डी0एन0ए0 पुर्नसंयोजन (DNA Recombination)

डी0एन0ए0 पुर्नसंयोजन
(DNA Recombination)

किसी जीव के DNA में किसी दूसरे जीव के DNA को जोड़ना या D.N.A में हेर-फेर को DNA पुर्नसंयोजन कहलाता है। आधुनिक उपकरणों की सहायता से उपर्युक्त क्रिया को सम्पन्न किया जाता है। इस प्रकार की तकनीक को आनुवंशिक इन्जीनियरिंग या D.N.A इन्जीनियरिंग कहते हैं। इस तकनीकी द्वारा DNA खण्डों के नये क्रम तैयार किये जाते हैं। वैसे प्रकृति में जीन विनिमय द्वारा DNA के नये क्रम बनते रहते हैं। किन्तु D.N.A पुनर्सयोजन का सम्बन्ध उस DNA क्रम से है जो प्रकृति में नहीं पाया जाता। इस तकनीकी में उच्च जन्तु या पौधों के DNA के इच्छित भागों की अनेक प्रतिकृतियाँ तैयार की जाती हैं। इसीलिए इस प्रक्रिया को जीन समरूपता तथा जीन सम्बन्धन भी कहा जाता है।

इसमें जीवाणुओं द्वारा तेजी से विखण्डन द्वारा विभाजन होता है। यह प्रक्रिया निम्नलिखित चरणों में सम्पन्न की जाती है-

(1) डी0एन0ए0 खण्ड तैयार करना :- इसके लिए रेस्ट्रिक्शन एण्डोन्यूक्एिज एन्जाइमों का प्रयोग किया जाता है जिसकी खोज बेरनर आर्बर, हैमिल्टन स्मिथ-तथा डैनियल नाथन्स ने की। ये एनजाइम DNA को एक निश्चित बेस क्रम पर काटते हैं। रेस्ट्रिक्शन एण्डोन्यूक्लिएज का उत्पादन जीवाणु अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली के अन्तर्गत करते हैं।

(2) डी0एन0ए0 खण्ड को क्लोनिंग वाहन या वेक्टर से जोड़ना :- इस प्रक्रिया में जीवाणु भोजी या प्लाज्मिडों को वेक्टर के रूप में प्रयोग किया जाता है। प्लाज्मिड में कुछ ’रेस्ट्रिक्शन स्थल’ होते हैं जहाँ पर प्लाज्मिडों को काटकर इच्छित D.N.A  खण्ड को एन्जाइम डी0एन0ए0 (लाइगेज DNA)  की सहायता से जोड़े देते हैं।

(3) पुनर्सयोजन वेक्टर को पोषक कोशिका में प्रवेश कराया जाता है। इस प्रक्रिया का ट्रांसफाॅर्मेशन(Transformation) कहते हैं। इस प्रक्रिया द्वारा वेक्टर, जिसमें वाह्य DNA है, कोशिका भित्ति व कोशिका कला से स्थानान्तरित होकर पोषक कोशिका के कोशिकाद्रव्य में प्रवेश कर जाता है। पोषक कोशिका अधिकतर जीवाणु ईश्चरिकिया कोलाई (Escherichia cola) होता है।

जीवाणु कोशिका को इसके संवर्द्धन माध्यम में उगाया जाता है, तथा इसके बाद इन कोशिकाओं को स्क्रीनिंग (Screening) की जाती है। जिन कोशिकाओं में पुनर्सयोजित प्लाज्मिड स्थापित हो गये हों, उन्हें अलग कर उचित माध्यम में उगाते हैं, जिससे उनकी संख्या में वृद्धि के साथ इच्छित DNA में भी वृद्धि की जा सके।

(4) DNA खण्ड या उसके उत्पाद का पृथक्करण :- DNA खण्ड जिसे जीवाणु कोशिका में प्रविष्ट कराया गया था, वह पोषक कोशिका में अनुलेखन (Transcription) तथा अनुलिपिकरणT(Translation) करता है। इस प्रकार जीन के उत्पाद का निर्माण होता रहता है और इसे आवश्यकतानुसार इसे पृथक करते रहते हैं।

आनुवंशिक इंजीनियरिंग के अनुप्रयोग

मुख्य अनुप्रयोग इस प्रकार हैं-

(1) व्यक्तिगत जीनों का पहचान :- इस तकनीक द्वारा व्यक्तिगत जीनों की पहचान की जाती है।

(2) मानव जीनों की मैपिंग :-  DNA पुनर्सयोजन तकनीक द्वारा अब सामान्य जीनों के बारे में भी जानकारी मिल रही है जबकि पहले किसी जीन के बारे में जानकारी उसकी उत्परिवर्तित अवस्था से ही लगती थी। अभी तक लगभग 100000 से अधिक मानव जीनों की गुणसूत्र पर स्थिति का निर्धारण किया जा चुका है। न्यूक्लियोटाइड क्रम में प्राकृतिक रूप से विभिन्नताएँ पायी जाती हैं। रेस्ट्रिक्शन एंजाइमों का प्रयोग करके विभिन्न DNA के अलग- अलग लम्बाई के टुकड़े बनाते हैं। DNA अणु की विभिन्नता का पता लगाने को रेस्ट्रिक्शन फ्रैग्मेंट लेंग्थ पालीमाॅर्फिज्म (Restriction fragment length parochialism या R F L P) कहते हैं।

(3) आनुवंशिक रोगों का पता लगाना :- आनुवंशिक रोगों का गर्भ में ही ’एम्निओसिन्टेसिसस’ (Amniocentesis) तकनीक द्वारा पहले पता लगाया जाता था, किन्तु DNA पुनर्सयोजन तकनीक द्वारा क्लोनकृत डी0एन0ए0 क्रम (DNA Sequence) के उपलब्ध होने से गर्भस्थ शिशु के पूरे जीनोटाइप का निरीक्षण किया जा सकता है। इस प्रक्रिया द्वारा विलोपन प्रतिलोपन, विन्दु उत्परिवर्तन आदि सभी उत्परिवर्तनों का पता लगाया जा सकता है। इस विधि का पश्चिमी देशों में गर्भस्थ शिशुओं में थैलेसीमिया, अरक्तता, दात्र कोशिका फिनाइल कीटोन्यूरिया आदि रोगों का पता लगाने के लिए किया जा रहा है।

(4) व्यक्तिगत जीनों का पृथक करना :- इस प्रक्रिया के द्वारा जीनों को पृथक करने की तकनीक विकसित की गयी। कुछ पृथक जीन्स समूह इस प्रकार हैं-
(a) राइबोसोमल D.N.A के जीन्स
(b) विशिष्ट प्रोटीन बनाने वाले जीन्स
(c) नियन्त्रण क्रिया वाले जीन्स जैसे-रेगुलेटरी जीन्स, प्रोमोटर जीन्स आदि।

पहली बार 1965 में ’जीनोपस’ के राइबोसोमल जीन्स को पृथक किया गया। चूजों में ओवल्ब्युमिन के जीन, चूहे में ग्लोबिन तथा इम्युनोग्लोबिन जीन, अनाजों व लेग्यूम्स में प्रोटीन्स संग्रह के जीन्स, बाजरे में एमाइलेज के जीन्स पृथक किये जा चुके हैं।

(5) आनुवंशिक रोगों का इलाज करना :-  इसमें आनुवंशिक रोगों का इलाज जीन थेरैपी (Gene Therapy) की सहायता से किया जाता है। एक लड़की सीवियर कम्बाइन्ड इम्युनोडिफिशिएन्सी या सिड  से पीड़ित थी। इस रोग में ’एडीनोसिन डीएमीनेज’ का संश्लेषण करने वाले जीन में खराबी होती है। इस विधि में रोगी के शरीर से टी लिम्फोसाइट  निकालकर उसमें वेक्टर का प्रवेश कराया गया जिसमें सामान्य ADA जीन थी।

(6) डी0एन0ए0 फिंगर प्रिटिंग के लिए रेस्ट्रिक्शन फ्रैग्मेंट लेंग्थ पाॅलीमाॅफिज्म (RELP) का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। प्रत्येक व्यक्ति के गुणसूत्रों में उसकी विशिष्ट RELP होती है, जिसके द्वारा उस व्यक्ति को रुधिर की एक बूँद एक रोम या त्वचा के कुछ भाग द्वारा पहचाना जा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति दो समजात गुणसूत्रों में से एक माता से प्राप्त करता है तथा एक पिता से। अतः माता व पिता के गुणसूत्रों से तुलना करके उसके माता व पिता का भी पता लगा लिया जाता है। भारत में इस क्षेत्र में कार्यरत संस्था हैदराबाद का सी0सी0एम0बी0 है जिसके द्वारा अनेक प्रकार के अनुसंधान किये जा रहे हैं।

आनुवंशिकी इंजीनियरिंग के द्वारा अनेक प्रकार के व्यावसायिक उत्पादों को विकसित किया गया है। इस तकनीक द्वारा निर्मित टमाटर को ’फ्लैवर सेवर टमाटर’ कहते हैं। यह टमाटर बिना फ्रिज के भी कई दिनों तक रखा जा सकता है। इसके द्वारा मानव इन्सुलिन तथा मानव वृद्धि हार्मोन का उत्पादन किया जा रहा है। आनुवंशिकी अभियान्त्रिकी तकनीक द्वारा मानव इन्टरफेरोन (ल्यूकोसाइटिक इन्टरफेरोन, फाइब्रो ब्लास्टिक इन्टेरफेरोन, प्रतिरक्षक इन्टरफेरोन) का उत्पादन भी किया जा रहा है। इसी तकनीक से हेपेटाइटिस बी का टीका, एन्टीरैबीज टीका आदि, विषाणुरोधी एवं जीवाणु रोधी पौधे, कीट प्रतिरोधक जीन आदि तैयार किये गये हैं।

प्रकृति में डी0एन0ए0 पुनर्सयोजन (D.N.A Recombination in Nature) :- जीनों का पुनर्संयोजन प्राकृतिक रूप से युग्मकों के निर्माण के समय अर्धसूत्री विभाजन में जीन विनिमय या क्रासिंग ओवर द्वारा होता रहता है। पौधों में D.NA पुनर्संयोजन के उदाहरण मिलने के कारण यह पता लगता है कि प्रकृति में DNA पुर्संयोजन हुआ होगा सामान्य गेहूँ भी स्पष्ट रूप से संकर है। अपलैण्ड कपास भी प्रकृति में हुए D.N.A पुनर्संयोजन का उदाहरण है। यह कपास गाॅ0 हर्बेसियम (पुरानी दुनिया की कपास) एवं गाॅ0 रेमोन्डिआई के पुर्संयोजन द्वारा हुई है। इसमें 26 जोड़ी गुणसूत्र पाये जाते हैं।

कैनिस फमिलिएरिस की उत्पत्ति जंगली कुत्ते, भेड़िये तथा गीदडत्र के प्रकृति में हुए D.N.A पुनर्संयोजन द्वारा ही हुई है।

मानव जीनोम प्रोजेक्ट :- पूरी मानव जाति के जीनोम को पहचानने तथा उसके विषय में समस्त जानकारियाँ जुटाने के उद्देश्य से 1990 में 8मानव जीनोम परियोजना’ प्रारम्भ की गयी। इस परियोजना पर 1986 से ही कार्य चल रहा था। इस परियोजना का प्रारम्भ अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान व चीन ने मिलकर किया था। यह परियोजना नेशनल ह्यूमन जीनोम रिसर्च इन्स्टीट्यूट में आरंभ हुई थी, जिसके निदेशक डा0 फ्रांसिस काॅलिन्स थे। इस परियोजना के तहत छह देशों की 16 प्रयोगशालाओं में कार्य चल रहा है। बाद में अमेरिका की एक निजी कम्पनी ’सेलेरा जेनोमिक्स कारपोरेशन’ ने इस परियोजना पर कार्य आरम्भ किया। इसके निदेशक ’क्रेग वेन्टर’ थे। ब्रिटिश संस्थान ’सैंगर सेन्टर’ के डा0 जान साल्सटन ने भी इस क्षेत्र में अपना योगदान किया। वैज्ञानिकों को यह दावा है कि उन्होंने मानव जीनोम की लगभग 3.1 अरब इकाइयों (न्यूक्लियोटाइड्स) की संरचना ज्ञात करके उनका प्रारम्भिक खाका तैयार कर लिया है। इस प्रकार लगभग 97 प्रतिशत जीनोम का प्रारम्भिक खाका तैयार है और इसमें 85% की बिल्कुल सही संरचना का ज्ञान हो चुका है। सन् 2003 में मानव जीनोम परियोजना पूर्ण हो चुकी है।

मानव जीनोम प्रोजेक्ट के उद्देश्यों में समस्त मानव जाति के सम्पूर्ण जीन की जानकारी, प्रोटीन निर्माणक जीन्स की पहचान एवं शरीर में उनके कार्य, रोगों के जीन्स को आनुवंशिक इन्जीनियरिंग द्वारा बदलना या सुधारना आदि आते हैं।

बुद्धि लब्धि (Intelligence Quotient) :- किसी मनुष्य या शिशु का मानसिक आयु को असली आयु ;तमंसंहमद्ध से भाग कर 100 से गुणा करें तो जो संख्या आती है, वह उसकी बुद्धि लब्धि कहलाती हैं।(IQ) =12/ 10 × 100 = 120

प्रतिभासम्पन्न की बुद्धि लब्धि (Intelligence Quotient of Genius) :- अत्यन्त बुद्धिमान मनुष्य की बुद्धि लब्धि 140 या अधिक होती है।
ऐसे मनुष्य की सर्व बुद्धिमान कहा जाता है। वास्तव में 110 बुद्धि लब्धि से अधिक होने पर व्यक्ति उत्कृष्टता की ओर बढ़ता जाता है।

बुद्धि लब्धि पूर्ण रूप से आनुवंशिकता के अधीन नहीं है। इस पर अनेक तथ्यों का असर पड़ता है। जैसे-गर्भधारण, गर्भवधि वातावरण, प्रतिभा के उपयोग का अवसर आदि।

डी0एन0ए0 पुनर्संयोजन तकनीक
के लिए आवश्यक एन्जाइम

(1) लयन एन्जाइम :- कोशिका भित्ति के लयन में सहायक है अतः कोशिका में D.N.A निकालने में सहायक हैं।
(2) संश्लेषी एन्जाइम :- दो प्रकार के होते हैं-

(a) पाॅलीरेजेज :-  DNA पाॅली मेरज एन्जाइम D.N.A टैम्पलेट पर नये  D.N.A अणु के संश्लेषण में सहायक हैं।

(b) रिवर्स ट्रांस क्रिप्टेज एन्जाइम  D.N.A स्टैण्ड पर  D.N.A  संश्लेषण में सहायता करता है।

(3) लागेजेज एन्जाइम D.N.A को टुकड़ों  में जोड़ते है।

(4) विदलन एन्जाइम (Cleavage Enzymes) :-  D.N.A अणु को तोड़ने का काम करते हैं। इसके लिए तीन विदलन एन्जाइमों का प्रयोग किया जाता है।

(a) एक्सोन्यूकिलएज (Exonucleases) :-  एन्जाइम क्ण्छण्।ण् अणु के छोर से न्यूक्लियोटाइडों को अलग करते हैं।

(b) एण्डोन्यूक्लिएज (Endonucleases) :- एन्जाइम डी0एन0ए0 अणु को बीच से तोड़ते हैं।

(c) रेस्ट्रिक्शन एण्ड्रोन्यूक्लिएज एन्जाइम D.N.A अणु को विशिष्ट क्षारक क्रम पर तोड़ते हैं और इस प्रकार तोड़ते हैं कि इसके विमुख सिरों पर कुछ अयुग्मित क्षारक रहते हैं। इससे दूसरा D.N.A अणु का टुकड़ा आसानी से जुड़ जाता है।

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