बीजों का वर्गीकरण

1. प्रजनक बीज (Breeders Seeds) :- प्रजनक बीज, पादप या जिस संस्था द्वारा पैदा किया जाता है उससे सीधा सम्बन्धित होता है इसमें सबसे अधिक शुद्धता पायी जाती है।

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आधार बीज (Foundation Seeds) :- ये बीज प्रजनक बीजों से तैयार किये जाते है इनमें विशेष मानकों के आधार पर आंनुवशिक गुण और शुद्धता पायी जाती है। राष्ट्रीय बीज निगम, भारतीय राज्य फार्म निगम और राज्य बीज निगमों को आधार बीज के उत्पादन का दायित्व सौंपा गया है।

प्रमाणित बीज (Certified Seed) :- ये बीज व्यवसायिक रूप से खेती के लिए काम आने वाले बीजों की अन्तिम आवस्था है ये बीज उच्चतर गुणवत्ता युक्त होते है।

कृत्रिम बीज (Artificial Seeds) :- कृत्रिम बीज जेल (Gel) के मनके हैं जिनमें कायिक भ्रूण आवश्यक पोषक, वृद्धि नियामक, पीड़कनाशी, एंटीबायोटिक आदि होते है जिसमें भू्रण स्वस्थ्य पौधों में विकसित हो सके।

जेनेटिकली मॉडिफाइड बीज (Genetically Modified Seed ) :- जब किसी पौधे के प्राकृतिक जीन में कृत्रिम उपायों द्वारा उसकी मूल संरचना को परिवर्तित कर दिया जाता है, तो ऐसे पौधे से प्राप्त बीज को जी.एम. बीज कहते हैं। इसका उद्देश्य जल की आवश्यकता को कम करना, रोग तथा कीट के प्रति संवेदनशीलता को समाप्त करना, गुणवत्ता में वृद्धि करना आदि हो सकता है।

पराजीनी बीज (Transgenic Seed) :- वह बीज जिसके प्राकृतिक जीन में कृत्रिम उपायों द्वारा किसी दूसरे पौधे या जन्तु के जीन का भाग जोड़ दिया जाता है, पराजीनी बीज कहलाता है। इसका भी उद्देश्य पौधे में किसी विशिष्ट गुण या क्षमता का विकास करना होता है।

नोट :- भारत सरकार बीज उत्पादन की तीन किस्मों को मान्यता प्रदान करता है-प्रजनन बीज, आधारी बीज और प्रमाणिक बीज।

राष्ट्रीय बीज निगम(National Seeds Corporation). इसकी स्थापना-1963 ई0 की गयी जबकि 1966 ई0 में भारतीय बीज निगम अधिनियम पारित किया गया। बीज विकास, उत्पादन एवं वितरण सम्बन्धित कार्य करना इनका मुख्य उद्देश्य है।

खेती की प्रणालियाँ(System of Farming) :- इससे अभिप्राय कृषि के आर्थिक व सामाजिक क्रियाकलापों से है। कृषि की मुख्य प्रणाली निम्नलिखित हैं-

1. सहकारी खेती( Co-operative Farming) :- सहकारी खेती के अन्तर्गत परस्पर लाभ के उद्देश्य स्वेच्छापूर्वक अपनी भूमि श्रम और पूंजी को एकत्र करके सामूहिक रूप से खेती करते हैं।

2. राजकीय खेती (State Farming) :- राजकीय खेती में भूमि का प्रबन्ध सरकारी कर्मचारियों द्वारा किया जाता है। फार्म उत्पादन योजना सरकार द्वारा बनाई जाती है प्रतिदिन का कार्य दैनिक मजदूरों द्वारा किया जाता है। ऐसी फर्मों को चलाने के लिए सभी प्रकार की सुविधायें व आवश्यकतानुसार पूंजी राज्य द्वारा दी जाती है।

3. निगमित खेती (Corporate Farming) :- इसके अन्तर्गत खेती का प्रबन्ध एक निगम द्वारा किया जाता है। चूँकि निगम के सदस्यों का दायित्व सीमित होता है तथापि सम्पूर्ण व्यवस्था संचालन का कार्य मंडल द्वारा किया जाता है। इस व्यवस्था के अन्तर्गत बड़ी मात्रा में पूंजी एवं भूमि की आवश्यकता होती है। भारतवर्ष में महाराष्ट्र, तमिलनाडु और चेन्नई के कुछ भागों में यह खेती प्रचलित है।

4. काश्तकारी खेती (Peasant Farming) :- इस प्रणाली में स्वयं किसान भूमि का मालिक होता है तथा राज्य से उसका सीधा सम्बन्ध होता है। वह निर्धारित लगान राज्य को देता है। कृषि का सभी कार्य किसान अपनी मर्जी से करता है। खेती की प्रणालियों में यह प्रणाली भारत में प्रसिद्ध है।

5. पूंजीवादी खेती (Capitalistic Farming) :- इस प्रकार की खेती में पूंजीपतियों के पास बड़े-बड़े भूखण्ड होते हैं जो या तो स्वयं क्रय करते हैं या सरकार द्वारा अधिगृहीत कर दिये जाते हैं। इन भू-खण्डों पर पूंजीपति आधुनिक तकनीकी एवं साधनों को काम में लाकर भूमि का अधिकतम प्रयोग करते हैं। भारत में यह प्रणाली चाय, कॉफी व रबड़ के बागान में पायी जाती है।

6. संयुक्त खेती(Joint Farming) :- इस प्रकार की खेती में दो या दो से अधिक किसान सहकारी नही बल्कि आपसी साझेदारी के आधार पर कृषि संसाधनों को प्रयुक्त करके कृषि कार्य करते हैं।

7. सामूहिक खेती(Collective Farming) :- इस प्रणाली के अन्तर्गत भूमि का स्वामित्व सम्पूर्ण समाज में निहित होता है। प्रबन्ध समिति द्वारा निर्वाचित सदस्यों को सीमित वर्ग में बांट दिया जाता है। जिन्हें कार्यानुसार वेतन मिलता है।

फसलचक्र(Crop Rotation)

एक निश्चित क्षेत्र में एक निश्चित समयावधि के दौरान फसलों को इस क्रम में उगाना जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति का कम से कम क्षति हो फसल चक्र कहलाता है। जैसे गहरी जड़ वाली फसल के बाद कम गहरी जड़ वाली फसलों को उगाना, जैसे अरहर के बाद गेहूँ। दलहनी फसलों के बाद गैर दलहनी फसलों का उगाना आदि।

फसल चक्र अपनाने से बहुत से लाभ प्राप्त होते हैं। एक ओर जहाँ मृदा की उर्वरा शक्ति बनी वहीं दूसरी ओर रोग खरपतवार व कीट की रोगथाम में सहायता मिलती है। मृदा क्षरण में सहायता तथा घरेलू व बाजार मांग की पूर्ति में सहायता मिलती है।

फसल चक्र सघनता(Crop Rotation Intensity) :- देश के विभिन्न भागों में परिस्थिति के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के फसल चक्र अपनाए जाते हैं। कृषि क्षेत्र में लगातार उर्वरकों में प्रयोग से भूमि की उर्वरता एवं उत्पादकता (Fortilyty And Producitvity ) लगातार घटती जाती है फलस्वरूप एकीकृत पादप पोषक तत्व प्रबन्धनIntegrated Plant Nutrient Management को अपनाना जरूरी है। जिसके तहत खरीफ फसल के दौरान 50%NPK तत्व जीवांश खाद से तथा 50ः छच्ज्ञ उर्वरकों से देना चाहिए।

फसल चक्र में फसलों की संख्या                                                                                                                                                               फसल चक्र की सघनता =                                                                                                                                                                       × 100

फसल चक्र के वर्ष

फसल सघनता (Cropping Intensity) :- एक वर्ष में कुल कृषित क्षेत्र व शुद्ध (निवल) कृषित क्षेत्र का अनुपात फसल सघनता कहलाता है इसे प्रतिशत के रूप में व्यक्त किया जाता है।

एक वर्ष में बोया गया कुल क्षेत्र
फसल सघनता = × 100
शुद्ध कृषि क्षेत्र

विभिन्न प्रकार की खेतियों के नाम-

  • एरोपोनिक (Aeroponic) — पौधों को हवा में उगाना।
  • एपीकल्चर (Apiculture) — मधुमक्खी पालन
  • हॉर्टीकल्चर (Horticulture)—बागवानी
  • फ्लोरीकल्चर (Floriculture)—फूल विज्ञान
  • ओलेरीकल्चर (Olericulture)—सब्जी विज्ञान
  • पोमोलॉजी (Pomoculture)—फल विज्ञान
  • विटीकल्चर (Viticulture)—अंगूर की खेती
  • वर्मीकल्चर(Vermiculture) —केचुआ पालन
  • पिसीकल्चर (Pisiciculture) —मत्स्यपालन
  • सेरीकल्चर (Sericulture)—रेशम उद्योग
  • मोरीकल्चर (Moriculture)—रेशम कीट हेतु शहतूत (Mulberry) उगाना

उवर्रक :- उर्वरक दो प्रकार के होते हैं-

(1) कार्बनिक उर्वरकः- कार्बनिक उर्वरक प्राकृतिक उर्वरक होता है जैसे गोबर की खाद आदि।

(2) अकार्बनिक उर्वरक :- अकार्बनिक उर्वरक का तात्पर्य रासायनिक उर्वरकों से होता है जो मनुष्यों द्वारा उत्पादित किया जाता है।

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार कृषि के विभिन्न किस्मों के उर्वरकों (नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा पोटास) का उपयोग एक संतुलित अनुपात में किया जाना चाहिए। भारत की अन्न फसलों हेतु आदर्श अनुपात 4ः2ः1 का है। जबकि दलहन फसलों के लिए यह अनुपात 1ः2ः1 है।

उर्वरक उत्पादन एवं उपयोग में भारत का विश्व में चीन व अमेरिका के बाद तीसरा स्थान है। भारत अभी भी नाइट्रोजनी उर्वरकों की अपनी खपत का 94: व फास्फेटी उर्वरकों की खपत का 82: की उत्पादन कर पाता है। पोटाशी उर्वरकों के लिए तो भारत पूरी तरह आपात पर ही निर्भर है।

यूरिया उर्वरक के मूल्य सरकार द्वारा निर्धारित किए जाते हैं। किसानों को उचित मूल्य पर इसकी आपूर्ति जारी रखने के लिए केन्द्र सरकार की ओर से सब्सिडी दी जाती है। यूरिया ही एक मात्र ऐसा उर्वरक है जो मूल्य नियंत्रण के अन्तर्गत आता है। भारत में कृषि क्षेत्र की एक तीसरी समस्या पूंजी निर्माण की है। इसके अन्तर्गत अधो संरचना, कोल्ड स्टोरेज, ऊर्जा, सड़क, सिंचाई इत्यादि में भारी मात्रा में निवेश की आवश्यकता है या उस अनुपात में निवेश नही हो पा रहा है।

भारत में कृषि जोत :-

कृषि जोत से तात्पर्य उस क्षेत्र से होता है जो प्रत्येक किसान परिवार के पास अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए उपलब्ध होता है। भारत में कृषि जोतों को तीन प्रकार से विभाजित किया गया है-लाभकर जोत, पारिवारिक जोत, तथा अनुकूलतम जोत।

लाभकर जोत (Economic Holding) :- इससे तात्पर्य उस जोत से है जो कृषक परिवार को पूर्ण कालिक रोजगार प्रदान करे तथा रहन-सहन का उचित स्तर प्राप्त किया जा सके। केन्द्रीय भूमि सुधार कमेटी के अनुसार लाभ कर जोत का आकार सिंचित भूमि का 10 एकड़ आंशिक सिंचित भूमि का 27 एकड़ लक्ष्य या असिंचित भूमि का 54 एकड़ निर्धारित है।

भारत में कृषि जोतों का एक अन्य वर्गीकरण सीमान्त, लघु, मध्यम और बड़े आकार की जोतों के रूप में किया गया है।

सीमांत जोत :- 1 हेक्टेयर से कम अथवा ढाई एकड़ से कम जोत को सीमांत जोत कहते हैं।

लघु जोत :- 1-2 हेक्टेयर वाले जोतों को लघु जोत कहा जाता है।

मध्यम जोत :- 4-10 हेक्टेयर जोत वाले क्षेत्र को मध्यम जोत कहते हैं।

बड़े आकार की जोत :- 10 हेक्टेयर से बड़े आकार की जोत को बड़े आकार की जोतों में सम्मिलित करते हैं।

भारत का विश्व में कृषि जोत भूमि के सम्बन्ध में दूसरा स्थान है। पहला स्थान न्ण्ैण्।ण् का है। कृषि योग्य भूमि की दृषि से विश्व में पांच शीर्ष राष्ट्र क्रमशः है-अमेरिका, भारत चीन, रूस, ब्राजील।

शीर्ष पांच कृषि योग्य भूमिधारी राज्यों का क्रम-राजस्थान, महाराष्ट्र, उ0प्र0, म0प्र0, आन्ध्र प्रदेश।

नोट :- भारत के पास विश्व की कुल कृषि योग्य भूमि का मात्र 11.0% है जबकि इसे विश्व जनसंख्या में लगभग 18.0% भाग का पोषण करना पड़ता है।
सिंचाई :- योजना आयोग द्वारा विभिन्न प्रकार की सिंचाई परियोजनाओं को निम्नलिखित प्रकार से वर्गीकृत किया गया है-

(1) छोटी सिंचाई परियोजनाएं :- इनमें वे परियोजनाएं सम्मिलित की जाती है जिसके अन्तर्गत 2000 हेक्टेयर तक क्षेत्रफल हो। लघु सिंचाई कार्यक्रमों में कुओं का निर्माण, निजी नलकूपों का निर्माण, बोरिंग तथा कुओं को गहरा करके भूमिगत जल का विकास तथा लिफ्ट सिंचाई परियोजनाओं को सम्मिलित किया जाता है।

(2) मध्यम सिंचाई परियोजनाएं :- इसमें वे परियोजनाएं सम्मिलित की जाती हैं जिसके नियंत्रण के अधीन 2000 से 10,000 हेक्टेयर कृषि योग्य क्षेत्रफल हो।

(3) बड़ी सिंचाई परियोजनाएं :- इनमें वे परियोजनाएं सम्मिलित की जाती है जिनके नियंत्रण में 10,000 हेक्टेयर से अधिक कृषि योगय क्षेत्रफल हो।
वर्ष 2014 की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2011-12 में सर्वाधिक सिंचित क्षेत्रफल वाले पांच राज्य क्रमशः है-उ0प्र0, राजस्थान, म0प्र0, पंजाब एवं आन्ध्र प्रदेश।

  •  कुल क्षेत्रफल के प्रतिशत की दृष्टि से सर्वाधिक सिंचित राज्य है-पंजाब।
  • देश में सबसे कम सिंचित क्षेत्रफल प्रतिशत की दृष्टि से मिजोरम में पाया जाता है।
  • क्षेत्रफल की दृष्टि से सर्वाधिक सिंचित क्षेत्रफल (Non Intrigated Aera) क्रमशः महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, कर्नाटक एवं आन्ध्र प्रदेश।
  • नहर, नलकूप तथा कुआँ द्वारा सिंचित क्षेत्रों को क्षेत्रफल के आधार पर निम्नलिखित क्रम में रखा गया है-नलकूपझनहर झकुआँ

    शीर्ष पांच नलकूप सिंचित राज्य (2011-12)

  • प्रथम – पंजाब
  •  द्वितीय – राजस्थान
  • तृतीय – बिहार
  • चतुर्थ – हरियाणा
  • पंचम – आन्ध्र प्रदेश

कृषि साख की समस्या (Problem of Agriculture Credit) :-

कृषि साख की समस्या से अभिप्राय किसानों को ऋण उपलब्ध कराने से है। भारतीय किसानों की वित्तीय आवश्यकता की पूर्ति को तीन प्रकार के ऋणों द्वारा पूरा किया जाता है-

1. अल्प कालीन ऋण :- 15 माह से भी कम समय के लिए लिये गये धन को अल्पकालीन ऋण में सम्मिलित करते हैं। इसमें बीज, उर्वरक तथा पारिवारिक आवश्यकताओं के लिए ऋण लिया जाता है।

2. मध्यम कालीन ऋण :- भूमि सुधार के लिए, पशु खरीदने के लिए तथा कृषि उपकरण प्राप्त करने के लिए 15 माह से 5 वर्ष तक अवधि के लिए, लिये गये ऋण को मध्यम कालीन ऋण सम्मिलित करते हैं।

3. दीर्घकालीन ऋण :- ये ऋण पांच वर्ष से अधिक की समयावधि के लिए, लिये जाते हैं। दीर्घ कालीन ऋण के अन्तर्गत भूमि खरीदने। भूमि पर स्थायी सुधार कराने, पुराने करों का भुगतान करने तथा मंहगे कृषि यंत्रों को खरीदने को सम्मिलित किया जाता है।

भारत में किसान अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दो प्रकार के स्रोतों से ऋण प्राप्त करता है-

1. परम्परागत स्रोत :- परम्परागत स्रोत ;छवद प्दजतपजनजपवदंस ैवनतबमेद्ध जिसे गैर-संस्थागत स्रोत भी कहते हैं, के अन्तर्गत महाजन, साहूकार, देशी बैंकर अड़तिए इत्यादि से शामिल किया जाता है।

2. संस्थागत स्रोत (Instiutional Soruces) :- संस्थागत स्रोत जिसे आधुनिक स्रोत भी कहा जाता है, के अन्तर्गत सरकार, सहकारी समितियों तथा वाणिज्यिक बैंको आदि को सम्मिलित किया जाता है।

कृषि साख केे सम्बन्ध में 1951-52 ई0 में गोरवाल की अध्यक्षता में अखिल भारतीय ग्रामीण साख सर्वेक्षण समिति का गठन किया गया। इसी की अनुशंसा पर भारतीय स्टेट बैंक की स्थापना हुई।

ए0एम0 खुसरो की अध्यक्षता में भारतीय रिजर्व बैंक ने अखिल भारतीय ग्रामीण साख समीक्षा समिति गठित की जिसने अपनी सिफारिसें 1989 ई0 में प्रस्तुत की थी इसी आधार पर 22 अप्रैल 1998 ई0 के नर सिंहम समिति ने भी कृषि साख के सम्बन्ध में सुझाव प्रस्तुत किए।

क्षेत्रीय ग्रामीण बैकों की स्थापना वर्ष 1975 ई0 में हुई जिनका मुख्य कार्य कृषि साख उपलब्ध कराना है।

वर्ष 1969 ई0 में 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ और इसके बाद इन व्यावसायिक बैंको ने कृषि साख उपलब्ध कराने का कार्य प्रारम्भ किया।

कृषि साख को उपलब्ध कराने वाली सबसे बड़ी संस्था नाबार्ड (NABARD) है जिसकी स्थापना 12 जुलाई 1982 ई0 को हुई। नाबार्ड का मुख्यालय मुम्बई में है। नाबार्ड भारतीय रिजर्व बैंक की वह शाखा है जो कृषि क्षेत्र में साख उपलब्ध कराने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

ग्रामीण अवसंरचना विकास निधि (RIDF) :- RIDF नाबार्ड द्वारा उन अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों से निधियाँ एकत्रकर 1995-96 से चलायी जा रही है जो कृषि क्षेत्र को ऋण देने के अपने लक्ष्य को पूरा करने में असमर्थ है। इस निधि का उद्देश्य राज्य सरकारों तथा राज्य के स्वामित्व वाले निगमों की चल रही ग्रामीण आधारभूत योजनाओं को पूरा करने के लिए, समर्थ बनाने के लिए ऋण प्रदान करना। वाद में इसके कार्य क्षेत्र को बढ़ाकर इसमें ग्रामीण पेयजल योजना, भूमि संरक्षण योजना ग्रामीण स्वास्थ्य केन्द्रों और प्राथमिक स्कूलों, आंगनबाड़ी केन्द्रों आदि को शामिल किया गया।

ग्रामीण अवस्थापना या अधोसंरचना के विकास के सम्बन्ध में 1995-96 में 200 करोड़ रूपये आवंटित किए गये जो ग्रामीण अवस्थापना विकास फण्ड Q.M (RIDE) को दिये गये। वर्ष 2014-15 के बजट में त्प्क्थ् के लिए 30 हजार करोड़ रू0 आवंटित किए गये। इस फण्ड का संचालन नाबार्ड द्वारा किया जाता है।

कपार्ट :- लोक कार्यक्रम एवं ग्रामीण प्रौद्योगिकी विकास परिषद अर्थात् कपार्ट (Council For Advancement of Peole’s Action And Rural Technology-CAPART)का गठन 1 सितम्बर 1986 को किया गया था। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है। कपार्ट का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण समृद्धि के लिए परियोजनाओं क्रियान्वयन में स्वेच्छिक कार्य को प्रोत्साहित करना एवं उसमें मदद करना है। कपार्ट के नौ प्रादेशिक केन्द्र स्थापित किये गये हैं। जो निम्न हैं-जयपुर, लखनऊ, अहमदाबाद, पटना, भुवनेश्वर, गुवाहाटी, हैदराबाद, चण्डीगढ़ और धारवाड़। इन प्रादेशिक केन्द्रों को अपने-अपने क्षेत्रों में स्वयं सेवी संस्थाओं के 20 लाख रूपये तक के परिव्यय वाली योजनाओं को मंजूरी देने की शक्ति प्राप्त है। बिहार के मुजफ्फरपुर के बनिया ग्राम में परामर्श एवं मार्गदर्शक केन्द्र के रूप में एक ’ग्राम ज्ञान केन्द्र’ VKC-Village Knoqladge Center) की शुरूआत 22 अप्रैल 2007 को कपार्ट द्वारा की गयी।

कृषि यंत्रीकरण (Agriculture Machanisation) :- कृषि यंत्रीकरण से अभिप्राय भूमि पर मशीनों द्वारा उन कार्यों को करने से है जो साधारण रूप से मानव शक्ति व बैल, घोड़े या अन्य किसी प्रकार के वाहक पशुओं द्वारा किए जाते हैं। दूसरे अर्थों में कहा जा सकता है कि श्रम को पूँजी से बदल देना ही कृषि का यंत्रीकरण है। भारत में कृषि यंत्रीकरण दो रूपों में अपनाया गया है-

1. परम्परागत पशुचालित कृषि उपकरणों के स्थान पर डीजल, पवन ऊर्जा और सौर ऊर्जा से चलने वाले उपकरणों का प्रयोग।

2. देश में विभिन्न कृषि जलवायु तथा सामाजिक-आर्थिक स्थितियों के संदर्भ में भारवाही पशुओं के महत्व एवं उनकी अनिवार्यता को दृष्टि में रखते हुए पशु चालित यंत्रों का प्रोन्नयन एवं प्रतिस्थापन करना।

कृषि यंत्रीकरण में सबसे अधिक प्रगति टै्रक्टरों एवं पावर ट्रिलरों के उत्पादन एवं उपयोग में दिखाई दे रही है। भारत प्रतिवर्ष 5 लाख से अधिक टै्रक्टरों को उत्पादित कर विश्व में अग्रणी राज्य बना हुआ है।

वर्तमान में कृषि यंत्रीकरण की सबसे बड़ी बाधा कृषि शक्ति की कम एवं अनियमित उपलब्धता और कम होता हुआ जोत का आकार है। आर्थिक समीक्षा 2013-14 के अनुसार भारत में फार्म मशीनीकरण का स्तर विकसित देशों के 90ः की तुलना में औसतन 25ः है।

ट्राइफेड (Triffed) :- जनजातीय लोगों का शोषण करने वाले निजी व्यापारियों से छुटकारा दिलाने और उनके द्वारा तैयार की गई वस्तुओं का अच्छा मूल्य दिलाने के उद्देश्य से सरकार ने अगस्त 1987 में भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास परिसंघ (Tribal Co-Oprative Marketing Development Federation Of India Ltd-TRIFED) की स्थापना की थी। इसने अप्रैल 1988 से कार्य करना प्रारम्भ कर दिया था। इसे पेड़ों तथा वनों के उत्पादों के एकत्रीकरण, प्रसंस्करण भण्डारण और विकास की प्रमुख एजेन्सी भी घोषित किया गया है। गेहूँ और धान की सरकारी खरीद के लिए ट्राइफेड भारतीय खाद्य निगम के एजेन्ट और मोटे अनाजों, दालों और तिलहनों की सरकारी खरीद में कृषि एवं सहकारिता विभाग के एजेन्ट के रूप में काम करती है। मूल्यों के उतार-चढ़ाव से होने वाले अचानक नुकसान की भरपाई के लिए कृषि मंत्रालय इसे अनुदान देता है।

नाफेड (NAFED) :- कृषि उपजों के विपणन हेतु सहकारी क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ (National Agriculture Co- Operative Federation Ltd-NAFED)की स्थापना की गई है।

कृषि उपजों का भण्डारण :- कृषि उपजों के भण्डारण की सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए 1956 में ’राष्ट्रीय सहकारी विकास एवं भण्डागार बोर्ड’ तथा 1957 में केन्द्रीय भण्डागार निगम (Central Warehousing Corporation) की स्थापना की गई थी। इसके बाद राज्यों में भी राज्य भण्डागार निगम स्थापित किए गए हैं। भारतीय खाद्य निगम ;थ्ब्प्द्ध के पास अपने गोदाम हैं।

कृषि विपणन :- भारत में कृषि उपजों के व्यवस्थित विपणन को प्रोत्साहित करने के लिए बाजार को नियन्त्रित किया गया था। अधिकांश राज्यों तथा केन्द्रशासित प्रदेशों ने कृषि उपजों के विपणन को नियन्त्रित करने के लिए एक अधिनियम ;।च्डब्.।बजद्ध बनाया था। 1950 के अन्त तक देश में 286 नियामक बाजार (Regulated Markets) थे, जिनकी संख्या 31 मार्च, 2009 को बढ़कर 7139 हो गई थी।

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