पारिस्थितिकी (ECOLOGY)

वातावरण एवं समुदाय के पारस्परिक सम्बन्धों के अध्ययन को पारिस्थितिकी कहते हैं। इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम हैकेल 1896 ने किया था। उडम ने प्रकृति की संरचना एवं कार्यों के अध्ययन को पारिस्थितिकी कहा है।

वातावरण में से सभी कारक आ जाते हैं जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जीव समुदाय को प्रभावित करते हैं। इन कारकों को पारिस्थितिकी कारक भी कहते हैं जिन्हें चार समूहों में रखा गया है-

1. जलवायवीय कारक जिसमें वर्षा, ताप, प्रकाश वायुमण्डलीय गैसें, वायु गति तथा वायुमण्डलीय नमी शामिल है। जीव की उपापचयी क्रियाओं के लिए जल अत्यन्त ही आवश्यक तत्व है जो मुख्य रूप से वर्षा से प्राप्त होता है। अधिक वर्षा तथा अधिक ताप के कारण चैड़े पत्तों वाले बड़े वृक्षों के घने जंगल अधिक वर्षा तथा कम ताप के कारण नुकीली पत्तियों वाले वृक्ष (जैसे चीड़ आदि) तथा कम वर्षा व अधिक ताप के कारण मरूद्भिद् वनस्पतियाॅं उगती हैं।
ताप पौधों की भौतिक रासायनिक तथा उपापचयी क्रियाओं पर नियंत्रण रखते हैं।

पौधे 25-35°c  ताप पर अधिकतम क्रियाशील होते हैं। 0°c या इससे कम ताप पर एन्जाइम निष्क्रिय हो जाते हैं।, नष्ट नहीं होते। 60°c  ताप पर एन्जाइम का स्कन्दन एवं विकृतिकरण हो जाता है, जिसके कारण पौधे नष्ट हो जाते हैं। ताप का मुख्य स्रोत सूर्य है। सूर्य के ऊर्जा प्रकाश के रूप में मिलती है। प्रकाश से पौधों में प्रकाशसंश्लेषण, वाष्पोत्सर्जन, वृद्धि बीजांकुरण, पुष्पन, लवक का निर्माण आदि क्रियाएँ प्रभावित होती हैं।

वायु की गति भी पौधे की रचना, वृद्धि एवं कार्यिकी पर प्रभाव डालते है वायु की गति बढ़ाने से वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है। जबकि वृद्धि दर कम हो जाती है।

वायुमण्डलीय O2,CO2, N2 गैसें  तथा जलवाष्प का वायुमण्डल में चक्रीकरण होता रहता है जिसके कारण इनकी एक निश्चित मात्रा बनी रहती है। कुछ गैंसे वायुमण्डल को प्रदूषित कर पौधों को हानि पहॅुचाती हैं। वायुमण्डलीय नमी पैाधों में वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करती हैं। वायुमण्डलीय में उपस्थित जलवाष्प वायुमण्डलीय नमी कहलाती हैं।

परितन्त्र : –  सीमित एवं निश्चित भौतिक वातावरण का प्राकृतिक तन्त्र जिसमें जैवीय तथा अजैवीय घटकों में पारस्परिक सम्बन्ध एक निश्चित नियमानुसार गतिज संतुलन में रहता है। और इसमें पदार्थों तथा ऊर्जा का प्रवाह सुनियोजित प्रकार से होता रहता है। पारितन्त्र शब्द का प्रयोग टेन्सले 1935 ने किया था। एक आत्मनिर्भर परितन्त्र के लिए ऊर्जा का स्रोत तथा पर्याप्त मात्रा में रासायनिक पदार्थों की पूर्ति का होना आवश्यक है।

परितन्त्र के जैवीय घटकों में उत्पादक, उपभोक्ता तथा उत्पादक आते हैं। उत्पादक के अन्तर्गत हरे पौधे आते हैं जो जल तथा CO2 से प्रकाश सेश्लेषण द्वारा पर्णहरित तथ प्रकाश की उपस्थिति में कार्बनिक भोजन निर्माण करते हैं। ये प्राथमिक उत्पादक कहलाती है।

                    
उपभोक्ता वर्ग के जन्तु प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपना भोजन पौधों से प्राप्त करते है। शाकाहारी जन्तु अपना भोजन पौधों से प्राप्त करते हैं और ये प्राथमिक उपभोक्ता की श्रेणी में आते हैं। इस श्रेणी में कीड़े -मकोड़े बकरी, गाय, खरगोश आदि आते हैं। प्राथमिक उपभोक्ता से भोजन प्राप्त करने वाले मांसाहारी जन्तु द्वितीय श्रेणी के उपभोक्ता कहलाते हैं। इस श्रेणी मे मेढक बिल्ली, भेड़िया आदि आते हैं।

द्वितीय श्रेणी के मांसाहारी जन्तुओं से भोजन ग्रहण करने वाले मांसाहारी जन्तु तृतीय श्रेणी के उपभोक्ता कहलाते हैं। इस श्रेणी में साॅप, मोर, शेर, चीता आदि आते हैं। इस श्रेणी के वे उपभोक्ता जो सभी शाकाहारी तथा मांसाहारी जन्तुओं से भोजन प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन उनको मारकर अन्य जन्तु भोजन नहीं ग्रहण कर सकते। वे सर्वोच्च मांसाहारी की श्रेणी में आते हैं, मनुष्य को तो सर्वभक्षी कहा गया है क्योंकि वह अपना भोजन किसी भी पोषक स्तर से प्राप्त कर सकते हैं।

अपघटक :-  उन जीवों को कहते हैं जो उत्पादक तथा उपभोक्ताओं की मृत्यु के पश्चात् उनके शरीर का अपघटन कर देते हैं जिससे जटिल कार्बनिक पदार्थ सरल तत्वों में अपघटित हो जाते हैं। ये सरल तत्व पुनः जीवधारियों द्वारा प्रयोग कर लिये जाते हैं। अपघटक की श्रेणी में मृतोपजीवी कवक तथा जीवाणु आते हैं। इन्हें प्राकृतिक सफाईकर्ता भी कहतें हैं।

अजैवीय घटकों को तीन समूहों में :-

(1) जलवायवीय जैसे प्रकाश, ताप आदि

(2) अकार्बनिक पदार्थ जैसे नाइट्रोजन,कार्बन डाइआक्साइड, आक्सीजन, जल आदि

(3) कार्बनिक पदार्थ जैसे प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइडेªट्स आदि में बाॅटा गया है।

परितंत्र में ऊर्जा हस्तान्तरण :-  परितंत्र के उत्पादक जितनी ऊर्जा खाद्य के रूप में संचित करते हैं उसकी 90 प्रतिशत ऊर्जा उत्पादक अपनी जैविक क्रियाओं में प्रयुक्त कर लेते हैं, केवल 10 प्रतिशत ऊर्जा खाद्य पदार्थों के रूप में शाकाहारी प्राथमिक उपभोक्ताओं को प्राप्त होती है। प्रत्येक पोषक स्तर पर 90 प्रतिशत ऊर्जा खर्च हो जाती है और केवल 10 प्रतिशत ऊर्जा ही अगले पोषक स्तर तक हस्तान्तरित हो पाती है। यही कारण है कि तृतीय या सर्वोच्च श्रेणी के उपभोक्ताओं की संख्या कम होती है। कार्बनिक पदार्थों के आक्सीकरण से रासायनिक ऊर्जा, गतिज ऊर्जा तथा ताप के रूप में मुक्त होकर वातावरण में चली जाती है। यहाॅ ऊर्जा का प्रवाह ऊष्मा गतिक नियम के अनुसार होता है।

पारिस्थितिक कारक :-  वातावरण का वह भाग होता है जो किसी भी पौधे को प्रभावित करता है। वातावरण जैवीय जलवायवीय मृदा तथा स्थलाकृतिक कारकों से निर्मित होता है। जैवीय कारकों के कारण ही समुदाय के सभी जीवधारी आपस में एवं वातावरण में सम्बन्धित होते हैं और एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। मृदा कारक भी पौधों के लिए महत्वपूर्ण है। मृदा का निर्माण खनिज पदार्थ लगभग 40 प्रतिशत, कार्बनिक पदार्थ लगभग 10 प्रतिशत, मृदा जल, (लगभग 25 प्रतिशत) तथा मृदा वायु लगभग 25 प्रतिशत द्वारा होता है।

जीवोम (THOKSE) :-  सबसे बड़ा स्थलीय समुदाय जो एक निश्चित बड़े क्षेत्र में फैला होता है। इसकी प्रकृति तथा क्षेत्र निर्धारण तापमान, वर्षा मृदा अक्षांश आदि कारकों पर निर्भर करता है। पृथ्वी पर पाये जाने वाले प्रमुख जीवोम में टुन्ड्रा, टैगा, शीतोष्ण पर्णपाती वन, उष्ण कटिबन्धीय मानसूनी वन, घास के मैदान, मरूस्थल उष्ण कटिबन्धीय सवाना आदि आते हैं।

टुन्ड्रा क्षेत्र  60°N अक्षांश पर एशिया, यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका में फैला हुआ हिम क्षेत्र है। यहाॅ का ताप लगभग 30°c से 40°c  के मध्य रहता है, विषम परिस्थितियो में टुन्ड्रा को आर्कटिक मरूस्थल भी कहते हैं। यहाॅ की वनस्पतियों में मुख्यतः लाइकेन तथा स्फैगनम पाये जाते हैं। जन्तुओं में यहाॅ रेनडियर, बर्फीले उल्लू ध्रुवीय भालू, आर्कटिक लोमड़ी आदि मिलते हैं। ग्रीष्म काल मे यहाॅ अधिकतम 10°c  का ताप रहता है।

टैगावन को वोरियल वन या उत्तरी शंकुधारी सदाबहार वन भी कहते हैं। ये वन उत्तरी अमेरिका, यूरोप तथा उत्तरी एशिया में टुन्ड्रा वनों के समीप पाये जाते हैं। इस प्रकार के वनों में शंकुधारी वृक्ष मुख्य रूप से पाये जाते हैं। जैसे चीड़ देवदार, जूनीपर, फर, स्पू्रस आदि।

  शीतोष्ण  पर्णपाती   वन :-  उत्तरी मध्य यूरोप, पूर्वी एशिया पूर्वी अमेरिका, कनाडा आदि में पाये जाते हैं। इन वनों के वृक्षों में ओक बेटुला एसर हिकोरी फर्न, माॅस, लाइकेन आदि पाये जाते हैं।

उष्ण कटिबन्धीय मानसूनी वन मध्य अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, कांगों, भारत, जावा सुमात्रा श्रीलंका आदि देशों में पाये जाते हैं। सिनकोना, बरगद, दालचीनी, बांस ताड, ढाक, साल, टीक आदि इन वनों में पाये जाते हैं।

अमेरिका में प्रेयरीज, अफ्रीका में वेल्ड्स यूरोप तथा एशिया में स्टेपीज घास के मैदान हैं। घास के मैदानों में बारहसिंगा, बिलकारी उल्लू, बैजर, वाइसन प्रेअरीज, कुत्ते आदि जानवर पाये जाते हैं। विश्व में पाये जाने वाले मरूस्थलों में प्रमुख उत्तरी अफ्रीका का सहारा, एशिया का गोबी, पश्चिम एशिया में थार मरूस्थल प्रमुख हैं। मरूस्थल के दिन गर्म तथा रातें ठण्डी होती हैं। यहाँ पायी जाने वाली वनस्पतियों में कैक्ट्स, यूफोर्बिया, कैजुराइना खजूर, झाऊ, करील आदि है। प्रमुख जन्तुओं में रैटल सर्प, लोमड़ी, सियार, आदि हैं।

समुद्री पारिस्थितिक तट  :-  समुद्र की गहराई, तट से दूरी, प्रकाश की उपलब्धता आदि के कारण समुद्र में एक से अधिक प्रकार के पारिस्थितिक तन्त्र पाये जाते हैं। समुद्र की गहराइयों मे प्रकाश की उपलब्धता के आधार पर निम्न अनुदैध्र्य क्षेत्र पाये जाते हैं- जल की सतह से 200 मीटर गहराई पर प्रकाशी क्षेत्र 200 से 2000 मीटर की गहराई पर अप्रकाशी क्षेत्र, 2000 से अधिक गहराई का क्षेत्र वितलीय क्षेत्र कहलाता है।

समुद्री जीवों को तीन समूहों

(1) प्लवक (निष्क्रिय रूप से जल की सतह पर तैरते हैं),

(2) (तरणक सक्रिय रूप से तैरने वाले जीवधारी)

(3) समुद्र की तली पर रहने वाला, समान्यतः अपमार्जक में बाँटा गया है।

इकोटोन :- जीव समुदाय एक दूसरे की सीमाओं का अतिक्रमण कर जब एक ऐसे विनियम क्षेत्र का निर्माण करते है जहाँ दो क्षेत्रो के जीवों का सह अस्तित्व होता है। ऐसे माध्यमिक क्षेत्रों को ही ईकोटोन या सवंमित क्षेत्र कहते हैं।

दीप्तिकालिता :-  प्रकाश अवधि को दीप्तिकाल तथा इसके प्रभाव को दीप्तिकालिता कहते है। इसके आधार पर पौधों के कई वर्ग हैं

  1. – दीर्घ दीप्तिकाली पौधों जैसे पालक, हेनबेन आदि
  2.  अल्प दीप्तिकाली पौधे जैसे सोयाबीन, जेन्थियम आदि
  3.  प्रकाश उदासीन पौधे जैसे टमाटर, मिर्च आदि
  4.  मध्यवर्ती प्रकाशीय जैसे मिकेनिया
  5. दीर्घ अल्प प्रकाशीय जैसे ब्रायोफिल्ल
  6. अल्प दीर्घ प्रकाशीय जैसे गेंहॅू आदि।

मृदापरिच्छेदिका :-  मृदा के विभिन्न स्तरों के अनुक्रम रचना, लवणीय तथा स्वभाव को मृदापरिच्छेदिका कहा जाता है। मृदा की खड़ी कर मृदापरिच्छेदिका का अध्ययन किया जाता है तथा इसे निम्न स्तरों में विभाजित करते  हैं।

अ-  जो मिट्टी की ऊपरी पर्त है जिसमें ह्यूमस के रूप में अपघटित तथा अपघटित कार्बनिक पदार्थ पाये जाते हैं। पौधों की जड़ें समान्यतः इसी भाग में होती है।

ब-  को उपमृदा भी कहते हैं। ह्यूमस की मात्रा कम होती है। निक्षालन के कारण इसमे खनिज लवण प्रचुर मात्रा में मिलते हैं।

 स –  मृदा परिच्छेदिका का सबसे निचला स्तर जिसमें मातृ चट्टानों के टुकड़े पाये जाते हैं।

द-  जिसमें मूल चट्टाने पायी जाती हैं।

नोट :-

1.दृश्य प्रकाश की तरंगें 320-750 mμ तरंग लम्बाई की प्रकाश संश्लेषण में सहायता करती है। इसमें से पीली और हरी किरणों का उपयोग विशेष रूप से नहीं होता है। सूर्य प्रकाश की पत्ती पर पड़ने वाली मात्रा का लगभग 83 प्रतिशत पत्ती द्वारा अवशोषित होता है। 12 प्रतिशत परावर्तित तथा 5 प्रतिशत पारगत हो जाता है। अवशोषित प्रकाश में से लगभग 4 प्रतिशत का उपयोग प्रकाश संश्लेषण में होता है। शेष भाग ऊष्मा के रूप में वातावरण मे ंचला जाता है।

2.अन्धकार में उगाये पौधों में पर्णहरित का निर्माण नहीं होता है। ऐसे पौधे पीले, कमजोर और लम्बे होते हैं। इस लक्षण को पाण्डुता कहते हैं।
प्रकाश पौधों में रन्ध्रों के खुलने और बन्द होने की क्रिया को प्रभावित करके वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करता है। प्रकाश की तीव्रता के कारण तापमान में वृद्धि होती है। और वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है।

3.उत्तरी गोलार्द्ध में समुद्री धाराओं की दिशा दक्षिणावर्ती व दक्षिणी गोलार्द्ध में वामावर्ती होती है। यह कारिआॅलिस प्रभाव के कारण होता है।
पृथ्वी की जलवायु को प्रभावित करने वाला सर्वोच्च कारक सूर्यातप है।

4.राजस्थान की साॅभर झील मित पोषणी झील का उदाहरण है।

5.उष्णकटिबन्धीय सदाबहार वन धरातलीय जीवोम वानस्पतिक विकास व जीव समुदाय के दृष्टिकोण से सर्वाधिक उन्नत है। उष्ण कटिबन्धीय वर्षा वनों में क्राउन शाईनेस नामक परिदृश्य दिखायी पड़ता है।

6.पृथ्वी अपने अक्ष पर लगभग 465 मीटर/सेकेण्ड की गति से घूमती है।

7.चैपरैल को भूमध्य सागरीय कुंजवन भी कहते हैं। इन क्षेत्रों में पूरे वर्ष मौसम शुष्क रहता है। इनका विस्तार उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अफ्रीका, दक्षिणी आस्ट्रेलिया चिली आदि में है। वृक्ष तथा झाडियाँ यहाँ की मुख्य वनस्पति है। चैपरैल में यूकेलिप्टस, ओक, आर्टीमिसिया, गे्रविलिया आदि वनस्पतियाॅ पायी जाती हैं।

8.आरोही पादप अन्य पौधों से लिपटकर ऊपर चढ़ते है ताकि उचित मात्रा में प्रकाश प्राप्त कर सकें। परजीवी तथा अर्द्ध परजीवी पौधों से भोजन प्राप्त करते हैं।

9.अमरवेल लोरेन्थस चन्दन दूसरे पौधों पर उगते हैं। लाइकेन परस्पर सहजीविता का उदाहरण।