बीज एवं बीज प्रौद्योगिकी

1960 के दशक में मैक्सिको से आयातित गेहूं के उन्नत बीज लार्मा रोजा (Larma Roja) का भारतीय वैज्ञानिकों ने देशी किस्म सोनेरा (Sonera) के साथ क्रास कराकर सोनेरा-64 नामक अधिक उत्पादन देने वाली किस्म का विकास किया। भारत में हरित क्रांति की शुरुआत में इस बीज का बड़ा योगदान था। धान की प्रजातियों में भी इसी विधि को अपनाया गया।

राष्ट्रीय बीज नीति :

विश्व व्यापार संगठन (WTO) के प्रावधानों के अनुपालन के साथ-साथ देश में बीज उद्योग को एक संगठित स्वरूप देने हेतु केंद्रीय मंत्रिमण्डल द्वारा 18 जून, 2002 को नई राष्ट्रीय बीज नीति का अनुमोदन किया गया। इस नीति में बौद्धिक सम्पदा संरक्षण (Intellectual Property Protection) हेतु प्रावधान के अतिरिक्त Plants Variety and Farmers Rights Pro- tection Authority तथा राष्ट्रीय बीज बोर्ड के गठन का भी प्रावधान किया गया। इस बीज नीति में ट्रांसजेनिक बीजों, अनुवंशिक रूप से संवर्द्धित बीजों के उत्पादन में जैव प्रौद्योगिकी की भूमिका को मान्यता देते हुए इसके परीक्षण तथा वाणिज्यिक उपयोग को जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रूवल कमेटी (GEAC) के अनुमोदन के अधीन किया गया है।

राष्ट्रीय बीज निगम (National Seed Corporation) :

राष्ट्रीय बीज निगम का गठन 1956 के कंपनी अधिनियम के अंतर्गत 1963 में किया गया। बीजों के स्तर में उन्नयन हेतु यह देश में किया गया प्रथम प्रयास था।

संकर बीज (Hybrid Seed) :

जब दो या दो से अधिक स्वपरागित फसलों के संकरण पद्धति द्वारा प्राप्त बीजों को फसल उत्पादन हेतु प्रयोग किया जाता है तब इसे संकर बीज कहते हैं। ऐसे बीजों को अगली फसल के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता है। इस कारण से ऐसे बीजों को हर साल बदलाना पड़ता है। संकर बीजों को बनाने का श्रेय शल नाम के वैज्ञानिक को जाता है, जिन्होंने वर्ष 1909 में ऐसे बीज तैयार किए थे।

प्रजनक बीज (Breeders Seeds) :

प्रथम चरण में जो बीज तैयार किए जाते हैं उन्हें प्रजनक बीज कहते हैं।

आधार बीज (Foundation Seeds):

बीज उत्पाद शंखला का दूसरा चरण आधार बीज है प्रजनक बीजों को आधार बीजों में परिवर्तित करने के लिए वैज्ञानिक विधि से इनकी निगरानी की जाती है आधार बीजों का उत्पादन राष्ट्रीय बीज निगम राज्य फार्म निगम तथा राज्य बीज निगमों द्वारा विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों की सहायता से किया जाता है।

प्रमाणित बीज (Certified Seeds) :

तीसरे चरण में आधार बीजों से प्रमाणित बीजों का उत्पादन किया जाता है। कभी-कभी बिना आधार बीजों के ही उन्नत किस्म के बीजों का उत्पादन किया जाता है, इसे क्वालिटी बीज कहा जाता है।

जीन संवर्द्धित बीज (Genitically Modified Seeds) :

कृत्रिम उपायों द्वारा बीजों के प्राकृतिक गुणों में फेरबदल करके तैयार किए गए बीज को जीन संवर्धित बीज (GM Seeds) कहा जाता है।

पराजीनी बीज (Transgenic Seeds) :

कृत्रिम उपायों द्वारा बीज के जीन में किसी अन्य वनस्पति या जीव के जीन को मिलाकर विकसित किए गए बीज को पराजीनी बीज कहते हैं। ऐसे बीज पौधे की क्षमता का विकास करते हैं तथा उन्हें विशेष गुणों से युक्त बनाते हैं। इस प्रक्रिया द्वारा बीज की रोग प्रतिरोधक क्षमता, कीट प्रतिरोधी क्षमता में विकास के साथ-साथ उसके रंग, रूप, स्वाद तथा उसके जीवन अवधि में इच्छित परिवर्तन किया जा सकता है।

टर्मिनेटर एवं ट्रेटर बीज प्रौद्योगिकी

टर्मिनेटर प्रौद्योगिकी (Terminator Technology) : टर्मिनेटर प्रौद्योगिकी में जीनियागिरी के द्वारा बीज के कुछ गुणों या अवगुणों को निकाल दिया जाता है तथा उनके स्थान पर अन्य जीन या जीनों को समावेशित कर इच्छित परिणाम प्राप्त किए जाते हैं।

ट्रेटर प्रौद्योगिकी (Traitor Technology):

ट्रेटर प्रौद्योगिकी| टर्मिनेटर प्रौद्योगिकी के अगले चरण की प्रौद्योगिकी है जिसमें इच्छित जीन या जीनों को फसल में समावेशित किया जाता है।

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