किसान क्रेडिट कार्ड योजना (KCC)

कृषकों को संगठित बैंकिंग प्रणाली तथा कम खर्चीले तरीके से पर्याप्त और यथा समय ऋण सहायता प्रदान करने के लिए अगस्त 1998 ई0 में किसान क्रेडिट कार्ड योजना चलाई गयी। इस योजना का कार्यान्वयन वाणिज्यिक बैंको, केन्द्रीय सहकारी बैंको और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के माध्यम से किया जा रहा है। नाबार्ड ने 2004 ई0 में इस योजना को संशोधित रूप प्रदान किया और अब इस योजना द्वारा दीर्घकालीन ऋण प्रदान किए जा रहे हैं।

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योजना की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

(1) रू0 5000 अथवा अधिक के उत्पादन ऋण के लिए पात्र किसान, किसान क्रेडिट कार्ड प्राप्त करने के हकदार हैं, यह कार्ड किसानों को उनकी भूमि के आधार पर जारी किए जाते हैं।
(2) पात्र किसानों को किसान कार्ड और पासबुक अथवा कार्ड-सह-पासबुक उपलब्ध कराई जाती है।
(3) इनका उपयोग किसान खेती के लिए बीज, उर्वरक और कीटनाशक आदि जरूरतों की वस्तुओं को खरीदने के लिए करते हैं।
(4) प्रचलनात्मक जोत ;व्चमतंजपवदंस संदक ीवसकपदहद्धए फसल पैटर्न और वित्त श्रेणी ;ैबंसम व िपिदंदबमद्ध के आधार पर सीमा निर्धारित की जाती है।
(5) बैंकों के विवेक पर उपसीमाएं निर्धारित की जाती हैं।
(6) वार्षिक समीक्षा की शर्त पर कार्ड 3 वर्ष के लिए वैध होता है।
(7) प्रत्येक आहरण का भुगतान 12 महीने में करना होता है।
(8) प्राकृतिक आपदाओं के कारण खराब हुई फसलों के मामले में ऋण को बदलना/पुनर्निर्धारण की भी अनुमति है।
(9) लागत वृद्धि फसल पैटर्न आदि में परिवर्तन होने पर ऋण की सीमा को बढ़ाया जा सकता है।
(10) भारतीय रिजर्व बैंक के मानदंडों के अनुसार ब्याज की दर आदि में परिवर्तन किया जा सकता है।
(11) जारी करने वाली शाखाओं अथवा बैंक के विवेक पर उसकी अन्य नामित शाखाओं के माध्यम से प्रचालन ;व्चमतंजपवदेद्ध किया जाता है।
(12) कार्ड और पास बुक साथ होने पर स्लिप/चैक के माध्यम से आहरण किया जाता है।

कृषि कीमत नीति (Agriculture Price Poliey)  

कृषि मूल्यों के व्यापक उतार-चढ़ाव उत्पादक एवं उपभोक्ता दोनों के हित में नहीं होता है और ऐसे में कर भार कृषि कीमतों को नियंत्रित करने का प्रयास करती है। यदि किसी वर्ष उत्पादन आवश्यकता से अधिक हो जाता है तो सरकार अतिरिक्त उत्पादन को क्रय करके बजार स्टाॅक के रूप में FCI के खाताओं में सुरक्षित रख देती है और जिस वर्ष उत्पादन अपेक्षाकृत कम होता है इस वफर स्टाॅक का प्रयोग करके मांग को पूरा किया जाता है। भारत सरकार द्वारा निम्नलिखित प्रकार की कीमतें घोषित की जाती है-

वसूली कीमत (Purching Price) :- वसूली कीमत से तात्पर्य उस कीमत से होता है जिस कीमत पर सरकार मण्डी से कृषकों तथा व्यापारियों से उनकी उपज को खरीदती है जिससे कमजोर अन्य वर्ग के लोगों को उचित कीमतों पर न्यूनतम आवश्यकता मात्रा में खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा सके।

जारी कीमत (Issue Price) :- जारी कीमते उन कीमतों को कहते हैं जिस पर सरकार खाद्यान्न आदि वस्तुएं उपभोक्ताओं को उचित कीमत की दुकानों से उपलब्ध कराती है। सामान्यतः यह कीमत क्रय कीमत की तुलना में कम होती है। यह समाज के कमजोर वर्गों के लिए निर्धारित की जाती है। इस कीमत के होने वाली क्षति की पूर्ति सरकार द्वारा विक्रेताओं को अनुदान देकर की जाती है।

न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price) MSP :-

सामान्यतः न्यूनतम समर्थन कीमत द्वारा सरकार किसानों को यह आश्वासन देती है कि खाद्यान्नों का मूल्य इस न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे नही गिरेगा। कृषिगत उत्पादन को प्रोत्साहन देने हेतु सरकार द्वारा 20 महत्वपूर्ण फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य अति उत्पादन की स्थिति में उपज के मूल्य को गिरने से रोकना तथा इस प्रकार किसानों के हितों का संरक्षण करना है। जब कृषि उपज का बाजार मूल्य घोषित समर्थन मूल्य से नीचे चला जाता है तो सरकार स्वयं समर्थन मूल्य पर उपज खरीदने को तैयार रहती है, इससे बाजार में सम्बन्धित उपज का मूल्य सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे नही जा पाता तथा किसानों को अति उत्पादन की स्थिति में मूल्य गिरने की आशंका नही रहती है तथा वह अधिक से अधिक उत्पादन करने को प्रेरित होता है। ध्यान रहें कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की संस्तुति कृषि लागत एवं मूल्य आयोग द्वारा वर्ष में दो बार (रवी एवं खरीफ) की जाती है।

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (Commission for Agriculture Coast and Price) CACP :- कृषिगत उत्पादों का मूल्य निर्धारित करने के लिए खाद्य मूल्य नीति समिति सन् 1964 ई0 की संस्तुति के आधार पर 1965 ई0 में कृषि मूल्य आयोग (Agriculturl Price Commission) की स्थापना की गयी। सन् 1985 ई0 में APC का नाम बदलकर कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) कर दिया गया। इस आयोग का मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है।

(CACP) विभिन्न उत्पादों के सम्बन्ध में राज्यों के परामर्श से विभिन्न राज्यों के लिए उत्पादन लागत सम्बन्धी आकड़ों का विश्लेषण करता है। राज्य के मुख्य मंत्रियों की बैठक के पश्चात् न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की जाती है।

लागत विचार धारा :- देश में सामान्य फसलों के लिए उत्पादन की लागतें भिन्न-भिन्न उत्पादकों के लिए भिन्न-भिन्न होने के कारण एक मानक के रूप में लागत के स्तर को अपनाने में बहुत कठिनाई होती है फलतःCACP द्वारा प्रयुक्त कुछ महत्वपूर्ण लागत अवधारणाएं C-2 और C-3 है-

C-2 लागत :- C-2 लागत में वास्तविक मालिक द्वारा उत्पादन के वहन किए गये नगद और वस्तु रूप में सभी वास्तविक खर्चें तथा पट्टे पर ली गयी जमीन के लिए अदा किया गया किराया और पारिवारिक श्रम का लगाया गया मूल्य तथा स्वाधिकृत पूंजी सम्पत्तियों के मूल्यदर ब्याज और स्वाधिकृत जमीन का किराया मूल्य शामिल है।

C-3 लागत :- इसमें लागत C-2  किसानों को प्रबन्धकीय प्रारम्भिक का हिसाब लगाने के लिए C-2 लागत का 10 प्रतिशत शामिल करते हैं।

उत्पादन की लागतों का आकलन प्रति क्विंटल तथा प्रति हेक्टेयर दोनों आधारों पर लगाया जाता है। चूंकि राज्यों में लागतों में अन्तर बहुत ज्यादा पाया जाता है। इसलिए CACP  ने MSP का निर्धारण C-2 लागत के आधार पर करने की सिफारिस की।

मूल्य स्थिरीकरण कोष (Price Stabillsation fund-PSP) :- चाय, काॅफी, रबर व तम्बाकू के मूल्यों में होने वाले उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के उद्देश्य से आर्थिक मामलों पर मंत्रिमंडलीय समिति ने मूल्य स्थिरीकरण कोष की स्थापना के प्रस्ताव को 20 फरवरी 2003 को अनुमोदित किया। चार हेक्टेयर की एक भी जोतों वाले धारक इस योजना का लाभ उठा सकते हैं। मूल्य स्थिरीकरण में लिए बैंचमार्क (Bench Mark) मूल्य का निर्धारण विगत सात वर्षों के अन्तर्राष्ट्रीय मूल्य के आधार पर चल मध्य (Seven Yearly Moving Average of Inter National Price) के द्वारा निर्धारित किया जाता है। बाजार मूल्य के इससे 20ः तक अधिक या कम होने पर कोई कदम नही उठाया जाता है किन्तु मूल्य में 20ः तक अधिक की कमी आने पर उत्पादकों को इस भाव से राहत प्रदान की जाती है। इस प्रकार बाजार मूल्य के बेंच फार्म मूल्य के 20ः के भी अधिक होने पर उत्पादकों को अतिरिक्त राशि कोष में जमा करनी पड़ती है।

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