हार्मोन (Hormones)

हार्मोन (Hormones) हार्मोन जटिल कार्बनिक यौगिक है जो अत्यन्त सूक्ष्म मात्रा में विशिष्ट ग्रन्थियाँ द्वारा स्रावित किये जाते हैं। ये विशिष्ट ग्रन्थियाँ अन्तःस्रावी (Endocrine) या नलिका विहीन ग्रन्थियाँ  (Ductless glands)  भी कहलाती है। हार्मोन उपापचय क्रियाओं, जनन, वृद्धि, विकास, रूधिर दाब, रूधिर में जल की मात्रा आदि का नियन्त्रण करते हैं। इनका स्रावण यदि शरीर

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मानव में होने वाले रोग (Human Diseases)

मानव में होने वाले रोग (Human Diseases) मानव रोग उत्पन्न होने के कई कारक हैं-जैसे- (1) जैविक कारक :- विषाणु, जीवाणु, माइकोप्लाज्म, कवक, प्रोटोजोआ, हैल्मिन्थीज तथा अन्य जीव। (2) पौष्टिक तत्व :- प्रोटीन,कार्बोहाइड्रेट, वसा, खनिज लवण एवं विटामिनों की कमी। (3) भौतक कारक :- सर्दी, गर्मी, आर्द्रता, दबाव, विद्युत, विकिरण, ध्वनि आदि। (4) यान्त्रिक कारक

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मानव स्वास्थ्य एवं पोषण Human health  & Nutrition

मानव स्वास्थ्य एवं पोषण Human health  & Nutrition शरीर के सामान्य विकास के लिए सन्तुलित भोजन की आवश्यकता होती है। इसके लिए भोजन की मात्रा एवं गुणवत्ता दोनों महत्वपूर्ण है। भोजन की उचित मात्रा तथा गुणवत्ता के अभाव में कुपोषण की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। अल्प पोषण के कारण शरीर जैविक क्रियाओं के संचालन

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उत्सर्जन (Excretion)

उत्सर्जन (Excretion) शरीर में उपापचयी क्रियाओं के फलस्वरूप बने नाइट्रोजन युक्त व्यर्थ एवं हानिकारक वज्र्य पदार्थों का शरीर से निष्कासन ही उत्सर्जन है। शरीर के जो अंग इस क्रिया में भाग लेते हैं, उन्हें उत्सर्जी अंग (Excretory organs)  कहते हैं। कार्बोहाइड्रेट तथा वसा के उपापचय से जल तथा CO2  अपशिष्ट पदार्थ बनते हैं। CO2 का निष्कासन श्वास

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मनुष्य की आहार नाल (Human alimentary canal)

मनुष्य की आहार नाल (Human alimentary canal) मुख से लेकर गुदा तक 8 से 10 मीटर लम्बी खोखली और अत्यधिक कुण्डलित हमारी आहार नाल होती है जिसे जठरान्त्रीय कार्य मार्ग (Gastrointestinal tract GI Tract) कहते हैं। इसके निम्न भाग हैं -(1) मुख ग्रासन गुहिका (2) ग्रासनली, (3) आमाशय तथा (4) आँत। मुख मुखगुहा में खुलता

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पोषण (Nutrition) : इसका उपयोग ऊर्जा उत्पादन, वृद्धि

पोषण: (Nutrition) वह सम्पूर्ण प्रक्रिया जिसके अन्तर्गत जीवधारी वातावरण से भोज्य पदार्थों को ग्रहण करके इसे कोशिकाओं द्वारा प्रयोग किये जाने योग्य बनाते हैं जिससे इसका उपयोग ऊर्जा उत्पादन, वृद्धि तथा मरम्मत में किया जा सके, ’पोषण’ कहलाती है। जन्तुओं में यह प्रक्रिया पांच चरणों में सम्पन्न होती है- पहला चरण ’अन्तर्ग्रहण’ कहलाता है जिसके अन्तर्गत

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ग्रसनी तथा ग्रासनली (Pharyanx and Oesophagus)

ग्रसनी तथा ग्रासनली (Pharyanx and Oesophagus) ग्रसनी नाक, मुख तथा स्वरयन्त्र के पीछे स्थित होती है। इसका विस्तार कपाल आधार से छठी ग्रीवा कशेरुका तक होता है। इस कशेरुका पर क्रिकोयड कार्टिलेज के स्तर पर ग्रसनी से ग्रास नली आरम्भ होती है। ग्रसनी लगभग 12 सेमी0 लम्बी होती है। तथा तीन भागों में बँटी होती

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पाचन क्रिया (Digestion)

पाचन क्रिया (Digestion) पाचन तन्त्र का कार्य भोजन ग्रहण करना तथा उसे समांगीकरण के योग्य बनाना है। पोषण नाल के अन्तर्गत निम्न अंग आते हैं- मुख (Mouthe) ग्रसनी (Pharynx) ग्रास नली  (O esophagus ) तथा  आमाशय (Stomach) मुख में दाँत और जीभ भोजन का स्वाद लेने तथा उसे चबाने और निगलने में सहायता देता है।

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जनन तन्त्र (Reproductory System)

जनन तन्त्र (Reproduction System) अपनी वंश परंपरा को बनाये रखने के लिए जीवधारी जनन प्रक्रिया द्वारा अपने जैसी सन्तान उत्पन्न करते हैं। जन्तुओं में जनन दो प्रकार से होता है- अलैंगिक जनन तथा लैंगिक जनन। अलैंगिक जनन :-  में संतति का विकास मात मातृ जन्तु के शरीर के किसी भी भाग या किसी विशेष रचना द्वारा

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कंकाल तन्त्र (Skeltal System)

कंकाल तन्त्र (Skeltal System) कंकाल की रचना में हड्डियों के अतिरिक्त कुछ स्थानों पर कार्टिलेज या उपास्थि का भी योग रहता है। कंकाल को दो मुख्य भागों में बाँटा गया है- (1) अक्षीय कंकाल (Axial Skeleton) :- जिसमें शरीर के दीर्घ एवं लम्बे एक्सिस में विद्यमान हड्डियाँ आती हैं। इसमे कपाल या खोपड़ी (Skull) उरोस्थि

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