पृथ्वी की आन्तरिक सरंचना

पृथ्वी की आन्तरिक संरचना के बारे में जिन साधनों से जानकरी प्राप्त की जाती है, वे इस प्रकार है-

1. अप्राकृतिक साधन-
  1.  घनत्व  (Density) – पृथ्वी के ऊपरी भाग का निर्माण परतदार शैलों से हुआ है जिसकी औसत मोटाई लगभग 800 मीटर है। इस भाग का घनत्व 2.9 ग्राम घन सेमी. है तथा स्पष्ट है कि पृथ्वी का औसत घनत्व 5.617 ग्राम घन सेमी0 है। अतः स्पष्ट है कि नीचे स्थित भाग का धनत्व 5517 ग्राम घन  सेमी.  से अधिक होगा जिसे सामान्यता 100 माना जाता है इस प्रकार स्पष्ट होता है कि पृथ्वी का घनत्व ऊपर से नीचे उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। तथा (Core) कोर भाग का घनत्व सर्वाधिक होता है।
  2.   दाब (Pressue) – घनत्व के नीचे ज्यों-ज्यों बढ़ते है दबाव भी बढ़ता जाता है पृथ्वी के अन्तरतम भाग में स्थित पदार्थ स्वयं ही ऐसी धातुओं के रूप में हैं जो अत्यधिक घनत्व वाली तथा भारी है।
  3.  तापमान (Temperature):– सामान्यतया पृथ्वी के अन्दर प्रवेश करने पर प्रति 32 मीटर पर 1ब0 ताप की वृद्धि होती है। जिससे यह स्पष्ट है कि पृथ्वी के आन्तरिक भाग का तापमान बहुत अधिक होगा ऐसी दशा में पृथ्वी का अधिकांश भाग पिघल गया होता किन्तु ऐसा नहीं है क्यांकि पृथ्वी की सबसे ऊपरी परत में रेडियो सक्रिय तत्व होते है जिनसे ऊष्मा निकलती है। गहराई के बढ़ने के साथ रेडियो सक्रिय पदार्थों की उपलब्धता में कमी होती जाती है जिससे तापमान भी कम होता जाता है।
 2. पृथ्वी की उत्पत्ति से सम्बंधित सिद्धन्तो के साक्ष्य:

विभिन्न विद्वानों द्वारा समय समय पर प्रस्तुत की गयी पृथ्वी की उत्पत्ति सम्बन्धी परिकल्पनाओं के आधार पर उसके आन्तरिक भाग के विषय में निम्न तथ्य उभरकर सामने आते है।

  1.   चैम्बरलिन ने 1905 ई. में अपनी ग्रहाणु परिकल्पना प्रस्तुत की जिसके अनुसार पृथ्वी का निर्माण ठोस ग्रहाणुओं के एकत्रीकरण से हुआ है अतः उसके अन्तरम को ठोस अवस्था में होना चाहिए।
  2. जेम्स जीन्स द्वारा 1919 में ज्वरीय परिकल्पना से यह निष्कर्ष निकलता है कि उसकी केन्द्र की अवस्था तरल हो।
  3.  लाप्लास (1776ई.) की वायत्य निहरिका परिकल्पना के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति गैस से बी निहारिका से मानी जाती है।

3. प्रकृतिक साधन

1. ज्वालामुखी क्रिया के साक्ष्य-

ज्वालामुखी उद्भेदन के समय पृथ्वी के आन्तरिक भाग से गर्म तथा तरल लावा निकलकर धरातल पर प्रवाहित होता है जो कि वहाॅ विशाल मैग्मा भण्डार के रूप में स्थित है। इससे यह निष्कर्ष निकालना आसान है कि पृथ्वी के अन्दर कुछ भाग अवस्य ही द्रव अवस्था में होना चाहिए।

 2. भूकम्प विज्ञान के साक्ष्य-

भूकम्प विज्ञान को सीस्मोलाॅजी तथा भूकम्प मापने के यंत्र को भूकम्पमापी यंत्र या सीस्मोग्राफ कहतें है। जस स्थान से भूकम्प का प्रारम्भ होता है उसे भू- कम्प मूल (Foeus) तथा धरातल पर जहाॅ सबसे पहले भू-कम्प का अध्ययन किया जाता है उसे अधिकेन्द्र (Epicenter)) कहा जाता है। भू-कम्प के समय उत्पन्न होने वाली लहरों या तरंगों को तीन प्रमुख श्रेणियों में रखा जाता है जो निम्नलिखि है-

(a) प्राथमिक अथवा लम्बात्मक लहरें (Primari or lonitdanal Waves)
(b)गौड़ अथवा आड़ी लहरें (Transvery orDistortional Waves)

इनकी प्रकृति प्रकाश तरंगों से मिलती जुलती है। इनमें कणों की गति लहर की दिशा के समकोण पर काटती है। इसकी सबसे मुख्य विशेषता यह है कि ये प्रायः द्रव अवस्था में लुप्त हो जाती है। इनकी गति 4-5 किमी0 होती हैं।

(c)धरातलीय लहरें(Surpace Waves):

ये लहरें पृथ्वी के ऊपरी भाग पर चलती हैं तथा अत्यन्त विनष्टकारी होती हैं। ये लहर अन्य लहरों की अपेक्षा सबसे लम्बा मार्ग तय करती है। इनकी गति सबसे कम लगभग 3-4Km/s  होती है इन्हें Lon Period L Waves कहते हैं। भू-गर्भ में भूकम्पनीय लहरों का भ्रमण पथ इन भूकम्पीय तरंगों के आधार पर पृथ्वी के आन्तरिक भाग में तीन प्रकार की परतों का पता लगाया गया है जो निम्नलिखित हैं_

  1. . ऊपरी परत (Upper Layer)
  2. मध्यवर्ती परत (Intermediate Layer)
  3.  निचली परत (Lawe Layer)

 भौगोलिक  पृथ्वी के आन्तरिक भाग का रासायनिक संगठन:-

जगत में एडवर्ड स्वेस के विचार काफी हद तक मान्य है। उन्होंने यह बताया है कि भू-पटल का सबसे ऊपरी भाग परतदार अवसादी शैलों का बना है, जिसकी गहराई बहुत कम है जिसकी संरचना सिलिवेट से बनी है जिसमें अभ्रक तथा फेल्सपार अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। स्वेस ने इस परत के नीचे निम्न तीन परतों की उपस्थिति स्वीकार की है-

1. सियाल (Sial-Silica+Aluminium):-

यह ग्रेनाइट से बनी होती है तथा इसका निर्माण सिलिका व एल्युमिनियम जैसी हल्की धातुओं से हुआ है। ैपंस का घनत्व 2.99 घन सेमी है। इसकी गहराई लगभग 50-300 कि0मी0 है। अम्लीय प्रवृत्ति की चट्टानें पायी जाती हैं। माना जाता है कि महाद्वीपों की रचना में इन्हीं परतों का सर्वाधिक योगदान है।

 2. सीमा(Silica+Manesium):-

यह सियाल के नीचे की परत है और ठंेंसजपब आग्नेय शैलों से इसकी रचना हुई है। इसका घनत्व 2.9 से 4.7 ग्राम/घन सेमी. होता है तथा गहराई 1000 से 2000 किमी0 की है। क्षारीय प्रवृत्ति की चट्टानें पायी जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि सीमा तरलावस्था में है तथा सियाल सीमा पर तैर रहा है। ज्वालामुखी का उद्गार इसी परत से होता है।

 3. निफे (Niekel+Ferium):-

यह पृथ्वी के आन्तरिक भाग की परत है जो निकेल और लोहे जैसी कठोर धातुओं से बनी है तथा इसका घनत्व सर्वाधिक 11 ग्राम/घन सेमी. है। पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण का कारण निकेल और लोहे का केन्द्र में पाया जाना है।

वर्तमान भूकम्पीय लहरों की गति या उनके भ्रमण पथ में आने वाले परिवर्तनों आसान वैज्ञानिक अध्ययन एवं विशेषण के आधार पर पृथ्वी की आन्तरिक संरचना से सम्बन्धित अभिनव मत के अनुसार इसके आन्तरिक भाग को तीन वृहत मण्डलों में विभाजित किया गया है।

  1.  Crust (क्रस्ट)
  2.  Mantle (मैण्टिल)
  3. Eare (अन्तरम)