पपीता की खेती (Papaya Farming):खेती की इस तकनीक से किसान बना मालामाल

पपीता की खेती (Papaya Farming) से सम्बंधित जानकारी

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पपीते की खेती फल उत्पादन के रूप में की जाती है | इसके पौधे कम समय में पैदावार देने के लिए तैयार हो जाते है | पपीताबहुत ही पौष्टिक और गुणकारी फल है, जिसमे विटामिन की अच्छी मात्रा पाई जाती है |विटामिन के अलावा इसमें पपेन नाम का एंजाइम पाया जाता है, जो शरीर में मौजूद कोलेस्ट्रॉल और अतिरिक्त चर्बी को घटाने में लाभकारी होता है | पपीते का सेवन अनेक प्रकार की बीमारियों के लिए लाभकारी होता है | पपीते की खेती काफी सरलता से की जा सकती है, तथा इसके पौधे भी एक वर्ष में पैदावार देने के लिए तैयार हो जाते है |

इसलिए किसान भाइयो की रुचि पपीते की खेती की और अधिक देखने को मिलती है | भारत में पहले पपीते की खेती बिहार, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, तमिलनाडु, पंजाब, आंध्रप्रदेश, गुजरात, असम, उत्तरांचल, जम्मू एवं कश्मीर और मिज़ोरम जैसे राज्यों में की जाती थी, किन्तु अब इसे पूरे भारत में ही उगाया जाने लगा है | यदि आप भी पपीते की खेती करना चाहता है, तो इस लेख में आपको पपीता की खेती कैसे करें (Papaya Farming in Hindi) तथा पपीता की खेती से मुनाफा कितना होता है, इसके बारे में जानकारी दी जा रही है |

पपीते की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी, जलवायु और तापमान (Papaya Cultivation Suitable soil, Climate and Temperature)

पपीते की खेती किसी भी उपजाऊ मिट्टी में की जा सकती है | इसकी खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी को सबसे उपयुक्त माना जाता है | उचित जल निकासी वाली भूमि में पपीते की खेती आसानी से की जा सकती है | इसकी खेती में भूमि का P.H. मान 6.5 से 7.5 के मध्य होना चाहिए |

पपीते की खेती किसी भी मौसम में की जा सकती है, किन्तु सर्दियों में गिरने वाला पाला इसके पौधों को अधिक हानि पहुँचाता है | इसके पौधे अधिकतम 44 तथा न्यूनतम 5 डिग्री तापमान को ही सहन कर सकते है |

पपीते के खेत की तैयारी और उवर्रक (Papaya Field Preparation and Fertilizer)

पपीते की अच्छी पैदावार के लिए खेत को अच्छी तरह से तैयार कर लेना चाहिए | इसके लिए सबसे पहले खेत की अच्छी तरह से गहरी जुताई कर दी जाती है | इससे खेत में मौजूद पुरानी फसल के अवशेष पूरी तरह से नष्ट हो जाते है | इसके बाद खेत में पहली जुताई के पश्चात प्रति हेक्टेयर के हिसाब से पुरानी गोबर की खाद देनी होती है | खाद को मिट्टी में डालने के बाद उसमे रोटावेटर लगाकर दो से तीन जुताई कर दी जाती है | इससे खेत की मिट्टी में गोबर की खाद अच्छे से मिल जाती है | इसके बाद खेत पानी में लगा दिया जाता है | जब खेत की मिट्टी सूख जाती है, उस दौरान खेत की जुताई कर खेत की मिट्टी को भुरभुरा कर दिया जाता है |

इसके बाद खेत में पाटा लगाकर भूमि को समतल कर दिया जाता है, इससे खेत में जलभराव की समस्या नहीं देखने को मिलती है | भूमि समतल के बाद पौधों की रोपाई के लिए खेत में गड्डो को तैयार कर लिया जाता है | पपीते के पौधों को अच्छे से वृद्धि करने के लिए उचित मात्रा में उवर्रक की आवश्यकता होती है | इसके लिए तैयार गड्डो में गोबर की खाद के अलावा 200 GM नत्रजन, फास्फोरस 200 GM और 400 GM पोटाश की मात्रा को प्रति हेक्टेयर के हिसाब से देना होता है | पौधों की रोपाई के 4 महीने बाद उवर्रक का इस्तेमाल करने से अच्छी गुणवत्ता वाले फल प्राप्त होते है |

पपीते के उन्नत किस्म के बीज (Papaya Seeds Improved Varieties)

वर्तमान समय में पपीते की कई उन्नत किस्में उगाई जा रही है, जिन्हे कम समय में अधिक पैदावार देने के लिए उगाया जा रहा है, जिनमे इजराइली और ताईवानी हाइब्रिड किस्में है, जो अधिक पैदावार देने के लिए उगाई जाती है | इसके अलावा भी पपीते की कई किस्में है, जो अच्छे मुनाफे के लिए उगाई जाती है, जो इस प्रकार है, पूसा ड्वार्फ, कोयम्बटूर प्रजाती, कोयम्बटूर-1, कोयम्बटूर-6, अलावा पेन-1, कुर्ग हनीड्यू, पूसा नन्हा, पूसा, जाइंट, पूसा डेलीसियस, पूसा मेजेस्टी, पंत पपीता और हनीड्यू आदि |

पपीते के पौधों की रोपाई का सही समय और तरीका (Papaya Plants Planting Right time and Method)

पपीते के पौधों की रोपाई पौध के रूप में की जाती है, इसके लिए उन्हें पॉलीथिन में तैयार कर लिया जाता है | इसके बाद तैयार पौधों को पॉलीथिन से निकाल कर उनकी गड्डो में रोपाई कर दी जाती है | यदि आप बीजो की रोपाई को सीधा खेत में करते है, तो उसके लिए आपको अधिक देखरेख करनी होती है | इसलिए बीजो को पहले नर्सरी या फिर घर में तैयार कर लिया जाता है | इसके लिए पपीते के बीजो की रोपाई को नर्सरी में 10 CM की दूरी में लगाना होता है, तथा पौधों के 20 CM तक बड़ा हो जाने पर उन्हें निकाल कर गड्डो में लगा दिया जाता है |

पपीते के पौधों की रोपाई किसी भी समय की जा सकती है | किन्तु असिंचित जगहों पर पपीते के पौधों को जून और जुलाई के महीने में लगाना उपयुक्त माना जाता है, इस दौरान बारिश का मौसम होता है, जिससे पौधों को पर्याप्त मात्रा में पानी प्राप्त हो जाता है | इसके अतिरिक्त यदि आप पौधों की रोपाई सिंचित जगहों पर करते है, तो उसके लिए आप इन्हे सितम्बर, अक्टूबर और फ़रवरी से मार्च के महीने में भी लगा सकते है | इसके पौधों को वृद्धि करने के लिए सामान्य तापमान की आवश्यकता होती है |

पपीते के पौधों में लगने वाले रोग एवं उनकी रोकथाम (Papaya Plant Diseases and Prevention)

पपीते के पौधों में भी कई तरह के रोग देखने को मिल जाते है, जो पैदावार को अधिक प्रभावित करते है | इसमें रिंगस्पॉट, डिस्टोसर्न, मोजैक लीफ कर्ल, एन्थ्रेक्नोज, जड़ व तना सड़न और कली व पुष्प वृंत का सड़ना आदि किस्म के रोग है, जो पपीते के पौधों पर आक्रमण कर उन्हें अधिक हानि पहुचाते है | इन रोगो की रोकथाम के लिए पौधों पर सड़न गलन को खरोच कर उस पर वोर्डोमिक्सचर के 5:5:20 अनुपात का लेप लगाना होता है | इसके अलावा अन्य रोगो से बचाव के लिए पपीते के पौधों पर डाईथेन एम्-45, 2 GM, मैन्कोजेब या जिनेव 0.2% से 0.25 % या व्लाईटाक्स 3 GM की उचित मात्रा का घोल बनाकर छिड़काव किया जाता है |

पपीते के पौधों की सिंचाई (Papaya Plant Irrigation)

पपीते के पौधों की रोपाई भूमि की सतह से थोड़ा ऊपर की जाती है | इसलिए इसके पौधों को अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है | इसके पौधों की पहली सिंचाई पौध रोपाई के तुरंत बाद कर दी जाती है | गर्मियों के मौसम में इसके पौधों को सप्ताह में दो बार पानी देना होता है, तथा सर्दियों के मौसम में इसके पौधों को 10 दिन के अंतराल में पानी दे |

पपीते के नर पौधे को अलग करना (Male Papaya Plant Separating)

पपीते के पौधों में भी तीन किस्में पाई जाती है, जिसमे नर, मादा तथा उभयलिंगी पौधे होते है | जब इसके पौधे बड़े हो जाये तब उनकी पहचान की जाती है, नर पौधों की पहचान कर उन्हें अलग कर लिया जाता है | एक हेक्टेयर के खेत में केवल 10 से 15 फीसदी ही नर पौधे होने चाहिए | नर पौधों पर छोटे-छोटे गुच्छो में लम्बे डंठल युक्त पुष्प पाए जाते है |

पपीते के पौधों निराई – गुड़ाई (Papaya Plants Weeding)

पपीते के पौधों की सिंचाई के दौरान पौधों के पास की भूमि काफी कठोर हो जाती है, जिस वजह से पपीते के पौधे की जड़े उचित मात्रा में वायु नहीं प्राप्त कर पाती है | पौधों को उचित मात्रा में वायु प्राप्त हो सके इसके लिए पौधों की समय-समय पर निराई – गुड़ाई की जाती है | पौधों की प्रत्येक तीसरी सिंचाई के बाद निराई – गुड़ाई करना लाभदायक होता है | इससे पैदावार में असर देखने को मिलता है |

पपीते के फलो की तुड़ाई (Papaya Fruit Plucking)

पपीते के पौधे रोपाई के 10 महीने पश्चात तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते है | पपीते का फल आरम्भ में हरे रंग का होता है, जब इसका फल पीले रंग का आकर्षक दिखाई देने लगे उस दौरान इसके फलो की तुड़ाई कर ली जाती है | इसके कच्चे फल में नाख़ून लग जाने पर दूध निकलता है, तथा पके फल से पानी की तरह एक पदार्थ निकलता है | जिससे इसके कच्चे और पके फल की पहचान की जा सकती है |

पपीते के फलो का संरक्षण, पैदावर और लाभ (Papaya Fruit Protection, Yield and Benefits)

पपीते के फलो की तुड़ाई होने के बाद उन्हें ठीक तरह संरक्षित कर लिया जाता है, इसके लिए फल को किसी अख़बार या सादे कागज में लपेट कर रख लिया जाता है | पपीते के फलो को दबने से बचाना होता है | यदि किसी तरह से फल दब जाता है, तो फल बहुत जल्द ही ख़राब होने लगता है | इसलिए फलो की तुड़ाई के समय बहुत ही सावधानी रखनी होती है, कि फल टूटकर गिरे नहीं या फिर उसमे किसी तरह की खरोच न लगे | क्योकि इससे फल कम समय में ही ख़राब हो जाता है |

पपीते के एक हेक्टेयर के खेत में तक़रीबन 35 से 40 टन की पैदावार प्राप्त हो जाती है | इसका बाज़ारी भाव कॉफ़ी अच्छा होता है | जिससे किसान भाई पपीते की एक बार की फसल से एक से डेढ़ लाख तक की कमाई आसानी से कर अच्छा लाभ कमा सकते है |

बहुफसली तकनीक से होती है दोगुनी आय

अतुल त्रिपाठी, इंटरक्रॉपिंग में विश्वास करते हैं और नवीनतम तकनीकों का उपयोग करते रहते हैं. यह अपने खेत में आने वाले सभी किसान या फिर अन्य लोगों से बात करते हैं कि उन्होंने यहां क्या देखा और सीखा है जिससे इन्हें अपने क्षेत्र में काफी पहचान भी मिली है.

जैसे की हम सभी जानते हैं कि आज का ज़माना सोशल मीडिया का है. ऐसे में इन्होंने फेसबुक पेज के साथ हजारों सदस्यों का ग्रुप भी बनाया हुआ है. अतुल का कहना है कि “उन्होंने जैविक कृषि पर एक समूह शुरू किया है और 3 महीने के भीतर समूह में उनके 57,000 सदस्य हैं. इसलिए, बड़ी संख्या में संभावित ग्राहकों या सहयोगियों को उनके बारे में ऑनलाइन माध्यम से पता चलता है. वह उन उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखने की योजना बना रहे हैं जो वे प्रदान करते हैं”.

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अतुल, जैन कंपनी के माध्यम से पौध प्रदान करते हैं, इनका दावा है कि यह भारत की सबसे बड़ी कृषि कंपनी है और इनके पौधे तीव्र गति से बढ़ते हैं और 8-9 महीनों में परिणाम देते हैं. इन्होंने अपने केले के पौधों का उदाहरण दिया जिसमें यह बताते हैं कि जहां इसका पेड़ 14-16 महीनों में परिणाम देते हैं, वहीं इस कंपनी का पौध 9-12 महीनों में ही फल देना शुरू कर देता है. इससे किसानों को नुकसान नहीं होगा बल्कि उनकी आय में दोगुना मुनाफा ही होगा.

साथ ही, अतुल मटर के बीज पर भी काम करते हैं और कहा कि जिले में हजारों एकड़ में मटर की खेती की जाती है. यह मटर के बीज को 2000-3000 रुपये प्रति क्विंटल पर बेचते हैं. यह सामान्य मानकों से महंगा है लेकिन अतुल का यह दावा है कि वह गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराते हैं. इनका कहना है कि “हमारे क्षेत्र में मटर के बीज उपलब्ध कराने में काफी प्रतिस्पर्धा है. हम यह सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं कि जो बीज हम प्रदान करते हैं वे शुद्ध हों और एक भी खराब बीज न हो”.

अतुल बताते हैं कि वह अच्छी गुणवत्ता वाले बीज पैदा करने के लिए मूल बीज खरीदते हैं. वह खराब बीजों को छानने के लिए श्रमिकों को किराए पर लेते हैं, जिसके बाद वो चनाई करते हैं, ग्रेडिंग करते हैं ताकि मैन्युअल प्रयास के बाद भी कोई खराब बीज है, तो मशीनें उन्हें छान लें. गर्व की बात है कि पहले उनका राज्य स्तर पर एक कार्यालय था और अब एक जिला स्तर पर है.

क्या है इनकी प्रेरणा का स्त्रोत

अतुल ने कहा कि “खेती और तकनीकी खेती उनका बचपन का शौक है. यहां के ज्यादातर लोग गेहूं और बाजरा उगाते हैं. यह 2016 में औपचारिक रूप से खेती में शामिल हुए और कुछ नया और अलग करना चाहते थे. उन्होंने केले के पेड़ लगाकर शुरुआत की लेकिन गर्मियों में पत्ते सूख गए और फूल सही से नहीं आए. उसने फिर भी उम्मीद नहीं छोड़ी और सर्दियों में मिट्टी ठंड की चादर से ढकी हुई थी. वह कड़ी मेहनत करते रहे और आज यह अपनी 7 एकड़ जमीन से करीब 15 लाख रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं.

उनकी कुल भूमि में से 2 एकड़ में ड्रिप सिंचाई की सुविधा है जहां वे पपीते की खेती करते हैं और बाकी की सिंचाई पारंपरिक तरीकों से की जाती है. यह 200 किसानों के एक समूह को 1,000 एकड़ जमीन पर खेती करने की सलाह देते रहे हैं. इस समूह का प्रबंधन व्हाट्सएप के माध्यम से किया जाता है और अतुल प्रशासक है जो प्रतिदिन घंटों संदेशों को पढ़ने और उनका जवाब देने में व्यतीत करते हैं. यह अपने उत्पादों को सही बाजार में निर्देशित करके किसानों का समर्थन करते हैं, जिससे इन किसानों को अच्छी आमदनी हो रही है.

ध्यान देने वाली बात यह है कि अतुल त्रिपाठी, अपने क्षेत्र में केले की खेती करने वाले पहले किसान थे, लेकिन आज उनके उदाहरण का अनुसरण करते हुए अब हर साल सैकड़ों एकड़ भूमि पर केले की खेती की जाती है. खेती शुरू करने और किसानों को सलाह देने से पहले, इस क्षेत्र में केले का सफलतापूर्वक उत्पादन नहीं किया गया था. इनका सुझाव है कि किसानों को ध्यान केंद्रित करना चाहिए और कड़ी मेहनत करनी चाहिए साथ ही सही ज्ञान भी होना चाहिए. उदाहरण के लिए अतुल सुझाव दिया कि ” उन्होंने अनुभव से सीखा है कि जुलाई-अगस्त केले लगाने का सबसे अच्छा समय है. मार्च से जून तक केले के हमेशा अच्छे दाम मिलते हैं. केले महाराष्ट्र के शोलापुर से 15 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से लाए जाते हैं और फिर 2 रुपये प्रति किलोग्राम परिवहन के बाद 17 रुपये खर्च होते हैं. जबकि उनके स्थानीय रूप से उगाए गए केले की कीमत लगभग 14 रुपये प्रति किलोग्राम है, जिससे उनके केले अधिक लाभदायक हो जाते हैं.

हर दिन उन्हें अग्रिम भुगतान करने और अपने खेत से केले लेने के इच्छुक व्यवसायियों के फोन आते हैं. इसके अतिरिक्त वे इंटरक्रॉपिंग के साथ आलू और प्याज उगाते हैं जिससे अतिरिक्त आय होती है.

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