तन्त्रिका तन्त्र
(Nervous System)

 

शरीर के विभिन्न अंगों की क्रियाओं का नियन्त्रण एवं नियमन तन्त्रिका तंत्र द्वारा होता है। तन्त्रिका कोशिकाएँ उत्तेजनशीलता तथा संवाहकता के लिए उत्तरदायी हैं। तन्त्रिका कोशिकाएँ शरीर की अत्यधिक जटिल और सबसे लम्बी कोशिकाएँ होती हैं जिनकी उत्पत्ति भ्रूण की एक्टोडर्म से होती है। एक तन्त्रिका कोशिका से निकलने वाले प्रवर्धों की संख्या के आधार पर इन्हें एक ध्रुवीय (Uni polar) द्विधु्रवीय(Bipolar) तथा बहुध्रवीय (Multi polar) न्यूरान्स में बाँटा गया है।

तन्त्रिका कोशिका को दो मुख्य भागों में बांटा गया है –

कोशिका काय  :-  तन्त्रिका तन्त्र का प्रमुख भाग जिसके केन्द्र में केन्द्रक होता है। स्त्रियों की तन्त्रिका कोशिका के केन्द्रक के समीप ’बार बाडी’ पायी जाती है। कोशिका द्रव्य में अनियमित आकार के बड़े निसल के कण पाये जाते हैं, जो R.N.A व न्यूक्लियोंप्रोटीन के बने हुए क्रोमैटिन कण हैं।

 तन्त्रिका कोशिका प्रवर्ध  :-  तन्त्रिका कोशिकाओं में दो प्रकार के प्रवर्ध (Dendrites) तथा अक्षतन्तु (Akon)पाये जाते हैं।
तन्त्रिका तन्त्र केवल जन्तुओं में होता है और वातावरणीय परिवर्तनों को संवेदी सूचनाओं के रूप में ग्रहण करके तन्त्रिकीय प्रेरणाओं या आवेगों के रूप में प्रसारित करता है।

न्यूरोएन्डोक्राइन तंत्र  :-  तन्त्रिका तन्त्र एवं अन्तःस्रावी तन्त्र के सम्मिलित रूप को न्यूरोएन्डोक्राइन तन्त्र कहते हैं।
तन्त्रिकीय नियन्त्रण के घटकों में संवेदांग, अपवाहक रचनाएं तथा सूचना प्रसारण तन्त्र आते हैं।
संवेदांग वातावरणीय परिवर्तनों से उद्दीपित होने वाले अंग होते हैं।

इनकी तीन श्रेणियाँ होती हैं-
(1) ज्ञानेन्द्रियां या बाह्य संवेदांग जिसमें घ्राणेन्द्रियाँ, नेत्र कर्ण तथा त्वचा में सूक्ष्म त्वक् ज्ञानेन्द्रियाँ आती हैं।

(2) अन्तः संवेदांग या ज्ञानेन्द्रियाँ आंतरांगों में स्थित संवेदी तन्त्रिका तन्तुओं स्वतंत्र नग्न छोरों के रूपा सूक्ष्म संवेदांग होते हैं। ये शरीर के अन्तः वातावरण में उद्दीपनों को ग्रहण करते हैं।

(3) स्वाम्य ज्ञानेन्द्रियाँ  :-  रेखित पेशियों, अस्थि संधियों, कण्डराओं, स्नायुओं आदि में स्थित संवेदी तन्त्रिका तन्तुओं के स्वतंत्र या नग्न छोर होते हैं।

अपवाहक रचनाएं :- केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र द्वारा प्रसारित चालक प्रेरणाओं के अनुसार शरीर की प्रतिक्रिया को अन्जाम देते हैं। पेशियाँ तथा ग्रन्थियाँ ही तन्त्रिकीय संचालन की प्रतिक्रियाओं की अपवाहक होती हैं।

सूचना प्रसारण तन्त्र के दो प्रमुख खण्ड  :-  केन्द्रीय तन्त्रिका तंत्र तथा परिधीय तन्त्रिका तंत्र (Peripheral nervous sysrem p.n.s))  होते हैं। केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र में मसितष्क, सुषुम्ना तथा मेरुरज्जु होत हैं। परिधीय तन्त्रिका तन्त्र में दूर संचार तारों की भाँति, सारे शरीर में फैली महीन धागे-समान तंत्रिकाएँ होती हैं।

इस प्रकार स्पष्ट है कि केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र एक ऐसे केन्द्रीय विनिमय केन्द्र (Central Exchange) का काम करता है जहाँ की वातावरणीय उद्दीपनों की व्याख्या होकर उपयुक्त प्रक्रियाओं का निर्धारण होता है, चिन्तन तथा मनोभावों की उत्पत्ति होती है। तथा उद्दीपनों की स्मृतियों का संचय होता है।
तन्त्रिकीय ऊतक में दो प्रमुख प्रकार की कोशिकाएँ होती हैं- तन्त्रिका कोशिकाएँ तथा न्यूरोग्लिया कोशिकाएँ।

तन्त्रिका कोशिकाएँ :- तन्त्रिका तंत्र की क्रियात्मक ईकाइयाँ होती हैं। तन्त्रिका तन्त्र की संवेदन ग्रहण, सूचना प्रसारण, उद्दीपनों की व्याख्या, चिन्तन, मनोभावों स्मृतियों आदि की क्षमताएँ इन्हीं कोशिकाओं के संगठन में निहित होती हैं।
नयूरोग्लिया कोशिकाएँ तन्त्रिका कोशिकाओं को अवलम्बन तथा सुरक्षा प्रदान करने का काम करती है।
शरीर में तन्त्रिका, कोशिकाओं की संख्या लगभग 100 अरब (1011) होती हैं। इनकी अधिकांश संख्या मस्तिष्क में होती हैं। तन्त्रिका कोशिकाएँ रचना और कार्यिकी में शरीर की सबसे जटिल कोशिकाएँ होती हैं।

प्रवर्धों एवं स्वभाव के अनुसार ये चार प्रकार की होती हैं-

(1) अधु्रवीय तन्त्रिका कोशिकाएँ मुख्यतः हाइड्रा एवं अन्य नाइडेरिया में।

(2) एक ध्रुवीय तन्त्रिका कोशिकाएँ कशेरुकी जन्तुओं में स्पाइनल तन्त्रिकाओं के पृष्ठमूल गुच्छकों की सारी तन्त्रिका कोशिकाओं में परिवर्तन से एक ध्रुवीय तन्त्रिका कोशिकाएँ बनती हैं। एक ऐक्सान ऑर एक-एक डेन्ड्रान।

(3) बहु धु्रवीय तन्त्रिका कोशिकाएँ जिनमें एक एक्सान तथा दो या अधिक डेन्ड्रान्स होते हैं। कशेरुकियों में अधिकांश तन्त्रिका कोशिकाएँ ऐसी ही होती हैं।

कार्यों के अनुसार तन्त्रिका कोशिकाएँ तीन प्रकार की होती हैं –

संवेदी तन्त्रिका कोशिकाएं, चालक तन्त्रिका कोशिकाएँ एवं मध्यस्थ तन्त्रिका कोशिकाएँ।
शरीर की समस्त तन्त्रिका कोशिकाओं में लगभग 99.98 प्रतिशत मध्यस्थ या संयोजी तन्त्रिका कोशिकाएँ होती हैं। ये बहु ध्रुवीय होती हैं और केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र में दो या अधिक तन्त्रिका कोशिकाओं के बीच संबंध स्थापित करने का काम करती हैं। इन्हें पुरकिन्जे की कोशिकाएँ भी कहते हैं। संवेदी तन्त्रिका कोशिकाएँ एक ध्रुवीय तथा चालक तन्त्रिका कोशिकाएँ बहु ध्रुवीय होती हैं।

तन्त्रिका तन्त्र का कार्यात्मक संघठन  :-  हमारी समस्त प्रतिक्रियाओं को सामूहिक रूप से हमारा व्यवहार या आचरण कहा जा सकता है। हमारी समस्त प्रतिक्रियाओं को दो कोटियों ऐच्छिक एवं अनैच्छिक में बांटा गया है। ऐच्छिक प्रतिक्रियाएँ किसी निश्चित उद्देश्य को पूरा करने के लिए होती हैं। इनकी प्रेरणा प्रमस्तिष्क (Cerebrun) के नियंत्रण केन्द्रों से निर्गमित होती हे। अनैच्छिक क्रियाएँ अपने आप होती रहने वाली अचेतन प्रतिक्रियाएँ होती हैं। हृद स्पंदन, सामान्य श्वास क्रिया, ताप नियन्त्रण, आदि से संबंधित प्रतिक्रियाएँ अनैच्छिक होती हैं। इनके नियंत्रण केन्द्र, मस्तिष्क में हाइपोथैलेमस में होता है।

मानव मस्तिष्क की रचना  :-  ’कपाल या क्रेनियम’ के भीतर मानव मस्तिष्क सुरक्षित रहता है। मस्तिष्क तीन आवरणों-

  1.  दृढ़तानिका (Duramater)
  2. जालतानिका (Arochnoid Mater)
  3. मृदुतानिका (Plamater) रहता है।

     मस्तिष्क को तीन भागों :-

  1. अग्रमस्तिष्क(Fore brain)
  2. मध्य मस्तिष्क (Mid brain)
  3. तथापश्च मस्तिष्क (Hindi brain)में बांटा गया है।

अग्रमस्तिष्क के भी तीन भाग  :- घ्राण भाग, , सेरिब्रम तथा,डाइएनसिफैलान होते हैं।

प्रमस्तिष्क या सेरिब्रम मस्तिष्क का 2/3 भाग होता है। प्रमस्तिष्क की पृष्ठ सतह में तन्त्रिका तन्तुओं की अत्यधिक संख्या होने के कारण यह सतह अत्यधिक मोटी व वलनों वाली होती हैं। इस सतह को नियेपैलियम (neopallium) कहते हैं। प्रमस्तिष्क की गुहाओं को पार्श्व मस्तिष्क गुहा या पैरासील कहते हैं। डाइएन सिफैलान का पृष्ठ भाग पहला होता है तथा अधर भाग मोटा होता है जिसे हाइपोथैलमस कहते हैं। इसकी अधर सतह पर ’इन्फन्डीबुलम से जुड़ी ’पीयूष ग्रन्थि’ होती हे। डाइएनसिफैलान की पृष्ठ सतह पर पीनियल काय तथा अग्र रक्त जालक पाया जाता है।

मध्य मस्तिष्क का पृष्ठ भाग चार दृश्य पालियों के रूप में होता है जिन्हें कार्पोरा क्वाड्रिजेमिना कहते हैं। इसके पार्श्व व अधर भाग में तन्त्रिका ऊतक की पट्टियाँ होती हैं जिन्हें क्रूरा सेरेब्राई कहते हैं।

पश्च मस्तिष्क के दो भाग – अनुमस्तिष्क (Cerebellum )तथा मेडुला आब्लांगेटा (Medulla obligate) होते हैं। मेडुला की गुहा को चतुर्थ निलय या मेटासील कहते हैं।

मेरुरज्जु (Spinal cord) :-  यह केन्द्रीय तन्त्रिका तंत्र का भाग है। यह तीन रक्षात्मक आवरणों-दृढ़तानिका, जाल तानिका व मृदुतानिका से घिरी लम्बी व बेलनाकार कशेरूक दण्ड द्वारा बनी नाल में स्थित होता है। इसमे श्वेत तथा घूसर द्रव्य भरा होता है। श्वेतद्रव्य बाहर की ओर तथा घूसर द्रव्य अन्दर की ओर स्थित होता है। मेरुरज्जु के केन्द्र में एक गुहा होती है जिसे केन्द्रीय नाल या न्यूरोसीन कहा जाता है।

परिधीय तन्त्रिका तन्त्र (Peripheral nervous system) :- इसके दो भाग होते हैं-;पद्ध कपालीय तन्त्रिकाएँ तथा ;पपद्ध मेरु तंत्रिकाएं। कपालीय तन्त्रिकाएँ मस्तिष्क से निकलती हैं। मानव में यह 12 जोड़ी होती है।

मेरु तंत्रिकाएं मिश्रित तन्त्रिकाएँ होती हैं। मानव शरीर में 31 जोड़ी मेरु तन्त्रिकाएं होती हैं।
स्वायत्र तन्त्रिका तन्त्र (Autonomous nervous system) स्वतन्त्र रूप से कार्य करता है लेकिन अंतिम रूप से इसका नियंत्रण केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र करता है। स्वायंत्र तन्त्रिका तन्त्र के दो घटक हैं-

 परानुकम्पी एवं अनुकम्पी तन्त्रिका

अपवाही एवं अभिवाही न्यूरान :- अपवाही न्यूरान प्रेरक न्यूरान होते हैं जबकि अभिवाही न्यूरान संवेदी न्यूरान केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र से प्रेरणा को शरीर के विभिन्न भागों में पहुँचाते हैं जबकि अभिवाही न्यूरान विभिनन अंगों से संवेदना को केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र में लाते हैं।

तन्त्रिका तन्तु में आयनों का वितरण :- तन्त्रिका की विश्रामावस्था में सोडियम आयन( Na+) की संख्या तंत्रिका कला के काफी बाहर अधिक होती है जिसके कारण बाहरी तल पर धनावेश होता है। कला के भीतरी तल पर पोटैशियम आयनों (K+) की बहुत कम उपस्थित के कारण ऋणात्मक आवेश होता है। तन्त्रिका कला के भीतरी तल पर 70-80 mv का ऋणात्मक आवेश तथा बाह्य सतह पर 70-80 mv का धनात्मक आवेश होता है। इसे कला विभवान्तर कहते हैं।