मानव स्वास्थ्य एवं पोषण
Human health  & Nutrition

शरीर के सामान्य विकास के लिए सन्तुलित भोजन की आवश्यकता होती है। इसके लिए भोजन की मात्रा एवं गुणवत्ता दोनों महत्वपूर्ण है। भोजन की उचित मात्रा तथा गुणवत्ता के अभाव में कुपोषण की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। अल्प पोषण के कारण शरीर जैविक क्रियाओं के संचालन हेतु अपने ही ऊतकों को विघटित करके ऊर्जा प्राप्त करता है। इस स्थिति को प्रोटीन कैलोरी कुपोषण कहते हैं। इसका असर 1 से 4 वर्ष के बच्चों में सबसे अधिक होता है। प्रोटीन ’कैलोरी कुपोषण’ के कारण बच्चों में क्वाशरकोर एवं मेरेस्मस नामक रोग हो जाते हैं।

सन्तुलित आहार :- जिस भोजन में शरीर की आवश्यकताओं को पूरा करने वाले तत्व अर्थात् प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइडेट, खनिज लवण एवं विटामिन्स उचित मात्रा में विद्यमान हों, उसे ’सन्तुलित भोजन’ कहते हैं।

मनुष्य के भोजन की मात्रा लिंग, अणु एवं जलवायु से प्रभावित होती है। 16 से 18 वर्ष की आयु के व्यक्ति को लगभग 3000 कैलोरी ऊर्जा उत्पादक भोजन की आवश्यकता प्रतिदिन होती है।

3000 कैलोरी ऊर्जा प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन भोजन में भोज्य पदार्थों का अनुपात इस प्रकार होना चाहिए।

90-100 ग्राम प्रोटीन                           360-400 कैलोरी
80-90 ग्राम वसा                               720-810 कैलोरी
360-450 ग्राम कार्बोहाइडेट               1440-1800 कैलोरी

भोजन का वर्गीकरण :- ऊतकों की मरम्मत तथा नये ऊतकों के निर्माण के लिए शरीर को पोषण तत्वों की आवश्यकता होती है, ऊर्जा तथा पोषक तत्वों की उपलब्धि शरीर को भोजन से होती है।

प्रोटीन :- विभिन्न भोज्य पदार्थों में प्रोटीन ही ऐसा पदार्थ है जिसमें नाइट्रोजन पाया जाता है। यह जन्तु तथा वनस्पति दोनों स्रोतों से प्राप्त होता है। प्रत्येक जीवित कोशिका के ’प्रोटोप्लाज्म’ का यह आवश्यक अंग है। प्रोटीन को जन्तु तथा वनस्पति प्रोटीन में बाँटा गया है। इसके अलावा ’एमीनो एसिड’ के आधार पर भी प्रोटीन का वर्गीकरण किया गया है। एमीनो एसिड कुल 20 से भी अधिक होते हैं। इनमें आठ अनिवार्य एमीनो एसिड होते हैं जिस प्रोटीन में पाँच या इससे अधिक अनिवार्य अमीनों एसिड हों, वह ’प्रथम श्रेणी की प्रोटीन’ कहलाती है। पाँच से कम एमीनो एसिड वाली प्रोटीन ’द्वितीय श्रेणी की प्रोटीन’ कहलाती है। प्रथम श्रेणी के प्रोटीन का स्रोत जन्तु होता है। इनके निम्न उदाहरण है-

एल्बुमिन का मुख्य उदाहरण अंडे की सफेदी है। दूध में यह ’लैक्ट-एल्बुमिन’ के रूप में पाया जाता है।

ग्लोबुलिन रक्त ग्लोबुलिन के रूप में, विटेलिन रक्त ग्लोबुलिन के समान अंडे की जर्दी में, कैसीनोजन दूध में, मायोसिन साधारण मांस तथा मछली में पाया जाता है।

द्वितीय श्रेणी की प्रोटीन वनस्पतीय पदार्थों से प्राप्त होती है, इस श्रेणी के मुख्य प्रोटीनों में ग्लूटेन गेहूँ तथा अन्य अनाजों से प्राप्त, ’लेग्यूमेन’ मटर, दालों, बीनों तथा सोयाबीन से प्राप्त ’जिलेटन’ हड्डियों तथा स्नायुओं से प्राप्त होती है।

प्रोटीन एमीनो एसिडों की बनती हैं, पाचन क्रिया के दौरान प्रोटीन एमीनो अम्लों में विघटित हो जाती है तथा ’आँत’ द्वारा अवशोषित होकर ये अमीनो अम्ल रक्त में पहुँच जाता है। रक्त से विभिन्न अंग आवश्यकतानुसार एमीनो अम्ल ग्रहण कर लेते हैं। किसी वयस्क व्यक्ति को ’भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के अनुसार 50-60 ग्राम प्रोटीन की आवश्यकता होती है। शारीरिक भार की दृष्टि से ये वयस्कों में 1 ग्राम प्रति किलोग्राम तथा बच्चों में 1.5-2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम की आवश्यकता होती है।

कार्बोहाइडेट:- कार्बन, हाइड्रोजन तथा आक्सीजन के मिश्रण से निर्मित होते हैं। इसमें हाइड्रोजन और आक्सीजन उसी अनुपात में होते हैं, जिस अनुपात में वे जल  का निर्माण करते हैं। कार्बोहाइडेट के जलने से शरीर को गर्मी तथा शक्ति प्राप्त होती है। 1 ग्राम कार्बोहाइडेट में 4.1 कैलोरी प्रदान करने की क्षमता होती है। कार्बोहाइडेट के मुख्य उदाहरण स्टार्च तथा शर्करा है, जिन्हें एक वयस्क व्यक्ति प्रतिदिन लगभग 300 ग्राम खाता है।

शर्कराएँ:- लैक्टोज के अतिरिक्त अन्य सभी शर्कराएं वनस्पतियों से प्राप्त हैं। विभिन्न शर्कराओं में सुक्रोज  (गन्ना तथा चुकन्दर से प्राप्त) फ्रक्सट्रोज’ या ’ग्लूकोज’ (फलों तथा शहद से प्राप्त) तथा माल्टोज  (स्टार्च या मांड़ जल अपघटन से प्राप्त) हैं।
संतुलित आहार सूची

क्र.स.                   खाद्यपदार्थ                 पुरुष                  स्त्री
1.                         अनाज                    430 ग्राम            350 ग्राम
2.                          दाल                      70 ग्राम              75 ग्राम
3.                          हरी सब्जी               100 ग्राम           150 ग्राम
4.                         अन्य सब्जी               75 ग्राम              75 ग्राम
5.                          जड़ वाली सब्जी        75 ग्राम              75 ग्राम
6.                          फल                        30 ग्राम              30 ग्राम
7.                          दूध                          250 ग्राम            250 ग्राम
8.                          वसा                         35 ग्राम               35 ग्राम
9.                           शर्करा                     30 ग्राम                30 ग्राम

लवण (Salts) :- शरीर में अनेक/लवण पाये जाते हैं जो भोजन में विद्यमान धात्विक यौगिकों से प्राप्त होते हैं। कुछ खनिज लवण इस प्रकार है-

कैल्शियम :- दूध, पनीर, अण्डे की जर्दी तथा पत्तेदार सब्जियाँ से प्राप्त होता है। हड्डियों के निर्माण, दाँतों के निर्माण तथा रक्त के स्कन्दन में इसकी भूमिका अहम होती है। रक्त के कैल्शियम स्तर का नियन्त्रण पैराथोरमोन तथा कैल्सिटोनिन नामक दो हार्मोनों से होता है। ये हार्मोन पराअवटु या पैराथाइरायड ग्रन्थि में निर्मित होते हैं।

सल्फर :- सभी प्रोटीन युक्त भोजनों में पाया जाता है तथा सभी ऊतकों को इसकी आवश्यकता होती है।

लोहा :- मांस, अण्डा, अनाज, दालें तथा हरी सब्जियों से प्राप्त होता है। इसकी कमी से लौह अल्पता जन्य रोग हो जाते है।

पोटैशियम :-प्रोटीन युक्त भोजनों में विद्यमान अन्तः कोशिका तरल में इनकी प्रचुरता होती है। सोडियम क्लोराइड  की प्रचुरता कोशिका वाहन तरल में होती है। खाने का नमक सोडियम क्लोराइड होता है।

आयोडीन:- समुद्र तथा उसके निकटवर्ती भागों से प्राप्त होने वाले भोजन में होती है। इसकी कमी से थायरायड नामक ग्रन्थि की क्रिया पर गम्भीर प्रभाव पड़ता है और घेघा रोग हो जाता है।

फास्फोरस :- शरीर की प्रत्येक कोशिका में पाया जाता है। हड्डी तथा दाँत के निर्माण में इसका विशेष योगदान रहता है। पेशी ऊर्जा तथा तन्त्रिका ऊर्जा का उत्पादन बिना फास्फोरस सम्भव नहीं है। यह तत्व दूध, अण्डे की जर्दी तथा हरी सब्जियों में प्रचुरता से विद्यमान होता है।

स्टाॅर्च या मंड :- प्रायः वनस्पतियों से प्राप्त होता है तथा प्रायः पौधों के तनों, जड़ों अथवा बीजों में पाया जाता है। इसके उदाहरणों में गेहूँ मक्का, बाजरा, चावल, साबूदाना, कन्द आदि हैं।

ग्लाइकोजन एक प्रकार का जांतव स्टार्च है जो शरीर के ऊतकों विशेषतः यकृत तथा पेशी में संचित रहता है।
कार्बोहाइडेट तीन प्रकार के होते हैं-

(1) मोनोसैकराइड :- जैसे-ग्लूकोज गैलेक्टोज तथा फ्रक्टोज आदि शर्कराएं,

(2) डाई सैकराइड :– जैसे-सुक्रोज, माल्टोज तथा लैक्टोज आदि शर्काराएं,

(3) पाॅली सैकराइड:- जैसे-स्टार्च तथा सेल्युलोज। सेल्युलोज वनस्पतियों में पत्तों, तनों, जड़ों आदि में पाया जाने वाला रेशा होता है।

ग्लाइकोजन:- शरीर में सरल शर्कराओं के योग से बनता है तथा यकृत तथा पेशी में संचित रहता है, आवश्यकता पड़ने पर शरीर इन्हें पुनः ग्लूकोज में बदल सकता है।

वसा (Fat) :- मूलतः कार्बन, हाइड्रोजन तथा आक्सीजन के मिलने से बनती है। इनके मुख्य अंग ग्लीसिरीन तथा वसा अम्ल या फैटीएसिड होते हैं।
जन्तु वसा के उदाहरण के माँस, चर्बी, दूध, मक्खन तथा अण्डे की जर्दी है। इसमें विटामिन । तथा क् विद्यमान होते हैं। ’वनस्पति वसा’ के उदाहरणों में सरसों नारियल, तिल, मूँगफली, विनौला, कडी या कुसुम्भ आदि के तेल तथा इससे बनाया गया वनस्पति घी, बादाम, अखरोट आदि हैं।

भोजन में विद्यमान वसा दो प्रकार की-संतृप्त तथा असंतृप्त वसा होती है। अतिकोलेस्टरोलरक्तता  अतिलिपिडरक्तता कौरोनरी धमनी रोग आदि दशाओं में असंतृप्त वसा का सेवन लाभदायक होता है।

1 ग्राम वसा से 9.3 कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है-शरीर में वसा का संचय ’वसा ऊतक’ के रूप में होता है। वसा तथा कार्बोहाइडेट को ईंधन भोजन कहते हैं।

जल :- मुख्यतः पेयों के रूप में ग्रहण किया जाता है। ठोस भोजन का एक बड़ा भाग जल के रूप में होता है। अनेक फलों में 85 प्रतिशत जल होता है, तरबूज में तो 95% जल होता है।

मेटाबोलिज्म:- के समय भोजन का आक्सीकरण होने पर कुछ जल का निर्माण होता है। लगभग 2500 से 3000उस जल का शरीर से निकास होता है जो निम्न प्रकार है-

मूत्र                                     1500 ml
त्वचा (पसीने द्वारा)                 900 ml
श्वसन क्रिया (निःश्वसित वायु)    400 ml
मल                                     200 ml

विटामिन्स (Vitamin) :- जीवन, स्वास्थ्य तथा विकास के लिए आवश्यक होते हैं। ये शरीर में उचित मेटाबोलिज्म के लिए आवश्यक होते हैं। इनका वर्गीकरण इनके घुलनशील गुण के आधार पर वसा तथा जल विलेय विटामिनों में किया जाता है। विटामिन सामान्यतः ’क्षुद्र आन्त्र में अवशोषित होते हैं। वसा विलेय विटामिनों में A,D,E तथा Kआते हैं। विटामिन A दूध और दुग्ध जन्य पदार्थों, यकृत, मछली तथा मछली के जिगर के तेल में पाया जाता है। वनस्पतीय पदार्थों में यह कैरोटीन के रूप में पाया जाता है। विटामिन E की कमी से रतौंधी  तथा जीरोफ्थैल्मिया नामक रोग हो जाते हैं।

विटामिन D के कई रूप हैं, प्राकृतिक रूप में पाया जाने वाला विटामिन कD3 कहलाता है। विटामिन D3 अथवा कैल्सिफेरौल उस समय बनता है जब शरीर की त्वचा ’अर्गोस्टीरौल’  पर सूर्य के प्रकाश में विद्यमान अल्ट्रावायलेट किरणें पड़ती है। यह मक्खन, अण्डा, मछली तथा मछली के यकृत तेल में पायी जाती है। यह आन्त्र से कैल्शियम के अवशोषण में, सहायक होता है। इसकी कमी से ’रिकेट्स’ नामक रोग हो जाता है। इसे ’रिकेट्स रोधी विटामिन’ भी कहते हैं। वयस्कों खासकर स्त्रियों में इस विटामिन की कमी से ओस्टियोमलेशिया  अस्थिमृदुता रोग हो जाता है।

विटामिन  E :- अण्डे की जर्दी, दूध तथा कुछ हरी सब्जियों में होता है। इसकी कमी से जन्तुओं में प्रजनन क्रिया में बाधा पड़ती है। इसे ’वन्ध्यता रोधी विटामिन’ भी कहते हैं।

विटामिन K :- अल्फाफा, पालक सोयाबीन तथा सुअर के जिगर पाया जाता है। ’प्रोथ्राम्बिन’ के निर्माण के लिए यह आवश्यक होता है। इस विटामिन की कमी से स्कंदन समय  बढ़ जाता है। यह स्थिति नवजात शिशु के रक्तस्राव रोग तथा अवरोधी कामला में पायी जाती है।

जल में विलेय विटामिनों में विटामिन B,C तथा P हैं। विटामिन B वर्ग के विटामिनों में निम्नलिखित विटामिन आते हैं-थायमीन अथवा B1 जो अनाजों, दालों, अण्डे तथा यीस्ट में पाया जाता है। इसकी कमी से बेरी-बेरी रोग हो जाता है। कार्बोहाइडेट के मेटाबोलिज्म के लिए यह आवश्यक होता है।

राइबोफ्लेबिन अथवा B2 :- गेहूँ, दूध, यकृत, सोयाबीन, मटर तथा दालों में पाया जाता है। इसकी कमी से त्वचाशोथ  होता है, होठों तथा नाक की त्वचा फट जाती है तथा जिव्हा लाल पड़ जाती है।

निकोटिनिक एसिड अथवा नियासिन:- माँस, यकृत तथा हरी सब्जियों में पाया जाता है। इसकी कमी से पेलेग्रा नामक रोग हो जाता है।

बायोटिन:- यकृत, वृक्क, मशरुम, दूध अण्डे तथा यीस्ट में पाया जाता है। यह त्वचा तथा म्यूकस कला के स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक होता है।

पायरीडाक्सिन :- हरी पत्तियों, यीस्ट, यकृत तथा वृक्क में पाया जाता है। यह लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में आवश्यक होता है।

विटामिन B12:- यकृत में पाया जाता है, इसका प्रयोग पर्निशश एनीमिया की चिकित्सा में किया जाता है।

फोलिक एसिड:- हरी पत्तेदार सब्जियों तथा दालों में पाया जाता है। यह लाल रक्त कणिकाओं के निर्माण में योगदान देता है। विटामिन B वर्ग का एक विटामिन ’पेन्टोथोनिक एसिड’ है।

विटामिन C :- सभी प्रकार के संयोजी ऊतकों के निर्माण के लिए आवश्यक है। यह हरी पत्तेदार सब्जियों, साइट्रस फलों (संतरा नीबू तथा नारंगी), आंवला, टमाटर तथा हरी मिर्च में पाया जाता है। इसकी कमी से संक्रमण के प्रति शरीर की प्रतिरोधक शक्ति घट जाती है। इसकी अत्यधिक कमी से स्कर्वी नामक रोग हो जाता है।

विटामिन (Hesperidin) :– साइट्रस फलों में पाया जाता है तथा रक्त कोशिकाओं की मजबूती हेतु आवश्यक है।

जन्तुओं एवं मनुष्य के लिए आवश्यक पोषक पदार्थ :- अपने भोजन से मानव सहित सभी जन्तु निम्नलिखित सात श्रेणियों के पोषक पदार्थ प्राप्त करते हैं-(1) प्रोटीन्स, (2) कार्बोहाइड्रेट, (3) न्यूक्लिक अम्ल, (4) जल, (5) खनिज लवण, (6) लिपिड्स, (7) विटामिन।

उपर्युक्त पदार्थों में जल व खनिज लवण अकार्बनिक हैं तथा शेष कार्बनिक पदार्थ हैं। शरीर में कार्बोहाइड्रेट लिपिड्स तथा प्रोटीन्स की काफी मात्रा खपती है। इसीलिए इन्हें ’दीर्घ पोषक’(Bulk Nutrients)  कहते हैं। जल के अतिरिक्त अन्य पोषक पदार्थ सूक्ष्म पोषक (Micornutrients);कहलाते हैं।

उपयोगिता के आधार पर पोषक पदार्थों को चार भागों में बाँटा गया है-

(1)  ईंधन पदार्थ या ऊर्जा उत्पादक (fuel Substances) :- कार्बोहाइड्रेट एवं वसाएं
(2)  निर्माणक पदार्थ(Building Substances) :- प्रोटीन्स
(3) उपापचयी नियन्त्रक(Metabolic Regulators) :- विटामिन्स, जल एवं खनिज लवण
(4) आनुवंशिक पदार्थ (Herediatry Substances) :- न्यूक्लिक अम्ल
मोनोसैकराइड कार्बोहाइड्रेट सरलतम्, घुलनशील तथा मीठे होते हैं। इसीलिए इन्हें शर्कराएं कहते हैं। जीवों में मुख्यतः षट या पंच कार्बनीय शर्कराएं ही होती हैं। षट कार्बनीय शर्कराएं मुख्यतः ग्लूकोज, फ्रक्टोज, गैलेक्टोस एवं मैनोस होती है। इनका रासायनिक सूत्र .O6 H12 O6 होता है।

मोनोसैकराइड के दो अणुओं से ’ग्लाइकोसिडिक बन्ध’ द्वारा परस्पर जुड़ जाने से एक डाईसैकराइड का अणु बनता है। डाई सैकराइड शर्कराएं जल में घुलनशील, मीठी तथा तीन प्रकार-(माल्टोस सुक्रोज तथा लैक्टोस) की होती है। मोनोसैकराइड के दस से अधिक अणुओं के मिलने से पाॅली सैकराइड का निर्माण होता है। हमारे भोजन के सारे तैलीय तथा चरबीदार घटक ’लिपिड्स’ होते हैं।

प्रोटीन्स का नामकरण 1838-39 में बरजीलियस तथा मुल्डर ने किया। यह सजीव शरीर का लगभग 14% तथा मृत और सूखे शरीर का 50% तक भाग बनाती हैं।

न्यूक्लीक अम्ल प्रोटीन्स से मिलकर न्यूक्लियों प्रोटीन्स बनाते हैं जो कोशिकाओं के केन्द्रक में ’गुणसूत्री’ के रूप में रहती हैं। न्यूक्लियों प्रोटीन्स का सबसे अभूतपूर्व लक्षण सरल घटक पदार्थों से अपनी तरह के पदार्थ का संश्लेषण करना है।

नोट:

  •  प्रोटीन को प्रोटीन नाम किसने दिया – बरजीलियम तथा मुल्डर ने
  •  न्यूक्लिक अम्ल की खोज की -फ्रीड्रिक मीशर ने
  •  न्यूक्लिक अम्ल को यह नाम किसने दिया –अल्टमान ने
  •  सर्वप्रथम ज्ञात विटामिन जिसे फंक ने किससे प्राप्त किया -चावल की छीलन से
  • एस्कार्बिक अम्ल के नाम से जाना जाने वाला विटामिन -विटामिन-सी
  •  निकोटिनिक अम्ल या नियासिन को किस अन्य नाम से जाना जाता है -विटामिन पी पी
  • विटामिन बी को किस और नाम से जाना जाता है -पाइरिडाक्सिन
  •  विटामिन ’एच’ को किस और नाम से जाना जाता है – बायोटिन
  •  बायोटिन की कमी से कौन-सी बीमारी हो जाती है – त्वचा रोग, बालों का झड़ना, तथा कमजोरी
  •  टोकोफेराॅल किस विटामिन का नाम है -विटामिन E
  •  विटामिन ज्ञ का अन्य नाम क्या है -नैफ्थोक्विनोन
  •  किस विटामिन को रक्तरोधी पदार्थ कहते हैं -’विटामिन के’
  •  विटामिन । की कमी से त्वचा, कार्निया आदि में कोशिकाएँ सूखने लगती हैं और शल्की भवन (Kavatinization) हो जाता है। कार्निया के शल्कीभवन को जीरोफ्थेल्मिया रोग  कहते हैं।
  •  रुधिर प्लाज्मा की ’लाइकोप्रोटीन्स’ वसाओं का यकृत से वसीय ऊतकों तथा अन्य ऊतकों का संवहन करती है। पेशियों को सिकोड़कर शरीर एवं अंगों को गति प्रदान करने वाली पेशियों की प्रोटीन-एक्टिन एवं मायोसीन प्रोटीन लिसाइपिन तथा सिफैलिन नामक फास्फोलिपिड्स तन्त्रिका, ऊतकों, यकृत कोशिकाओं, अण्डपीत, पेशियाँ आदि में पायी जाती हैं।
  •  जन्तुओं में कोलेस्ट्राॅल नामक स्टीराॅयड सबसे अधिक पाया जाने वाला व्युत्पन्न लिपिड होता है।
  •  कोलेस्ट्राल की अधिकता से कौन-सा रोग हो जाता है-  ऐथिरो स्कलेरोसिस।