द्रव (Liquids)

पृश्ठ-तनाव(Surface Tension ) :-  द्रव के मुक्त पृष्ठ की यह प्रवृत्ति होती है कि वह सिकुड़ कर अपना क्षेत्रफल न्यूनतम कर ले। द्रवों की यह प्रवृत्ति पृष्ठ तनाव कहलाती है। पृष्ठ तनाव को हम निम्न प्रकार से भी परिभाषित कर सकते हैं। ’’किसी द्रव का पृष्ठ तनाव वह बल है जो कि द्रव के पृष्ठ पर खींची गयी किसी काल्पनिक रेखा की एकांक लम्बाई पर पृष्ठ के तल में तथा रेखा के लम्ब रूप में कार्य करता है’’ पृष्ठ तनाव का मात्रक न्यूटन/मीटर है। किसी का पृष्ठ तनाव ताप बढ़ाने पर घट जाता है। पृष्ठ तनाव पर आधारित कुछ घटनायें हमें दैनिक जीवन में देखने को मिलती है जैसे काॅच सिरे का बर्नर की ज्वाला में गर्म होने पर गोल हो जाना पृष्ठ तनाव के कारण ही होता है। साधारण जल की अपेक्षा साबुन मिले जल से कपड़ों की अच्छी सफाई होती है तथा इस जल के साधारण जल से बड़े बुलबुले बनाये जा सकते हैं क्योंकि साबुन मिलने से जल का पृष्ठ तनाव कम हो जाता है जिससे साबुन युक्त जल कपड़े के छोटे छिद्रों में भी पहुंच जाता है। इसी तरह से मच्छरों को नष्ट करने के लिए जल के तल पर मिट्टी के तेल का छिड़काव करते हैं जिससे जल तनाव कम हो जाता है और मच्छर उनके अण्डे जल में डूब जाते हैं।

ससंजक बल तथा आसंजक बल (Cohesive and Adhesive force) :- एक ही पदार्थ के अणुओं के बीच लगने वाले बल को संसजक बल तथा भिन्न-भिन्न पदार्थ के अुणओं के बीच लगने वाले आकर्षण बल को आसंजक बल कहतें हैं। ससंजक बल के ही कारण किसी द्रव की बूंदें सम्पर्क आने पर एक हो जाती हैं तथा जल से भीगी कांच की दो प्लेटों को अलग करने में काफी बल लगाना पड़ता है परंतु कांच की प्लेट का जल से भीगना आसंजक बल के कारण होता है। कोई द्रव्य किसी वस्तु को तभी भिगोता है जब वस्तु तथा द्रव के अणुओं के बीच लगने वाला आसंजक बल द्रव के अणुओं के बीच लगने वाले ससंजक बल से अधिक होता है। जल से भीगी शीशे की प्लेट को रेशम या नाइलोन के कपड़े से आसानी से नहीं पोंछा जा सकता है क्योंकि कांच और पानी के अणुओं के बीच उपस्थित असंजक बल, जल तथा रेशमी कपड़े के अणुओं के बीच उपस्थित आसंजक बल से अधिक होता है। स्याही और कागज के बीच आसंजक बल स्याही के संसजक बल से अधिक होता है, इसलिए लिखते समय स्याही कागज पर चिपक जाती है।

स्पर्ष कोण (Angle of Contact) :- द्रव व ठोस के किसी स्पर्श बिन्दु से द्रव के पृष्ठ पर खीचीं गयी स्पर्श-रेखा तथा ठोस के पृष्ठ पर द्रव के अन्दर की ओर खींची गयी स्पर्श रेखा के बीच बने कोण को स्पर्श कोण कहते हैं। जो द्रव ठोस को भिगोते हैं उनके लिए स्पर्श कोण न्यून कोण तथा जल को न भिगोने वाले द्रवों के लिए स्पर्श कोण अधिक होता है तथा कांच के लिए इसका मान 80 कांच व पारे के लिए 1350 तथा जल एवं चांदी के बीच 900 होता है।

केशिकत्व-काॅच की दोनों तरफ खुली केशनली को जल में सीधा खड़ी करने पर केशनली में जल का तल बाहर वाले जल के तल से ऊपर कुछ ऊॅचाई तक चढ़ जाता है परन्तु यदि केशनली को पारे से भरे बर्तन खड़ी करें तो केशनली में पारे का तल बाहर वाले पारे के तल से नीचे होता है। इस घटना को केशिकत्व कहतें हैं। किसी द्रव मे यदि कोई परखनली खड़ी की जाये तो उसमें द्रव के तल की ऊँचाई निम्न सूत्र से ज्ञात की जा सकती है।

  •         r – कोशिका की त्रिज्या
  • d – द्रव का घनत्व
  • g – गुरूत्वीय त्वरण
  • R-द्रव के तल की त्रिज्या

   h=3πcosθ/rdg

जहाॅ h परखनली में जल के तल की ऊॅचाई है। T= द्रव का पृष्ठ तनाव Cosθ = स्पर्श कोण

श्यानता (Viscosity) :- द्रव की विभिन्न परतों पर आन्तरिक स्पर्शरेखीय बल कार्य करतें हैं जो उनकी सापेक्ष गति को नष्ट करने का प्रयास करते हैं। इन बलों को श्यानबल कहते हैं तथा द्रव के इसी गुण को, जिसके कारण द्रव अपनी भिन्न-भिन्न परतों में होने वाली सापेक्ष गति का विरोध करता है, श्यानता है। गाढ़े द्रवों में अधिक श्यानता होती है। अतः यदि हम मेज पर जल और शहद गिराये तो शहद शीघ्र ठहर जायेगी। ठोसों में श्यानता नहीं होती है।

बरनौली का प्रयोग (Bernoulli theo-rem) :- जब कोई अंसपीड्य तथा अश्यान द्रव अथवा गैस एक स्थान से दूसरे स्थान तक धारा रेखीय प्रवाह में बहता है तो उसके मार्ग के प्रत्येक बिन्दु पर इसके एकांक आयतन की कुल ऊर्जा अर्थात् दाब ऊर्जा, गतिज ऊर्जा तथा स्थितिज ऊर्जा का योग एक नियतांक होता है।

   P+½pv²+pgh = नियतांक

 दाब गतिज स्थितिज
ऊर्जा ऊर्जा ऊर्जा
जहाॅ- P द्रव का घनत्व। p को रो (एक ग्रीक शब्द) कहतें हैं।
g– गुरूत्वीय त्वरण
h– द्रव के तल की पृथ्वी से ऊंचाई
h– द्रव का वेग
यदि द्रव का प्रवाह क्षैतज तल में हो रहा हो तो स्थितिज ऊर्जा शून्य होगी।

अतः   P=½ pv²= नियतांक

बरनौली की इस प्रमेय से स्पष्ट है कि किसी प्रवाहित द्रव या गैस मे जहाॅ द्रव का दाब कम होता है वहाॅ वेग अधिक होता है। इसका अनुभव हम दैनिक जीवन में करते हैं, जैसे यदि हम प्लेटफार्म पर खड़े हों तो तेज गति से रेलगाड़ी के आने पर गाड़ी की ओर गिर जाने का खतरा रहता है। इसका कारण है कि जब रेलगाड़ी तेजी से आती है तो हमारे तथा रेलगाड़ी के बीच वायु का दाब काम हो जाता तथा पीछे की वायु जो अधिक दाब पर है हमें गाड़ी की तरफ धक्का देती है। इसी तरह आंधी आने पर टीन तथा छप्पर आदि उड़ जाते हैं क्योंकि टीन के ऊपर वायु का वेग अधिक होने के कारण दाब कम हो जाता है तथा टिन के नीचे वायु दाब अधिक होता है जिससे टिन या छप्पर आॅधी में उड़ जाती हैं।

द्रव का उत्क्षेप (Upthrust of liquids) :- किसी ठोस वस्तु को किसी द्रव में डुबाने पर उसके भार में कुछ कमी प्रतीत होती है। वस्तु के भार में यह आभासी कमी द्रव द्वारा वस्तु पर ऊपर की ओर लगाये गये बल के कारण होता है। इस बल को उत्पलावक बल अथवा उत्क्षेप बल अथवा Upthrust. कहतें हैं। उदाहरण स्वरूप कुएं से पानी खींचते समय पानी से भरी बाल्टी जब तक जल के अन्दर रहती है हल्की प्रतीत होती है। बाल्टी पर नीचे से ऊपर की तरफ लगने वाले बल के कारण होता है।

आर्कमिडीज का सिद्धांत (Principle of Archimedes) :- इस सिद्धांन्त के अनुसार जब कोई वस्तु किसी द्रव में पूरी अथवा आंशिक रूप से डुबोई जाती है तो उसके भर में कमी एहसास होता है। भार में यह आभासी कमी वस्तु द्वारा हटाये गये द्रव भार के बराबर होती है। द्रव में स्थित किसी ठोस वस्तु पर दो बल कार्य करते हैं। वस्तु का भार w जो उध्र्वाधर दिशा में नीचे की तरफ कार्य करता है तथा द्रव का वस्तु पर उत्क्षेप जो वस्तु के उत्पलावन केन्द्र पर ऊध्र्वाधर ऊपर की ओर कार्य करता है। वस्तु का डूबना या तैरना इन दोनों बलों के आपेक्षिक मान पर निर्भर करता है। इसकी निम्नलिखित तीन अवस्थाएं सम्भव हैं।

  1. यदि  W>F (जब वस्तु का भार हटाये गये द्रव के भार से अधिक हो) इस अवस्था में परिणामी बल (W-F) नीचे की ओर कार्य करेगा अतः वस्तु द्रव में डूब जायेगी।
  2. यदि W=F (जब हटाये गये द्रव का भार वस्तु के भार के बराबर हो) इस अवस्था में परिणामी बल शून्य होगा अतः वस्तु द्रव में जिस जगह होगी वहीं तैरती रहेगी।
  3. यदि W<F (जब वस्तु का भार हटाये गये द्रव के भार से कम हो) इस अवस्था में परिणामी बल (F-W) ऊपर की ओर कार्य करेगा अतः वस्तु द्रव के तल पर तैरती रहेगी।

आर्कमिडीज के सिद्धान्त के दैनिक जीवन में अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं जैसे लोहे का जहाज पानी में नहीं डूबता है परन्तु लोहे की कील डूब जाती है क्योंकि जहाज अपने आकार के कारण अपने भार से अधिक द्रव विस्थापित करता है परन्तु कील अपने भार से कम द्रव विस्थापित करती है।

किसी ठोस का कितना भाग किसी द्रव में डूब जायेगा, यह द्रव तथा ठोस के आपेक्षिक घनत्व पर निर्भर करता है, जैसे यदि किसी वस्तु का आयतन V1 व घनत्व d1 तथा द्रव का घनत्व d2 है व ठोस के द्रव में डूबे भाग का आयतन V2 है तब तैरने वाले ठोस का  भार = हटाये गये द्रव का भार

V2 ×d1× g= V2×g

अतः अधिक घनत्व वाले द्रव में ठोस का कम भाग डूबेगा तथा कम अधिक घनत्व वाले द्रव में वस्तु का अधिक भाग डूबेगा। इसी कारण समुद्र में नदियों की अपेक्षा तैरना आसान होता हैं। समुद्र के द्रव का घनत्व नदी के द्रव के घनत्व से अधिक होता है।

किसी द्रव में वस्तु का आभासी भार :- जब कोई वस्तु किसी द्रव में डुबायी जाती है तो उसके भार में कुछ कमी प्रतीत होती है। द्रव में किसी वस्तु के भार को निम्न सूत्र से ज्ञात किया जा सकता है।

द्रव में वस्तु का आभासी भार = वास्तविक भार – हटाये गये द्रव का भार