ग्रसनी तथा ग्रासनली
(Pharyanx and Oesophagus)

ग्रसनी नाक, मुख तथा स्वरयन्त्र के पीछे स्थित होती है। इसका विस्तार कपाल आधार से छठी ग्रीवा कशेरुका तक होता है। इस कशेरुका पर क्रिकोयड कार्टिलेज के स्तर पर ग्रसनी से ग्रास नली आरम्भ होती है। ग्रसनी लगभग 12 सेमी0 लम्बी होती है। तथा तीन भागों में बँटी होती है।

नाक के पीछे नासाग्रसनी मुख के पीछे मुख ग्रसनी तथा ग्रसनी का निम्नतम भाग स्वरयन्त्र ग्रसनी है। ग्रसनी में सात द्वार होते हैं। ग्रसनी की भित्ति तीन स्तरों की बनी होती हैं। म्यूकस स्तर, तन्तु स्तर, पेशी स्तर।

ग्रसनी में दो प्रकार की उपकला होती है। ऊपरी भाग में श्वसन उपकला तथा निम्न भाग में स्तरित उपकला। ग्रसनी में दोनों ओर गलतुंउिका (Fauces)के स्तम्भों के मध्य लसिका ऊतक का एक पिण्ड होता है जिसे टौन्सिल कहते हैं। इसमें रक्त वाहिकाएँ लसिका वाहिकाएँ तथा लसिका कोशिकाओं के समूह होते हैं। ग्रसनी में पश्च नासा तथा यूस्टेशियन ट्यब के द्वारों के निकट भी लसिका ऊतक विद्यमान होता है जो ’एडिनाइड’ (Adenoid) कहलाता है। ग्रासनली 23-25 सेमी लम्बी एक पेशी निर्मित ट्यूब होती है जो ऊपर ग्रसनी से जुड़ती हैं तथा नीचे आमाशय में खुलती हैं। ग्रासनली की भित्ति स्तरों की बनी होती हैं। सबसे बाहरी सतर संयोजी ऊतक का होता है जिसके भीतर पेशी स्तर होता है जिसके दो भाग अनुदैध्र्य एवं वलय पेशी होते हैं। फिर एक सब म्यूकस स्तर (अवश्लेष्मक स्तर) तथा सबसे भीतर ’म्यूकस उपकला’ होती है। निगरण (Swallowing) चबाने के बाद की क्रिया है। इस क्रिया को तीन भागों में बाँटा गया है। प्रथम क्रिया ऐच्छिक है। निगरण की दूसरी क्रिया ग्रसनी में होता है। निगरण का तीसरा भाग ग्रासनली के पेरिस्टैल्सिस (Peristalsis) द्वारा सम्पन्न होता है।

लाला ग्रन्थियाँ तथा लाला रस
(Salivary Glands and Saliva)

लाला ग्रन्थियाँ कम्पाउंड रेसीमोज ग्रन्थियाँ होती हैं। मुख्य लाला ग्रन्थियों में पैरोटिड (Parotid कर्ण पूर्व), सब मेन्डिबुलर (Submandibular तथा सबलिंगुअल Sublingul उपजिव्हा) आते हैं। लाला ग्रन्थियाँ लाला रस अथवा लार उत्पन्न करती हैं जो पाचन तन्त्र का प्रथम पाचक रस है। लाला रस का स्राव निम्न दशाओं में अधिक होता है- (a) मुख में भोजन आने पर (b) भोजन का ध्यान आने पर अथवा उसे देखने या सूँघने पर। इस ग्रन्थि की सूजन ’कर्णपूर्व ग्रन्थिशोथ’ (Parotitis) कहलाती है। तीव्र शोथ विरल होता है। मम्स (Mumps) नामक रोग में ये ग्रन्थियाँ एक वायरस संक्रमण के कारण सूज जाती हैं।

लाला रस पानी के समान पतला एक क्षारीय तरल होता है। इसमें अत्यल्प मात्रा में कुछ ठोस पदार्थ म्यूसिन तथा टायलिन नामक एक स्टार्च विघटक पदार्थ होता है।

उदर गुहा (Abdominal Cavity) :-  यह शरीर की सबसे बड़ी गुहा है जिसकी आकृति अण्डाकार होती है तथा यह ऊपर डायफ्राम से नीचे श्रोणि तक फैली होती है। पोषण नाल का अधिकांश भाग (अमाशय, छोटी आँत तथा बड़ी आँत) उदर गुहा में समाहित है। यकृत उदर के दायें और ऊपरी भाग में डायफ्राम के नीचे स्थित होता है। आमाशय तथा छोटी आँत का आरम्भिक भाग इससे दबे रहते हैं। पित्ताशय यकृत के नीचे स्थित होता है। अग्न्याशय या पैन्क्रियाज आमाशय के पीछे स्थित होता है तथा प्लीहा अग्न्याशय पुच्छ के निकट बायीं ओर स्थित होती है।

आमाशय तथा जठर पाचन (Stomach and Gtric Digestion) :- आमाशय पोषण नाल का सबसे अधिक विस्तारित अंग है। इसका अधिकांश भाग उदर के एपिगेसिट्रक (Epigastric) अधिजठर प्रदेश में स्थित होता है तथा कुछ भाग बांये हाइपोकोन्ड्रियम (Hypochondrium) और नाभि प्रदेश में स्थित होता है। आमाशय के तीन भाग होते हैं – (1) फण्डस (ऊपरी भाग) (2) पिण्ड या बौडी (मध्य भाग) तथा (3) जठर निर्गम कोटर (Pyloric Antrum निम्न भाग) आमाशय चार स्तरों का बना होता है – (1) पेरिटोनियल सतर (2) पेशी स्तर-(a) अनुदैध्र्य तन्तु (b) वलय तन्तु तथा (c) तिर्यक तन्तु (3) अवम्यूकस स्तर (4) म्यूकस स्तर।

म्यूकस कला :-  यह स्तम्भाकार उपकला द्वारा आच्छादित होती है तथा इसमें अनेक लसिका वाहिनियाँ होती हैं। म्यूकस कला के पृष्ठ पर जठर ग्रन्थियों की अनेक लघु वाहिनिया खुलती हैं।

जठर ग्रन्थियाँ (Cardiac Glands) :- ग्रास नली के द्वार के निकट स्थित होती हैं, इनसे निकलने वाला म्यूकस क्षारीय होता है। जठर निर्गम ग्रन्थियाँ भी मुख्यतः क्षारीय म्यूकस उत्पन्न करती हैं। आमाशय में भोजन ग्रास नली से आता है। यहाँ पर भोजन आमाशय रस मिलकर पतला एकरूप हो जाता है। यहाँ से लगभग 14 ग्राम भोजन डिओडेनम में आता है, यह भोजन अत्यन्त अम्लीय होता है किन्तु डिओडेनम में पित्त और अग्न्याशय रस से मिलकर यह उदासीन हो जाता है। आमाशय की म्यूकस कला में स्थित ग्रन्थियाँ जठर रस नामक महत्वपूर्ण पाचक रस बनाती हैं। यह रस एक स्वच्छ रंगहीन, अम्लीय तरल होता है, इसमें 0.4% मुक्त हाइड्रोक्लोरिक अम्ल होता है, इस अम्ल के कारण भोजन में विद्यमान सूक्ष्म जीव मर जाते हैं तथा प्रोटीनयुक्त भोजन के पाचन में सहायता मिलती है। जठर रस में पेप्सिन, रेनिन तथा जठर लाइपेज नामक एंजाइम पाये जाते हैं। पेप्सिन प्रोटीन को पेप्टोन में, रेनिन केसीनोजन नामक विलेय प्रोटीन से केसीन का निर्माण करता है जो अविलेय होती है। रेनिन की उपस्थिति में दूध जमकर फट जाता है। जठर लाइपेज के कारण कुछ हद तक वसा का पाचन आमाशय में ही हो जाता है।

भोजन खाते समय भोजन के स्वाद से और अधिक जठर रस उत्पन्न होता है। यह दशा ’तन्त्रिका प्रावस्था’ कहलाती है। जब भोजन आमाशय में पहुँचाता है तो आमाशय की भित्ति से ’गैस्ट्रिन’ नामक हार्मोन उत्पन्न होता है, यह दशा रासायनिक प्रावस्था कहलाती है।

एक्स-रे परीक्षण Barium meal बेरियम मील) जठर दर्शी यंत्र अथवा गेस्ट्रोस्कोप द्वारा आमाशय का प्रत्यक्ष दर्शन जठर फोओग्राफी, जठर स्राव का अध्ययन करने के लिए टेस्ट मील पद्धति काम में लायी जाती है।

छोटी आँत तथा पाचन :- छोटी आँत लगभग 2.4 मीटर लम्बी एक ट्यूब होती है और मरणोत्तर काल में इसकी लम्बाई 6 मीटर तक पहुँच जाती है। यह आमाशय से इलियो सीकल वाल्ब तक होती है और इसी स्थान पर यह बड़ी आँत से जुड़ी होती है। छोटी आँत का आरम्भ ग्रहणी या डिओडेनम (Duodenum) से होता है। इसकी लम्बाई 25 सेमी होती है तथा आकार घोड़े के नाल के सदृश होता है। छोटी आँत भी चार स्तरों की बनी एक भित्ति होती है। वाह्य स्तर ’पेरीटोनियम’ का बना होता है। भीतर का स्तर ’पेशी स्तर’ है जिसे अनुदैध्र्य तथा वलय पेशी में बाँटा गया है। पेशी के भीतर की ओर ’अवश्लेष्मा स्तर’ होता है जो ’अवकाशी ऊतक’ का बना होता है। ग्रहणी (Duodenum) में एक विशिष्ट प्रकार की ग्रन्थियाँ होती हैं जो ’ब्रूनर की ग्रन्थियाँ’ कहलाती हैं। अवश्लेष्मा और श्लेष्मा के मध्य चिकनी पेशी की एक ओर तह होती है जो ’श्लेष्मल पेशिका’ कहलाती हैं। सबसे भीतरी स्तर ’श्लेष्मिक कला’ का है जिसमें अनेक फोल्ड अथवा पुटक होते हैं। इस स्तर में अनेक प्रकार की कोशिकाएँ होती हैं जिसमें अनेक ’ल्यूकोसाइट’ भी होते हैं।

पाचन क्रियाओं का संक्षिप्त वर्णन

कार्य :- आमाशय से आने वाले काइम (Chyme) अथवा तरल भोजन का भोजन का पाचन छोटी आँत में होता है। ग्रहणी में पित्त एवं अग्न्याशयिक रस भोजन से आकर मिलता है।

पित्त वसा के पाचन के लिए आवश्यक होता है। इसके द्वारा वसा का इमल्सीकरण होता है। पित्त क्षारीय होता है तथा आमाशय में से आने वाले भोजन की अम्लीयता कम करता है। ’पित्तलवण’ (Bile Saltus) पाचित वसा के इमल्सीकरण में योग देते हैं।

अग्न्याशय रस क्षारीय होता है तथा इसमें पाये जाने वाले तीन प्रकार के पाचक एंजाइम एमाइलेज (कार्बोहाइड्रेट का पाचन), लाइपेज (इसके द्वारा वसा का पाचन होता है। इसीलिए इसे वसा विघटक एंजाइम कहते हैं) ट्रिप्सिन (इसके द्वारा प्रोटीन का पाचन) होता है। ट्रिप्सिन प्रोटीनों तथा पेप्टोनों पाॅली पेप्टाइड वर्ग में बदलता है। आन्त्र रस में विद्यमान एन्टरोकाइनेज नामक एंजाइम अग्न्याशय रस के प्रोटीन विघटक एंजाइम को सक्रिय करता है। इरैप्सिन पाली पेप्टाइडों को एमीनों एसिड में बदलता है।

कार्बोहाइड्रेट पर तीन प्रकार के एन्जाइम सुक्रेज (ईक्षु शर्करा का पाचन), लैक्टेज (लैक्टोज को ग्लूकोज तथा गैलेक्टोज में बदलता है) तथा माल्टेज (माल्टेज को ग्लूकोज में बदलता है) प्रभाव डालते हैं तथा डाइसैकराइडों को मोनोसैकराइडो में बदलते हैं।

इस प्रकार छोटी आँत में भोजन पूरी तरह पच जाता है। छोटी आँत के अन्त तक पहुँचने में भोजन को चार घंटे लगता है। प्रोटीन का विघटन जठर व अग्न्याशय के एंजाइमों द्वारा प्रोटीनों का एमीनों एसिडो में, कार्बोहाइड्रेट का ग्लूकोज में तथा वसा का वसा अम्ल और ग्लिसरीन में विघटन हो जाता है। इसके बाद ये सब पदार्थ अवशोषण के लिए तैयार हो जाते हैं।

अवशोषण (Absorption) :- पचे हुए भोजन का अवशोषण पूर्णतः छोटी आँत में होता है। अवशोषण दो मार्गों रक्त केशिकाएँ तथा आँत अंकुरों की लसिका वाहिनियों से होता है।

बड़ी आँत तथा मल विसर्जन (Large intesrine and Defaecation) :-  यह इलिओकस वाल्व से प्रारम्भ होकर लगभग डेढ़ मीटर लम्बी होती है। आमाशय में जब भोजन प्रविष्ट होता है तो जठर वृहदान्त्र प्रतिवर्त (Gastro-Calicreflx) प्रकट होता है जिसके फलस्वरूप बड़ी आँत में पुरः सरण बढ़ जाता है। इस प्रतिवर्त के फलस्वरूप मल विसर्जन होता है।

एपेन्डिक्स Appendix उण्डुक पुच्छ) :- उन्हीं चार स्तरों का बना होता है जो आँत में होते हैं। एपेन्डिक्स की स्थिति सीकम के नीचे अथवा पीछे हो सकती है। एपेन्डिक्स शोथ की दशा में एपेन्डिसाइटिस कहलाता है। इस स्थिति में प्रायः ’एपेन्डिएक्टमी’ का आपरेशन करना होता है।

यकृत वंक तथा प्लीहा बंक :- यकृत तथा प्लीहा जहाँ बड़ी आँत मुड़ती है, वह स्थल क्रमशः यकृत बंक तथा प्लीहा बंक कहलाते हैं। मलाशय बड़ी आँत का सबसे निम्नतम भाग होता है, इसकी लम्बाई लगभग 13 सेमी होती है। यह श्रोणि आँत (बड़ी आँत) से शुरू होता है और गुदानाल (Analcanal) पर समाप्त होता है। गुदानाल की लम्बाई लगभग 4 सेमी0 होती है। यह गुदा पर समाप्त होती है।

पर्युदुर्या (Peritoneum) :- यह एक दोहरी सीरमी कला है जो शरीर की कलाओं में सबसे बड़ी होती है। इसके दो भाग भिक्तिक पर्युदर्या ; (Parietal Peritoneum) तथा अंतरांग पर्युदर्या(Visceral Peritoneum)  होते हैं।

जठरीय रस (Gastric juice) :- हमारे आमाशय की दीवार में उपस्थित लगभग 3.5 करोड़ जठर ग्रन्थियाँ दिन भर में लगभग 1 से 3 लीटर तक, एक पीले से उच्च अम्लीय (Ph 1.0 -3.01) जठर रस का स्रावण करती है। इस रस में 97% से 99% तक जल होता है। 0.2% से कोशिकाओं द्वारा स्रावित एक तात्विक अभिकर्ता तथा जाइमोजीनिक कोशिकाओं द्वारा स्रावित पेप्सिनोजन एवं जठर लाइपेज नामक एंजाइम होते हैं। जठर रस की उच्च अम्लीयता HCL के कारण होती है।

पित्त (Bile) :- पीले-हरे या हरे-नीले से रंग का क्षारीय (Ph 7.6-8.6) द्रव होता है। मनुष्य में प्रतिदिन लगभग 800 से 1000 मिली पित्त का स्रावण होता है। पित्ताशय से ग्रहणी में मुक्त होने वाले पित्त में लगभग 92% जल, 6.0% पित्त, लवण 3.0% पित्त रंग ;इपसम चपहउमदजद्ध एवं पित्त अम्ल 0.3 – 0.9 कोलेस्ट्राॅल, 0.3% लिसाइथिन एवं 0.3 से 1.2% वसीय अम्ल होते हैं।

नोट:-

  • जठर रस की उच्च अम्लीयता किसके कारण होती है – हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के कारण
  •  पेप्सिन क्या है-एक प्रोटीन-पाचक अर्थात प्रोटिओलाइटिक एन्जाइम और एण्डोपेप्टिडेज होता है।
  •  जठर लाइपेज नामक वसापाचक एन्जाइम-जठर रस में पाया जाता है।
  •  जठर रस का पेप्सिनोजन एन्जाइम -एक निष्क्रिय एन्जाइम होता है।
  •  एमाइलेज तथा डाईसैकराइड-पाचक एन्जाइम कहलाते हैं-कार्बोहाइडेªट्स-पाचक एन्जाइम
  • एण्डोपेप्टिडेसस एवं एक्सोपिप्टिडेसेस एन्जाइम कहलाते हैं-प्रोटीन पाचक एन्जाइम
  •  वसाओं के एस्टर बन्धों को तोड़कर इनका विघटन करने वाले एन्जाइम -लिपिड पाचक एन्जाइम
  •  न्यूक्लीक अम्लों का न्यूक्लिओटाइड मोनोमरो में विखण्डन करने वाला-न्यूक्लिएसेस है।
  •  R.N.A को पचाने वाला-राइबो न्यूक्लिएसेस
  •  D.N.A को पचाने वाला-डी-आक्सी-राइबोन्यूक्लिएसेस
  •  जठर रस में जल की मात्रा-97.99ः के बीच
  •  जठर रस का PHमान-1.0 से 3 के बीच
  •  औसतन लगभग कितना अग्न्याशयिक रस हमारी ग्रहणी द्वारा प्रतिदिन मुक्त किया जाता है-1.2 से 1.5 लीटर
  •  अग्न्याशय रस का PH मान-7.5 से 8.3
  •  अग्न्याशयिक रस में कितना जल होता है-96%
  • भोजन में कोलेस्ट्राल किस रूप में होता है-मुख्यतः कोलेस्टेरिल एस्टरों के रूप में
  •  फास्फोलाइपेज का कार्य है-फास्फोलिपिड्स से वसीय अम्लों को पृथक करना।
  •  कार्बोक्सीपेप्टिडेज होता है-जिंकयुक्त एक्सोपेप्टिडेज
  •  पित्त  का PHमान-7.6 से 8.6
  • मनुष्य में लगभग कितनी मात्रा में पित्त का स्रावण प्रतिदिन होता है-800 से 1000 मिली
  •  पित्ताशय से ग्रहणी में मुक्त होने वाले पित्त में होता है-लगभग 92% जल, 6% पित्त लवण 0.3% पित्त रंग एवं पित्त अम्ल 0.3-0.9% कोलेस्ट्राल 0.3% लिसाइथिन 0.3-1.2% वसीय अम्ल,
  •  पित्त लवणों में पाया जाता है-सोडियम क्लोराइड एवं सोडियम बाई कार्बोनेट नामक अकार्बनिक तथा सोडियम ग्लाइकोलेट तथा सोडियम टाॅरोकोलेट नामक कार्बनिक लवण।
  •  प्राटीन पाचन को पूरा करने वाले कई एक्सोपेप्टियोज एन्जाइमों का सामूहिक नाम-इरेप्सिन
  •  हमारे भोजन में कार्बोहाइडेट, किस रूप में होते हैं-पाली सैकराइड, डाईसैकराइड तथा मोनोसैकराइड के रूप में
  • पाॅली सैकराइड का उदाहरण है-मण्ड या ग्लाइकोजन
  •  मोनो सैकराइड का उदाहरण है-ग्लूकोज एवं फ्रक्टोज
  •  डाईसैकराइड का उदाहरण है-सुक्रोस तथा लैक्टोस
  • मनुष्य के दाँतों का प्रमुख भाग होता है-डेन्टीन
  • अमाशय के दीवार के भीतरी सतह की एपीथिलियम होती है-स्तम्भी
  •  मनुष्य के आमाशय में अन्तिम या दूरस्थ भाग को कहते हैं-पाइलोरिक
  •  पित्त का प्रमुख कार्य है-पाचन के लिए वसा का इमल्सीकरण
  • आन्त्रीय ग्रन्थियों द्वारा स्रावित हार्मोन कोलीसिस्टोकाइनिन का कार्य- पित्ताशय के संकुचन का प्रेरण तथा अग्न्याशययी रस के स्रावण का प्रेरण
  • पचे हुए भोजन के अवशोषण की कार्यात्मक इकाइयाँ-विलाई है
  •  मनुष्य में प्रोटीन्स का पाचन कहा से प्रारम्भ होता है- आमाशय से
  •  समस्त पाचन एन्जाइम होते हैं-जल-अपघटक
  •  रेनिन, ट्रिप्सिन एवं एमाइलेज का समान लक्षण-प्रोटीन्स होते हैं।
  •  अग्न्याशय से मुख्यतः स्रावित होते हैं-तीन पाचन एन्जाइम तथा दो हारमोन
  •  वसा-पाचक एन्जाइमों को कहते हैं-लाइपेजेज
  •  आमाशय में PH होता है-लगभग तीन
  •  एमाइलेज द्वारा स्टार्च का पाचन मुख्यतः कहाँ होता है-ग्रहणी में
  •  आमाशय में भोजन के बैक्टीरिया को कौन नष्ट करता है-HCL
  •  आमाशय की दीवार का पेशीय संकुचन कहलाता है-पेरिस्टाल्सिस
  •  पल्प कैविटी  किसमें पायी जाती है-दाँतों में