जाति-प्रथा के विरूद्ध संघर्ष:- जाति व्यवस्था, समाज-सुधार आंदोलन के हमले का एक और प्रमुख निशाना थी। इस समय ंिहन्दू अनगिनत आकृतियों में बॅटे थे। कोई व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता था उसी के नियमों से उसके जीवन का एक बड़ा भाग संचालित होता था। व्यक्ति किससे विवाह करे तथा किसके साथ भोजन करे, इसका निर्धारण उसकी जाति से ही होता था। उसके पेशे तथा उसकी सामाजिक प्रतिबद्धता का निर्धारण भी बहुत कुछ इसी से होता था। इसके अलावा जातियों को भी सावधानीपूर्वक अनेक ऊंचे-नीचे दर्जें मे रखा गया था। इस व्यवस्था में सबसे नीचे अछूत आते थे जो हिंदू आबादी का लगभग 20 प्रतिशत भाग थे, इन्हीं को बाद में अनुसूचित जातियां कहा गया। ये अछूत अनेकों कठोर निर्योग्यताओं और प्रतिबंधों से पीड़ित थे जो विभिन्न जगहों में भिन्न-भिन्न थीं। उनके स्पर्श मात्र से किसी व्यक्ति को अपवित्र माना जाता था।

देश के कुछ भागों में और दक्षिण में लोग उनकी छाया तक से बचते थे और इसलिए किसी ब्राम्हण को आता जानकर इन अछूतों को बहुत दूर हट जाना पड़ता था। अछूतों के खाने-पहनने और रहने के स्थान पर भी कड़े प्रतिबंध थे। वह ऊंची जातियों के कुओं, तालाबों से पानी नहीं ले सकता था, इसके लिए अछूतों के लिए कुछ तालाब और कुए निश्चित होते थे। जहां ऐसे कुएं अैर तालाब न होते वहाॅ उनको पौखरों और सिंचाई की नालियों का गंदा पानी पीना होता था। वे हिंदू मंदिरों में जा नहीें सकते और न शास्त्र पढ सकते थे। अक्सर उन के बच्चे ऊंची जातियों के बच्चों के स्कूल में नहीं जा पाते थे। पुलिस तथो सेना जैसी नौकरियां उन के लिए नहीं थी। अछूतों को अपवित्र समझे जाने वालें गंदे काम, जैसे झाडू-बुहारू जूते बनाना, मुर्दे उठाना, मुर्दा जानवरों की खाल निकालना, खालों तथा चमड़ा को पकाना-कमाना, आदि काम करने पड़ते थे। वे जमीन के मालिक नहीं बन सकते थे और उनमें से अनेकों को बंटाईदारी या खेत-मजदूरी करनी पड़ती थी।
जति-प्रथा की एक और बुराई भी थी। यह  अमानवीय और जन्मगत असमानता के जनतंत्र-विरोधी सिद्धांत पर आधारित तो थी ही, साथ ही समाजिक विघटन का कारण थी। इसने लोगों को अनेकों समूहों में बंाटकर रख दिया था। आधुनिक काल में यह प्रथा एकता की राष्ट्रीय भावना के विकास और जनतंत्र के प्रसार में एक प्रमुख बाधा रही है। जातिगत चेतना, खासकर विवाह-संबंधों के बारे में, मुसलामानों, ईसाइयों तथा वे भी कम उग्र रूप में ही सही, छुआछूत का पालन करते रहे है।
ब्रिटिश शासन ने ऐसी अनेक शक्तियों को जन्म दिया जिन्होंने धीरे-धीरे जाति प्रथा की जड़ों को कमजोर किया। आयुनिक उद्योगों, रेलों व बसों के आरंभ से तथा बढ़ते नगरीकरण के कारण खासकर शहरों में विभिन्न जातियों के लोगों के बीच संमर्क को अपरिहार्य बना दिया। आधुनिक व्यापार-उद्योग ने आर्थिक कार्यकलाप के नए क्षेत्र सभी के लिए पैदा किए हैं। उदाहरण के लिए, एक ब्राम्हण या किसी और ऊंची जाति का व्यपारी चमड़े या जूते के व्यापार का अवसर भी शायद ही छोडे, और न ही वह डiक्टर या सैनिक बनने का अवसर छोडेगा। जमीन की ख्ुाली बिक्री ने उनेक गांवों में जातीय संतुलन को गिाड़ कर रख दिया है। एक आधुनिक औद्योगिक समाज जाति और व्यवसाय का पुराना चल सकना कठिन है क्योंकि इस समाज में मुनाफा प्रमुख प्रेरणा जा रहा है।
प्रशासन के क्षेत्र में, अंग्रेजों ने कानून के सामने सबकी समानता का सिद्धांत लागू किया, जातिगत पंचायतों से उनके न्यiयिक काम छीन लिए, और प्रशासकीय सेवओं के दरवाजे धीरे-धीरे सभी जातियों के लिए खोल दिए।इस के अलावा, नई शिक्षा प्रणाली पूरी तरह धर्मनिपेक्ष है और इसलिए वह मूलतः जातिगत भेदों तथा दृष्टिकोण की विरोधी है। जब भारतीयों के बीच आधुनिक जनतंत्रिक व बुद्धिवादी विचार फैले तो उन्होंने जाति-प्रथा के खिलाफ आवाज उठाना शुरू किया। ब्रम्हसमाज, प्रर्थना समाज, आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन, थ्यिोसोेफी, सोशल कांफ्रेस तथा उन्नीसवीं सदी के लगभग सभी महान सुधारकों ने इस पर हमले किए। हांलांकि उनमें से बहुतो ने चार वर्णों की प्रथा का पक्ष भी लिया, मगर वे भी जाति-प्रथा के आलोचक थे। उन्होंने खास तौर पर छुआछूत की अमानवीय प्रथा की निंदा की। उन्होंने यह भी महसूस किया कि राष्ट्रीय एकता तथा राजनीति-सामाजिक आर्थिक क्षेत्रों में राष्ट्रीय प्रगति तब तक असंभव है तब कि लाखों-लाख लोगों सम्मान के जीने के अधिकार से वंचित है।
राष्ट्रीय आंदोलन के विकास ने भी जाति-प्रथा को कमजोर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राष्ट्रीय आंदोलन उन तमाम संस्थाओं का विरोधी था जो भारतीय जनता को बंाटकर रखती थी। जन-प्रदर्शनों, विशाल जनसभाओं तथा सत्यग्रह के संघर्षों में सबकी भागीदारी ने भी जातिगत चेतना को कमजोर बनाया। कुछ भी हो, वे लोग जो स्वाधीनता और स्वतंत्रता और स्वतंत्रता के नाम पर विदेशी शासन से मुक्ति के लिए लड़ रहे थे, जाति-प्रथा का समर्थन नहीं कर सकते थे क्योंकि यह उन सिद्धातों की विरोधी थी। इस तरह आरंभ से ही भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने पूरे जातिगत विशेषधिकारों का विरोध किया, और जाति-लिंग धर्म के भेदभाव के बिना व्यक्ति के विकास के लिए समान नागरिक अधिकारों तथा समान स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ते रहे।
गांधी जी अपनी सार्वजनिक गतिविधियों में छुआछूत खात्में को जीवन भर एक प्रमुख काम मानते रहे। 1932में उन्होंने इस उद्देश्य से अखिल भारतीय हरिजन संघ की स्थापना की। ’’अस्पृष्यता का जड़-मूल से उन्मूलन का उनका आंदोलन मानवतावाद और बुद्धिवाद पर आधारित था। उनका तर्क हिंदू शास्त्रों में छुआछूत को कोई मान्यता नहीं दी गई है। लेकिन शास्त्र छुआछूत का समर्थन करे तो उसे नहीं मानना चाहिए क्योंकि यह सब मानव-सम्मान के विरूद्ध है। उन्होंने कहा कि सत्य किसी पुस्तक के पन्नों तक सीमित नहीं होता।’’
उन्नीसवीं सदी के मध्य से अनेक व्यक्तियों व संगठनों ने अछूतों के बीच शिक्षा-प्रसार का काम आरंभ किया (इन अछूतों को बाद में कमजोर वर्ग या अनुसूचित जातियां कहा गया) उनके लिए स्कूलों तथा मंदिरों के दरवाजे खुलवाने,सार्वजनिक कुओं और तालबों से उन्हें भरने का अधिकार दिलाने, तथा उनको उत्पीड़ित करने वाली अन्य सामाजिक निर्योग्यताओं और भेदभावों को नष्ट करने के प्रयास किए गए।
शिक्षा तथा जागृति फैली तो निचली जातियों में भी हलचल होने लगी। व अपने मूल मानव-अधिकारों के प्रति सचेत हुए तथा उनकी रक्षा के लिए उठकर खड़े होन लगे। धीरे-धीरे उन्होंने ऊंची जातियों के परंपरागत उत्पीड़न के खिलाफ शक्तिशाली आंदोलन खड़ा किया। महाराष्ट्र में 19वीं सदी केउत्तरार्ध में एक निचली जाति में जन्में ज्योतिबा फूले ने ब्राम्हणों ने ब्राम्हणों की धार्मिक सत्ता के खिलाफ जीवन भर आंदोलन चलाया। यह ऊंची जाितयों के प्रभुत्व के खिलाफ उनके संघर्ष काएक अंग था। वे आधुनिक शिक्षा को निचली जातियों की मुक्ति का सबसे शक्तिशाली अस्त्र समझते थे। वे पहले व्यक्ति थे जिन्होने निचली जातियों की लड़कियों के लिए अनेक स्कूल खोले। डiक्टर खोले। डIक्टर भीमराव अम्बेडकर ने जो खुद एक अनुसूचित जाति के थे, अपना पूरा जीवन जातिगत अत्याचर विरोधी संघर्ष को समर्पित कर दिया। इसके लिए उन्होंने अखिल भारतीय अनुसूचित जाति महांसंघ की स्थापना की। अनुसूचित जातियों के दूसरे अनेक नेताओं ने अखिल भारतीय वंचित वर्ग संघ की स्थापना की।
केरल में श्री नारायण गुरू ने जाति-प्रथा के खिलाफ जीवन भर संघर्ष चलाया। उन्होंने ही ’’मारव जाति के लिए एक धर्म, एक जाति और एक ईश्वर’’ का प्रसिद्ध नारा दिया। दक्षिण भारत में ब्राम्हणों द्वारा लादी गई निर्योग्यताओं का मुकाबला करने के लिए गैर-ब्राम्हणों ने 1920 के दशक में एक आत्मसम्मान आंदोलन चलाया। पूरे भारत में मंदिरों में अछूतों के प्रवेश की मनाही तथा दूसरे प्रतिबंधों के खिलाफ ऊंची तथा निचली जातियों के लोगों ने मिलकर अनेक सत्याग्रह आंदोलन चलाए।


फिर भी, छूआछूत विरोधी विदेशी शासन में पूरी तरह सफल नहीं हो सका थां विदेशी सरकार समाज के रूढ़िवादी तत्वों की शस्त्रुता मोल लेने से डरती थी। समाज के मूलभूत सुधारक का काम केवल स्वतंत्र भारत की सरकार कर सकती थी। इसके अलावा, सामाजिक कल्याण का काम राजनीतिक आर्थिक कल्याण से गहराई से जुड़ा होता है। उदाहरण के लिए, कमजोर वर्गों की सामाजिक स्थिति सुधारने के लिए आर्थिक प्रगति आवश्यक है शिक्षा तथा राजनीतिक अधिकारों के प्रसार के साथ भी यही बात है। इस बात को भारतीय नेताओं ने अच्छी तरह समझा था। 1950 के विधान ने अंततः छुआछूत के खात्में के लिए एक कानूनी आधार तैयार किया। इसने घोषणा की कि अस्पृश्यता समाप्त की जा चुकी है और किसी भी रूप में इसका पालन मना है।