नई विदेशी व्यापार नीति 2015-20

भारत सरकार द्वारा नई व्यापारिक नीति 2015-20 के बीच घोषित की गयी इस नई नीति में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन किये गये जो केवल व्यापारिक नीति के उद्देश्यों से सम्बन्धित थे अपितु विभिन्न योजनाओं से भी सम्बन्धित थे।

1. नई व्यापारिक नीति में भारत के निर्यात का हिस्सा जो वर्ष 2013-14 में 466 बिलियन डॉलर था उसे 2019-20 तक बढ़ाकर 900 बिलियन डालर करने का लक्ष्य रखा गया।
2. विश्व व्यापार निर्यात में भारत की हिस्सेदारी जो वर्ष 2013-14 में 2 प्रतिशत थी बढ़ाकर 3.5 प्रतिशत करना।
3. निर्यातों को बढ़ाने के लिए दो अलग-अलग नीतियां प्रारम्भ की गयी।

1. MEIS – भारत द्वारा वस्तुगत निर्यात की योजना
2. SEIS – भारत द्वारा सेवा निर्यात योजना
पहले से चल रही योजनाओं जो फोकस मार्केट स्कीम, फोकस प्रोडक्ट स्कीम, मार्केट लिंक फोकस, और विशेष कृषि ग्रामीण योजना इन पांचों को मिलाकरप्रारम्भ MEIS की गयी। वित्त एवं सेवाक्षेत्र जैसी योजनाओं को मिलाकर  योज SEIS ना शुरू की गयी।

भारत के वस्तुगत निर्यात योजना MEIS के अन्त र्गत उपहार कर की दर 2-5 प्रतिशत के बीच होगी। जबकि SEIS में यह दर 3-5 प्रतिशत दर होगी।

ऐसे कम्पनियां जिनके द्वारा 3 मिलियन डालर का निर्यात किया गया है उन्हें 1 ’ निर्यात गृह का दर्जा दिया जायेगा। जिसका निर्यात 25 मिलियन डालर है उन्हें ’’ निर्यात गृह का दर्जा दिया जायेगा। 100 मिलियन डालर निर्यात करने वाले को ’’’ गृह का दर्जा दिया जायेगा जबकि 2000 मिलियन डालर या उससे अधिक का निर्यात करने वाले को 5 ’’’’’ निर्यात गृह का दर्जा दिया जायेगा।

नयी व्यापारिक नीति में निर्यातित वस्तुओं के उत्पादन के लिए रत्न एवं आभूषण निर्माता ड्यूटी रहित आपात प्राप्त कर सकते हैं।

पूंजीगत वस्तुओं के विनिर्माण को प्रोत्साहित करने के लिये EPCG योजनान्तर्गत निर्यात दायित्व को घटाकर 75 प्रतिशत कर दिया गया। भारत की विदेशी व्यापार नीति को डिजिटर इण्डिया एवं मेक इन इंडिया तथा स्किल इंण्डिया के साथ जोड़ा गया है।

इस नयी नीति में एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन को प्रारम्भ करने की बात कही गयी है। जिससे निर्यातों की मात्रा में वृद्धि लायी जा सकती है।
नई व्यापारिक नीति में कृषि उत्पादन एवं रक्षा सम्बन्धी उत्पाद अथवा पर्यावरण सुरक्षा जैसे उत्पाद के सम्बन्ध में उच्च स्तरीय सहायता उपलब्ध करने की बात कही गयी है।

नई व्यापारिक नीति में यह निर्णय लिया गया है कि व्यापारिक नीति की समीक्षा वार्षिक आधार पर न होकर ढाई वर्षो में किया जायेगा। नई व्यापारिक नीति इस तथ्य को स्वीकार करती है कि जब तक भारत निर्यातों के बहुत अधिक सीमा तक नहीं बढ़ाया जाता तब तक भारत मेनुफैक्चरिंग पॉवर हाउस के रूप में विकसित नहीं हो सकता है।

नई व्यापारिक नीति का मूल्य उद्देश्य निर्यातों को प्रेरित करना चाहे निर्यात वस्तुगत हो अथवा सेवाओं का। भारत को न केवल भुगतान शेष की प्रतिकूलता से मुक्ति दिलाना है अपितु इसे विनिर्माण वस्तुओं का उत्पादक देश और सेवाओं के हब के रूप में स्थापित करना है।

भारतीय राजकोषीय प्रणाली :- लोक वित्त अथवा राजस्व का सम्बन्ध केन्द्र सरकार तथा राज्य सरकार की वित्तीय व्यवस्था से होता है इसे प्रभावित करने वाली नीति राजकोषीय नीति अथवा वित्तीय नीति कहलाती है।

वित्तीय नीति के अन्तर्गत संसाधनों का आवंटन, आय का वितरण अर्थिक स्थिरता और आर्थिक विकास इन चार लक्ष्यों को शामिल किया जाता है। वित्तीय निधि के अन्तर्गत सार्वजनिक आय सार्वजनिक व्यय, सार्वजनिक ऋण और हिनार्थ प्रबन्धन को शामिल किया जाता है-
1. सार्वजनिक आय
2. सार्वजनिक व्यय
3. सार्वजनिक ऋण
4. सार्वजनिक प्रबंधन

क्लासिकल अर्थशास्त्रियों का मानना था कि वित्तीय नीति तटस्थ होनी चाहिए और एसे में वे संतुलित बजट नीति के समर्थक थे उनका मानना था कि सरकार द्वारा किया जाने वाला व्यय उसकी आय के बराबर होना चाहिए। कीन्स ने हस्ताक्षेप किया तथा क्षतिपूरक वित्तीय नीति अपनाने की सलाह दी। कीन्स का विचार था कि यदि किसी देश में आर्थिक विकास का स्तर कम है तो एसे में सरकार क्षतिपूरक राज्य कोषीय नीति अपना सकती है। इसके अन्तर्गत सार्वजनिक आय से अधिक व्यय किया जा सकता है। अतः कीन्स घाटे की वित्त व्यवस्था अपनाने की सलाह देते हैं। इसे प्रति चक्रीय वित्तीय नीति भी कहते हैं।

ए0पी0 लर्नर ने क्रियात्मक वित्तीय व्यवस्था अपनाने की सलाह थी। इसके अन्तर्गत यह बताया गया कि किसी भी वित्तीय नीति का मूल्यांकन उसके कार्यों के आधार पर होना चाहिए।

डा0 बलजीत सिंह ने सक्रिय वित्तीय नीति की अवधारणा प्रस्तुत की और बताया कि वित्तीय नीति को इस प्रकार से कार्य करनी चाहिए जिससे अर्थव्यवस्था में निष्क्रिय पडे़ संसाधनों का भी प्रयोग किया जा सके।

प्रो0 गौतम माथुर ने एक्चुएटिंग वित्तीय नीति की अवधारणा प्रस्तुत की इसमें वित्तीय नीति का उद्देश्य निजी व सार्वजनिक क्षेत्र के बीच संसाधनों के बँटवारे का है। और उनके लिए संसाधन जुटाने का है।

भारत के संविधान में अनुच्छेद 112 के तहत बजट संम्बन्धी प्रावधान दिया गया है। जो पहली अपै्रल से 31 मार्च तक के लिए प्रस्तुत किया जाता है। इस बजट के अन्तर्गत राष्ट्रीय अनुमानित प्राप्तियों एवं व्ययों का विवरण प्रस्तुत किया जाता है।

अनुच्छेद 266-67 में बजट का ढांचा प्रस्तुत किया गया है। सविंधान में तीन प्रकार के खातों का उल्लेख है। 266(1) में समेकित कोष या निधि का उल्लेख है जिसे संचित कोष के नाम से जाना जाता है। इस कोष में भरत सरकार की सम्पूर्ण राजस्व प्राप्तियॉ सरकार द्वारा जारी किये गये ट्रेजरी बिल ऋण प्रपत्र इत्यादि को रखा जाता है।

अनुच्छेद 266(2) में सार्वजनिक खाते का उल्लेख किया गया है। इसके अन्तर्गत राष्ट्रीय अल्प बचत योजना के कोष प्रॉविडेन्ट फण्ड के खाते जमा तथा अग्रिम एवं संचित कोष को शामिल किया जाता है।

संविधान के अनुच्छेद 267 में आकस्मिक कोष फण्ड की व्यवस्था की गयी इसके द्वारा कुछ आकस्मिक तथा अनिश्चित व्ययों की पूर्ति की जाती है। जिन्हें संसद की स्वीकृति तक के लिए टाला जा सकता है।

सरकार की आय को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा गया है।
1. कर 2 फीस या शुल्क 3. ड्यूटी

जब सेवाओं को पूरा करने के लिए वित्तीय व्यवस्था की आवश्यकता हो तो इसके लिए लगायी गयी लेवी को कर कहते हैं। जब सरकार द्वारा प्राप्त की जा रही वस्तुओं के उपयोग को हतोत्साहित करने के लिए लेवी लगायी जाती है। तो इसे फीस कहते हैं। और यदि लेवी का उद्देश्य निजी एजेंसियों द्वारा वस्तुओं एवं सेवाओं उत्पादन को हतोत्साहित करना है तो इसे ड्यूटी कहा जाता है। कर उपकर एवं अधिभार में भी लेवी पाया जाता है।

कर एक अनिवार्य अंश दान होता है जिसे कर दाता को सरकार के पास जमा करना होता है जबकि उपकर एवं अधिभार किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए लगाये जाते हैं। उपकर को कर के साथ लगाया जाता है। जबकि अधिभार कर के ऊपर होता है।

कर का वर्गीकरण प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों के बीच किया जाता है। प्रत्यक्ष कर का तात्पर्य ऐसे करां से होता हैं जहां पर करापात तथा कराघात एक ही व्यक्ति पर होता है। इन करों का विवर्तन सम्भव नहीं होता है। जैसे आय कर, निगम कर इत्यादि।

अप्रत्यक्ष कर उनकरों को कहतें हैं जहां कराघात तथा करापात अलग-अलग व्यक्यिं पर होता है। और अप्रत्यक्ष करों का विवर्तन सम्भव है। इसके अर्न्तगत उत्पाद शुल्क सेवा शुल्क इत्यादि।

प्रगतिशील का तात्पर्य उन करों से होता है। जहाँ कर के आधार पर वृद्धि होने पर कर की दर में भी वृद्धि पायी जाती है।

आनुपातिक कर का तात्पर्य उन करों से होता है जो सभी आय वर्ग पर एक ही अनुपात में लगाया जाता है।

अधोमुखी कर का तात्पर्य उन करों से होता है जो प्रारम्भ में प्रगतिशील करों का लक्षण दिखाते है। परन्तु एक निश्चित आय के बाद ये आनुपातिक हो जाते है। भारत में प्रतिगामी कर लगाया जाता है।

यदि भारत की मुद्रा प्राप्तियों की तुलना में उसका कुल व्यय अधिक है तो इसे बजेटरी घाटा कहा जाता है।

बजेटरी घाटा = (Re+Ce) > (Rr+Cr)
यदि राजस्व व्यय एवं पूंजीगत व्यय का योग राजस्व प्राप्तियों एवं पूंजीगत प्राप्तियों से अधिक हो तो इसे बजेटरी घाटा कहते हैं।
(Re>Rr) = राजस्व घाटा
यदि राजस्व प्राप्तियां राजस्व व्यय से अधिक हैं तो इसे राजस्व घाटा कहा जाता है।
Ce>Cr) = पूंजीगत घाटा
पूंजीगत व्यय पूंजीगत प्राप्तियों से अधिक है तो ऐसे में पूंजीगत घाटा पाया जाता है।
बजेटरी घाटा = राजस्व घाटा  पूंजीगत घाटा

राजकोषीय घाटा :- यह सबसे वृहद अवधारणा है जिसे सुखमय चक्रवर्ती की रिपोर्ट के बाद प्रयोग में लाया गया था। राजकोषीय घाटे में बजेटरी घाटे के साथ-साथ सभी स्रोतों से लिये गये ऋण को शामिल करते हैं।
राजकोषीय घाटा = बजेटरी घाटा  सार्वजनिक ऋण
प्राथमिक घाटे को ज्ञात करने के लिए सकल राजकोषीय घाटे से ब्याज भुगतान को घटा देते हैं।
प्राथमिक घाटे = राजकोषीय घाटा – ब्याज भुगतान

लैफर वक्र :- कर से राजस्व प्राप्ति और कर की दर के बीच के सम्बन्ध को प्रदर्शित करने के लिए अर्थशास्त्री आर्थर लैफर ने एक वक्र का प्रतिपादन किया जिसे लैफर वक्र के नाम से जाना जाता है। लैफर ने बताया कि कर की दर का एक अनुकूलतम स्तर होता है जिससे ऊपर कर बढ़ाने पर कर राजस्व में कमी आती है अतः कर को अनुकूलतम दर पर ही लगाना चाहिए।

सार्वजनिक ऋण :-

सरकार द्वारा घाटों को पूरा करने के लिए सार्वजनिक ऋण लिये जाते हैं। भारत की बजेटरी प्रणाली में ये तीन प्रकार के हैं।
1. आन्तरिक ऋण :- इसके अन्तर्गत सरकारी प्रतिभूतियां एवं ट्रेजरी बिल के माध्यम से ऋण की प्राप्ति होती है।
2. विदेशी ऋण :- इसे सरकारों एवं बहुपक्षीय संस्थाओं से प्राप्त किया जाता है।
3. अन्य देयताएं :- इसके अन्तर्गत डाकघर, प्राविडेन्ट फन्ड इत्यादि के माध्यम से ऋण लिया जाता है।

अनुच्छेद 292 में यह प्रावधान किया गया है कि संसद केन्द्र सरकार द्वारा सार्वजनिक ऋण की अपनी सीमा निर्धारित कर सकती है जिससे अधिक मात्रा में केन्द्र सरकार ऋण प्राप्त कर सकती है।

अनुच्छेद 293 राज्यों द्वारा ऋण लेने की सीमा का निर्धारण करता है और यह विधानमण्डल द्वारा तय किया जाता है। भारत में बजट का वर्गीकरण मुख्यतः तीन भागों में किया जाता है।

  1.  क्रियात्मक वर्गीकरण
  2. आर्थिक वर्गीकरण
  3. तिर्यक वर्गीकरण

    तिर्यक वर्गीकरण 1967-68 में लागू किया गया। क्रियात्मक वर्गीकरण का निर्धारण वित्त मंत्रालय द्वारा किया जाता है।

बजट प्रणाली के अन्तर्गत सार्वजनिक वस्तुओं निजी वस्तुओं तथा मेरिट वस्तुओं के बीच भेद उत्पन्न किया जाता है। सार्वजनिक वस्तुओं से तात्पर्य उन वस्तुओं से होता है जिनकी व्यवस्था बजट द्वारा की जाती है। इनका सामूहिक उपयोग होता है किसी भी व्यक्ति को इसके प्रयोग से इसलिये नही रोका जा सकता है कि इसके लिए उसने भुगतान नहीं किया है। सार्वजनिक वस्तुओं में अपवर्जन का नियम लागू नहीं होता है।

निजी वस्तु का तात्पर्य ऐसे वस्तुओं से होता है जिसका एक निश्चित मूल्य होता है निजी वस्तु वस्तुओं में अपवर्जन का नियम लागू होता है इनका सामूहिक उपयोग नही हो सकता है जो व्यक्ति अधिक मात्रा में भुगतान करेगा वह वस्तु की अधिक मात्रा प्राप्त करेगा। कम भुगतान करने वाले को कम मात्रा प्राप्त होगी।

मिश्रित वस्तुओं का तात्पर्य उन वस्तुओं से होता है जो न तो शुद्ध सार्वजनिक होती हैं और न ही शुद्ध निजी।

मेरिट वस्तुएं ऐसी होती हैं जिसकी व्यवस्था विशेष रूप से बजट में की जाती है। यह किसी विशेष वर्ग तथा समुदाय से सम्बन्धित होती हैं जैसे-मध्यान्ह भोजन योजना, स्वास्थ्य एवं शिक्षा के सम्बन्ध में किये गये विशिष्ट प्रयोग।

बारहवें वित्त आयोग को स्वास्थ्य एवं शिक्षा का ज्ूपद डमतपज ळववके रंग राजन द्वारा कहा गया।

यदि भारत में केन्द्र सरकार के कर का विश्लेषण करें तो इन्हें तीन भागों में बांटा जा सकता है-
1. आय पर कर
2. सम्पत्ति पर कर अथवा पूंजीगत व्यवहारों पर लगने वाला कर
3. वस्तुओं एवं सेवाओं पर लगने वाला कर।

आय पर लगने वाले कर में व्यक्तिगत आयकर को निकाल कर और न्यूनतम वैकल्पिक कर को शामिल किया जाता है।

भारत में आयकर पहली बार जुलाई 1860 में लगाया गया और इसीलिए 24 जुलाई 2010 को आयकर दिवस के रूप में मनाया गया। भारत में आयकर के लिए डायरेक्ट टैक्स कोड 1 रहा है। कम्पनियों के आय पर लगने वाले कर को निगम कर कहते हैं। इसे पहले सुपर टैक्स के नाम से जाना जाता था। घरेलू कम्पनियों पर निगम कर की दर 30 प्रतिशत है जबकि विदेशी कम्पनियों पर 40 प्रतिशत रखा गया है।

यदि घरेलू कम्पनी की कर योग्य आय 10 करोड़ से अधिक है तो उस पर 10 प्रतिशत का सरचार्ज लगाया जाता है। परन्तु यदि 10 करोड़ से कम है तो 5 प्रतिशत का सर चार्ज लगाया जाता है। परन्तु विदेशी कम्पनियों पर यह 5 प्रतिशत है।

न्यूनतम वैकल्पिक कर :- वर्ष 2011-12 के बजट में न्यूनतम वैकल्पिक कर 18.5 प्रतिशत कर दिया गया था और यही 2014-15 के बजट में लागू किया गया था। यह कर ऐसी कम्पनियों पर लगाया जाता है जिनका शुद्ध लाभ तो धनात्मक हो परन्तु विभिन्न प्रकार की छूटों का लाभ उठाने के लिए ये अपने निबल लाभ को शून्य दिखायें तथा इन्हें किसी प्रकार का भुगतान न करना पड़े।

सम्पत्ति एवं पूंजीगत व्यवहार पर लगने वाला कर

सम्पत्ति कर/अस्थिकर /उपहार कर/ इस्टेड ड्यूटीइस्टेड ड्यूटी 1953 ई0 में प्रारम्भ की गयी थी जिसे एल0के0 झा समिति की संस्तुति पर मार्च 1985 ई0 में समाप्त कर दिया गया।

अक्टूबर 1998 ई0 में उपहार कर को समाप्त कर दिया गया यद्यपि 2002-03 ई0 में यह प्रावधान किया गया कि यदि सगे सम्बन्धियों के अतिरिक्त अन्य लोगों द्वारा 50 हजार रू0 से अधिक का उपहार दिया जाता है तो उसे उपहार प्राप्त कर्ता की आय में जोड़ लिया जायेगा और उस पर आयकर देना होगा।

सम्पत्ति कर अभी तक लगाया जाता है। इसे धनकर के नाम से जाना जाता है। वर्ष 2009-10 के बजट में इसकी सीमा 30 लाख रू0 की गयी।

पूंजी लाभकर :- किसी प्रतिभूति शेयर भवन या सम्पत्ति का विक्रय मूल्य यदि उसके क्रय मूल्य से अधिक है तो होने वाले लाभ को पूंजी लाभ कहते हैं और इस प्रकार के लगाये जाने वाले कर को पूंजी लाभकर कहते हैं। 2010-11 ई0 में पूंजी लाभ कर 15 प्रतिशत निर्धारित किया जाता है जबकि दीर्घ कालीन पूंजी लाभकर 20 प्रतिशत निर्धारित किया जाता है। म्युचुअल फण्ड से दीर्घकाल में मिलने वाले पूंजी लाभ पर कर 10 से बढ़ाकर 20 प्रतिशत पूंजीगत लाभ निर्धारित किया गया है।

वस्तुओं एवं सेवाओं पर कर

उत्पाद शुल्क ,सीमा शुल्क, सेवा कर

वस्तुओं पर लगने वाले शुल्क को उत्पाद शुल्क कहा जाता है। यह 1944 ई0 के एक्साइज्ड एण्ड साल्ट एक्ट के अधीन लगाया जाता रहा है। वर्ष 1986 ई0 में उत्पाद शुल्क में MOD VAT प्रणाली लागू की गयी और बाद में वर्ष 2000-01 में CEN VAT की दर 8 प्रतिशत थी जिसे 2012-13 में बढ़ाकर 12 प्रतिशत कर दिया गया। 2014-15 में SEN VAT की दर को घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया गया।

सीमा शुल्क का तात्पर्य ऐसे करों से होता है जो आयातित एवं निर्यातित वस्तुओं पर लगाया जाता है। 1990-91 के पूर्व कुछ परिस्थितियों में इसकी दर 30 प्रतिशत से भी अधिक ऊंची थी परन्तु 2008-09 के बजट के बाद गैर कृषि वस्तुओं के लिए सीमा शुल्क 15 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया गया।

सेवा कर 1994-95 में लागू हुआ। पहली बार केवल तीन क्षेत्रों में जिसमें टेलीफोन, स्टॉक ब्रोकर एवं सामान्य बीमा में 5 प्रतिशत का सेवा कर लगाया गया। नये बजट में सेवा कर की दर को बढ़ाकर 14 प्रतिशत कर दिया गया है। सेवा कर की वसूली सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ एक्साइज एवं कस्टम ड्यूटी द्वारा की जाती है। यह अन्य करों की अपेक्षा नया कर है।

सार्वजनिक व्यय :– सार्वजनिक व्यय के सम्बन्ध में एडोल्फ बैगनर ने राज्य व्यय के विस्तार का नियम प्रतिपादित किया तथा उन्होंने बताया कि जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था का विस्तार होता जायेगा। राजकीय क्रियाओं में वृद्धि होती जायेगी और इसके कारण सार्वजनिक व्यय भी बढ़ेगा।

बैगनर की विचारधारा के विरोध में वाइजमैन पीकॉक ने अपनी परिकल्पना प्रस्तुत की और बताया कि सार्वजनिक व्यय में वृद्धि अल्प काल में पायी जाती है क्योंकि उस दौरान लोगों की कर देने की क्षमता बढ़ जाती है परन्तु आपातकाल समाप्त होने तक कर की दर में कटौती उतनी नहीं होती है जितनी आपात काल के पूर्व थी।

केलकर समिति :- वर्ष 2002 में गठित किया गया जिसका सम्बन्ध प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करारोपण में सुधार से था।

राजा जी चलैया समिति :- 1991 ई0 में गठित की गयी इसके द्वारा कर सुधार की रूप रेखा प्रस्तुत की गयी। माडबैट के विस्तार का विचार दिया गया और प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष करों के राजस्व को बढ़ाने का प्रयास किया गया।

एल0के0 झॉ समिति :- चुंगी कर के स्थान पर टर्न ओवर टैक्स की संस्तुति दी गयी। इसे 1981 में गठित किया गया।

चोकसी समिति :- इसका सम्बन्ध प्रत्यक्ष करारोपण से है जिसे 1978 ई0 में गठित किया गया।

राज समिति :- 1972 ई0 में कृषि क्षेत्र के विकास के लिए गठित की गयी थी।

बांचू समिति :- इसका सम्बन्ध कर चोरी रोकने तथा कर प्रणाली को और मजबूत करने से था।

भूत लिंगम समिति :- कर के ढांचे को सरल एवं सुलभ बनाने के लिए 1968 ई0 में इसकी स्थापना की गयी।

घाटे की वित्त व्यवस्था :- घाटे की वित्त व्यवस्था का तात्पर्य सरकारी बजट में जान-बूझकर घाटा उत्पन्न करने से होता है और इस घाटे को पूरा करने के लिए सरकार वित्तीय व्यवस्था करती है और 1985 ई0 में बजेटरी घाटे के स्थान पर राजकोषीय घाटे को महत्व दिया गया। जिसे सुखमय चक्रवर्ती की रिपोर्ट में प्रस्तुत किया गया।

मूल्यवर्धित कर :- यह उत्पादन के प्रत्येक चरण पर लगाया जाता है इसका प्रतिपादन 1918 ई0 में एफ वॉन सिमन्स द्वारा किया गया था और यह सबसे पहले जर्मनी में टर्न ओवर टैक्स के नाम से लागू किया गया परन्तु सफल नही हुआ। 1954 ई0 में इसे फ्रांस में सफलतापूर्वक लागू किया गया जबकि जापान में 1950 ई0 में इसे स्वीकार किया गया। भारत में 1 अप्रैल 2005 से 21 राज्यों एवं 5 केन्द्र शासित प्रदेशों में लागू किया गया। उत्तर प्रदेश आखिरी ऐसा राज्य है जहां 1 जनवरी 2008 को लागू किया गया। लक्षद्वीप एवं अण्डमान निकोबार द्वीप में वैट नहीं लगाया जाता।

जी.एस.टी. :- राष्ट्रीय स्तर पर वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतों को एक समान बनाने के लिए वस्तु एवं सेवा कर की अवधारणाओं को प्रस्तुत किया गया, इसमें विभिन्न करों के स्थान पर जी.एस.टी. लागू करने का प्रावधान है। यद्यपि की यह अभी तक संसद में पास नहीं हुआ है।

आउटकम बजट :- यह मुख्य रूप से 3 तथ्यों पर आधारित होता है जिसमें आगत परिव्यय, आउटलेज और निर्गत।

निष्पादन बजट :- यह लागत लाभ विश्लेषण पर आधारित है यह सार्वजनिक बजट के विभिन्न तथ्यों के निष्पादन पर आधारित होता है और इसीलिए संसद में तीनों प्रकार के बजट मुख्य बजट, निष्पादन बजट, एवं आउटकम बजट प्रस्तुत किये जाते हैं।

ओकुन का नियम :- समग्र उत्पादन में कमी एवं बेरोजगारी के बीच के सम्बन्ध का विश्लेषण ओकुन का नियम करता है।

शून्य आधारित बजट :- इसे पीटर ए. पायर ने प्रस्तुत किया था मूल्य वर्धित कर को विकसित करने का श्रेय मारिश फरे और कार्ल सूत जाता है।

करारोपण के सम्बन्ध में ऐच्छिक विकास सिद्धान्त लिन्डॉल ने दिया था। करारोपण का करदेय क्षमता सिद्धान्त जे.एस. मिल से सम्बन्धित है। बाद में एजवर्थ एवं कार्बर ने न्यूनतम त्याग के सिद्धान्त के रूप में विकसित किया। कर देय क्षमता का पहली बार प्रयोग क्लार्क ने किया। भारत में राजकोषीय क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए वर्ष 2003 में राजकोषीय उत्तरदायित्व प्रावधान अधिनियम (FRBM) लागू किया गया। कर्नाटक पहला ऐसा राज्य है जिसने FRBM को लागू किया। सिक्किम पश्चिम बंगाल को छोड़कर यह सभी राज्यों में लागू है।

भारत में बजेटरी प्रक्रिया :-

भारत में बजट बनाने की प्रक्रिया को चार भागों में बांटा जा सकता है-
1. बजट का निर्माण
2. बजट का वैधानीकरण
3. बजट का क्रियान्वयन
4. अंकेक्षण

बजट निर्माण की जिम्मेदारी वित्त मंत्रालय की होती है और निर्माण प्रक्रिया प्रत्येक वर्ष के सितम्बर माह से प्रारम्भ हो जाती है। जहां विभिन्न मंत्रालयों एवं विभागों को उनके आने वाले व्ययों के अनुसार तैयार करने को पत्र भेजा जाता है और यह अनुमान दिसम्बर जनवरी तक वित्त मंत्रालय को प्राप्त हो जाता है। इसी प्रकार राजस्व सम्बन्धी आंकड़े भी एकत्र किये हैं। वित्त मंत्री इन अनुमानों का विश्लेषण करते हैं और इस सम्बन्ध में प्रधानमंत्री से सलाह करते हैं। संसद में बजट प्रस्तुत करने से पहले मंत्रि परिषद को भी संक्षिप्त परिचय बजट का दिया जाता है।

वैधानीकरण में बजट बनने के बाद उसे संसद में कई चरणों से होकर गुजरना पड़ता है। संसद में बजट पर दो प्रकार की बहस होती है। पहले हिस्से में सामान्य बजट पर बहस होती है जिस पर बजट के प्रावधानों के सम्बन्ध में व्यापक चर्चा की जाती है। जबकि बजट के दूसरे भाग में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों के सम्बन्ध में प्रस्ताव होते हैं और वित्त विधेयक के माध्यम से करों के ढांचे में परिवर्तन, नये करों को लगाने इत्यादि का प्रस्ताव रखा जाता है।

बजट के प्रस्तुत करने के तुरन्त बाद वित्त विधेयक रखा जाता है और वित्त विधेयक सदन में रखने के बाद अप्रत्यक्ष कर में सुधार उसी दिन से लागू हो जाते हैं जबकि प्रत्यक्ष कर अगले अप्रैल से लागू होता है।

संविधान के अनुच्छेद 113 में अनुदान की मांग का उल्लेख है जिस पर संसद आपत्ति उठा सकती है और अस्वीकार कर सकती है। कटौती प्रस्ताव अनुदान की मांग के सम्बन्ध में होता है।

धन विधेयक तथा वित्त विधेयक में मुख्य भेद इस तथ्य का है कि प्रत्येक वित्त विधेयक धन विधेयक नहीं होता। परन्तु प्रत्येक धन विधेयक वित्त विधेयक होता है।

अनुच्छेद 110 में जितने भी विषय उल्लेखित हैं वह सभी वित्त विधेयक का हिस्सा होता है। जबकि अनु0 110(1) में दिये गये विषय धन विधेयक से सम्बन्धित होता है। वित्त विधेयक एवं धन विधेयक में एक समानता यह भी है कि दोनों लोक सभा में पेश किये जाते हैं तथा राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति के बिना इन्हें पेश नहीं किया जा सकता।

लोकसभा द्वारा अनुदान मांग के पारित हो जाने के बाद विनियोग विधेयक पेश किया जाता है। संविधान के अनु0 116 में आकस्मिक परिस्थिति में भी सरकार को अधिक मात्रा में धन की आवश्यकता हो तो इसे संसद द्वारा स्वीकृत किया जा सकता है और इसी अनुच्छेद के प्रथम भाग में लेखा अनुदान का प्रावधान है।

बजट का क्रियान्वयन संसद में वित्त विधेयक एवं विनियोग विधेयक के पारित होते ही प्रारम्भ हो जाता है। भारत के संविधान में अनु0 118 में कुछ समितियों के सम्बन्ध में प्रावधान किया गया है जिनका गठन लोकसभा में होता है।

1. आकलन समिति :- आकलन कमेटी में 30 सदस्य होते हैं जिनकी नियुक्ति लोकसभा द्वारा होती है। आकलन समिति की रिपोर्ट पर सदन में बहस नही होती है और विपक्ष दल का नेता इसका अध्यक्ष होता है।

2. सार्वजनिक उद्यम समिति :- इसमें 22 सदस्य होते हैं जिसमें 15 लोकसभा तथा 7 राज्यसभा से होते हैं। इसके अध्यक्ष की नियुक्ति लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है। इसका कार्यकाल 1 वर्ष का होता है।

3. लोक लेखा समिति :- यह संसद की सबसे पुरानी समिति है इसका अध्यक्ष विरोधी दल का नेता होता है जिसका कार्यकाल 1 वर्ष का होता है। यह समिति सरकार द्वारा किये जाने वाले व्ययों का अध्ययन करती है तथा कन्ट्रोलर एवं आडिटर जनरल की रिपोर्ट पर भी विचार करती है।

4. विभागों से सम्बन्धित स्टैन्डिंग कमेटी :- यह 1993 ई0 में प्रारम्भ की गयी जिसका मुख्य कार्य सरकारी नियुक्ति एवं कार्यक्रमों का मूल्यांकन करना है।

5. रेलवे कन्वेंशन कमेटी :- यह कमेटी रेलवे के वित्त सम्बन्धी मामलों पर विचार करती है। जिसमें कुल 18 सदस्य होते हैं जिसमें 12 लोकसभा से तथा 6 राज्यसभा से होते हैं।

बजट के अंकेक्षण का कार्य C.A.G करता है और संविधान के अनुच्छेद 283 में दी गयी व्यवस्थाओं को लागू कराने का प्रयास करता है। C.A.Gका मुख्य कार्य केन्द्र सरकार के लेखों का उचित एवं वैज्ञानिक ढंग से संवैधानिक दायरे के अन्तर्गत रख-रखाव सुनिश्चित करता है।