भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना

’ कांग्रेस’ शब्द की उत्पत्ति उत्तरी अमेरिका के राजनीतिक इतिहास कीदेन है, जिसका अर्थ है, ’व्यक्तियां का समूह’। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का श्रेय ए.ओ. ह्यूम एक सेवानिवृत ब्रिटिश अधिकारी थे। इन्होंने कलकत्ता बंबई और मद्रास का दौरा करने के उपरांत भारतीय राष्ट्रीय संघ का एक सम्मेलन पुणे में आयोजित करने की घोषणा की। यह सम्मेलन दिसम्बर में आयोजित किया जाना था, किंतु पुणे में हैजा फैल जाने के कारण यह आयोजन 28 दिसंबर 1885 की बंबई के गोकुलदास संस्कृत कालेज में किया गया। दादाभाई नौरोजी के सुझाव पर भरतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का नाम  कर दिया गया। बम्बई में हुए इस पहले अधिवेशन मे कुल 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता व्योमेश चन्द्र बनीर्जी ने की तथा इसके सचिव ए.ओ. ह्यूम थे।

कांग्रेस की स्थापना और उसके उद्देश्य के संबंध में अनेक मत प्रसुत किये गये हैं। इनमें से कुद मत निम्नलिखित हैः-

सुरक्षा कपाट सिद्धांत: सुरक्षा कपाट सिद्धांत सर्वप्रथम लाला लाजपात राय ने अपने पत्र ’यंग इंडिया’ में प्रस्तुत कया। इस अवधारणा के अन्तर्गत यह प्रतिपादित किया गया कि कांग्रेस ब्रिटिश वायसरायल के प्रोत्साहन पर ब्रिटिश हितों के लिए स्थापित एक संस्था है जो भारतीयों का प्रतिनिधित्व नहीं करती। इस अवधारणा क माध्य से भारतीय राष्ट्रीय कांगेस के उद्ेश्य एवं स्थित्वि पद-चिन्ह दिया गया। कांग्रेस के अन्य आलोचकों ने भी लाला लाजपत राय के इस वक्तव्य का उपयोग कर कांग्रेस की आलोचना प्रारंम्भ कर दिया एवं इसके अभिजात्यवादी स्वरूप को हास्यास्पद् बताया।  वैसे, तार्किक विश्लेशण करने से सुरक्षा कपाट विद्धान्त की सीमा स्पष्ट हो जाती हैं। सर्वप्रथम, सरकारी दस्तावेजों के अधार पर यह सिद्ध हो गया कि ह्यूम डफरिन की सलाह पर कार्य नहीं कर रहे थे। साथी ही, लाॅर्ड डफरिन कांगे्रस के प्रति असहिष्णु हो गए थे।

सरुक्षा कपाट की अवधारणा के विपरीत एक तड़ित चालक सिद्धांत का उदय हुआ। इसके अनुसार भारीय बुद्धिजीवियों ने ह्यूम का उपयोग भारतीय हितों के लिए किया, न कि ह्यूम ने भारतीय नेताओं का प्रयोग ब्रिटिश हितों के लिए किया। ध्यातव्य है कि अंग्रेजी सरकार कांग्रेस जैसी महत्वपूर्ण संस्था को संदेह की दृष्टि से देखती और इसे सरकारी नीतियों का शिकार होना पड़ता। किन्तु एक सेवानिवृत्त ब्रिटिश अधिकारी के इस संस्था से जुडने केपरिणामस्वरूप यह सरकारी कोपभाजन शिकार होने से बच गई।

भारतीय अभिजात वर्ग की आकांक्षाओं का मूर्त रूप: इस विचारधारा का प्रतिपादन करने वाले इतिहासकारों ने भारतीय राष्ट्रीय के अभिजात्यवादी चरित्र को उजागर किया और इसे ऐसे सत्तलोलुप, नौकरी के भूखे कुंठित एवं निराश व्यक्तियों का आंदोलन कहा जिनका उदेश्य अपनी स्वार्थसिद्ध के लिए कांग्रेस का उपयोग साधन के रूप में करना था। वैसे विश्लेशण करने से इस सिद्धानत की भी सीमाएॅ स्पष्ट हो जाती हैं। ये तथ्य किसी मामले विशेष के सम्बन्ध में सही हो सकते हैं किन्तु देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत एक नवीन वैचारिक आंदोलन का सूत्रपात करने वाले व्यक्तियों का समान्यीकरण न केवल गलत है, बल्कि उस पवित्र भावना की भी उपेक्षा है जिसने लाखों करोड़ों लोगों में राष्ट्रीय चेतना का संचार कर उन्हें प्रभावित किया।

अखिल भारतीय संस्था की आवश्यकता की अभिव्यक्ति : 19वीं सदी के पूर्वार्ध में पाश्चात्य शिक्षाप्राप्त नवोदित माध्यवर्ग की रूचि केवल समाज-सुधार में थी। यही कारण है कि 1857 ई0 के विद्रोह के समय राजनीतिक चेतना से रहित इस वर्ग की सहानुभूमि ब्रिटिश सरकार के साथ थी। किंन्तु सन् 1970 के दशक में औपनिवेशिक शोषण-तंत्र के विषय में उनकी समझ बेहतर हुई। दादाभाई नौरोजी ने अपना लेख(ब्रिटिश डैब्ट टू इंडिया) लिखकर ’धन की निकासी’ जैसे मुद्दो को प्रमुखता से उठायां कालंतर में इसी राजनीतिक चेतना के प्रस्फुन से देश के भिन्न-भिन्न भागों में राजनीतिक संगठनों की स्थापना हुई। इसी श्रृखंला की चरम परिणति के रूप में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई।