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भारत में अंग्रेजों की कम्पनी की स्थापना (Establishment of the British company in India)

31 दिसम्बर 1600 को ब्रिटेन की महारानी एलिजावेथ प्रथम ने एक अंग्रेज कम्पनी को 15 वर्ष के लिए पूर्व के साथ व्यापार करने की अनुमति प्रदान की। इस कम्पनी का प्रारम्भिक नाम The Governer and Company of Marchants of Landon Trading into the East Indies था। 1688 में एक और कम्पनी न्यू कम्पनी का उदय हुआ 1702 ई0 में इन दोनों कम्पनियों ने आपस में मिलने का फैसला किया और 1708 में मिल गयी तब इसका नाम The Governer and Company of Marchants of Landon Trading into the East Indies रखा गया। 1833 के चार्टर एक्ट द्वारा इसका नाम ईस्ट इंण्डिया कम्पनी पड़ गया।

अंग्रेजी फैक्ट्रियां

ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना के बाद 1601 ई0 में इन्होंने अपने पहले अभियान दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में किये। 1608 ई0 में जेम्स-प्रथम ने सर्वप्रथम हाॅकिन्स को राजदूत बनाकर अकबर के नाम का पत्र देकर भारत भेजा परन्तु वह मुगल सम्राट जहाँगीर के दरबार में पहुँचा। वह तुर्की और फारसी दोनों भाषायें बोल सकता था। उसने फारसी भाषा में वात भी किया। जहाँगीर ने खुश होकर उसे 400 का मनसब प्रदान किया और 1608 ई0 में ही सूरत में एक Factory खोलने की अनुमति दी परन्तु पुर्तगीज दबाव के कारण यह अनुमति शीघ्र ही रद्द कर दी गयी। इस प्रकार हाॅकिन्स को व्यापारिक रियासत प्राप्त करने में सफलता नहीं मिली। अब अंग्रेजों ने दक्षिण भारत की ओर रुख किया और उन्होंने 1611 ई0 में मसूली पट्टम में एक व्यापारिक कोठी खोली। 1611ई0 में गुजरात के तट पर स्वाल्ली के युद्ध में पुर्तगीजों को अंग्रेजों ने परास्त कर दिया तब इन्हें 1612 ई0 में सूरत में Factory खोलने की अनुमति दी गयी जो इनकी किले-बन्द फैक्ट्री थी।1623 ई0 तक इन्होंने सूरत भड़ौच अहमदाबाद, आगरा, आदि क्षेत्रों में भी फैक्ट्रियां स्थापित कर लीं।

  • 1608    –    सूरत-प्रथम फैक्ट्री
  • 1611    –    मसूली पट्टम-प्रथम दक्षिण भारत में फैक्ट्री
  • 1612    –    सूरत प्रथम किलेबन्द फैक्ट्री।

दक्षिण में पूर्वी तट पर फैक्ट्रियां

1611 मसूली पट्टम (मछलीपट्टम) गोलकुण्डा राज्य का प्रसिद्ध बन्दरगाह था। यहाँ से अंग्रेज फुटकर कपड़े फारस आदि देशों को भेजते थे।
1632 सुनहला फरमान:- इस फरमान के द्वारा गोलकुण्डा के सुल्तान ने 500 पगोड़ा वार्षिक कर के बदले में व्यापारिक छूट प्रदान की। इसे ही Golden Farmer कहा गया।
1639:- एक अंग्रेज फांसिसडे ने चन्द्रगिरि के राजा से एक क्षेत्र किराये पर लिया जहाँ पर एक किलेबन्द फैक्ट्री फोर्टसेंट जार्ज की स्थापना की गई।
उत्तर-पूर्व तट पर फैक्ट्री:-  1633:- उड़ीसा में हरिहरपुर तथा बाला सोर में फैक्ट्रियां स्थापित की गयी।
1651:- ब्रिजमैन ने हुगली में व्यापारिक कोठी स्थापित की। फिर उसी वर्ष पटने और कासिम बाजार में भी व्यापारिक कोठियां स्थापित हुई।
1658:- बंगाल बिहार उड़ीसा और कोरोमण्डल तट की सभी प्रमुख फैक्ट्रियाँ फोर्टसेंट जार्ज के अधीन कर दी गयी।
बंगाल में अंग्रेजी व्यापार की प्रमुख वस्तुयें रेशमी कपड़े, सूती कपड़े, शोरा, और चीनी थी।
1669:- इस वर्ष सूरत के गर्वनर औगियान (एवं बम्बई के प्रमुख) ने प्रसिद्ध वक्तब्य दिया ’’अब समय का तकाजा है कि हम अपने एक हाथ में तलवार लेकर अपने व्यापार का प्र्बन्ध करें’’।
बम्बई:- बम्बई का द्वीप पुर्तगीज राजकुमारी कैथरीन की ब्रिटिश राजकुमार चाल्र्स के साथ विवाह के उपलक्ष्य में पुर्तगालियों ने अंग्रेजों को 1661 ई0 में दिया, जिसे 1668 ई0 में चाल्र्स ने ईस्ट-इंण्डिया कम्पनी को 10 पौंड वार्षिक किराये पर प्रदान किया।
1687:- इस वर्ष तक आते-आते सूरत की जगह बम्बई अंग्रेजों की प्रमुख व्यापारी बस्ती बन गयी।
1688:- बम्बई के प्रमुख सरजाॅन चाइल्ड ने बम्बई और पश्चिमी समुद्र तट पर कई मुगल जहाजों को पकड़ लिया परन्तु औरंगजेब ने उनका कठोरता से दमन किया। डेढ़ लाख रूपये हर्जाना के एवज में उन्हें आम माॅफी दे दी गयी।

बंगाल में अंग्रेजी शक्ति का विकास

1651:- बंगाल के सूबेदार सुजा ने एक फरमान के जरिये अंग्रेजों को 3000 वार्षिक कर के बदले बंगाल से व्यापार करने की छूट प्रदान की। ऐसा इसलिए किया गया था कि एक अंग्रेज चिकित्सक ग्रेबियन ब्रांटन ने राज परिवार की किसी महिला का इलाज किया था।
1651:- बंगाल के सूबेदार सुजा ने एक फरमान के जरिये अंग्रेजों को 3000 वार्षिक कर के बदले बंगाल से व्यापार करने की छूट प्रदान की। ऐसा इसलिए किया गया था कि एक अंग्रेज चिकित्सक ग्रेबियन ब्रांटन ने राज परिवार की किसी महिला का इलाज किया था।
1656:- उपरोक्त व्यापारिक छूट की पुनः पुष्टि की गयी।
1672:- साइस्ता खाँ ने पुनः छूट की पुष्टि की।
1680:- औरंगजेब ने एक फरमान जारी कर अंग्रेजों से 2% चुंगी और 1.5 %जजिया कर वसूलने की आज्ञा जारी की।
1688:- अंग्रेजों ने हुगली को लूटा। बाद में अनुनय विनय के कारण उन्हें पुनः व्यापार करने की छूट प्रदान की गयी।
1690:- सूतानाती में जाब चार्नोक ने अंगे्रज कोठी की स्थापना की यहीं पर बाद में अंग्रेजों की भावी राजधानी कलकत्ता की नींव पड़ी। इसी कारण चार्नोक को कलकत्ता का जन्मदाता माना जाता है।
1688:- बंगाल के सूबेदार अजीमुशान ने अंग्रेजों को तीन गाँव-सूतानाती, कलिकाता और गोविन्दपुर की जमींदारी प्रदान की यहीं पर फोर्ट विलियम की नींव पड़ी। सर चाल्र्स आयर यह फोर्ट विलियम का पहला गर्वनर बना। 1774 ई0 से 1911 ई0 तक यह फोर्ट विलियम अथवा कलकत्ता ब्रिटिश काल की राजधानी बनी रही।
नारिश मिशन (1698):- यह मिशन औरंगजेब के दरबार में व्यापारिक रियासत प्राप्त करने के उद्देश्य से गया था। परन्तु इसे प्राप्त करने में ये असफल रहा।
जाॅन सरमन मिशन (1715):- जाॅन सरमन की अध्यक्षता में कलकत्ता से एक मिशन फर्रुखसियर के दरबार में 1715 में पहुँचा।
1 हैमिल्टन:- एक चिकित्सक जिसने फरुखसियार की एक बीमारी का इलाज किया था।
2. ख्वाजा सहूर्द:- इसमें एक आरमेनियन दु भाषिया भी सम्मिलित था। फरुखसियार ने प्रसन्न होकर 1717 ई0 में एक शाही फरमान जारी किया जिसके द्वारा 3000रू0 वार्षिक कर के बदले में कम्पनी को बंगाल से व्यापार करने की छूट प्राप्त हो गयी तथा बम्बई में कम्पनी के द्वारा ढाले गये सिक्कों को सारे मुगल राज्य में चलाने की अनुमति मिल गयी।
ब्रिटिश इतिहासकार ओर्म (Aurm) ने इसे कम्पनी का मैग्नाकार्टा कहा।

डेन अथवा डेनिश

अंग्रेजों के बाद डेन 1616 में भारत आये। इन्होंने 1620 में तंजौर के ट्रांके बोर में पहली फैक्ट्री स्थापित की। इनकी दूसरी फैक्ट्र 1676 में बंगाल के सीरमपुर में स्थापित हुई। 1745 ई0 में इन्होंने अपनी फैक्ट्रियां अग्रेजों को बेंच दी और ये भारत से चले गये।

फ्रांसीसी

फ्रांस के सम्राट लुई चैदहवाँ के समय में उसके प्रसिद्ध प्रधानमंत्री कोल्बर्ट ने फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना की। प्रारम्भ में इसका नाम कम्पनी द इण्ड ओरियण्टल था। फ्रांसीसियों ने अपनी प्रारम्भिक समुद्री मात्रायें द%E

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