जीवन में आहार का क्या महत्त्व है? आयुर्वेद क्या कहता है, कैसे भोजन करे |

जीवन में आहार का क्या महत्त्व

उत्तम स्वास्थ्य के निर्धारक तत्त्वों में आहार प्रमुख है। युक्ति संगत आहार के बिना स्वस्थ रहना असम्भव है। हमारे उपनिषद आदि ग्रन्थों में तो आहार को ही जीवन कहा गया है‘अन्नं वै प्राणाः।‘ वास्तव में आहार स्वयं में औषधि है। इससे शरीर के दोष, धातु और मलों का प्रीणन (पोषण) और प्राणों का आप्यायन (वृद्धि व पुष्टि) होता है। इसके विज्ञान को जानकर हम अनेक व्याधियों का चिकित्सा कर सकते हैं। आहार का प्रभाव केवल शरीर पर ही नहीं मन पर भी समान रूप से पडता है। लोकप्रसिद्ध भी है- जैसा खाएं अन्न, वैसा बने मन। स्पष्टतः आहार हमारे शरीर व इन्द्रियों को पष्ट करता है, प्राणों को बलवान् बनाता है और अन्ततोगत्वा मन की प्रवृत्तियों का भी पोषण करता है।

आयुर्वेदानुसार सुस्वास्थ्य के लिए आहार को महत्त्वपूर्ण माना गया है, अत: व्यक्ति को स्वस्थ रहने के लिए आहार से सम्बन्धित ज्ञान का होना अत्यावश्यक है।

आहार हमारे स्वास्थ्य के लिए तभी हितकर सिद्ध होगा, जब हम इसका सेवन मात्र स्वाद की दृष्टि से न करके स्वास्थ्य की दृष्टि से करेंगें। सदा स्मरण रखना चाहिए कि ‘हमारा जीवन खाने के लिए नहीं, अपितु खाना जीवन जीने के लिए है।’ एक किंवदंती है कि- ऋषि चरक ने प्रश्न किया- कौन व्यक्ति स्वस्थ रहता है? इसके उत्तर में वाग्भट नामक विद्वान् ने कहा-

“हितभुक्, मितभुक्, ऋतभुक्’- अर्थात् अपनी प्रकृति के अनुसार हितकारी, उचित मात्रा में और उचित प्रकार से कमाया (अर्जित) भोजन करने वाला व्यक्ति ही स्वस्थ रहता है। इसके विपरीत भोजन करने वाला अनेक कष्टकर रोगों से ग्रस्त हो जाता है। अपनी जीभ पर नियन्त्रण रखने वाला जितेन्द्रिय व्यक्ति ही ऐसा आचरण कर सकता है।

आयुर्वेद के अनुसार भोजन कब और कैसे करें?

आहार सेवन के लिए कुछ विशेष बातें चरक ऋषि ने बताई है; जिन्हें आदर्श आहार-संहिता कहा गया है।

  • भोजन स्निग्ध (उचित मात्रा में शुद्ध तैल, घृतादि से युक्त) होना चाहिए।
  • भोजन ताजा व गुनगुना होना चाहिए न कि डिब्बाबन्द पैक व सड़ा-गला।
  • भोजन सुन्दर, एकान्त व शान्त स्थान पर बैठ कर करना चाहिए।
  • उच्च स्वरयुक्त (गाना बजाना, टीवी तथा वाद्ययन्त्र) वाले स्थान पर बैठकर भोजन नहीं करना चाहिए
  • भोजन करते समय बात नहीं करना चाहिए
  • उचित आसन पर पालथी मारकर, बैठकर भोजन करना करना उत्तम मन गया है 
  • हमेशा शान्त व प्रसन्न मन से भोजन ग्रहण करना चाहिए। भोजन भोजन के प्रति प्रशंसा का भाव व सकारात्मक सोच रखनी चाहिए 
  • भोजन का समय निश्चित होना चाहिए। शास्त्र में लिखा भी ‘कालभोजनम्, आरोग्यकराणाम्’ अत: सुबह, दोपहर व रात्रि में पर शरीर की आवश्यकतानुसार व उचित मात्रा में भोजन ग्रहण करना चाहिए 
  • भोजन को चबा-चबाकर, धीरे-धीरे खाना चाहिए। इससे भोजन का सही से पाचन होता है 

इस प्रकार पथ्य और उचित आहार लेने वाला व्यक्ति पर ही नहीं होता, यदि किसी कारणवश रोगी हो भी जाए, तो परहेज पूर्बक भोजन से रोग बढ़ता नहीं और स्वतः ठीक हो जाता है। इस प्रकार किसी औषधि की आवश्यकता नहीं होती। इसके विपरीत यदि मनुष्य अच्छी औषधि का सेवन तो करता है, परन्तु पथ्य-परहेज नहीं करता रोग ठीक नहीं होता, उसकी औषधि व्यर्थ हो जाती है। गलत आहार विहार (अपथ्य) रोग बढ़ाने में कारण है और कारण को दूर किए बिना रोग नहीं नष्ट हो सकता। इसीलिए आयुर्वेद में कहा गया है कि-

‘परहेज करने रोगी को औषधि की क्या आवश्यकता? और परहेज न करने वाले रोगी को भी आषाध सवन स क्या लाभ?’

चरक ऋषि ने भी कहा है कि- ‘अन्न प्राणियों के लिए प्राण है, इसीलिए लोग अन्न की ओर दौड़ते हैं। हमारा वर्णप्रसाद (रंग का निखार), सुन्दर स्वर, जीवन, प्रतिभा, सुख, तुष्टि, पुष्टि, बल और मेधा- ये सभी अन्न पर ही आश्रित हैं।

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