अधिकतर जीवनधारियों R.N.A एक सूत्री होता है। वुन्ड ट्यूमर वायरस तथा रियोवायरस आदि में दो सूत्री आर0एन0ए0 पाया जाता है। आर0एन0ए0 की पाॅलीन्यूक्लियोटाइड्स शृंखला का निर्माण न्यूक्लियोटाइड्स के मिलने से होता है। न्यूक्लियोटाइड्स का निर्माण राइबोज शर्करा अणु, नाइट्रोजन बेस तथा फास्फोरिक अम्ल अणु से होता है। आर0एन0ए0 अधिकतर आनुवांशिक सूचनावाहक होता है और प्रोटीन संश्लेषण में भाग लेता है। अधिकांश वाइरस आर0एन0ए0 आनुवांशिक होता है। आर0एन0ए0 कोशिकाद्रव्य केन्द्रक तथा केन्द्रिका में पाया जाता है। आर0एन0ए0 का संश्लेषण डी0एन0ए0 पर होता है।

आर0एन0ए0 चार प्रकार के होते हैं।

(1) संदेषवाहक आर0एन0ए0:-  का लगभग 5-10 प्रतिशत होता है। इसकी संरचना डी0एन0ए0 श्रंखला की पूरक होती है। इसमें पैतृक सूचनाएॅ कोडोन के रूप में अंकित होती है। इसका अणुभार 25000 से 10,000,000 तक होता है। एम0आर0एन0ए0 एक विशिष्ट प्रोटीन संशेलषण हेतु टेम्पलेट की तरह कार्य करता है। यह बहुत कम समय तक जीवित रहता है।

(2) राइबोसोमल आर0एन0ए0 :-  कुल आर0एन0ए0 का लगभग 75 प्रतिशत होता है। यह राबोसोम में पाया जाता है। यह एक शंृखला से बना होता है तथा स्थान-स्थान पर लूप बना लेता है। इसका अणुभार 35,000 से 10,000,000 तक होता है।

(3) ट्रान्सफर आ0एन0एन :-  कुल आर0एन0ए0 का लगभग 20 प्रतिशत होता है। ये आकार में सबसे छोटे होते हैं। इनका अणुभार 23000 से 30000 तक होता है। इसे घुलनशील आर0एन0ए0 भी कहते हैं। यह विशिष्ट प्रकार के अमीनों अम्लों को राइबोसोम्स पर स्थित एम0आन0एन0ए0 तक पहुँचता है जिससे अमीनो अम्ल पेप्टाइड बन्धों द्वारा परस्पर मिलकर प्रोटीन संश्लेषण कर सकें।

(4) वाइरल आर0एन0ए0 :- सभी पादप एवं कुछ जन्तु वाइरस में आुनवांशिक पदार्थ आर0एन0ए0 होता है, अतः इसे आनुवांशिक आर0एन0ए0 कहते हैं।

प्रोटीन संष्लेशण- राइबोसोम पर होता है। यह निम्न चरणों में पूरा होता है।
1- डी0एन0ए0 से अमीनो अम्ल संयोजन के क्रम की सूचना आर0एन0ए0 में कोडोन के रूप में व्यवस्थित हो जाती है। इसे सूचनावाहक आर0एन0ए0 कहते हैं।

2- सूचनावाहक आर0एन0ए0 केन्द्रक से कोशिकाद्रव्य में पहॅुचकर राइबोसोम्स से संलग्न हो जाता है। जो टेम्पलेट के रूप में अमीनो अम्लों के लिए एक साॅचे का कार्य करता है।

3- केन्द्रक से ट्रांसफर आर0एन0ए0 बनकर कोशिकाद्रव्य में आ जाते हैं। ये अमीनो अम्ल को टैम्पलेट आर0एन0ए0 पर पहँुचाते हैं। ट्रान्सफर आर0एन0ए0 से क्रिया करने से पहले अमीनो अम्ल सक्रिय हो जाते हैं। इसके लिए आवश्यक ऊर्जा ए0टी0पी0 से प्राप्त होती है।

4- टैम्प्लेट आर0एन0ए0 पर पहॅुचकर अमीनो अम्ल अपने विशिष्ट क्रम में संयोजित हैं। अमीनों अम्ल पेप्टाइड बन्धन द्वारा आपस में जुड़ जाते हैं। और प्रोटीन अणु बन जाता है।

5- प्रोटीन अणु संश्लेषण के पश्चात् राइबोसोम्स से पृथक हो जाता है और जैवकि क्रियाओं में भाग लेने लगता है। यह एन्जाइम की तरह कार्य करके लक्षणों का निर्धारण करता है।

प्लाजिड्स :-  जीवाणु कोशिकाओं में वृत्ताकार गुणसूत्र केन्द्रकीय भाग बनाते हैं। इसके अतिरिक्त कोशिका में अनेक छोटे-छोटे डी0एन0ए0 अणु होते हैं जिन्हें प्लाज्मिड्स कहते हैं।

ये निम्न प्रकार के होते हैं।
1- प्लाज्मिड्स :-  इन्हें लिंग कारक कहते हैं जो संयुग्मन में महत्वपूर्ण होते हैें।
2-  प्लाज्मिड्स :-  इन पर औषधियों एवं प्रतिजैविक पदार्थों के लिए प्रतिरोधी जीन होते हैं।
3- COL प्लाज्मिड्स :-  ये सुग्राही कोशिकाओं को नष्ट करने वाले कोल्सीन प्रोटीन के जीन होते हैं।

प्लाजिड्स का प्रयोग आनुवांशिक अभियांत्रिकी में किया जाता है। इनका उपयोग मानव इन्सुलिन, हिपेटाइटिस ठ बैक्सीन आदि बनाने में किया जाता
लैम्पबुष गुणसूत्र- ये अत्यधिक लम्बे 100μ× 20 μ होते हैं। इन्हें फ्लेमिंग ने सबसे पहले देखा, रूकर्ट ने नाम दिया ये जन्तुओं के प्राथमिक अण्डज में विशेष रूप में पाये जाते हैं।

जीनोम :- युग्मकों में पाये जाने वाले गुणसूत्रों की संख्या को प्रदर्शित करते हैं। कोशिकाओं में पाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के सभी गुणसूत्रों के एक समूह को जीनोम कहते हैं। इसे अगुणित संख्या भी कहते हैं। जैसे मनुष्य का जीनोम या अगुणित संख्या 23 गुणसूत्र होते हैं। मानव कोशिकाओं में 46 गुणसूत्र पाये जाते हैं।

हिस्टोन प्रोटीन :-  गुणसूत्र में न्यूक्लिक अम्ल डी0एन0ए0, आर0एन0ए0 हिस्टोन तथा नान हिस्टोन प्रोटीन्स होती हैं। हिस्टोन क्षारीय प्रोटीन्स होती है। गुणसूत्र में 5 प्रकार की हिस्टोन प्रोटीन्स होती है- H2A, H2B, H2H4 तथा H1 विभिन्न जातियों के गुणसूत्रों में H2A,H2 तथा H4 प्रोटीन लगभग समान होती हैं और ये मिलकर अष्टभागी अणु बनाती है।

डी0एन0ए0 पाॅलीमरेज एन्जाइम :- कोर्नबर्ग ने अपने प्रयोगों में यह दिखाया कि यदि परखनली में पहले से ही कुछ डी0एन0ए0 उपस्थित हों तो कुछ जीवाणुओं से पृथक किया गया एक एन्जाइम कोशिकाओं के बाहर परखनली में डी0एन0ए0 के संश्लेषण को उत्प्रेरित कर देता है। इस एन्जाइम को ही डी0एन0ए0 पाॅलीमरेज नाम दिया गया।

द्विगुणन मूल :-  डी0एन0ए0 अणु का द्विगुणन इसके कुछ निर्दिष्ट स्थानों पर ही प्रारम्भ होता है जिन्हें द्विगुणन मूल कहते हैं।
द्विगुणन मूल :-  वैज्ञानिक वाल्बियानी ने काइरोनोमस नामक कीट के डिम्भक की लार ग्रन्थि की कोशिकाओं में

सामान्य गुणसूत्रों से लगभग सौ गुना अधिक लम्बा और काफी मोटा गुणसूत्र देखा, जिसे ही असामान्य गुणसूत्र कहा गया।
ईस्केरीकिया कोलाई नामक जीवाणु के केन्द्रकाभ या न्यूक्लिटाइड में स्थित अकेला डी0एन0ए0 अणु लगभग (1700μ 1.7MM )लम्बा होता है जबकि जीवाणु स्वयं लगभग 2μ 0.002 उउ ही लम्बा होता है।

हमारे शरीर की प्रत्येक कोशिका के केन्द्रक में डी0एन0ए0 के 46 (23 जोड़ी) अणु होते हैं जिनकी औसत लम्बाई 4.5 सेमी ओर कुल लम्बाई 2 मीटर होता है, जबकि स्वयं केन्द्रक का व्यास लगभग 4μ से 10 μ (0.004 जव 0.01 MM) ही होता है।

नोट-

  • डी0एन0 तथा आर0एन0 में क्या समानता है- डी0एन0ए0 तथा आर0एन0ए0 पाॅली न्यूक्लियोटाइड् से बने हेते हैं।
  • उस कोशिकांग का नाम, जो प्रोटीन संश्लेषण में भाग लेता है- राइबोसोम्स।
  • डी0एन0ए0 के दोनों रज्जुकों के बीच की दूरी होती है- 2।0
  • हमारे शरीर में कोशिकाएॅ होती है- लगभग 1014
  • इनमें उपस्थित डी0एन0ए0 की कुल लम्बाई है- 2*1014 मीटर।
  • हमारी कोशिकाओं की सबसे लम्बी डी0एन0ए0 अणु की लम्बाई है- 85 मिलीमीटर।
  • जो प्लाज्मिड्स लिंग कारक होते है- F प्लाज्मिड्स।
  • ड्रासोफिला की लार ग्रन्थियों में बहुत लम्बे एवं चैड़े गुणसूत्र बाल्बियानी ने देखे, जिन्हें नाम दिया गया- पोलीटीन गुणसूत्र।
  • डी0एन0ए0 द्विगुण अर्द्धसंरक्षी अर्द्ध असतत तथा एकदिश तथा द्विदिश दोनों ही प्रकार का होता है।
  • डी0एन0ए0 के एक स्टैण्ड पर डी0एन0ए0 द्विगुणन छोटे-छोटे टुकड़ों के जुड़ने से होता है। इन टुकड़ों को ओकाजाकी टुकड़े कहते हैं।
  • डी0एन0ए0 के जिस स्टैण्ड का निर्माण संतत संश्लेषण द्वरा होता है उसे लीडिंग स्ट्रैण्ड कहते हैं। यह 51-31 दिशा वाला स्ट्रैण्ड होता है।
  • डी0एन0ए0 द्विगुणन के समय जब डी0एन0ए0 अणु का कुण्डलन खुलता है तब जैसे-जैसे नये स्टैªण्डों का निर्माण होता जाता है कुण्डलन आगे की ओर खुलता जाता है। यह रचना काॅटे के समान दिखायी पड़ती है जिसे रेप्लिकेशन कांटा कहते हैं।
  • जब गुणसूत्रों को इनके विशिष्ट स्टेनों से जैसे-एसीटो कार्मिन या क्षारीय फुक्सिन से रँगा जाता है जब इसमें गाढ़ी एवं हल्की पट्टियाँ दिखायी पड़ती हैं। एमिल हेट्ज ने गहरे रंग की पट्टियों को हेटरोक्रोमेटिन तथा हलके रंग की पट्टियों वाले भाग को यूक्रोमेटिन कहा है।