अभ्यंस/कोटा

इसके अन्तर्गत भुगतान शेष नियंत्रित करने के लिए आयातों की मात्रा निर्धारित की जाती हैं अथवा उनका कोटा निर्धारित कर दिया जाता है जिससे देश उस मात्रा से अधिक वस्तु का आयात नहीं करता है।

भारत में चालू खाते का घाटा वर्ष- 2013-14 में कुछ कम हुआ और इस दौरान यह 32.4 बिलियन डालर पाया गया। जबकि 2012-13 में यह 88.2 डालर था। 2011-12 में 78.2 बिलियन डालर था।

भारत में भुगतान शेष की प्रतिकूलता को दूर करने के लिए 1991 में आर्थिक सुधार के लिए कई कदम उठाये गये थे। जिसमें रूपये का अवमूल्यन किया गया, उदारीकृत विनिमय प्रबंधन प्रणाली स्म्त्डै को प्रारम्भ किया गया था। चालू खाते को पूर्ण परिवर्तनीय बनाया गया था। जबकि पूंजी खातें में परिवर्तनीयता प्रारम्भ की गयी थी। विश्व के निर्यात में भारत के निर्यातों का हिस्सा 2011 में 1.7 प्रतिशत था। 2012 में 1.6 और 2013 में 1.7 प्रतिशत पाया गया जबकि विश्व के आयातों में भारत का हिस्सा वर्ष 2011 ई0 में 2.5 प्रतिशत में एवं 2012 में 2.6 प्रतिशत और 2013 में 2.5 प्रतिशत पाया गया।

भारत के निर्यातों में कृषि एवं सम्बन्धित वस्तुओं का हिस्सा 2012-13 में 13.6 प्रतिशत जो वर्ष 2013-14 में बढ़कर 13.7 प्रतिशत हो गया जबकि विनिर्मित वस्तुओं का भारत के आयातों में हिस्सा 2012-13 में 63.4 प्रतिशत जबकि 2013-14 में 63.5 प्रतिशत था। पेट्रोलियम निर्यातों में हिस्सा 2013-14 में 20.6 प्रतिशत था। अयस्क एवं खनिजों में हिस्सा 2013-14 में 1.8 प्रतिशत था।

भारत का सबसे महत्वपूर्ण निर्यात विनिर्मित वस्तुयें है जो कुल निर्यातों का दो तिहाई है जबकि दूसरा प्रमुख निर्यात पेट्रोलियम पदार्थ है। तीसरे स्थान पर कृषि एवं सम्बन्धित वस्तुयें हैं।

यदि भारत में आयातों का विश्लेषण करें तो खाद्यान्न एवं इनसे सम्बन्धित आयात ये वर्ष 2012-13 में 3.4 प्रतिशत थे। वह 2013-14 में 3.2 प्रतिशत हो गये। जबकि ईधन का आयात में 2012-13 में 36.4 प्रतिशत था। 2013-14 में बढ़कर 40.2 प्रतिशत हो गया।

भारत में आयातों में पूंजीगत वस्तुओं का हिस्सा 2012-13 में 12.8 प्रतिशत था। जो 2013-14 में कम हो कर 12.1 प्रतिशत हो गया। व्यक्तिगत स्तर पर भारत का सबसे प्रमुख आयात प्रेट्रोलियम पदार्थ है।

व्यापार की संरचना का तात्पर्य है कि किन वस्तुओं का आयात व निर्यात किया जा रहा है और यदि भारत की व्यापार की संरचना का विश्लेषण करें तो यह पेट्रोलियम पदार्थों का आयातक व निर्यातक दोनों है।

विदेशी व्यापार की दिशा का तात्पर्य है कि व्यापार किन देशों के साथ किया जा रहा है। भारत में व्यापारिक साझेदारी को मुख्य रूप से उत्तरी OECD, EU, OPEC विकासशील देश एवं अन्य देशों के बीच वर्गीकृत किया जाता है। यदि कुल व्यापार की दिशा का विश्लेषण करें तो यूरोपियन अमेरिका से भारत के व्यापार में कमी की प्रवृत्ति पायी गयी है जबकि विकासशील देशों से भारत का व्यापार बढ़ा है। विगत वर्षों में चीन, भारत का सबसे प्रमुख व्यापारिक साझेदारी के रूप में सामने आया है।

सेवाओं के निर्यात में भारत दुनिया का छठा बड़ा देश है जिनका सेवाओं का निर्यात विश्व के कुल निर्यात का 3.4 प्रतिशत जबकि सेवाओं के आयात में दुनिया का सातवां बड़ा देश है।

SEZ की स्थापना मुख्य रूप से निर्यात संवर्धन के लिए किया गया है। विशेष आर्थिक क्षेत्र के आधार पर ही कृषि निर्यात क्षेत्र भी स्थापित किये गये। वर्तमान समय में 60 कृषि निर्यात क्षेत्र कार्यशील हैं जो 20 राज्यों एवं 230 जिलों में फैले हैं। कृषि निर्यात क्षेत्र का उद्देश्य कृषि निर्यातों को प्रोत्साहित करना एवं कृषि उत्पादों को बढ़ावा देना है।