भू-संचलन (Earth Movement)

भूतल पर परिवर्तन दो बलों के कारण होता है-

  1.  अन्तर्जात बल तथा
  2.  बहिर्जात बल।

पृथ़्वी के आन्तरिक भाग से उत्पन्न होने वाले बल को अन्तर्जात बल जबकि पृथ्वी की सतह पर उत्पन्न होने वाले बल को बहिर्जात बल कहते हैं। अन्तर्जात बल का संबंध पृथ्वी के भू-गर्भ से होता है जबकि बहिर्जात बल का संबंध मुख्यतः वायुमंडल से है। अन्तर्जात बल से पृथ्वी में क्षैतिज (Horizontal) तथा लम्बवत्  (Vertical) संचलन उत्पन्न होते हैं। बहिर्जात बल पृथ्वी के अन्तर्जात बलों द्वारा भूतल पर उत्पन्न विषमताओं को दूर करने में सतत् प्रयत्नशील रहते हैं। इसलिए बहिर्जात बल को समतल स्थापक बल भी कहते हैं।
तीव्रता के आधार पर अन्तर्जात बलों से उत्पन्न संचलन को दो भागों में बाँटा जाता है-

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  1.  पटल विरूपणी संचलन तथा
  2.  आकस्मिक संचलन।

पटल विरूपणी संचलन मन्द गति से होने वाला संचलन है जिसका प्रभाव सैकड़ों- हाजरो वर्षों बाद परिलक्षित होता है। इससे विशाल आकार वाले स्थलरूपों का निर्माण होता है। क्षेत्रीय विस्तार की दृष्टि से पटल विरूपणी संचलन को दो भागों-महादेशजनक संचलन तथा पर्वत निर्माणकारी संचलन में बाँटा जाता है। महादेशजनक संचलन से महाद्वीपों में उत्थान और अवतलन तथा निर्गमन और निमज्जन की क्रियाएँ होती हैं। दिशा के आधार पर महादेशजनक संचलन को उपरिमुखी (Upward) तथा अधोमुखी (Downward)  संचलन में विभक्त किया जाता है। जब कोई महाद्वीप या उसका कोई भाग अपनी समीपवर्ती सतह से ऊँचा उठ जाता है तो उसे उत्थान(Upliftment)  कहते हैं। यदि महाद्वीप का तटीय भाग समुद्र-तल से ऊपर उठ जाता है तो इसे निर्गमन (Emergence) कहते हैं। इस तरह, उत्थान और निर्गमन उपरिमुखी संचलन का भाग है।

इसके विपरीत, अधोमुखी संचलन के अंतर्गत अवतलन तथा निमज्जन को सम्मिलित किया जाता है। यदि स्थलीय खंड अपनी समीपवर्ती क्षेत्र की तुलना में सतह से नीचे धँस जाता है तो इसे अवतलन कहते हैं जबकि कोई स्थलीय खंड यदि सागर तल से नीचे चला जाता है तो इसे निमज्जन कहते हैं। निमज्जन की क्रिया तटीय भागों या सागरीय भागों में ही होती है। पर्वत निर्माणकारी संचलन के अन्तर्गत बल क्षैतिज रूप में कार्य करता है। जब बल दो विपरीत दिशाओं में कार्य करता है तो उसे तनावमूलक बल कहते हैं। इससे धरातल में चटकनों  भ्रंशों  तथा दरारों  का निर्माण होता है। जब बल आमने-सामने कार्य करता है तो उसे संपीडन-बल कहते हैं।

संपीडन बल के कारण भूपटलीय चट्टानों में जब लहरनुमा मोड़ पड़ जाते हैं तो इस मोड़ को वलन कहा जाता है। वलन में ऊपर उठे हुए भाग को अपनति  नीचे धँसे हुए भाग को अभिनति हैं। जब एक वृहद अपनति में अनेक छोटी-छोटी अपनतियाँ और अभिनतियाँ निर्मित होती हैं तो उसे समपनति  जाता है। जब एक वृहद अभिनति में इसी तरह की आकृतियाँ निर्मित होती हैं तो उसे समभिनति  कहते हैं।
संपीडन बल के कारण जब भूतल का विस्तृत भाग ऊपर उठ जाता है तो इसे संवलन कहते हैं। इस तरह, संवलन का प्रभाव विस्तृत क्षेत्रों में होता है। संवलन के अंतर्गत ऊपर उठें हुए भाग को उत्संवलन  नीचे धँसे हुए भाग को अवसंवलन  कहते हैं।

वलन के प्रकार (Types of folds)

वलन को निम्नलिखित रूपों में बाँटा जा सकता है-

  •  सममित वलन(Symmetrical Folds) :-

जिस वलन की दोनों भुजाएँ समान रूप से झुकी हुई होती हैं, उन्हें सममित वलन कहते हैं।

  •  असममित वलन(Asyrmmetical Folds) :-

असममित वलन में दोनों भुजाओं के झुकाव तथा लम्बाई में असमानताएँ होती हैं।

  •   एकदग्नित वलन(Monoclinae Folds) :-

यदि वलन की एक भुजा का झुकाव साधारण हो तथा दूसरी भुजा समकोण के साथ झुका हो तो ऐसे वलन को एकदग्नित वलन कहते हैं।

  •   समनत वलन(Issclinal Folds) :-

जब वलन की दोनों भुजाएँ एक-दूसरे के इतनी समीप आ जाती है कि दोनों भुजाएँ समानान्तर हो जाती हैं तो इसे समनत वलन कहते हैं। समनत वलन की भुजाएँ समानान्तर होती हैं लेकिन क्षैतिज दिशा में नहीं होती।

  •  परिवलित वलन(Recumbent Folds) :-

जब वलन की दोनों भुजाएँ परस्पर समानान्तर और क्षैतिज दिशा में होती हैं तो इसे परिवलित वलन कहते हैं।

  •  प्रतिवलन(Overturned Folds :-

अत्यधिक संपीडन के कारण जब वलन की एक भुजा दूसरे पर उलट जाती है तो उसे प्रतिवलन कहते हैं।-

  •  वलन की अक्ष(Plunging Folds) :-

क्षैतिज तल के समानान्तर न होकर उसके साथ कोण बनाए तो उसे अवनमन वलन कहते हैं।

  • खुला वलन(Opened Folds) :-

जब वलन की दोनों भुजाओं के बीच का कोण अधिक कोण (90 अंश से अधिक और 180अंश से कम) हो तो उसे खुला वलन कहते हैं।

  • बन्द वलन(Closed Folds) :-

जब वलन की दोनों भुजाओं के बीच का कोण न्यून कोण (90 अंश से कम) हो तो उसे बन्द वलन कहते हैं।

  • भ्रंश(Faults)

जब भूपटल में एक तल के सहारे चट्टानों का स्थानांतरण होता है तो इस स्थानांतरण से उत्पन्न संरचना को भ्रंश कहते हैं। हलाँकि भ्रंश  का निर्माण क्षैतिज संचलन के दोनों बलों-संपीडन एवं तनावमूलक से होता है, लेकिन तनावमूलक बल इसमें ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।

भ्रंश के प्रकार(Type of Faults) :-

 सामान्य  भ्रंश(Normal Faults) :-

चट्टानों में दरार पड़ जाने के बाद जब उसके दोनों खण्ड विपरीत दिशा में सरक जाते हैं तो उसे सामान्य भ्रंश  कहते हैं।

व्युत्क्रम भ्रंश(Reverse Faults) :-

जब चट्टानों में दरार पड़ने के बाद दोनों खण्ड आमने-सामने खिसकते हैं तो इससे निर्मित भ्रंश को व्युत्क्रम भ्रंश कहते हैं। व्युत्क्रम भ्रंश में एक खंड पर चढ़ जाते हैं। व्युत्क्रम भ्रंश का निर्माण मुख्यतः क्षैतिज संचलन के द्वारा उत्पन्न संपीडन से ही होता है, इसलिए इसे संपीडनात्मक भ्रंश  भी कहते हैं। इसे क्षेपित भ्रंश  कहा जाता है।

नतिलम्बी सर्पण भ्रंश(Strike-slip Fault) :-

जब भ्रंश तल के सहारे चट्टानों में क्षैतिज गति होती है तो उसे नतिलम्बी सर्पण भ्रंश कहते हैं।

सोपानी भ्रंश(Step Fault) :-

जब सभी भ्रंश तल  के ढाल एक ही दिशा में हों तो उसे सोपानी भ्रंश कहते हैं। भ्रंशन से कई प्रकार की स्थलाकृतियों का विकास होता है जैसे-भ्रंश घाटी  घाटी  भ्रंशोत्थ पर्वत  हाॅस्र्ट पर्वत  आदि।

 भ्रंश घाटी (Rift Valley):-

जब दो  रेखाओं के बीच का च्टानी भाग नीचे धँस जाता है तो उसे भ्रंशों घाटी कहते हैं। उदाहरण-अफ्रीका की महान  भ्रंशों घाटी, जर्मनी की राइन ,  भ्रंशों घाटी, भारत की नर्मदा व ताप्ती नदी घाटी आदि।

रैम्प घाटी(Ramp valley) :-

जब दो समानान्तर भ्रंशों के दोनों ओर के भूखंड ऊपर की ओर उठ जाते हैं तथा मध्यवर्ती खंड यथावत रहता है तो ऐसी घाटी को रैम्प घाटी कहते हैं। उदाहरण-ब्रह्मपुत्र नदी घाटी।

( Black  Mountain):-

जब दो भ्रंशों के बीच का भाग यथावत रहता है तथा किनारे के भाग नीचे धँस जाते हैं तो ऊँचे उठे भाग को पर्वत कहते हैं। उदाहरण-यूरोप में वाॅसजेस और ब्लैक फाॅरेस्ट।

हाॅस्र्ट पर्वत(Horst Mountain) :-

जब दो भ्रंशों के किनारे के भाग यथावत रहे एवं बीच का भाग ऊपर उठ जाए तो हाॅस्र्ट पर्वत का निर्माण होता है। उदाहरण-जर्मनी का हाॅर्ज पर्वत।  हलाँकि भ्रंशों   घाटी और रैम्प घाटी तथा ब्लाॅक व हाॅस्र्ट पर्वत प्रायः आकृति की दृष्टि से समान प्रतीत होते हैं लेकिन भू-संचलन की दृष्टि से इनमें अंतर होता है।

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