1921-26 वाइस और गवर्नर जनरल लार्ड रीडिंग

वह एक ऐेसे नाजुक समय में भारत आया था जब गांधीवादी नणनीति ने भारतीय राजनीति में एक नए युक का सूत्रपात किया था। नवम्बर 1921 में जब प्रिंस आॅफ वेल्स का भारत में आगमन हुआ, तो देशव्यापी हड़ताल ने उनका स्वागत किया। इस घटना और प्रथम गांधीवादी आन्दोन के जादुई प्रभाव ने भारत में ब्रिटिश शासन को अपनी नीतियों में व्यापक परिर्वतन लाने के लिए बाध्य किया। यद्यपि चैरीचैरा घटना के बाद असहायोग आन्दोलन को वापस ले लिया गया, परन्तु इस आन्दोलन की सफलता। के साथ-साथ केरल में हिंसक मोपला विद्रोह 1921 ने भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जडो़ को हिला दिया। इस विस्फोटक स्थिति को शान्त करने के लिए अनेक उदारवादी कार्य किए गए जैसे कि 1910 के प्रेस अधिनियम और 1919 के रौलट एक्ट को निरस्त कर दिया गया।

फौजदारी काूनन संशोधन अधिनियम से जातीय या रंग भेदभाव को काफी सीमा तक दूरकरके और कपास उत्पादन शुल्क को समाप्त करके, सामान्य जन असन्तोश दूर करने का प्रयास किया गया। सार्वजनिक सेवाओं की व्यवस्था में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन कए गए। यह निश्चय किया गया कि उच्च पदों पर नियुक्ति के लिए भारतीयों और यूरोपियन लोगों को समान स्तर पर राख जाए या बराबरी का दर्जा प्रदान किया और 1923 से (विविल सर्विसेज) प्रशासनिक सेवओं में उम्मीदवारों के चयन के लिए दिल्ली और लन्दन मे एक साथ प्रतियोगी परीक्षा के आयोजन की व्यवस्था की गइ। इस प्रकार लगभग पिछली आधी शताब्दी से की जा रही मांग को स्वीकार कर लिया गया।

राष्ट्रीय स्तर पर भी कुछ दूरगामी महत्व की घटनांए घटित हुई। 1922 में विश्वभारती विश्वविद्यालय ने कार्य करना प्रारभ कर दिया। दूसरी ओर 1909 के अधिनियम पे साम्प्रदायिकता के जिन जीवाणुओं को जन्म दिया था, उन्होंने संपूर्ण देश को इस काल में जकड़ लिया। 1923 और 1925 में मूल्तान, अमृतसर, दिल्ली अलीगढ़ अर्बी और कलकत्ता में भयंकर साम्प्रदायिक दंगे हुए। हिन्दू महासभा, मुस्लिम लीग के मुकाबले में स्थपित किया गया, ने वाराणीसी में अपना अधिवेशन आयोजित किया।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जिसका 1921 मे मानवेन्द्र राय द्वारा सूत्रपात किया गया था। ने भी अपनी गतिविधियाॅ प्रारंभकर दी। चैरी चैरा घटना के बाद आसहयोग आन्दोलन वापस लेेने के कारण गांधीजी की जन प्रतिक्रिया सेरा रक्षा करने के लिए उन्हें गिरफ्तार करलिया गया था। इस कारण राष्ट्रीय जीवन में एक रिक्ता उत्पन्न हो गई परन्तु जिन कांग्रेसजनों ने मोतीलाल नेहरू और चितरंजन दास के नेतृत्व में स्वराज पार्टी के ना से विधायिकाओं के लिए चुनाव लड़े ’’उन्होनें प्रान्तीय विघानसभाओं और केन्द्रीय परिषद से समान सतत् अवराधात्मक निति का सफलतापूर्वक अनुसरण करके सरकार के कार्याें मे भयंकर अवरोध पैदा किए। क्रांतिकारी और आतंकवादी पहले से ही हर संभव स्थान पर थे।

9 अगस्त 1925 को प्रसिद्ध काकोरी षड्यंत्र केस ने ब्रिटिश शासन को हिला दिया। साम्प्रदायिक दंगे जो लबभग प्रतिवर्ष होने वाली घटना हो गए थे, राष्ट्रीय आन्दोलन की शक्ति को निचोड़ रहे थे। इस साम्प्रदायिक पागलपन की सर्वाधिक दुखद घटना, दिसम्बर 1926 में एक महान राष्ट्रावादी और आर्यसमाज के नेता श्रद्धानन्द की हत्या थी।

1926-34:- वाइसराय और गवर्नर जनरल लार्ड इर्विन-

सइमन कमीशन नियुक्ति से राष्ट्रीय जीवन में विद्यमान गतिहीनता टूट गई। के प्रारंभ में जब साइमन कमीशन भारत आया तो भारतीय लोगों ने इस कारण इसका अहिष्कार किया क्योकि किसी भी भारतीय सदस्यों को शामिल नहीं किया गया था। ब्रिटिश सरकार ने भारत भावी संवैधानिक व्यवस्था के संबंध में कांग्रेस को चुनौती दी कि वह ऐसे सर्वसम्मत संवैधानिक व्यवस्था को प्रस्तुत किरे जिसके पीछे विभिन्न दलों की सहमति हो।

इस चुनौती के प्रत्युत्तर में अगस्त 1928 में लखनऊ में सर्वदलीय सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में भावी संवैधानिक व्यवस्था का प्रारूप तैयार करने क लिए मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक सर्वदलीय समिति का गठन किया गया। इस समिति के परामर्श एवं प्रयासों से नेहरू रिपोर्ट या नेहरू संविधान तैयार किया गया। परंतु मुहम्मद अल जिन्ना के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग ने इस आधार पर इसे अस्वीकार कर कर दिया क्योंकि नेहरू रिपोर्ट में मुसलमानों के लिए प्रथक निर्वाचक मण्डल को नहीं माना गया था।

जिन्ना ने नेहरू रिपोर्ट के विरोध में अपना चैदह-सूी मांग पत्र प्रस्तुत किया। मुसलमानों के अतिरिक्त सिखों के कुछ वर्गोंं गैर-ब्राम्हणों और पिड़डे वर्गों तथा दथा दलित समुदायों ने भी नेहरू रिपोर्ट को पूर्णतः अनुमोदित नहीं किया लेकिन उत्तरदायी सरकार बनाने के मुद्दे पर पूरा भारत एक था। पूर्ण स्वतंत्रता की भावना ने भी धीरे-धीरे जड़ पकड़ लीं। भारतीय कांग्रेस अपने मद्रास अधिवेशन में स्वंतत्रता को भारत का लक्ष्य घोषित कर चुकी थी।

भारत के राजनीतिक जीवन में एक तूफान पनप रहा था। क्रांतिकारर गतिवधियां पुनर्जीवित हो गई। थीें। इनमें से कुद महत्पूवर्ण क्रांतिकारी घटनाएं थी। लाहौर के सहायक पुलिस अधीक्षक संाडर्स (जिसने साइन कमीशन के विरूद्ध जलूस का नेतृत्व कर रहे लाला लाजपत राय पर घातक प्रहारकिया गया था) की हत्या, दिल्ली के एसेम्बली हाॅल में बम फंेकना 1929 लाहौर, षड्यंत्र केस और चैंसठ दिन की भूख हड़ताल के बाद जतिन दासकी शहादत 1929 आदि।

इस तनावपूर्ण पृष्ठभूमि में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने लाहौर अधिवेशन (1929) मे पूर्ण स्वतंत्रता को अपना लक्ष्य घोषित किया था। 4 फरवारी, 1930 को साबरमती में कांग्रेस कार्यकारिणी समिति की जो बैठक हुई, उसमें सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू करने का निर्णय लिया गया। 12 मार्च 1930 को गांधीजी ने अपनी ऐतिहासिक दाण्डी यात्रा शुरू की और नमक कानून तोड़कर इस आंदोलन का उद्घाटन किया। सरकार ने भयंकर दमनात्मक उपायों द्वारा इस आंदोलन को कुचलने का प्रयास किया।

इसी समय सइमन कमीशन की रिपोर्ट पर विचार करने के लिए नवम्बर 1930 में लंदन में प्रथम गोलमेज सम्मेलन बुलाया गया,जिसका कांग्रेसने बहिष्कार किया। परंतु गोलमेज सम्मेजलन के कुछ सदस्यों ने भारत ने भारत आने पर कांगे्रस से गोलमेज सम्मेलन के बहिष्कारसे संबबधित अपने निर्णयपर पुनर्विचार करने की अपील की और गांधीजी से वाइसराय से मिलने के लिए अनुरोध किया। इस बैठक के फलस्वरूप गांधी इर्विन समझौता मार्च 5, 1931 पर हस्ताक्षर किए गए जिसके परिणामस्वरूप सविनय अवज्ञा आंदोलन को सथगित कर दिया गया। वाइसराय के रूप में लार्ड विलिंग्डन के उत्तराधिकारी ने।

1931-1936 वाइसराय और गवर्नर जनरल लार्ड विलिंग्डन

गांधी-इर्विन समझौता के तत्काल बाद सभी राजनीतिकबंन्दियों को रिहा कर दिया गया और अवज्ञा आंदोलन स्थगित कर दिया। द्वितीय गोजमेज सम्मेलन (1 सितम्बर से 1 दिसम्बर 1931) में प्रतिनिधत्व करने के लिए महात्मां गाधी कांगे्रस के केवल मात्र प्रतिनिधि थे। परंतु इस सम्मूलन में साम्प्रदायिक समस्या के बारे में मुस्लिम लीक के नेता जिन्ना दुराग्रह के कारण कोई समझौता नहीं हो सका। भारत विषयक सचिव सैम्युल होर जैसे कुछ ब्रिटिश राजनीतिज्ञ गुप्त रूप से जिन्ना का समर्थन कर रहे थे। इस प्रकार ग्राधीजी द्वितीय गोलमेज सम्मेलन से निराश होकर भारत वापस आए और उनके भारत-आगमन के बाद ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

सविनय अवज्ञा आन्दोलन, जिसे गांधी-इर्विन समझौता के बाद स्थगित कर दिया गया था, पुनः प्रारंभ करने का निर्णय किया गया। इस प्रकार जनवरी 1932 में सविनय अवज्ञा आंदोलन का द्वितीय चरण प्रारंभ हुआ। परंतु सविनय आंदोलन प्रारंभ होने के कुछ माह बाद ही ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्से मैकडाॅनल्ड ने 16 अगस्त, 1932 को अपने साम्प्रदायिक निर्णय (एवार्ड) की घोषणा की। इस एवार्ड में मुसलमानों, यूरोपियनों और सिखों को पृथक, निर्वाचक मंडल के द्वारा अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करने को अधिकार प्रदान किया गया। इस एवार्ड में हरिजनों या दलित वर्ग को भी पृथक सम्प्रदाय का दर्जा दिया और उन्हें भी पृथक निर्वाचक मण्डल के द्वारा अपने प्रतिनिधियों का चुनने का अधिकार प्रदान किया गया।

दलित वर्ग से संबोधित साम्प्रदायिक एवार्ड के विरूद्ध गांधीजी ने आमरण अनशन प्रारंभ किया। उनके अनशन के छठे दिन (25 सितम्बर, 1932) पूना पैक्ट के द्वारा इस एवार्ड में संशोधन किया गया। अगले कुछ वर्षों तक गांधीजी अस्पृश्यता निवारण या हरिजन अभियान में व्यस्त रहे। उनके इस अभियान के परिणामस्वरूप संपूर्ण भारत में हरिजनों के लिए मंदिर, सार्वजनिक कुएं आदि खोल दिए गए।

8 मई 1933 को गांधीजी ने अपनी आत्मशुद्धि और हरिजन लक्ष्य के प्रति अपने साथियों को ’’सावधान एवं सक्रिया रखने के लिए’’ इक्कीस दिन का अनाशन किया। अनशन की घोषणा के बाद ही उन्हें कारगार से मुक्त कर दिया गया और उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष को सुझाव दिया कि सविनय अवज्ञा आंदोलन को छः सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया जाए।

गांधीजी की इच्छाओं के प्रति आदर व्यक्त करते हुए आंदोलन को स्थगित कर दिया गया और उसके स्थान पर 1 अगस्त, 1933 को व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा चलाया गया। इस आन्दोलन का उद्घाटन करते ही गांधीजी को पुनः बन्दी बना लिया गया। परंतु कारागार में चूंकि उन्हें अस्पृश्यता निवारण अभियान संचालित करने के संबंध में सुविधाएं प्रदान नहीं की गई। अतः उन्होंने 16 अगस्त को पुनः अनशन प्रारंभ कर दिया। अनशन के दौरान जब उनकी स्थिति बहुत गंभीर हो गई तो 23 अगस्त, 1933 को उन्हें कारागार से बिना शर्त रिहा कर दिया गया। संपूर्ण अगला वर्ष उन्होंने हरिजन कल्याण के कार्य के लिए व्यतीत किया और इस बीच व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा आन्दोलन मृतप्राय हो गया।

इसी बीच (जनवरी 1933 में) पाकिस्तान आन्दोलन के बीज बो दिए गए जिन्हें परवर्ती वर्षों में सतर्कतापूर्वक पोषित किया गया। इसके अतिरिक्त दिसम्बर 1932 में तृतीय गोलमेज सम्मेलन सम्पन्न हो चुका था और साइमन कमीशन की रिपोर्ट एवं गोलमेज सम्मेलन में की गई चर्चाओं के आधार पर भारत शासन अधिनियम 1935, (गवर्नमेण्ट इण्डिया एक्ट, 1935) ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया। ब्रिटिश भारत में प्रचलित किए गए संवैधानिक सुधारों की श्रृंखला में यह अनितम अधिनियम था।