अरब साझा बाजार
(ACM)

इसकी स्थापना 1965 ई0 में हुई। इसका मुख्यालय ईराक की राजधानी बगदाद है। इसे यूरोपियन साझा बाजार के आधार पर विकसित किया गया है जिसमे ईराक, मिश्र, सीरिया एवं जापान शामिल हैं परन्तु अब यह अस्तित्वहीन हो चुका है।

केन्द्रीय अमेरिकी साझा बाजार

स्थापना 1960 ई0 में हुई। यह भी यूरोपियन साझा बाजार के आधार पर स्थापित किया गया, मुक्त बाजार क्षेत्र है। जिसका मुख्यालय पराग्वे में है।

भारत की व्यापारिक नीति

वर्ष 1991 ई0 के बाद भारत की व्यापारिक नीति में व्यापाक परिवर्तन हुये। आयात प्रतिस्थापन एवं निर्यात संवर्धन को बढ़ावा दिया गया। 1995 ई0 में WTO के गठन के साथ ही चरणबद्ध तरीके से मात्रात्मक प्रतिबन्ध को घटाया गया। व्यापारिक क्षेत्र में कई सुधार किये गये। जिसमें चालू खातू एवं व्यापार खाते को पूर्ण परिवर्तनीय बनाया गया, और इसी सम्बन्ध में तारापोर समिति का गठन किया गया।

भारत में व्यापक नीतियों का मुख्य उद्देश्य उदारीकरण के बाद विश्व व्यापार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाना। 27 अगस्त 2009 को भारत की नई विदेशी व्यापार नीति 2009-2014 घोषित हुई। इस नई विदेशी व्यापार नीति के उद्देश्यों का वर्गीकरण दो भागों में किया जा सकता है-
1. अल्प कलाीन उद्देश्य 2. दीर्घ कालीन उद्देश्य

व्यापारिक नीति का अल्पकालीन उद्देश्य निर्यातों में कम होने वाली प्रवृत्ति को समाप्त करके उसमें 15 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि लाना था। तथा यह लक्ष्य निर्धारित किया गया था कि भारत 200 बिलियन डालर के निर्यात के लक्ष्य को प्राप्त करेगा।

नई व्यापारिक नीति के दीर्घ कालीन उद्देश्य में वर्ष 2020 तक विश्व व्यापार में भारत के हिस्से को दोगुना करना था। वर्ष 2014 तक निर्यातों में 25 प्रतिशत तक वार्षिक वृद्धि लाना है।

नई व्यापारिक नीति में कुछ क्षेत्रों में विशेष बल दिया गया और विश्व व्यापार में उस दिशा में विस्तार करने और नियार्तों को बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया। ये क्षेत्र कृषि, हस्तशिल्प, हथकरघा, रत्न एवं आभूषण चमड़ा, समुद्री उत्पाद, इलेक्ट्रानिक्स खेल से सम्बन्धित सामान एवं हरित उत्पाद पर आधारित थे। ऐसे क्षेत्रों को फोकस क्षेत्र के नाम से जाना गया। निर्यातों में वृद्धि लाने के लिए तकनीकी विकास को भी महत्वपूर्ण माना गया।

नई नीति में विशेष कृषि एवं ग्राम उद्योग योजना चलाई गयी। 150 करोड़ रू0 की न्यूनतम सीमा के साथ निर्यात उत्कृष्ट की घोषणा की गयी। हस्तशिल्प की वस्तुओं के निर्यात को बढ़ाने का प्रयास किया गया।

रत्न एवं आभूषण क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए 8 किलो सोना आयात करने की छूट दी गयी तथा विदेशों में प्रदर्शनी इत्यादि लगाने के लिये पांच मिलियन डाॅलर तक के गहने ले जाने की छूट दी गयी। जबकि हीरो के व्यापार को प्रोत्साहित करने के लिये डायमण्ड बोर्ड की स्थापना का उद्देश्य बनाया गया।
चमड़ा उद्योग के विकास के लिये चमड़े से निर्मित कपड़ों के निर्यात मूल्य पर 3 प्रतिशत शुल्क मुक्त आयात का अधिकार होगा।

DEPB योजना वर्ष 2010 तक बढ़ाई गयी थी जिसे फिर 2011 में और आगे के वर्षों के लिये बढ़ाया गया। ऐसे चयनित टाउन जो 750 करोड़ रूपये या उससे अधिक का उत्पादन कर रहे हैं उन्हें टी (TEE) का दर्जा दिया गया।

Export House के लिये निर्यातों का मूल्य 20 करोड़ रूपये, स्टार Export House  के लिये निर्यातों का मूल्य 100 करोड़ रूपये,Trading House  के लिये निर्यातों का मूल्य 500 करोड़ रूपये,Star Trading House के लिये निर्यातों का मूल्य 2500 करोड़ रूपये और प्रीमियम ट्रेडिंग हाउस के लिये 7500 करोड़ रूपये निर्धारित किया गया।

सेवाओं के निर्यात को प्रोत्साहित करने के लिये SFIC (भारत द्वारा सेविंग योजना) प्रारम्भ की गयी। जिसका मुख्य उद्देश्य भारत में सेवा क्षेत्र को अन्तर्राष्ट्रीय रूप में एक ब्राण्ड के रूप में स्थापित करना।

विशेष बायोटेक पार्क की घोषणा नई व्यापारिक नीति में की गयी जो नये उत्पाद तथा नयी टेक्नोलाॅजी को विकसित करने के उद्देश्य से सम्बन्धित है।

भारत में निर्यातों को प्रोत्साहन देने के लिये विशेष आर्थिक क्षेत्र का गठन किया गया। काण्डला भारत का प्रथम SEZ था। 2005 के अधिनियम में काण्डला, सूरत, सान्ताक्रूज, चेन्नई, विशाखापत्तनम, माल्टा एवं नोयडा को विशेष आर्थिक क्षेत्र में घोषित किया गया है। SEZ एक शुल्क मुक्त क्षेत्र होता है जिसे केवल व्यापारिक क्रियाओं शुल्क एवं प्रशुल्क की दृष्टि से एक विदेशी क्षेत्र के रूप में गिना जाता है। इसके द्वारा वस्तु एवं सेवाओं का निर्यात किया जाता है जिसमें कृषि वस्तुयें भी शामिल होती थी।

भारत में अक्टूबर 2011 ई0 में व्यापारिक नीति का पुनरावलोकन किया गया और क्म्च्ठ को समाप्त करके DD में मिला दिया गया।

फोकस योजनाओं के अन्तर्गत  Special Bonus Benefit स्कीम प्रारम्भ की गयी। यह सभी परिवर्तन व्यापारिक नीति के संसाधनों के अन्तर्गत किये गये।

भारत में देशी मुद्रा भण्डार औसत 300 विलियन डाॅलर के आसपास विगत वर्षों में रहा है। मार्च 2010 में 779 विलियन, मार्च 2011 में 304 विलियम डाॅलर, मार्च 2014 में 298 बिलियन डाॅलर रहा है। विदेशी विनिमय कोष की यह स्थिरता विनिमय दरों को एक सीमा में बांधती है।

यदि भारत में विदेशी ऋण का विश्लेषण करें तो इन ऋणों का वर्गीकरण दो भागों में किया जा सकता है-
1. दीर्घ कालीन विदेशी ऋण 2. अल्प कालीन विदेशी ऋण

दीर्घ कालीन ऋण में वाणिज्यिक सुधार बहुपक्षीय उधार तथा अप्रवासी भारतीयों द्वारा शामिल जमा राशियां होती है। वर्ष 2010-11 में भारत के कुल विदेशी ऋणों में इनका हिस्सा 60 प्रतिशत तथा जिसमें सबसे अधिक लगभग 28 प्रतिशत वाणिज्यिक सुधार हुआ था इसके बाद अप्रवासी भारतीयों का जमा और बहुपक्षीय उधार रहा है।

भारत के विदेशी ऋण में निजी भागीदारी अधिक पायी गयी तथा कुल विदेशी ऋण में सरकारी ऋण 24-25 प्रतिशत के बीच पाया गया। यदि ब्रिक्स देशों के सकल राष्ट्रीय आय के रूप में विदेशी ऋण के प्रतिशत को देखें तो चीन में यह सकल राष्ट्रीय आय का 9.3 प्रतिशत है। ब्राजील में 16.9% भारत में 16.9% तथा दक्षिणी अफ्रीका में 12.2% है।

वित्त मंत्रालय के रिपोर्ट के अनुसार दिसम्बर 2013 में भारत का विदेशी ऋण 426 बिलियन डाॅलर था जिसका भारत के GDP में अनुपात 23.3% था इस प्रकार विदेशी ऋण भारतीय अर्थव्यवस्था के बजट पर ब्याज के भुगतान के रूप में एक महत्वपूर्ण देता है।

विश्व व्यापार संगठन के दो महत्वपूर्ण मुद्दे हैं जहां विकसित एवं अल्प विकसित देशों के बीच गतिरोध बना हुआ है।

कृषि में समझौते (AOA) :- 

1. ग्रीन बाॅक्स सब्सिडी
2. ब्लू बाॅक्स सब्सिडी
3. अम्बर बाॅक्स

ग्रीन बाॅक्स सब्सिडी, सब्सिडी की अधिकतम सीमा नहीं होती है अर्थात् पर्यावरण संरक्षण, शोध प्रशिक्षण इत्यादि के रूप में दी जाती है। इसे तटस्थ सब्सिडी भी कहा जाता है।

ब्लू बाॅक्स सब्सिडी किसानों को क्षतिपूर्ति के भुगतान के रूप में दी जाती है परन्तु इसकी अधिकतम सीमा होती है।
अम्बर बाॅक्स सब्सिडी व्यापार की संरचना को विकसित करती है।

विश्व व्यापार संगठन में विवादित मुद्रा छ।ड। और कृषि व्यापार पहुंच का ही नहीं है अपितु मुख्य समस्या इस बात की है कि प्रशुल्क की ऊंची दरों का निर्धारण किस प्रकार किया जाये। एक अन्य विवाद सेवा क्षेत्र का है और इसमें चार कोड पाये जाते हैं- 1,2,3,4 ।

पहले कोड में विश्वविद्यालय अथवा दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से शोध इत्यादि को बढ़ावा देना और सेवाओं का निर्यात करना शामिल है। दूसरे कोड में कर प्राप्त करने और दूसरे क्षेत्र में सेवा प्राप्त करने वाले, सेवा निर्यात करने वाले देश में जाता है। तीसरे क्षेत्र के अन्तर्गत सेवा उपलब्ध कराने वाला देश अन्य देश में अपनी शाखा खोल लेता है। चैथे क्षेत्र में अस्थायी रूप से सेवा प्राप्त करने के लिए अन्य देशों में जाया जाता है।