British Policy towards Princely States

देशी रियासतों के प्रति ब्रिटिश नीति (British Policy towards Princely States)

यद्यपि ब्रिटिश शासन की रियासतों के प्रति कोई निश्चित नीति नहीं थी, तथापि उन्होंने देश, कारक व परिस्थिति के अनुसार राजनैतिक सर्वोच्चता को प्राप्त करने के लिए विभिन्न प्रकार की नीतियों का अनुसरण किया। विलियम ली वार्नर ने अपनी पुस्तक ’द नेटिव स्टेट्स आॅफ इंडिया (The Native States of India) में रियासतों के प्रति ब्रिटिश नीति (British Policy) को तीन चरणों में वर्गीकृत किया है-
(क) घेरे की नीति, 1765-1813 ई0 (Policy of Ring Fence, 1765-1813)
(ख) अधीनस्थ पृथक्करण की नीति, 1813-1858 ई0 (Policy of Subordinate Isolation, 1813-1858)
(ग) अधीनस्थ संघ की नीति, 1858-1935 ई0 (Policy of Subordinate Union, 1858-1935)

दूसरी ओर, कुछ विद्वानों ने 1935 ई0 से 1947 ई0 तक की ब्रिटिश नीति को ’समान संघ की नीति’ (Policy of Equal Federation) की संज्ञा दी है। आइए, इन चारों नीतियों का कुछ विस्तार से वर्णन करें-

(क) घेरे की नीति, 1765-1813 ई0 (Policy of Ring Fence, 1765-1813)

  • चूँकि कंपनी का राजनैतिक दृष्टि से यह शैशवकाल था, अतएव कंपनी ने सीमित उत्तरदायित्व एवं राज्यों के प्रति अहस्तक्षेप की नीति का अनुपालन किया।
  • अपने जीते हुए प्रदेशों के पास ’बफर स्टेट’ की स्थापना करना उसका उद्देश्य था। उदाहरणस्वरूप, बंगाल को सुरक्षित रखने के लिए अवध के साथ संधि कर उसे ’बफर स्टेट’ बनाया गया क्योंकि वहाँ मराठा आक्रमण का खतरा विद्यमान था।
  • लेकिन वारेन हेस्टिंग्स के समय अवध के मामले में हस्तक्षेप, रूहेला युद्ध, मराठा युद्ध, द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध आदि अहस्तक्षेप की नीति से विचलन को दर्शाते हैं। इसी प्रकार लार्ड कार्नवालिस ने टीपू के विरूद्ध तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध लड़कर अहस्तक्षेप की नीति का उल्लंघन किया।
    कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस काल में कंपनी ने अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए अहस्तक्षेप की नीति का पालन किया, किन्तु आवश्यकता पड़ने पर उसका उल्लघंन भी किया।

(ख) अधीनस्थ पृथक्करण की नीति, 1813-1858 ई0 (Policy of Subordinate Isolation, 1813-1858)

  • इस काल में ब्रिटिश औद्योगिक नीति के तहत मुक्त व्यापार की नीति को अपनाया गया जिसके लिए राज्यों को अधीन बनाए जाने व उन पर प्रत्यक्ष नियंत्रण की आवश्यकता थी। इसलिए हेस्टिंग्स के आगमन के साथ ही क्षेत्र-विस्तार और युद्ध की नीति की शुरूआत की गई।
  • इस काल में वह नीति अपनाई गई जिसमें राज्यों को ब्रिटिश सत्ता के अधीन कर अन्य राज्यों से उनके संबंध विच्छेद कर देने का तत्व प्रमुख था ताकि वे कंपनी के विरूद्ध संगठित न हो सकें।
  • इस काल में मराठों के साथ अलग-अलग संधियाँ की गईं तथा राजपूत राज्यों पर नियंत्रण स्थापित हुआ। बेंटिक-काल में कुशासन के आरोप में भी राज्यों को मिलाया गया।
  • डलहौजी के काल में साम्राज्य का विस्तार पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर हुआ जिसमें व्यपगत सिद्धांत ;क्वबजतपदम स्ंचेमद्ध प्रमुख रहा।

(ग) अधीनस्थ संघ की नीति, 1858-1935 ई0 (Policy of Subordinate Union, 1858-1935)

  • सन् 1857 के विद्रोह से अंग्रेजों को इस बात का एहसास हो गया कि यह विद्रोह विलय एवं रियासतों के प्रति अलगाव की नीति का परिणाम था। अतः अंग्रेजों ने एक ऐसी नीति का अनुसरण आवश्यक समझा जिसमें स्थानीय शासकों की वफादारी एवं सहयोग प्राप्त किया जा सके। अतः एक नीति बनाई गई जिससे भारतीय रियासतों को अलग न रखा जाये, बल्कि उन्हें भारतीय प्रशासन में श्रेष्ठ स्थान दिया जाये।
  • महारानी विक्टोरिया की घोषणा के माध्यम से विलय की नीति का त्याग किया गया एवं कहा गया कि ब्रिटिश सरकार भारतीय रियासतों का विलय नहीं करेगी। इसके अतिरिक्त देशी नरेशों को गोद लेने के अधिकार लौटा दिए गए।
  • अब अंग्रेजों की नीति यह थी कि कुशासन के लिए शासकोें को दंडित किया जाये या आवश्यकता पड़ने पर हटा भी दिया जाये, लेकिन राज्यों का विलय न किया जाये।
  • सन् 1876 में देशी रियासतों पर ब्रिटिश सर्वोच्चता को वैधानिक रूप दे दिया गया तथा लाॅर्ड लिटन ने महारानी विक्टोरिया को ’भारत की साम्राज्ञी’ घोषित कर दिया। ब्रिटिश सर्वोच्चता ने मुगल सर्वोच्चता का स्थान ग्रहण कर लिया तथा इस तरह से भारतीय रियासतें अंग्रेजों के अधीन हो गई।
  • इस काल में अधीनस्थता के साथ राजनैतिक एकीकरण की प्रवृत्ति उभर कर सामने आई। आधुनिक साधन, जैसे-रेलवे, डाक-तार, सड़कें, प्रेस तथा शिक्षा-व्यवस्था ने राजनीतिक एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
    इस प्रकार, इस काल में ब्रिटिश सर्वोच्चता पूरी तरह स्थापित हो गई एवं भारतीय रियासतें ब्रिटिश शासकों के अधीन हो गई।

(घ) ’समान संघ की नीति’ 1935-1947 ई0 (Policy of Equal Federation)

  • इस समय तक भारतीय राष्ट्रवाद परिपक्व हो चुका था तथा राष्ट्रीय भावनाओं को नियंत्रित करने के लिए अस्त्र के रूप में संवैधानिक सुधारों को लक्ष्य बनाया गया। इसी संदर्भ में 1935 ई0 का भारत शासन अधिनियम पारित हुआ। इस अधिनियम में भारतीय राज्यों का एक संघ बनाने की बात की गई, यद्यपि ऐसा नहीं हुआ और संघ अस्तित्व में नहीं आया।
  • क्रिप्स मिशन, वैवेल योजना, कैबिनेट मिशन आदि के माध्यम से संवैधानिक सुधारों की बात की गई। माउंटबेटन योजना में ब्रिटिश सर्वोच्चता के समाप्ति की बात की गई। अन्ततः 1947 ई0 में भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पारित हुआ और भारत से ब्रिटिश सत्ता की समाप्ति हुई।

 

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