अन्तःस्रावी तन्त्र
Endocrine System

अन्तःस्रावी अंगों अथवा वाहिनीहीन ग्रन्थियों को अन्तःस्रावी तन्त्र के अन्तर्गत रखा गया है क्योंकि इनसे उत्पन्न स्राव अथवा हार्मोन ग्रन्थि से बाहर वाहिनी द्वारा नहीं जाते अपितु सीधे इन अंगों में प्रवाहित रक्त में जाते हैं। हार्मोन का वितरण रुधिर द्वारा होता है। हार्मोन रासायनिक संदेशवाहक भी होते हैं। रासायनिक रूप से हार्मोन प्रोटीन्स, स्टीरायड, अमीनो अम्ल अथवा कैटेकोलेमीन हो सकते हैं। हार्मोन रासायनिक दूत की भाँति कार्य करते हैं। हार्मोन को ओलिगोडायनैमिक भी कहते हैं क्योंकि हार्मोन की थोड़ी भी मात्रा उनकी क्रिया के लिए पर्याप्त होती है।

अन्तःस्रावी ग्रंथियां

(1) थायरायड (Thyroid) :- गर्दन में वायुनाल के अग्र भाग में स्थित द्विपालित एवं सबसे बड़ी अन्त: स्रावी ग्रन्थि है। इस ग्रन्थि से स्त्रावित हार्मोन थायराक्सिन तथा ट्राइआयोडो थाइरोनीन है। इनका प्रमुख कार्य उपापचय की दर (BMR) आक्सीजन की खपत, हृदय-स्पंदन दर की नियमन है। इसके अतिरिक्त गलूकोस का अवशोषण, ग्लूकोनिओजेसिस का प्रेरक की भाँति कार्य करता है।

(2) पैराथाइराइड ग्रन्थि :- थाइराइड ग्रन्थि के पश्च तल में धँसी हुई दो जोड़ी छोटी तथा गुलाबी रंग की ग्रन्थि। इस ग्रन्थि के द्वारा पैराथाइराॅयड या काॅलिप का हार्मोन का स्त्रावण होता है। इनका कार्य फास्फेट ( तथा Ca++) आयनों की सान्द्रता का नियमन, अस्थित तथा दाँत निर्माण में आवश्यक होता है तथा रूधिर में कैल्शियम की सान्द्रता को बढ़ाता है।

(3) अधिवृक्क ग्रन्थि(Adrenal Glands) :- प्रत्येक वृक्क के अग्र सिरे पर टोपी के समान के संयुक्त ग्रन्थि है। इसके दो भाग-काटेंक्स तथा मेडुला होता हैं। एड्रीनल कार्टेक्स के स्रावण का नियन्त्रण पीयूष ग्रन्थि के अग्र पिण्ड से निकला  ACTH करता है। एड्रीनल मेडुला के स्रावण का नियन्त्रण अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र द्वारा होता है। इस ग्रन्थि से स्रावित हार्मोन एवं उनके कार्य निम्नलिखित हैं-

(A)कार्टेक्स के हाॅर्मोन्स :- लगभग 30 स्टीरायड् हार्मोन का स्रावण जिन्हें तीन समूहों में रखा गया है-

  1. ग्लूकोकाॅर्टिकाॅएड्स जिनमें काॅर्टिसोन तथा काॅर्टिकोस्टेराॅन मुख्य हैं। इनका मुख्य कार्य भोजन के विभिन्न अवयवों के उपापचय, यकृत में ग्लाइकोजेनिसस, प्रोटीन से ग्लूकोस का निर्माण, जल तथा इलेक्ट्रोलाइट्स का शरीर में वितरण आदि का नियन्त्रण है।
  2. मिनरैलो काॅटिकाएडस जिसमें एल्डो स्टेराॅन मुख्य है। इनका मुख्य कार्य जल तथा खनिजों का संतुलन, रुधिर दाब व परासरणी दाब नियमन, वृक्क तथा अन्य कोशिकाओं में सोडियम व जल का पुनरावशोषण किन्तु फाॅस्फेट्स व पोटैशियम के अधिक उत्सर्जन को प्रेरित करता है।
  3. लिंग हार्मोन जिसमें एन्ड्रोजेन्सए एस्ट्रोजेन्स मुख्य है। इनका कार्य पेशियों तथा जननांगों के उचित विकास की प्रेरणा देना है।

 (B)मेडुला के हार्मोन :- इसमें दो हार्मोन हैं

  1.  एड्रीनेलिन या एपीनेफ्रिन :- मुख्य हार्मोन जिसका अर्थ ग्लूकोजेनो लाइसिस तथा वसा के विघटन को प्रेरित करता है। रक्त दबाव बढ़ाता है। यह संकट की अवस्था में शरीर को उग्र प्रतिक्रिया के लिए तैयार करता है।
  2.  नाॅरएड्रीनलीन या एपीनेफ्रिन:- इसका कार्य रक्त दाब बढ़ाना, हृदय की संकुचन शीलता का नियन्त्रण करना है। रुधिर शर्करा के स्तर को भी शीघ्रता से बढ़ाता है।

 

(4). पीयूष ग्रन्थि:- कपाल की स्फेनाॅयड अस्थि के सेलाटर्सिका नामक गर्त में स्थित होती हैं। यह एक छोटी ग्रन्थि है, यह दो पिण्डों से मिलकर बनी होती है तथा स्त्रियों में अपेक्षाकृत बड़ी तथा गर्भावस्था में और भी बड़ी होती है। इस ग्रन्थि को ’मास्टर ग्रन्थि’ भी कहते हैं। इस ग्रन्थि के द्वारा स्रावित हार्मोन तथा उनके कार्य निम्नलिखित हैं

(A). पश्चपिण्ड के हार्मोन:- इनके स्त्राव को ’पिट्यूट्रीन’ कहते हैं। इसमें दो हार्मोन होते हैं-

 1. वैसोप्रेसिन या प्रतिमूलक हार्मोन (ADH) :- जो वृक्क नलिकाओं के दूरस्थ भागों में जल अवशोषण को बढ़ाता है

2. आक्सी टोसिन या पिटोसिन :- जो गर्भाशय की दीवारों को भी संकुचन द्वारा प्रसव पीड़ा उत्पन्न करता है तथा दुग्ध निर्माण को भी प्रेरित करता है।

(B).अग्रपिण्ड के हार्मोन:- इस प्रकार हैं-

(1) सोमैट्राफिक या वृद्धि हार्मोन (GH or STH) जो शरीर की उचित वृद्धि के लिए आवश्यक है।

(2) जनन ग्रन्थि प्रेरक हार्मोन GTH के भी कई प्रकार हैं-

(a) पुटिका प्रेरक हार्मोन (F.S.H) जिसके प्रभाव में पुरुषों में शुक्र जनन तथा स्त्रियों में ग्राफियन पुटिकाओं की वृद्धि अण्डजनन व एस्ट्रोजेन्स का स्रावण होता है।

(b) ल्यूटीनाइजिंग या अन्तराली कोशिका प्रेरक हार्मोन जिसके प्रभाव से स्त्रियों के अण्डाशय में पुटिका फटने के बाद बने कार्पस ल्यूटियम प्रोटेस्ट्रान का स्रावण करता है। पुरुषों में लेंडिग कोशिकाओं को नर लिंग हार्मोन स्रावित करने को प्रेरित करता है।

(c) प्रोलैक्टिन या मेमोट्रापिक हार्मोन (MTH)गर्भकाल में स्तनों में वृद्धि एवं उनमें दुग्ध निर्माण को प्रेरित करता है।

(3)थाइराइड प्रेरक हार्मोन या थाइरोट्राॅपिन (T.S.H):- थाइराइड ग्रन्थि को क्रियाशील बनता है।

(4)अधिवृक्क वल्कुट हार्मोनATCHया एड्रीनोकाॅर्टिको ट्रापिन अधिवृक्क ग्रन्थि के कार्टेक्स भाग को क्रियाशील बनाता है।

(5) हाइपोथैलेमस:- इसके न्यूरान (तन्त्रिका स्रावी कोशिकाएँ) अनेक मुक्ति कारक तथा निरोधक कारक तत्वों को स्रावित करते हैं। वृद्धि हार्मोन मुक्ति कारक वृद्धि हार्मोन के स्रावण को प्रेरित करता है तथा वृद्धि हार्मोन निरोधक कारक वृद्धि हार्मोन के स्रावण को रोकता है। थाइरोट्रापिन मुक्ति कारक थाइरोट्रापिक हार्मोन के स्रावण को प्रेरित करता है।

ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन मुक्ति कारक L-H के स्रावण को प्रेरित करता है। प्रोलैक्टिन मुक्ति कारक RRF प्रोलैक्टिन हार्मोन के स्रावण को प्रेरित करती हैं। प्रोलैक्टिन निरोधक कारक प्रोलैक्टिन स्रावण को रोकता है।

(6) थाइमस :- हृदय के ठीक आगे स्थित, भ्रूणावस्था से शैशवास्था तक बड़ी होती जाती है। बाद में धीरे-धीरे छोटी हो जाती है। यह ग्रन्थि थाइमोसीन नामक हार्मोन का स्रावण करती है जिसके प्रभाव से शिशुओं में लिम्फोसाइट का विभेदन एवं प्रतिरक्षी पदार्थ का निर्माण होता है।

(7) अग्न्याशय :- एक मिश्रित ग्रन्थि है जिसका बहिःस्र्रावी भाग पाचक रस स्रावित करता है। इसमें उपस्थित लैगरहैंस की द्वीपिकाएँ अन्तः स्रावी भाग बनाती हैं। इस ग्रन्थि के द्वारा इन्सुलिन एवं ग्लूकैगाॅन हार्मोन स्रावित होता है-

(a).इन्सुलिन शरीर की कोशिकाओं को ग्लूकोस उपयोग के लिए प्रेरित करता है। ऊतकों विशेषकर पेशियों में कार्बोहाइडेट्स के उपयोग पर नियन्त्रण तथा यकृत कोशिकाओं में ग्लाइकोजेनेसिस का प्रेरक भी है।

(b).ग्लूकैगाॅन रूधिर में ग्लूकोज की मात्रा घटने पर ग्लाइकोजन व वसा के विखण्डन से ग्लूकोज के निर्माण को प्रेरित करता है।

(8) पीनियल काय (Pineeal Body) :- मस्तिष्क पर डाइएनसिफैलाॅन के पृष्ठ मध्य भाग पर एक छोटे से वृत्त पर स्थित होती हैं। इस चपटी, छोटी व सफेद रंग की ग्रन्थि के द्वारा मिलैटोनिन Meditation हार्मोन स्रावित होता है जिसके प्रभाव से स्तनियों में जनदों का विकास नही होता है।

(9) आमाशय की आंत्रीय श्लेष्मिका:- आहार नाल का भाग जो गैस्ट्रिन, एन्टरोगैस्ट्रान, कोली सिस्टोकाइनिन तथा पैंक्रियोजाइमिन नामक हार्मोनों का स्रावण करते हैं। गैस्ट्रिन हार्मोन जठर ग्रन्थियों से पेप्सिन तथा HCL के स्रावण का प्रेरक, सेक्रेटिन अग्न्याशय रस व यकृत से जल व खनिजों के सा्रवण का प्रेरक, एन्टरोगैस्ट्रान HCL के स्रावण का अवरोधक कोली सिटोकाइनिन पित्ताशय के संकुचन का प्रेरक तथा पैन्क्रियोजाइमिन अग्न्याशयिक रस के स्रावण का प्रेरक है।

(10) जनद (Gonads):- में वृषण, अण्डाशय एवं कार्पस ल्यूटियम आते हैं। वृषण में उपस्थित लेडिंग कोशिकाएँ नर हार्मोन्स टेस्टोस्टेराॅन एन्ड्रोजन का स्रावण करती हैं जो लैगिंक अंगों की परिपक्वता तथा विकास की प्रेरणा के साथ द्वितीय नर लैंगिक लक्षणों का प्रेरक तथा शुक्राणु जनन में सहायक है। अण्डाशय में उपस्थित ग्राफियन पुटिकाएँ मादा हार्मोन्स एस्ट्रोजेन्स का स्रावण करते हैं जिससे स्त्रियों के सहायक जननांगों, लैंगिक लक्षणों, स्तनों, दुग्ध ग्रन्थियों आदि के विकास तथा अण्डाणु जनन की की प्रेरणा देता है। अण्डोत्सर्ग के बाद बनी संरचना कार्पस ल्यूटियम प्रोजेस्टेराॅन तथा रिलैक्सिन नामक हार्मोन का स्रावण करती है। ये दोनों हार्मोन गर्भ धारण एवं शिशु जन्म को आसान बनाता है।

हार्मोनों की कमी एवं अधिकता से
उत्पन्न होने वाले रोग

सोमैट्रोट्राॅपिक या वृद्धिहार्मोन के अतिस्रावण से शरीर भीमकाय हो जाता है तथा उसके अल्प स्रावण से मनुष्य बौना हो जाता है।

वैसोप्रोसिन या प्रतिमूत्रक हार्मोन (A.D.H)की कमी से मूत्र की मात्रा अधिक होती है तथा ऊदक मेह (Diabetes insipid) रोग हो जाता है।

एड्रीनेलिन या एपीनेफ्रिन:- मज्जा भाग का मुख्य हार्मोन जो शरीर को संकट कालीन परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार करता है। अतः संकटकालीन हार्मोन या 3F(Fight,Flight,Fright)  हार्मोन्स भी कहते हैं।

एड्रीनल ग्रन्थि से हार्मोन्स के अल्प स्रावण से एडीसन रोग, हाइपो ग्लाइसीमिया तथा काॅन्स रोग हो जाते हैं।
एड्रीनल ग्रन्थि से हार्मोन्स के अतिस्त्रावण से कुशिंग रोग एवं विरलिज्म रोग हो जाते हैं।
थायराॅयड ग्रन्थि में स्रावित हार्मोनों की कमी से जड़वामनता या क्रिटिनिज्म, मिक्सीडेमा, घेघा एवं एक्सोफ्थैल्मिक ग्वाटर रोग हो जाते हैं।
थायराॅयड ग्रन्थि में स्रावित होने वाले हार्मोनों के अति स्रावण से ग्रेव्य रोग, प्लूमर रोग, एक्सोफ्थैल्मिक ग्वाटर नामक रोग हो जाते हैं।

प्लेसेंटा या अपरा:- विभिन्न समयों पर पाँच हार्मोन स्रावित करता है-(1) प्रोजेस्टेराॅन (2) एस्ट्रोजेन (3) कोरियोनिक गोनैडो ट्रापिन हार्मोन (4) रिलैक्सिन हाॅर्मोन (5) प्लेसेन्टेल लैक्टोजन।

एपिनेफ्रीन के प्रभाव से रुधिर वाहिनियां सिकुड़ती हैं।
हाइपोक्सिया अवस्था में ऊतकों को कम मात्रा में आक्सीजन मिलती है।

इन्सुलिन आघात:- अधिक मात्रा में इन्सुलिन की उपस्थिति के कारण रुधिर शर्करा की मात्रा बहुत कम हो जाती है तथा रोगी बेहोश हो जाता है। इसी अवस्था को इन्सुलिन आघात कहते हैं।

यूरीमिया:- रूधिर में यूरिया की मात्रा सामान्य से अधिक हो जाना।

इक्टोहारमोन या फेरामोन (Ectoharmones of Pheromones) :- ये हारमोन कुछ बाह्य स्रावी ग्रन्थियों द्वारा बाहरी वातावरण में स्रावित होते हें और एक ही जीव जातियों के सदस्यों के बीच पारस्परिक आचरण को प्रभावित करते हैं तथा ये स्वाद एवं गंध द्वारा सदस्यों में परस्पर सूचना प्रसारण का कार्य भी करते हैं।

स्त्रियों में यदि ’एण्ड्रोजेन्स का स्रावण अधिक मात्रा में होने लगे तब मादा में नर के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। इससे शरीर पर अधिक बालों का निकलना, आवाज का भारी होना, दाढ़ी-मूँछ निकल आना आदि लक्षण प्रमुख हैं। इस प्रकार के लक्षणों को हरस्यूटिज्म कहते हैं।

1.अधिवृक्क (Adrenal) ग्रन्थि के वल्कुट भाग को क्रियाशील बनाने वाला हार्मोन- एड्रीनोकार्टिकोट्रापिन
2. थाइराइड ग्रन्थि को क्रियाशील बनाने वाला ताकि थायराक्सिन का उचित स्रावण हो सके- थाइरोट्रापिन
3. गर्भकाल में स्तनों की वृद्धि एवं दुग्ध स्रावण को प्रेरित करने वाला हार्मोन- मेमोट्रापिक हार्मोन
4. नर लिंग हार्मोन– एण्ड्रोजन
5. मादा लिंग हारमोन- एस्ट्रोजन
6. इन्सुलिन के अल्प स्रावण से रक्त में शर्करा के बढ़ जाने से उत्पन्न होने वाला रोग- मधुमेह
7. थाइराइड ग्रन्थि में गाँठे पड़ जाने से उत्पन्न होने वाला रोग– प्लूमर रोग
8. थाइराइड ग्रन्थि के सम्पूर्ण रूप से फूल जाने पर उत्पन्न होने वाला रोग- बेब्स रोग
9. अपरा द्वारा सबसे पहले स्रावित हाने वाला हार्मोन- कोरियानिक गोनैडोट्रापिन हार्मोन
10. स्तनों में दुग्ध ग्रन्थियों के विकास तथा दुग्ध निर्माण को प्रेरित करने वाला हार्मोन-प्लेसेन्टेल लैक्टोजन
11. इन्सुलिन की अधिकता से उत्पन्न होने वाला रोग- हाइपरग्लाइसीमिया
12. हार्मोन तथा उनका स्रावण करने वाली ग्रन्थियों का अध्ययन करने वाला विज्ञान- अन्तः स्रावी विज्ञान
13मानव शरीर की सबसे छोटी अन्तःस्रावी ग्रन्थि- थायराइड ग्रन्थि
14.लड़ो या उड़ो हार्मोन किसे कहा जाता है- एड्रीनेलिन को
15.मास्टर ग्रन्थि (पीयूष) को नियन्त्रित करता है– हाइपोथैलमस
16.आपातकालीन हार्मोन-एड्रीनेलिन
17.ऊतकों को कम मात्रा में आक्सीजन उपलब्ध होने पर उत्पन्न होने वाला रोग- हाइपोक्सिया