन गया। बंगाल विभाजन का दिन बंगाल में ’शोक दिवस’ के रूप में मनाया गया तथा रवीन्द्रनाथ टैगोर के सुझाव पर यह दिन ’राखी दिवस’ के रूप में मनाया गया।

बंगाल विभाजन के विरूद्ध विरोध प्रदर्शित करने हेतु ब्रिटिश सामान के बहिष्कार का निर्णय लिया गया। स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन की आग संपूर्ण भारतवर्ष में फैल गई। पंजाब में इसका नेतृत्व अजीत सिंह, लाला लाजपत राय, स्वामी श्रद्धानंद, जयपाल और गंगाराम द्वारा किया गया। तिलक व उनकी पुत्री ने महाराष्ट्र में नेतृत्व किया। सैय्यद हैदर रजा ने दिल्ली में तथा चिदम्बरम् पिल्लई, सुब्रह्मण्यम अय्यर, आनंद चारलू और टी.एम. नायक ने मद्रास प्रेसीडेंसी में इसकी बागडोर संभाली। इस आंदोलन को सर्वाधिक सफलता विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार से मिली। महिलाओं ने विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई। मंदिरों के प्रसाद में यदि विदेशी चीनी का प्रयोग किया जाता तो महंत उस प्रसाद को लेने से इन्कार कर देते। इस आंदोलन ने आत्मशक्ति और आत्मनिर्भरता का नारा दिया। स्वदेशी वस्तुओं की आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु स्वदेशी प्रतिष्ठानों की स्थापना की गई, यथा-’बंगाल केमिकल्स’ की स्थापना आचार्य प्रफुल्लचंद राय द्वारा की गई।

स्वदेशी आंदोलन का सबसे अधिक प्रभाव कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में पड़ा। रवीन्द्रनाथ टैगोर, मुकुंद दास, बंकिमचंद चटर्जी, सैय्यद अबु अहमद इत्यादि द्वारा लिखे गए गीतों ने आंदोलनकारियों को प्रेरणा दी। रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा लिखा गया गीत ’आमार सोनार बांग्ला’ जो कालांतर में बांग्लादेश का राष्ट्रीय गीत बना, वह भी इसी समय लिखा गया। बंगाल की गलियाँ देशभक्ति के गीतों से गूँज उठीं। कला के क्षेत्र में पाश्चात्य कला के आधिपत्य को तोड़ते हुए पारंपरिक भारतीय कलाओं, यथा-अजंता की चित्रकारी से प्रेरणा ली गई। इस क्षेत्र में अवनीन्द्रनाथ टैगोर का योगदान अविस्मरणीय है। विज्ञान के क्षेत्र में जगदीश चंद्र बसु, प्रफुल्ल चंद्र राय छात्रों के लिए प्ररेणा-स्रोत बने, जिसके परिणामस्वरूप यह आंदोलन और अधिक मजबूत हो गया।  स्वदेशी आंदोलन में विद्यार्थियों की सक्रिय भूमिका ने इस आंदोलन की तीव्रता तथा प्रभावक्षेत्र को बढ़ा दिया। कलकत्ता विश्वविद्यालय की गुलाम खाना (दास गृह) के रूप में भत्र्सना की गई तथा एक राष्ट्रीय शिक्षा परिषद् का गठन किया गया। इन्हीं प्रयासों के परिणामस्वरूप रंगपुर नेशनल स्कूल तथा बंगाल नेशनल काॅलेज और स्कूल की स्थापना हुई। अरविंद घोष बंगाल नेशनल काॅलेज के प्रथम प्राचार्य बने। डाॅन सोसाइटी के सचिव सतीशचंद्र मुखर्जी ने बंगाल में राष्ट्रीय शिक्षा को प्रसारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारतीयों के निर्देशन में राष्ट्रीय विचारधारा के अनुरूप शिक्षा-व्यवस्था को संगठित करने का प्रयास किया गया।