मोहन दास करमचंद गांधी (1869-1948 ई.) 9 जनवरी को दक्षिण अफ्रीका से भारत वापस आए। वे 1893 ई0 में एक भारतीय मुस्लिम व्यापारी दादा अब्दुला का मुकदमा लड़ने दक्षिण अफ्रीका गए थे। वहाॅ पर उन्होंने भारतीयों के साथ हो रहे भेदभावपूर्ण व्यवहार को देखा। एक बार जब वे दक्षिण अफ्रीका में ट्रेन से यात्रा कर रहे थे तो उसी दौरान मेरित्जबर्ग नामक स्टेशन पर एक अंगे्रज ने धक्का देकर उन्हें ट्रेन से बाहर निकाल दिया। इस घटना से गांधीजी को एक नई दिशा मिली।

अपने दक्षिण अफ्रीका प्रवास के दौरान ही गांधीजी ने भारतीयों के प्रति अपनायी जाने वाली रंगभेद की नीतियों के विरूद्ध संघर्ष प्रारंभ किया। अपने आंदलोन को संगठनात्मक रूप प्रदान करने तथा तथा दिशा देने हेतु उन्होने कई संस्थाओं, जैसे- नटाल इंडियन कांग्रेस, टाॅलस्टाय फर्म (जर्मन शिल्पकार मित्र कालेन बाग की सहायता से) तथा फीनिक्स आश्रम की स्थापना की। दक्षिण में ही गांधी जी ने इंडियन ओपनीयन नामक समाचार पत्र का प्रकाशन भी किया। गांधीजी द्वारा दक्षिण अफ्रीका में सफलतापूर्वक आंदोलन का संचालन किए जाने के परिणामस्वरूप वहां की सरकार द्वारा सन् 1914 ई. तक अधिकांश भेदभावपूर्ण काले कानूनों को रद्द कर दिया गया। यह गांधीजी की प्रथम सफलता थी जो उन्होनें अहिंसा के मार्ग द्वारा प्राप्त की।

1915ई. में भारत आने के पश्चात् ही गांधीजी का भारतीय राजनीति में पदार्पण हुआ। गंाधीजी ने गोपालकृषण गोखले को अपना राजनीतिक गुरू माना। इस समय प्रथम विश्वयुद्ध चल रहा था तथा गांधीजी ने इस युद्ध में अंग्रेजों का समर्थन किया और भारतीयों को सेना में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया। इसी कारण से उन्हें ’भर्ती करने वाला सार्जेट’ कहा जाने लगा। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें केसर-ए हिंद की उपाधि से विभूषित कया। कांगधी का मानना था कि प्रथम विश्व युद्ध में सहयोग के बदले भारतीयों को स्वराज की प्राप्ति होगी।

गांधीजी ने 1915 ई0 में अहमदाबाद में साबरमती आश्रम की स्थापना की। इसका उद्ेश्य रचनात्मक कार्यों को प्रोत्साहन देना था। गांधीजी का भारतीय राजनीति में एक प्रभावशाली नेता के रूप में उदय उत्तर बिहार के चंपारण आंदोलन, गुजरात के खेड़ा कृषक आंदोलन तथा अहमदाबाद के श्रमिक विवाद का सफलतापूर्वक नेतृत्व करने के पश्चात् हुआ। जहाॅ चंपारण और खेड़ा आंदोलन कृषकों की समस्याओं से सम्बन्धित थे तो वहीं अहमदाबाद के श्रमिकों के विवाद की पृष्ठभूमि में काॅटन टेक्सटाइल मिल-मालिक और मजदूरों के बीच मजदूरी बढ़ाने तथा प्लेग बोनस दिए जाने से संबधित विवाद था। अहमदाबाद में प्लेग की समाप्ति के पश्चात् मिल-मालिक बोनस को समाप्त करना चाहते थे। मिल मालिकों ने केवल 20 प्रतिशत बोनस को स्वीकार किया। और धमकी दी कि जो कर्मचारी यह बोनस नहीं स्वीकार करेगा उसे नौकरी से निकाल दिया जाएगा। गांधीजी 35 प्रतिशत बोनस दिए जाने की मजदूरों की माॅग का समर्थन करते हुए स्वयं हड़ताल पर बैठ गए। इस पूरे प्रकरणपर न्यायाधिकरण ने भी मजदूरों की माॅंग को सही ठहराते हुए 35 प्रतिशत बोनस दिए जाने का आदेश दिया। इन मिल मालिकों में से एक गांधी जी के मित्र अम्बालाल साराभाई भी थे, जिन्होने साबरमती आश्रम के निर्माण हेतु बहुत अधिक मात्रा मे धन दान दिया था। अम्बालाल साराभाई की बहन अनुसुईया भी अहमदाबाद मजदूर आंदोलन मे गांधी के साथ थीं।

सत्याग्रह के आंरभिक प्रयोग की सफलता ने गांधी जी को जनसाधारण के समीप ला कर खड़ा दिया। गांधीजी के आदर्शों दार्शिनिक चिंतन विचारधारा और जीवन-पद्धिति ने उन्हें साधारण जनता के जीवन के साथ एकीकृत कर दिया। वे गरीब, राष्ट्रवादी एवं विद्रोही भारत के प्रतीक बन गये। हिन्दू-मुस्लिम एकता स्त्रियों की समाजिक स्थिति को सुधारने तथा छुआछूत के विरूद्ध कार्य करना उनके अन्य प्रमुख क्ष्यों में सम्मिलित थे। 1919 ई0 के जलियावाला बाग हत्याकाण्ड ने ब्रिटिश सरकार के प्रति गांधीजी के दृष्टिकोण को परिवर्तित कर दिया।