अक्रिय गैसें, हाइड्रोजन तथा उसके यौगिक

आवर्त सारणी के शून्य वर्ग में 6 तत्व हैं, हीलियम, निआन, आर्गन, क्रिप्टन, जीनाॅन तथा रेडाॅन। ये सभी तत्व साधरण ताप पर गैसंे हैं तथा रासायनिक दृष्टि से अक्रियशील हैं, इसी कारण इन्हें अक्रिय गैसें कहतें हैं। हीलियम और आर्गन जल में विलेय हैं, अतः अल्प मात्रा में वे नदियों, समुद्रों एव वर्षा के जल में भी पयी जायी जाती हैं। रेडाॅन प्रकृति में नहीं पायी जाती, यह उच्च रेडियोएक्टिव है, जिसका शीघ्रता से क्षय होता है।

अक्रिय गैंसों के उपयोग-
(1) हीलियम :- हीलियम हाइड्रोजन को छोड़कर अन्य समस्त गैसों से हल्की है। इसकी ज्वलनशीलता तथा उठाने की शक्ति (हाइड्रोजन का 92 प्रतिशत) के कारण हीलियम वायुयान के टायरों एवं गुब्बारों के भरने में प्रयुक्त होती है।

  •  समुद्री गोताखोरो को हीलियम तथा आॅक्सीजन का मिश्रण श्वास लेने के लिए दिया जाता है।
  • हीलियम गैस प्रशीतित परमाणु रिएक्टरों में प्रशीतक माध्यम के रूप में प्रयुक्त होती है।
  •  हीलियम थर्मामीटर निम्न तापमिति में उपयोग किये जाते हैं।
  •  हीलियम का उपयोग खाद्य-पदार्थों की सुरक्षा हेतु भी किया जाता है।

(2) निअॅान :- एक बंद नली से कम दाब पर निआॅन भरकर विद्युत प्रवाहित करने से लाल रंग की चमक उत्पन्न होती है। इसलिए इसका उपयोग विज्ञापनों, विद्युत संकेतों, साइनबोर्डों तथा वायुयान के प्रकाश गृहों में होता है।

  •  नियान का उपयोग टेलीफोन सेटों, रेडियो, फोटोग्राफी, ध्वनि चालकों के उत्पादन, स्पार्क प्लग परीक्षकों तथा भयावह सिग्नलों में होता है।
  •  निआॅन का तीक्ष्ण प्रकाश कोहरे एवं तूफान में भीे दिखाई देता है इसलिए समुद्री सेवा के प्रकाश स्तंभ में इसका उपयोग होता है।

(3) आर्गन :- कम ताप चालकता, निष्क्रिय प्रकृति के कारण आर्गन प्रकाश बल्बों व तापदीप्त लैपों में भरने के काम में आती है। इसकी निष्क्रिय प्रकृति बल्बों, लैपों का जीवन काल बढ़ा देती है। यह रेडियो बल्बों तथा परिशोधक एवं धातुओं की वेल्डिंग में उपयोगी है।

(4) क्रिप्टाॅन और जिनाॅन :- क्रिप्टन का उपयोग प्रतिदीप्त विसर्जन लैम्पों में तथा काॅस्मिक किरण माॅपन हेतु आयनीकृत चेम्बर में किया जाता है। जिनाॅन को निआॅन प्रकाश में क्रिप्टान के साथ मिश्रित करने से बल्बों की उपयोगिता बढ़ जाती है।

(5) रेडाॅन :- रेडियो धर्मी होने के कारण इसका उपयोग रेडियोधर्मी अनुसंधानों में तथा कैंसर के शल्य क्रिया रहित उपचार में होता है।

हाइड्रोजन – हाइड्रोजन सबसे हल्का तत्व है। इसकी खोज 1766 में कैवेण्डिश ने की थी।

परमाण्विक/सक्रिय हाइड्रोजन :-कम दाब पर साधरण हाइड्रोजन गैस में टंगस्टन, प्लैटिनम या पैलेडियम का तार उच्च तापमान पर गर्म करने या पारा के आधे मिमी. से भी कम दाब पर हाइड्रोजन में विद्युत विसर्ग प्रवाहित करने पर हाइड्रोजन के अणु H परमाणुओं में टूटते हैं। इस अवस्था वाली हाइड्रोजन गैस को सक्रिय हाइड्रोजन कहते हैं। यह काफी क्रियाशील होती है और आॅक्सीजन, फाॅस्फोरस के साथ साधारण तापमान पर सीेधे संयोग करती है।

नवजात हाइड्रो (Nascent Hydrogen) :- रासायनिक प्रतिक्रिया के फलस्वरूप किसी यौगिक से तुरंत निकली हुई हाइड्रोजन गैस को नवजात हाइड्रोजन कहते हैं। नवजात हाइड्रोजन आणविक हाइड्रोजन से अधिक क्रिया शील होती है।

आर्थों हाइड्रोजन :-  हाइड्रोजन का वह अणु जिसमें दोनों परमाणुओं के प्रचक्रण (Spins) समान्तर (Para) होते हैं।

पैरा हाइड्रोजन :- हाइड्रोजन का वह अणु जिसमें दोनों परमाणुओं के प्रचक्रण (Spins) प्रति-समान्तर (Anti-parallel) होते हैं।

भारी पानी (Havy water) :- अमेरिका के यूरे तथा उनके साथियों ने 1931 मे भारी जल का पता लगाया। उन्होंने बताया कि साधारण जल के 6000 भागों में लगभग 1 भाग भारी जल विद्यमान रहता है। इसे D2O से प्रर्दशित करते हैं।

भारी जल प्राणियों के लिए हानिकारक है और जीवन के लिए साधारण जल की भांति पोषक व सहायक नहीं है। लगभग शुद्ध भारी जल में टेडपोल और प्रोटोजोआ मर जाते है। बैक्टीरिया की वृद्धि भी भारी जल में कम हो जाती है। भारी जल पीने से चूहों की प्यास बढ़ जाती है। भारी जल का उपयोग नाभिकीय रिएक्टर में मंदक के रूप में किया जाता है। इसका अणुभार 20 होता है।

जल की कठोरता (Hardness  water) कठोर या मृदु जल (Hard & soft water) :-  वह जल जो साबुन के साथ कठिनाई से झाग, देता है, कठोर जल कहलाता है। जो जल साबुन के साथ आसानी से झाग नहीं देता है, मृदु जल कहलाता है। कठोर जल पीने के लिए सदैव हानिकारक नहीं होता है। यह लाउन्ड्री कार्य में हानिकारक होता है। औद्योगिक बाॅयलरों में कठोर जल के प्रयोग से ईधन की बरबादी होती है तथा बाॅयलर की क्षमता में कमी हो जाती है तथा बाॅयलर फटने की संभावना होती है।
मृदु जल या तो शुद्ध जल होता है या ऐसा जल होता हैं जो विलेय अशुद्धियों जैसे Na+ लवण से युक्त होता है। जल को पीने योग्य बनाने (हानिकारक कीटाणुओं को हटाने) की क्रिया स्टार्लाइजेशन कहलाती है। यह क्रिया क्लोनीनीकरण ओजोनीकरण या पराबैगनी किरणें पास करके की जाती हैं।

जल की कठोरता के कारण :-  जल की कठोरता, जल में कैल्शियम के घुलनशील लवणों (बाकार्बोनेट, सल्फेटस, क्लोराइड आदि) के कारण होती है। जल की कठोरता दो प्रकार की हाती है।

1. अस्थाई कठोरता (Temporary hardness) :-. यह कैल्शियम और मैग्नीसियम के बाइकार्बोनेट की उपस्थिति के कारण होती है, जो जल को मात्र उबाल देने पर समाप्त हो जाती है। उबलने पर विलेय बाइकार्बोनेट, अविलेय कार्बोेनेटो में परिवर्तित हो जाते है, जो छानकर दूर किए जा सकते हैं। जल में चूना जल (Ca(OH)2 ) मिलाकर भी अस्थायी कठोरता को दूर किया जा सकता है। इसे क्लार्क विधि कहतें है।

2. स्थाई कठोरता (Permanent hardness) :- यह कैल्श्यिम और मैग्नीशियम के क्लोराइड तथा सल्फेट के कारण होती है। यह कठोरता जल को मात्र उबाल देने से समाप्त नहीं होती। इसे दूर करने के लिए इसमें सोडियम कार्बोनेट का घोल मिलाते है, जिससे कैल्शियम और मैग्नीशियम के घुलनशील लवण अघुनशील कार्बोनेट में परिणत हो जाते हैं, जिन्हें छानकर अलग किया जाता है इस विधि को सोडा विधि कहते हैं।

यह कठोरता जल में साबुन मिलाकर भी दूर की जाती है। साबुन उच्च वसीय अम्लों का सोडियम लवण होता है। जल में उपस्थित कैल्शियम और मैग्नीशियम  Mके घुनशील लवण साबुन की प्रतिक्रिया से कैल्शियम और मैग्नीशियम के अघुनशील लवण के रूप में परिणत हो जाते है, जिन्हें छानकर बाहर निकाल देते हैं।

स्त्रवण विधि में जल को उबाल कर वाष्प के रूप में परिणत किया जाता है, पुनः वाष्प को संघनित कर जल में परिणत करते हैं। इसके अलावा परम्यूटिट तथा कैलगन विधि द्वारा भी जल की कठोरता को दूर किया जा सकता है।

हाइड्रोजन पराक्साइड (Hydrogen Peraoxide) :-. इसका सूत्र H2 O2 तथा अणुभार 34 होता है। इसके निम्न उपयोग हैं-

  •  यह औषधि के रूप में घाव घोने, कान साफ करने दांतों के मंजन के काम आता है।
  •  दूध, शराब आदि अन्य पेयों को सड़ने से बचाने के लिए।
  • प्रयोगशाला में आक्सीकारक के रूप में।
  • रेशम, ऊन, चमडी, हाथी दांत के विरंजन में।
  • राकेटों में नोदक (Propllant)के रूप में।

कुछ महत्वपूर्ण तत्व तथा यौगिक

(Few Important Elements and Copounds)

सोडियम के उपयोग :- सोडियम परआॅक्साइड, सोडिय सायनायड, टैट्राएथिल लेड (पैट्रोल में आपस्फोटन रोधी यौगिक के रूप में प्रयुक्त प्रयुक्त होता है) के निर्माण में, सोडियम वाष्प लैम्प में जो एक वर्णीय पीला प्रकाश उत्सर्जित करता है। सोडियम वाष्प लैम्प आजकल सड़कों पर प्रकाश के लिए प्रयुक्त होेते हैं।

सोडियम हाइड्राॅक्साइड का उपयोग :- पेट्रोलियम के परिष्करण में तथा रूई के न सिकुड़ने वाले वस्त्र बनाने में।
सोडियम सोडियम कार्बोनेट- इसका उपयोग वाशिंग सोडा के रूप में जल मृदुकरण में तथा लाॅण्ड्रियों में एवं कांच, कास्टिक सोडा, साबुन पाउडरों आदि के निर्माण में होता है।

सोडियम बाइकार्बोनेट या बेकिंग सेाडा  :-  बेंकिग पाउडर, झागयुक्त पेयों तथा फल के लवणों के निर्माण में, आमाशय की अम्लता को हटाने की औषधियों मे तथा अग्निरोधी के रूप में खिड़की के कांच के निर्माण में सोडियम सल्फेट का प्रयोग होता है।

मैग्नीषियम (Mg) :- पौधों के हरे पदार्थ में (क्लोरोफिल में) मैग्नीशियम उपस्थित होता है। इसका उपयोग फोटोग्राफी (प्रकाश बल्ब) संकेत ज्वालओं, अग्नि कार्यों तथा आतिशबाजी में प्रकाश स्रोत की तरह होता है।

कैल्शियम(Ca ) :-  कैल्शियम फाॅस्फेट हड्डियों तथा दांतों का एक अवयव होता है। कैल्शियम कार्बोनेट समुद्री जानवरों के रक्षक कवच का भी एक अवयव होता है। कैल्शियम का उपयोग पैट्रोलियम से सल्फर को हटाने में तथा परम ऐल्कोहल के निर्माण में निर्जलीकारक के रूप में होता है।

पोर्टलैण्ड सीमेण्ट :- यह सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में खोजा गया था। यह चूने के पत्थर तथा चिकनी मिट्टी का मिश्रण है। पोर्टलैण्ड सीमेण्ट का अनुमानित संघटन निम्न है, कैल्शियम आॅक्साइड (Cao)-62%  सिलिका (Sio) -22%  ऐलुमिना (Al2O3) -7.5% मैग्नीशियम (MgO) -2.5%  फेरिक आॅक्साइड (Fe2O3) -2.5%

बोरिक अम्ल :- यह एक एंटीसेप्टिक, एक नेत्र धोने वाले द्रव तथा एक भोजन संरक्षक के रूप में प्रयुक्त होता है। इसके अलावा यह काँच, चमकदार वस्तु तथा इनेमल के निर्माण में भी प्रयुक्त होता है।

कार्बन :- प्रकृति में यह मुक्त और संयुक्त दोनो अवस्थाओ में मिलता है। स्वतंत्र अवस्था में यह हीरा तथा ग्रेफाइट के रूप में मिलता है। संयुक्त अवस्था में यह निम्न खनिजों के रूप में उपलब्ध हैं।

  1.  प्राकृतिक आइड्रोकार्बन- मार्श गैस, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस आदि।
  2. कार्बोनेट खनिज- डोलोमाइट, संगमरमर, चूना पत्थर आदि।
  3.  वातावरण में कार्बन डाॅइआक्साइड के रूप में।

कार्बन के अपरूप (Allotropic forms of carbon) क्रिस्टलीय अपरूप :- हीरा, गे्रफाइट, आक्रिस्टलीय अपरूप- आक्रिस्टलीय कार्बन के विभिन्न रूप हैं जैसे- कोयला, कोक, चारकोल या काष्ठ चारकोल, अस्थि भस्म या प्राणि-चारकोल, लैम्प कालिख, कार्बन ब्लैक, गैस कार्बन तथा पैट्रोलियम कोक।

हीरो तथा ग्राफाइट में अन्तर

हीरा                                                             ग्रेफाइट
यह देखने में पारदर्शक होता है।                       यह काला होता है।
यह अत्यंत कठोर होता है।                              यह मुलायम होता है।
यह विद्युत का कुचालक होता है                     यह विद्युत का सुचालक होता है।
इसका अपवर्तनांक अत्यंत उच्च होता है             इसका अपर्वतनांक कम होता है।