अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं संगठन

(International Financial Institution & Trade)

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार तथा वित्तीय मामलों में प्रभावी सहयोग तथा राष्ट्रों की संतुलित व समन्वित समृद्धि में अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संगठनों एवं वित्तीय संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अल्प विकसित या विकासशील देशों में योजनाओं के क्रियान्वयन तथा भुगतान संतुलन में इसका अमूल्य योगदान है।

अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund-IMF) :-

IMF एक अन्तर्राष्ट्रीय मौद्रिक संगठन है। सर्वप्रथम अमेरिका ने 1943 ई0 में एक अन्तर्राष्ट्रीय कोष की स्थापना का प्रस्ताव रखा, जिसे ’हवाइट प्लान’ नाम दिया गया, फलतः जुलाई 1944 देशों के प्रतिनिधियों ने ब्रेटनवुड्स अधिवेशन में विश्व बैंक तथा IMF के गठन के सम्बन्ध में विचार विमर्श किया। इन दोनों संस्थाओं को Britten Boods Twinsपदे के नाम से जाना जाता है।
IMF की स्थापना ब्रेटन वुड्स समझौते के तहत 27 दिसम्बर 1945 ई0 को हुई परन्तु इसने 1 मार्च 1947 ई0 से कार्य करना शुरू किया। इसका मुख्यालय वाशिंगटन D.C में है तथा इसके दो कार्यालय पेरिस व जेनेवा में है। वर्तमान में IMF में 188 सदस्य देश है। 188वाँ सदस्य देश दक्षिणी सूडान है। क्रिस्टीन लेगार्डे Christine Legalese वर्तमान में IMF के प्रबन्ध निदेशक है।

कोष का संगठन एवं ढांचा (Organization and Structure of the Fund) :-

’समझौते के नियमों’ के दूसरे संशोधन में कोष के संगठन एवं ढांचें में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए। उसी रूप में, कोष का ढांचा इस प्रकार है : इसका एक शासक मंडल Board of Governors कार्यकारी मडल, एक प्रबंध निदेशक, एक परिषद् और स्टाफ है। सामान्य तौर से सदस्य देश अपने वित्तमंत्री को अथवा अपने केन्द्रीय बैंक के गवर्नर को अपनी ओर से इस कोष का गवर्नर नियुक्त कर देता है। वैकल्पिक गवर्नर बोर्ड की मीटिंग में भाग ले सकता है परन्तु उसे केवल गवर्नर की अनुपस्थिति में ही मतदान करने का अधिकार है।

कोष के उद्देश्य 
(Objectives of the Fund)

1. ऐसी स्थायी संस्था के माध्यम से अन्तर्राष्ट्रीय मौद्रिक सहयोग को बढ़ावा देना जो अन्तर्राष्ट्रीय मौद्रिक समस्याओं के सम्बन्ध में विचार-विमर्श और सहयोग की मशीनरी प्रदान करे।
2. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के विस्तार एवं संतुलित वृद्धि को सुगम बनाना और परिणामस्वरूप आर्थिक नीति के प्राथमिक उद्देश्यों के रूप में सब सदस्यों के रोजगार तथा वास्तविक आय के ऊंचे स्तरों को बढ़ावा देने और बनाए रखने में तथा सदस्यों के उत्पादक संसाधनों के विकास में योगदान देना।
3. विनिमय स्थिरता को बढ़ावा देना, सदस्यों में सुव्यवस्थित विनिमय प्रबंध बनाए रखना और प्रतियोगी विनिमय मूल्य ह्यस depreciationसे बचना।
4. सदस्यों के चालू लेन-देन के सम्बन्ध में भुगतान की बहु-देशीय प्रणाली की स्थापना करने में और उन विदेशी विनिमय प्रतिबन्धों को समाप्त करने में सहायता देना, जो विश्व-व्यापार की वृद्धि में बांधा पहुंचाते हैं।
5. सदस्यों को उचित संरक्षण के अन्तर्गत कोष को संसाधन उपलब्ध कराकर उनमें विश्वास जगाना और इस प्रकार उन्हें यह अवसर प्रदान करना कि वे राष्ट्रीय अथवा अन्तर्राष्ट्रीय समृद्धि को तबाह करने वाले उपायों का आश्रय लिए बिना ही अपने भुगतान-शेष कुसमायोजनों malabjustments को ठीक कर सकें।
6. उक्त उद्देश्यों के अनुरूप, सदस्यों के अन्तर्राष्ट्रीय भुगतान-शेष असंतुलन की अवधि घटाना और उसकी मात्रा को कम करना।

कोष के कार्य (Function of the Fund) :-

ऊपर वर्णित उद्देश्यों को पूरा करने हेतुIMF निम्न कार्य करता है-
1.IMF ऐसे ढंग से कार्य करता है कि बै्रटन-वुड्ज समझौते के नियमों में निर्धारित अपने उद्देश्यों को पूरा कर सके। यह देखना कोष का कर्तव्य है कि सभी सदस्य देश इन नियमों का पालन करें। अन्तर्राष्ट्रीय मौद्रिक घटनाओं के कारण, मूल नियमों के कुछ प्रावधान लुप्ल हो गए हैं, जैसे विनिमय दरों से संबंधित प्रावधान। तदनुसार, उचित समायोजन करने के लिए कोष ने अपने समझौते के नियमों में संशोधन कर दिए हैं। अप प्रबंधित तिरती प्रणाली Managed Floating System लागू है।

2. कोष सदस्यों को अल्पकालीन ऋण प्रदान करता है ताकि वे अपने अस्थायी भुगतान-शेष संतुलन को ठीक कर सकें।
3. भुगतान-शेष के क्षेत्र में कोष को ’सदाचरण का संरक्षण’ समझा जाता है। इसका लक्ष्य सदस्य देशों के प्रशुल्क (टेरिफ) और अन्य व्यापार प्रतिबंध घटना है। चार्टर के सातवें नियम में यह प्रावधान है कि कोष की अनुमति के बिना भुगतान करने पर प्रतिबंध नहीं लगाएगा अथवा विभेदक करेंसी प्रबंध नहीं करेगा अथवा बहु-करेंसी व्यवहारों में संलग्न नहीं होगा। सदस्य देशों द्वारा अपनाई जा रही नीति की निगरानी करना कोष का कार्य है।

4. कोष अपने सदस्यों को मौद्रिक एवं राजकोषीय नीतियों के संबंध में तकनीकी सलाह भी देता है। यह शोधनात्मक अध्ययन करता है और उन्हें प्रकाशित करता है। जिन देशों को भुगतान-शेष विषयक कठिनाइयां हों, कोष उन्हें तकनीकी विशेषज्ञ प्रदान करता है। यह अपने केन्द्रीय बैंकिंग सेवा विभाग, राजकोषीय मामलों के विभाग, सांख्यिकीय विभाग और IMF संस्थान के माध्यम से सदस्य राष्ट्रों के कर्मचारी वर्ग के लिए राजकोषीय, मौद्रिक एवं भुगतान-शेष पर अल्प-प्रशिक्षण पाठयक्रम भी चलाता है।

इस प्रकार, कोष-नियंत्रक, वित्तीय और निरीक्षणात्मक कार्य करता है।

कोष के सदस्यों का कोष के प्रति उत्तरदायित्व :-

1.भुगतानों तथा वर्तमान अन्तराष्ट्रीय लेन-देन के स्थानान्तरण पर लगे प्रतिबन्ध का परित्याग।
2.विभेदकारी मुद्रा नीति का परित्याग।
3. विदेशी मुद्रा कोषों की परिवर्तनीयता को बनाये रखना।
4.स्वर्ण तथा विदेशी विनिमय का देश तथा विदेश में संग्रह, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार तथा भुगतान-शेष, अन्तर्राष्ट्रीय विनियोग, राष्ट्रीय आय, मूल्य सूचकांक, विनिमय नियंत्रण, मुद्राओं की क्रय तथा विक्रय दरें आदि के विषय में राष्ट्रीय-आंकड़ों को जुटाना और प्रकाशित करना।

विशेष आहरण अधिकार(special Drawing Rights-SDRS) :-

1970 के प्रारम्भ में,IMFने विशेष आहरण अधिकार SDRS के निर्माण और जारी करने की एक स्कीम चलाई SDRS को कागजी सोना भी कहते हैं। 1969 में कोष के समझौता नियमों में पहला संशोधन करके SDRSका निर्माण किया गया। SDRS विश्व रिजर्वों के स्टॉक को बढ़ाने के लिए शर्तरहित रिजर्व परिसम्पत्तियों के रूप में निर्मित किये गये थे ताकि अन्तर्राष्ट्रीय तरलता की समस्या हल की जा सके। ये भाग लेने वाले सदस्यों को उनके कोष कोटों के अनुपात में आवंटित किए जाते हैं। इस मतलब के लिए कोष ने एक विशेष आहरण लेखा स्थापित किया है।

शुरू में देश SDRS को अपने रिजर्वों के भाग के रूप में धारण करते थे और भुगतान-शेष की कठिनाइयां उत्पन्न होने पर उन्हें अपनी करेंसियों में बदलाव लेते थे। एकSDRS 0.888671 ग्राम सोने के बराबर होता था। जो एक अमरीकी डालर का मूल्य था। जब 1973 के बाद कोष की सममूल्य प्रणाली छोड़ दी गई और अमरीकी डालर तथा अन्य प्रमुख करेंसियों को प्रचलित होने दिया गया तो SDR के विनिमय मूल्य को स्थिर करने का निर्णय हुआ। तद्नुसार, कोष के सदस्य देशों के व्यापकतम रूप से प्रयोग में आने वाली 16 करेंसियों के समूह के आधार पर SDR का मूल्य हर रोज आकलित किया जाता था। वे करेंसियां थींः अमरीकी डालर, जर्मन मार्क, अंग्रेजी पाउण्ड, फ्रांसीसी फ्रैंक, जापानी येन, कनाडियाई डालर, इटालियन लीरा, नीदरलैंण्ड् का गिल्डर, बेल्जियाई फ्रैंक, स्विट्जरलैण्ड का क्रोन, आस्ट्रेलियाई डालर, स्पेन का पेसेटा, नार्वे का क्रोन, आस्ट्रियाई शिलिंग और दक्षिण अफ्रीक रैंण्ड 1978 में दक्षिण अफ्रीकी और डेनमार्क की करेंसियां छोड़ दी गई और सऊदी अरब तथा ईरान की करेंसिया शामिल कर ली गई। जनवरी 1981 में समूह में करेंसियों की संख्या घटाकर पांच कर दी गई। इन करेंसियों में अमरीकी डालर, जर्मन मार्क, अंग्रेजी पाउण्ड, फ्रांसीसी फ्रैंक और जापानी येन ही रख गए। अक्टूबर, 1984 को एक ैक्त् 1ण्1031 अमरीकी डालर के बराबर था। 1 जनवरी, 1986 से शुरू करके हर पांच वर्ष बाद ैक्त् की वर्तमान करेंसी संरचना और भारण पैटर्न पर पुनरीक्षण किया जाता है। यह पुनरीक्षण दो बातों पर आधारित होता है। एक तो वस्तुओं एवं सेवाओं के निर्यात के मूल्य पर और दूसरे अन्य सदस्यों द्वारा धारित उनकी करेंसियों के शेषों पर। 1 अक्टूबर, 1997 को एक SDR 1.35610 अमरीकी डालर के बराबर था।

SDR के लाभ (Use of SDRS) :-

SDRS लेखा की अन्तर्राष्ट्रीय इकाई है जो ’कोष विशेष आहरण लेखा’ में रखी जाती हैं। ’कोष सामान्य लेखा’ में सभी करेंसियों के कोटों का मूल्य-निर्धारण SDRS में किया जाता है। अन्तर्राष्ट्रीय मौद्रिक परिसम्पत्ति के रूप में,SDRS केन्द्रीय बैंको और सरकारों के अन्तर्राष्ट्रीय रिजर्वों में रखे जाते हैं ताकि वे अपने भुगतान-शेषों की कमियों या अतिरेकों के लिए वित्त की व्यवस्था कर सकें। कोष द्वारा कर्जों और पुनर्भुगतान के रूप में किए गए सब लेन-देन, कोष के तरल रिजर्व, कोष की पूंजी आदि को SDRS में व्यक्त किया जाता है। बहुत-से देश अपनी करेंसियों को SDRS से जोड़ रहे हैं। इससे अपने विकासशील देशों को इस बात में सहायता मिली है कि वे अपनी बाह्य एवं आर्थिक स्थितियों को स्थिर बनाएं और अन्तर्राष्ट्रीय मौद्रिक लेन-देन में उत्पन्न होने वाली अस्थिरता से अपनी अर्थव्यवस्थाओं की रक्षा कर सकें।

SDRS के तीन प्रमुख प्रयोग हैं। प्रथम, प्रयोग निर्देशानुसार लेन-देन (Transaction with designation) है । इसके अन्तर्गत, कोष SDRS स्कीम के किसी ऐसे भागीदार को, जिसकी भुगतान-शेष एवं रिजर्व स्थिति मजबूत हो, यह निर्देश देता है कि वह किसी जरूरतमन्द दूसरे भागीदार को SDRS के बदले करेंसी प्रदान करे। यह हो सकता है कि SDRS के बदले में दी जाने वाली करेंसी उस भागीदार की अथवा किसी दूसरे भागीदार की ही हो। जब तक भागीदारों के धारण उनके कुल आवंटनों के तीन गुना से कम रहते हैं, तब तक उन्हें इस तरीके SDRS स्वीकार करने की इजाजत है। दूसरे, कोष के साथ सब लेन-देन में Transaction with the fund काम में लाए जाते हैं। तीसरे,SDRS का प्रयोग सहमति से किये जाने वाले लेन-देन Transaction by Agreement में होता है। कोष इस बात की अनुमति देता है कि किसी दूसरे भागीदार से समझौता करके करेंसी के बदले SDRS बेच दिए जाएं। SDRS के निम्नलिखित अतिरिक्त उद्देश्य माने गए –

  •  विनिमय प्रबंधों में
  •  वायदा प्रचलनों (Forward operations) में,
  • ऋणों में,
  • वित्तीय एतराजों को दूर करने में,
  •  वित्तीय उत्तरदायित्व पूरा करने के लिए जमानत के रूप में और
  •  दान अथवा उपहारों में।