1899-1905 वाइसराय और गवर्नर जनरल लाॅर्ड कर्जन

संभवतः किसी भी अन्य ब्रिटिश गवर्नर जनरल के विरूद्ध भारतीय लोगों के मन में इतनी अधिक उग्र घृणा ओर दुर्भावना जागृत नहीं हुई। जिनकी कर्जन के विरूद्ध हुई।वह भारत क प्रति ब्रिटिश साम्राज्यवाी नीतियों का नग्न प्रतीक था।जब उसने भारत में वाइसराय के रूप में पदभार ग्रहण किया उस। उस समय भारत भयंकर संकट के दौर से गुजर रहा था। 1896-98 मे महा अकाल के उपरान्त देश को विभिन्न भागों विशेषतः पिश्चिमी भारत को ब्याूबाॅनिक (गिन्टीदार) प्लेगने जकड़ लिया, जिसके परिणामस्वरूप कर्जन के काल में द्वितीय अकाल जांच आयोग नियुक्त किया गया।

विदेश नीति:- 1897-98 में सीमान्त कबाइली जातियों के विद्रोहों केकारण उसने संतुष्टीकरण की नीति का अनुसरण किया और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रात का गठन किया गया। कर्जन ने तिब्बत मेंरूसी विस्तारवाद की योजनाओं को विफल करने के लिए तिब्बत में एक सैनिक अभियान भेजा जो ल्हासा तक आगे बढ़ गया। (1904) इस अभियान के उपरान्त तिब्बत पर युद्ध का हर्जाना थोपा गया। इस हर्जाने कीआदायगी की जमानत या सुरक्षा के बतौर भारत में ब्रिटिश शासन ने तिब्बती प्रदेश चुम्बी घाटी पर 75 वर्षें के लिए अधिकार कर लिया। कर्जन की वैदेशिक साम्राज्यवादी नीतियों का लक्ष्य भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थिति को अभेद्य रूप से शक्तिशाली बनाना था। इसी दृष्टि से उसने अनेक आन्तरिक सुधारों को भी क्रियान्वित किया।

पुलिस सुधार 1902-03 संमपूर्ण ब्रिटिश साम्राज्य के पुलिस प्रशासन व्यवस्था की जाॅच के लिए सर एन्ड्रयु फ्रेजर की अध्यक्षता में एक पुलिस आयोग को नियुक्त किया गया। इस आयोग की रिपोर्ट में पुलिस बल को ’’कुशलता या समक्षमता से बहुत प्रशिक्षण एवं संगठन में दोशपूर्ण, भ्रष्ट एवं दमनपूर्ण बताया गया। इस आयोग ने समस्त ब्रिटिश प्रान्तों में पुलिस बल की संख्या वृद्धि एवं उनके वेतन वृद्धि करने तथा केन्द्रएवं प्रान्तों में अपराध गुप्तचार विभाग की स्थापना करने का सुझाव दिया।

प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम, 1904 –भारत की संास्कृतिक विरासत के सरंक्षण, परिरक्षण एवं पुनरूद्धार के लिए इस अधिनियम को पारित किया गया। और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की स्थापना की गई। विश्वविद्यालय आयोग 1902 एवं भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम 1904- इस आयोग के सुझावों के आधार पर इस अधिनियम को पारित किया गया था, जिसका उद्देश्य विश्वविद्यालय की कार्यकारिणी समितियों आदि में निर्वाचित सदस्यों के स्थन पर नामजद सदस्यों की संख्या वृद्धि करना था। आर्थिक सुधार- सुधारों के क्षेत्रों में अकाल आयोग आदि का गठन किया गया। इस आयोग ने कृषि के विस्तार का सुझाव दिया। कृषि एवं पशुधन के विकास एवं कृषि के क्षेत्र में वैज्ञानिक तरीकों को प्रचलित करने के लिए केन्द्रीय कृषि विभाग की स्थापना की गई। उद्योग एवं वाणिज्य विभाग की स्थापना की गईं। रेलवे के विकास के लिए रेलवे बोर्ड कागठन किया गया।

बंगाल का विभाजन:- 1905 कर्जन की महानम राजनीतिक भूल बंगाल विभाजन था, जिसका सर्वव्यापी रूप से भयंकर विरोध किया गया। अविभाजित बंगाल को (मुख्य)बंगाल और पूर्वी बंगाल के रूप में विभाजित किया एवं बंगाल के कुछ जिलों को असम के साथ शामिल कर दिया। इस कृत्य के पीेछे मुख्य उद्देश्य बंगाल के जुझारू राष्ट्रवाद की कमर तोड़ना था, परन्तु इस कार्य का प्रतिकूल ही प्रभाव पड़ा। बंगाल विभाजन के विरूद्ध एक अभूतपूर्व स्वरूप वाला देशव्यापी स्वदेशी आन्दोलन उठ खड़ा हुआ। स्वदेशी एवं बहिष्कार जैसे शब्दों को पहली बार स्वदेशी आन्दोलन के दौरान सुना गया। यद्यपि  1911 में बंगाल के विभाजन को निरस्त कर दिया गया। परंतु भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के निर्बाध गति से विकास का मार्ग किया। बंगाल विभाजन के निर्णय की घोषणा 19 जुलाई 1905 को भारत के तत्कालीन वाइसराय लॉर्ड कर्ज़न द्वारा की गयी थी। विभाजन 16 अक्टूबर 1905 से प्रभावी हुआ। विभाजन के कारण उत्पन्न उच्च स्तरीय राजनीतिक अशांति के कारण 1911 में दोनो तरफ की भारतीय जनता के दबाव की वजह से बंगाल के पूर्वी एवं पश्चिमी हिस्से पुनः एक हो गए|

1905-10 वाइसराय एव गर्वनर जनरल लार्ड मिन्टो

उसके कार्यकाल में सहसा राष्ट्रीय आंदोलन का विस्फोट हुआ, जिसके परिणामस्वरूप उग्रवादी, क्रांतिकारी और आंतकवादी गतिविधियें का उदय हुआ। इन गतिविधियों को रोकने के लिए अनेक दमनपूर्ण उपायों जैसेकि सार्वजनिक सभाओं के आयोजन को प्रतिबंन्धित करने के लिए आध्यादेश, समाचार-पत्र (अपराधों को भड़काने वाले समाचार प्रकाशित करने के विरूद्ध) अधिनियम 1908, विस्फोट पदार्थ अधिनियम आदि पारित किए गए।

इस प्रकार 1908 का वर्ष एक काला वर्ष था जिसमें से दमनात्मक काूनन पारित किये गये। ये उपाय अधिनियमों को पारित करने तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि इनके अंतर्गत मुकदमें चलाए और जनता का उत्पीड़न किया गया। बंगाल के विभाजन के विरूद्ध स्वदेशी आन्दोलन को मुचलने और देश के शेष भाग में बढ़ते हुए उग्रवादी विचार धारा को रोकने के लिए प्रमुख राष्ट्रवादियों पर मुकदमें चलाए गए और दिखावटी मुकदमों, अथवा बिना मुकदमा चलाए हुए ही दण्डित किया गया। इसका प्रथम दृश्टानत मई, 1907 में लाला लाजपत राय और अजीत सिंह को देश से निष्काशित करके बर्मा में मांडले भेजना था उसी वष्र उग्रवादी गुट के साथ नेताओं जैसे विपिनचन्द्र पल, अश्विनी कुमार दत्त और पंच अन्य को भी देश निकाले की सजादी गई। लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण जिसने सपूर्ण देश में भयंकर उत्तूजना जाग्रत की वह थी।

बाल गागाधर तिलक पर मुकदमा जिसके द्वारा उन्हें जुलाई 1908 मे छः वर्ष के लि देश निकाले की सजा दी गई। तिलक पर मुकदमा चलाने और उनकी सजा के विरूद्ध देशव्यापी हड़ताल और उपद्रव हुए। 1905 में कांगे्र के सूरत अधिवेशन में कांगे्रस में विघटन के बाद उदारवारियों ने उग्रवादियों को उनकी नियति पर छोड़ दिया और उदार वादी ब्रिटिश सरकार के प्रति आकृष्ट हुए। इन दमनपूर्ण परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में ब्रिटिश सरकार ने उदारवादियों के वंतुष्टीकरण के लिए कुद रियतों की घोषणा की। जिनमें दो रियासतें विशेष रूप से उल्लेखनीय है। एक तो वाइसराय की कार्यकारिणी परिषद में पहली बार भारतीय सदस्य को नियुेकत किया गया और दूसरा 1909 के संवैधानिक सुधारों (अर्थात् मिन्टो-मार्लें सुधारों) को पारित किया गया।

1909 के संवैधानिक सुधार में पहली बार बांटो और राज्य करो के सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए, मुसलमानों को पृथक निर्वाचक मंडल प्रदान किया गया। और 1909 अधिनियमके अंतर्गत,संशोधित विधायिकाओं मुसलमानोंको विशेष अधिकार प्रदान किए गए।इसी शरारत के परिणामस्वरूप 1947 मे भारत विभाजन हुआ। इस अवधि के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से उग्रवादियों के निष्कासन के कारण कांगे्रस ने अपना जनसमर्थन खो दिया और कई क्रांतिकारी संगठनों का गठन किया गया।

1910-16 वाइसराय और जनरल लार्ड हर्डिग

लाॅर्ड हंर्डिग ने अत्यत प्रतिकूल परिस्थितियों में वाइसराय का पदभार ग्रहण किया था। इसलिए उसने संतष्टीकरण विषयक अनेक कार्य किए जैसे कि 1911 में बंगाल के विभाजन को निरस्त करदिया। दूसरे महत्वपूर्ण कार्यभारत मे ब्रिटिश सामा्रज्यकीराजधानी को कलकत्ता से स्थानांतरित करना था। इन सभी परिवर्तनों की घोषणा दिल्ली में दिसम्बर 1911 में सम्राट जार्ज पंचम् के राज्याभिषेक दरबार में घोषित की गई।इन सन्तुष्टीकरण विषयक उपायों का उद्देश्य ब्रिटिश शासन के जनविरोधी कार्याें के विवरूद्ध भारत में जिस उग्र राष्ट्रवाी प्रतिक्रिया ने जन्म लिया था, उसे शान्त करना था। परन्तु दुर्भाग्यवश इन शमनकारी उपायों को बहुत विलम्ब से लागू किया गया था। राजनीतिक असन्तोष और क्रांतिकारी गतिविधियों ने भारत-भूमि में अपनी जड़ें अब तक मजबूत कर ली थीं। हर्डिग इस विभ्रम के प्रभाव सन्तुष्टिकरण विषयक यह कार्य कर रहा था। कि इनके द्वारा आतंकवादी आन्देलन को सफलता पूर्वक दबाया जा सकता है। परतु शीघ्र ही उस समय उसका मोहभंग हो गया। जब 23 दिसम्बर 1912 को दिल्ली में राजधानी स्थानान्तरण के औपचारिक समारोह के अवसर पर जब वह जलूस के रूप में दिल्ली में प्रवेश कर रहा था। कि उस पर चांदनी चैक में बम फेंका गया।

अलग वर्ष (1913) कहीं अधिक घटनापूर्ण रहा और उग्रवादी राष्ट्रावाद व्यापक प्रेस गतिविधियों के रूप मे उदित हआः फिरोज शाह ने बम्बई ने बम्बई क्राॅनिकल का और गणेश शंकर विद्यार्थी ने प्रताप का प्रकाषन प्रारंभ किया। गांधीजी भी उस समय राजनीतिक क्षेत्र में उतर आए जब दक्षिण अफ्रीका में अपंजीकृत ववाहों को अवैध घोषित करने के विरिूद्ध उन्होने सत्यग्रह का संचालन किया। मुस्लिम लीग ने लखनऊ अधिवेशन में अपने नवीन संविधान को पारित किया और सेना फ्रैंसिस्को में गदर पार्टी का गठन किया गया।

4 अगस्त 1914 को प्रथम विश्वयुद्ध केेेे छिड़ जाने सेइन आन्दोलनों को शक्ति एवं प्रेरणा मिली। भारत को इस महायुद्ध में घसीटा गया और ब्रिटिश साम्राज्यवादी की सुरक्षा के लिए भारतीय सैनिकों को अपने प्राणों की बलि देनी पड़ी 1915 में ही गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से भारत वापस आ गए।

तिलक को अपनी कारावास कीसजा पूर्णहोने के छः महा पूर्व ही रिहा कर दिया गया। सितम्बर 1915 में दो माह राष्ट्रवादी नेतओं गोखले और फिरोज शाह मेहता की मृत्यु हो गई। लेकिन उनके अभाव को गंाधीजी ने पूरा कर दिया, जिन्होने अहिंसावादी राष्ट्रीय आन्दोलन का शुभारम्भ किया। गांधीजी ने अपनी हत्या तक भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को अपना सफल नेतृत्व प्रदान किया और इसीलिए इस अवधि को सी सही ही गांधीयुग कहा गया है।

प्रथम विश्वयुद्ध के कारण भारतीय मुसलमानों में इस्लाम धर्म के खलीफा अथवा प्रधान तुर्की के सुल्तान की पराय और उसे सिंहासनच्युत करने के कारण असन्तोष की भावना भडकी। मुसलमानों ने अपने सम्मान और स्थिति की सुरक्षा के लिए खिलाफत आन्दोलन खड़ा कर दिया।

1916-21 वाइस राय और गर्वनर जनरल चेम्सफोर्ड

उसका कार्यकाल अनेक घटनाओं के कारण स्मरणीय है, जिनमें बाल गांगाधर तिलक एवं श्रीमती एनी बीसेन्ट के नेतृत्वमें संचालित होम रूल यास्वराज आन्दोलन एवं खिलाफत आन्दोलन सर्वाधिक उल्लेखनीय है। इसी अवधि में महात्मा गांधी भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सर्वाेच्च नेता के रूप में उदित जिसमें उन्होनें असहायोग और सतयाग्रहके अपने नवीन ब्रहास्त्र का खुलकर प्रयोग किया। इस अवधि की कुद अन्य महत्पूर्ण घटनांए थीः 1919 का संवैधानिक सुधार अधिनियम रौलट के रूप में ज्ञात उत्पीड़नकारी अधिनियम का क्रियान्वयन एवं उसके विरूद्ध गांधीजी द्वारा सत्याग्रहका नेतृत्व जलियावाला बाग, अमतसर में निर्दोश लोगों का नृशंस नरसंहारः गांधीजी के नेतृत्व में प्रथम सर्वव्यापी असहयोग एवं खिलाफत आन्दोलन का संचालन।

अगस्त 1920 को तिलक की मृत्यु के उरांत महात्मा गांधी जनमानस के निर्विवाद नेता हो गए। 1919 के संवैधानिक सुधार अधिनियम को 1 जनवारी 1921 को लागू किया गया, जिसके द्वारा प्रान्तों में द्वैध शासन की स्थापना हुई। चेम्सफोर्ड के शासनकाल मे दो अन्य महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। एक तो बार भारतीयों को ब्रिटिश सेना के कमीसन्ड पदों के लिए सक्षम माना गया और दूसरा एक भारतीय व्यक्ति सर एस0पी0सिन्हा को बिहार का गर्वनर नियुक्त किया गया।

शैक्षिक दृष्टि सेभी दो महत्वपूर्ण कार्य किए गए वे थेः 1916 पूणा में घोघों केशव द्वारा प्रथम महिला विश्वविद्यालय की स्थापना और कलकत्ता विश्वविद्यालय की स्थिति उसके विकास की संभावनाओं जांच एंव रचनात्मक सुझाव देने के लिए 1917 में सैडलेर आयोग की नियुक्ति की गई। इस आयोग की रिपोर्ट के आधार पर भारत में लगभग सर्वत्र शैक्षिक नीतियों में परिर्वतन आया और अनेक कार्यक्रमों को क्रियान्वित किया गया