जलवायु (Climate)

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जलवायु  से तात्पर्य सारे मौसमी तत्वों के औसत मान पर आधारित किसी स्थान की दीर्घकालीन वायुमण्डलीय दशाओं से है। इसके लिए प्रतिदिन पुनः प्रत्येक माह और अंत में वर्षभर के तापमान, वर्षा एवं अन्य तत्वों या घटकों के मध्य औसत मान से जलवायु के आॅकड़ें तैयार करने पड़ते हैं। जलवायु- सम्बन्धी औसत के लिए कम से कम  35  वर्ष की अवधि महत्वपूर्ण होती है। जिन कारकों से किसी स्थान की जलवायु प्रभावित होती है, वे निम्नलिखित हैं-

1. अक्षांश – उच्च अक्षाशों की ओर जाने पर अपेक्षाकृत ठंडी जलवायु होती है, क्योंकि वहाॅ सूर्य की किरणें अधिकाधिक तिरछी होती हैं जिससे सूर्यातप की मात्रा घटती जाती है। ध्रुव की ओर बढने पर वाष्पीकरण की कमी के कारण वर्षा की मात्रा भी सापेक्षतः कम होती जाती है।

2. समुद्र और स्थलमंडल का विवरण – पृथ्वी पर जल और स्थल खंड का वितरण असमान है, जिससे दोनों के ऊपर की वायुमंडलीय स्थितियाॅ विषम हो जाती है, क्योंकि समुद्र धीरे-धीरे गर्म या ठंडा होता है और स्थलखण्ड शीघ्र। यही कारण है कि महासागरों पर दैनिक या वार्षिक तापान्तर उतना अधिक नहीं मिलता जितना महाद्वीपों पर। समुद्र से चलने वाले पवन आर्द्र होते हैं और स्थल से चलने वाले पवन शुष्क। साथ ही, तटीय प्रदेशों में जहाॅ पवन समुद्र की ओर से आते हैं, अपेक्षाकृत अधिक वर्षा होती है। वायुदाब में ऋतुवत् भिन्नता का कारण भी पृथ्वी पर समुद्र और स्थल का असमान वितरण है।

3. धरातल की ऊँचाई-निचाई – ऊँचे भाग (पहाड़-पठार) में ग्रीष्म काल मे भी मैदानी भाग की अपेक्षा कम तापमान मिलता है, क्योंकि वायुमंडल की ऊपरी परत का घनत्व चिली परतों की अपेक्षा कम होता है। यही कारण है कि विषुवत रेखा पर स्थित होते हुए भी इक्वेडोर की राजधानी क्वीटों में चिरवसन्त छाया रहता है और अफ्रीका के केनिया स्थित किलिमंजारो पर्वत के शिखर हिमाच्छादित रहते हैं। पहाड़ी भाग वाष्प भरे बादलों को अपनी ढाल के सहारे ऊपर उठाकर भारी पर्वतीय वर्षा कराते है और विमुख में वृष्टि छाया-निर्मित होता है।

4. महासागरीय धाराएँ – ये भी जलवायु पर जबर्दस्त प्रभाव छोड़ती है। गर्म धाराएँ तटीय क्षेत्रों का तापमान और वायु की आर्द्रता बढ़ाती हैं और इसके विपरीत ठंडी धाराएँ घटा देती हैं। कालाहारी मरूथल में सहारा की अपेक्षा ठंडी जलवायु मिलने का प्रमुख कारण ठंडी जलधारा का प्रभाव है।

5. वनस्पति – इसके आभाव में धरातल जल्द गर्म हो जाता है (ग्रीष्म काल में) और वहाॅ शुष्क जलवायु मिलती है। घने पेड़-पौधों से ढंकी धरती न जल्द तपती है और न वहाॅ शुष्कता आती है। संघनन वन बादलों को अपनी ओर आकृष्ट कर वर्षा कराने में सक्षम होते हैं, जिससे जलवायु सम और नम हो जाती है।

6. पर्वत की दिशा – यदि किसी स्थान पर पर्वत की दिशा प्रचलित पवन के समान्तर हो तो वहाॅ वर्षा नहीं हो पाती (जैसे- राजस्थान में अरावली पहाड़ की दिशा अरब सागर में आने वाले मानसून के समान्तर है।) इसके विपरीत, यदि पर्वत की दिशा प्रचलित पवन के समकोण पर हो तो वहाॅ भारी वर्षा हो सकती है, जैसे-मेघालय में पर्वत के कारण यदि सम्मुख भाग वर्षा प्राप्त करता हैै तो उसका विमुख भाग (जहाॅ पवन नहीं पहॅुच पाती) वृष्टिहीन अर्थात् शुष्क रह जाता है, जैसे- हिमालय का तिब्बत क्षेत्र।

7. पवन की दिशा – निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों की ओर आने वाले पवन गर्म और उच्च अक्षांशों की ओर चलने वाले पवन ठंडे होते हैं। समुद्री पवन आर्द्र और स्थलीय पवन शुष्क होते हैं।

8. समुद्र से दूरी – समुद्र की हवा तटवर्ती क्षेत्रों में ग्रीष्मकाल में शीतलता प्रदान करती है शीतकाल में भयंकर सर्दी से बचाती है अर्थात जलवायु को सम (समुद्रिक) रखती है। इसके विपरीत, समुद्र से जितनी दूरी बढ़ती है वहाॅ समुद्री पवनों का प्रभाव उतना ही कम हो जाता है जिससे जलवायु विषम (महाद्वीपीय) हो जाती है। समुद्र की निकटता के कारण कोलकता एवं मुबंई में दिल्ली एवं लखनऊ की अपेक्षा न अत्यधिक शीतलता एवं न ही गर्मी पायी जाता है।

9. भूमि की ढाल व भू-आकृति – भूमि की ढाल में दो तथ्य महत्वपूर्ण हैं, एक उसकी दिशा और दूरी उसकी मात्रा। यदि ढाल की दिशा सूर्याभिमुख है तो गर्मी अधिक मिलेगी और सूर्य के विमुख है तो गर्मी कम। कश्मीर की घाटियो मे दक्षिणी ढाल पर अधिक गर्मी मिलने के कारण ही सेब के बागान मिलते हैं। यदि ढाल की मात्रा कम हो अर्थात् खड़ी ढाल हो तो उस पर गर्मी अधिक प्राप्त होती है।

10. मृदा – कुछ मिट्टियाॅ जल्द गर्म हो जाती हैं और कुछ देर से, अतः वे भी जलवायु को प्रभावित करती हैं। रेतीले मैदान जल्द गर्म और जल्द ठंडे हो जाते हैं। जिस मिट्टी में आर्दता देर तक बनी रहती है, वह देर से गर्म और देर से ठंडी होती है। संगमरमर में भी यही गुण है, अतः गर्म इलाकों में घर बनाने में इसका उपयोग किया जाता है।

विश्व के प्रमुख जलवायु/प्राकृतिक प्रदेश

विश्व के ऐसे प्रदेश जहाॅ की जलवायु एक-दूसरे से मिलती हैं, एक जलवायु-प्रदेश के अन्तर्गत रखे जाते हैं। उष्ण शीतोष्ण और शीत कटिबंधों में मिलने वाले जलवयु के 11 प्रकारों के आधार पर विश्व को इतने ही जलवायु-प्रदेशों में बाॅटा गया। जलवायु पर वनस्पति और जीव-जन्तु निर्भर रहते हैं। मानव के रहन-सहन का सामान्य ढंग भी जलवायु से प्रभावित है। अतः विश्व के ऐसे भू-भाग या प्रदेश, जो एक दूसरे से जलवायु प्राकृतिक वनस्पति जीव-जन्तु और रहन-सहन के साधारण ढंग में बहुत अधिक समता रखते हों, एक भौगोलिक प्रदेश या प्राकृतिक प्रदेश कहलाते हैं। यद्यपि ऐसे प्रदेशों के बीच निश्चित सीमाएॅ नहीं है, तथापि इन प्रदेशों का विस्तार निर्धारित किया जा सकता है। हर प्राकृतिक प्रदेश का अपना भौगोलिक रूप हुआ करता है।

उष्ण एवं आर्द्र विषुवतीय प्रदेश (The Hot and Wet Equatorial Climate) –

विषुवतीय प्रदेश विषुवत् रेखा के उत्तर और दक्षिण 5º से 10º अक्षाशों के बीच स्थित है। इसका विस्तार तीन महादेशों में मिलता है- 1. द0 अमेरिका, 2. अफ्रीका और 3. एशिया में। दक्षिण अमेरिका में विषुवतीय प्रदेश का सर्वाधिक फैलाव आमेजन बेसिन में, अफ्रीका में इसका विस्तार कांगो बेसिन में तथा एशिया में यह मलेशिया व पूर्वी द्वीपसमूह में फैला हुआ है।
जलवायु-
1. विषुवतीय प्रदेश की जलवायु-सम्बन्धी सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि यहाॅ सालोभर एक-सा उच्च तापमान मिलता है। औसत तापमान 27ºC रहता है।

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