मनुष्य की आहार नाल
(Human alimentary canal)

मुख से लेकर गुदा तक 8 से 10 मीटर लम्बी खोखली और अत्यधिक कुण्डलित हमारी आहार नाल होती है जिसे जठरान्त्रीय कार्य मार्ग (Gastrointestinal tract GI Tract) कहते हैं।

इसके निम्न भाग हैं -(1) मुख ग्रासन गुहिका (2) ग्रासनली, (3) आमाशय तथा (4) आँत।

मुख मुखगुहा में खुलता है। मुख गुहा में दाँत व जिहृा होते हैं। मुखगुहा की छत को तालू कहते हैं। यह दो भागों में कोमल एवं कठोर तालू में विभक्त होता है। मुखगुहा में तीन जोड़ी लार ग्रन्थियां खुलती हैं।

हमारे दाँत गर्तदन्ती, द्विदन्ती तथा विषमदन्त्री होते हैं। प्रीमैक्सिली हड्डियों की अनुपस्थिति के कारण ऊपरी जबड़े के सारे दाँत मैक्सिली हड्डियों में होते हैं। हमारे क्षीर दन्तों में 8 कृतंक, 4 रदनक तथा 8 चर्वण दन्त होते हैं।

स्थायी दातों में 8 कृंतक, 4 रदनक, 8 प्रचवर्णक तथा 12 चर्वणक दन्त होते हैं।

ग्रसनी में मुख गुहिका एवं नासा मार्ग मिलते हैं। यह पाचन एवं श्वसन दोनों तन्त्रों का अंग होती है। यह लगभग 13 सेमी0 लम्बी कीप के आकार की होती है। मुख ग्रसनी छोटी और गलद्वार द्वारा मुख गुहिका से जुड़ी होती है। ग्रसनी के पिछले व निचले संकरे भाग को ’कष्ठ ग्रसनी ’(Laryngopharynx) कहते हैं।

ग्रसनी की दीवार में चार स्तर होते हैं-महीने श्लेष्मिका का स्तर, अधः श्लेष्मिका स्तर, पेशी स्तर तथा संयोजी ऊतक स्तर। ग्रसनी हलक या निगल द्वार से आहार-नाल के दूसरे भाग-ग्रासनली में खुलती हैं। हमारी ग्रास नली लगभग 25 सेन्टीमीटर लम्बी और 25 से 30 मिलीमीटर मोटी होती है।

डायाफ्राम के ठीक पीछे, बायीं ओर आड़ा स्थित, लगभग 25 सेमी0 लम्बा और आहारनाल का सबसे चैड़ा, हंसिया की आकृति का थैलीनुमा भाग आमाशय कहलाता है। आमाशय चार भागों में विभक्त होता है-कार्डियक, फन्डिक, आमाशय काय, तथा पाइलोरस।

आहार नाल का संकरा तथा लम्बा भाग छोटी आँत कहलाता है। हमारी आँत लगभग 7.50 मीटर लम्बी और दो प्रमुख भागों में विभेदित होती है-छोटी आँत तथा बड़ी आँत। छोटी आँत का लगभग 25 सेमी लम्बा अपेक्षाकृत कुछ मोटा अकुण्डलित प्रारम्भिक भाग ग्रहणी कहलाता है। छोटी आँत की दीवार अपेक्षाकृत काफी पतली होती है।

इस पर भी ’लस्य स्तर’(Serosalayer) का आवरण होता है जिसमें बाहर पेरिटोनियल, मीसो थीलियम तथा इसके नीचे अन्तराली संयोजी ऊतक का स्तर होता है। छोटी आँत का शेष भाग 2.4 मीटर लम्बी मध्यान्त्र और 3.4 मीटर लम्बी शेषान्त्र में विभेदित होता है। शेषान्त्र पीछे बड़ी आंत में खुलती है।

यह लगभग 1.5 मीटर लम्बी और 6-7 सेमी मोटी होती है। इसके तीन भाग होते हैं-सीकम, कोलन तथा मलाशय। काइम तीन से दस घण्टों तक रुक सकती है। यह ज्यो-ज्यों कोलन में आगे खिसकती है, कोलन का श्लेष्मा जल, लवण तथा विटामिनों का अवशोषण करके रक्त में पहुँचा देती है। काइम का शेष भाग अर्ध ठोस मल का रूप ले लेता है। ज्योंही काइम कोलन से मलाशय में पहुँचता है, एक प्रतिवर्ती क्रिया के रूप में मलत्याग की इच्छा होने लगती है।

नोट :-

  • निष्क्रिय पेप्सिनोजन HCL द्वारा सक्रिय पेप्सिन में बदलता है।
  • मनुष्य का दन्त सूत्र 2123/2123 होता है।
  • क्षीर कोशिकाएँ  (Lacteals)  छोटी आंत्र की विलाई में पायी जाती हैं।
  • मनुष्य में कुल 3 जोड़ी लार ग्रन्थियाँ पायी जाती हैं-
    1.कर्णमूल ग्रन्थियाँ, 2.अधोजिह्वा ग्रन्थियाँ
    3.अधोहनु ग्रन्थियाँ
  • मनुष्य की जीभ पर तीन प्रकार के अंकुर पाये जाते हैं (1).कवक रूप अंकुर,(2) तन्तुरूप अंकुर तथा (3)  परिभित्तिक अंकुर।
  • पित्त वसा का इमल्सीकरण करता है जिससे वसा का भलीभाँति पाचन हो सके।
  • एमाइलेज कार्बोहाइड्रेट पाचक एन्जाइम है तथा अग्न्याशयिक रस में पाया जाता है। लाइपेज वसा पाचक एन्जाइम है तथा आँत्रीय रस एवं अग्न्याशयिक रस में पाया जाता है।
  • यकृत में मृत लाल रक्त कणिकाओं के हीमोग्लोबिन के विखण्डन से विलिवर्डिन तथा विलिरुबिन वर्णक बनते हैं। ये उत्सर्जी पदार्थ हैं। पित्तरस द्वारा मल के साथ शरीर से बाहर निकाल दिये जाते हैं।