हाईकोर्ट,न्यायिक पुनरावलोकन,जनहितवाद,महान्यायवादी,महाधिवक्ता

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  • संविधान के भाग-6 में, अनु0 214 से 231 तक हाईकोर्ट का प्रावधान है।
  • अनु0 214 के अनुसार प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा।
  • अनु0 230 के अनुसार संसद विधि बनाकर किसी उच्च न्यायालय की अधिकारिता का विस्तार संघ राज्य तक कर सकता है।
  • अनु0 231 के अनुसार संसद विधि बनाकर दो या अधिक राज्यों के लिए एक हाईकोर्ट की व्यवस्था कर सकती है।
  • अनु0 215 के अनुसार उच्च न्यायालय अभिलेखीय न्यायालय होगा।
  • अनु0 216 के अनुसार प्रत्येक उच्च न्यायालय, मुख्य न्यायाधीश और ऐसे अन्य न्यायाधीशों से मिलकर बनेगी जिन्हें राष्ट्रपति जी समय-समय पर नियुक्त करना आवश्यक समझें।
  • अनु0 217 के अनुसार राष्ट्रपति जी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश और उस राज्य के राज्यपाल के परामर्श पर करेंगे तथा अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति जी भारत के मुख्य न्यायाधीश तथा उस राज्य के हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और उस राज्य के राज्यपाल के परामर्श पर करेंगे। नियुक्ति में एडोकेट आॅन रिकार्ड का निर्णय प्रभावी होगा अर्थात् मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में वरिष्ठता का अनुपालन किया जायेगा तथा अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश अपना परामर्श चार वरिष्ठ जजों के पैनल के परामर्श के साथ देगा (कोलेजियम व्यवस्था)

हाईकोर्ट के न्याधीश की योग्यता (अनु0 217) है:-

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. वह कम-से-कम 10 वर्षों तक न्यायिक पद (जज) धारण किया हो। अथवा
  3. वह किसी न्यायालय में 10 वर्षों तक लगातार वकालत किया हो।

अनु0 222 के अनुसार हाईकोर्ट के जजों का स्थानान्तरण राष्ट्रपति जी भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श पर करेंगे।
अनु0 224 के अनुसार हाई कोर्ट के कार्यों में अस्थायी वृद्धि होने की स्थिति में राष्ट्रपति जी दो वर्षों के लिए अतिरिक्त या अपर या एडीशनल न्यायाधीश की नियुक्ति करेंगे।
अनु0 224 के अनुसार उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की अनुपस्थिति में राष्ट्रपति जी कार्यकारी न्यायाधीश की नियुक्ति करेंगे।
अनु0 224 (A) के अनुसार हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति जी की सहमति से सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की सेवा ले सकते हैं।

कार्यकाल:-

  • हाईकोर्ट के जजों का कार्यकाल अधिकतम 62 वर्षों तक का होता है। इसके पूर्व ये अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति जी को दे सकते हैं या संसद की अनुमति से राष्ट्रपति जी हटा सकते हैं।
  • अनु0 217 के अनुसार हाईकोर्ट के जजों को उसी रीति से हटाया जायेगा जिस रीति से सुप्रीम कोर्ट के जजों को हटाया जाता है।
  • अनु0 220 के अनुसार हाईकोर्ट का जज रिटायर होने के बाद अन्य हाईकोर्ट एवं सुप्रीमकोर्ट को छोड़कर किसी अन्य न्यायालय में वकालत नहीं करेगा।

वेतन:-

  • इनके वेतन की चर्चा अनु0 221 तथा अनुसूची दो में है।
  • हाईकोर्ट के जजों के वेतन-भत्ते का निर्धारण समय-समय पर संसद करेगी।
  • इनका वेतन-भत्ता राज्य की संचित निधि पर भारित होगा।
  • कार्यकाल के दौरान इनके वेतन-भत्तों में कोई अलाभकारी परिवर्तन नहीं होगा, परन्तु राष्ट्रीय वित्तीय आपातकाल के दौरान उसमें परिवर्तन किया जा सकता है।

शपथ:-

  • इनके शपथ की चर्चा अनु0 219 एवं अनुसूची तीन में है।
  • हाईकोर्ट का जज राज्यपाल या उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति के समक्ष संविधान एवं विधि के संरक्षण की शपथ लेता है।

कार्य:-

1. आरम्भिक अधिकारिता (अनु0 225):-

  •  हाईकोर्ट को राजस्व संग्रह से सम्बन्धित विशेषाधिकार प्राप्त है।
  • अनु0 226 के अन्तर्गत वह मौलिक अधिकारों की रक्षा करने के लिए रिटें जारी करता है।
  • सांसदों, विधायकों, स्थानीय निकायों आदि के निर्वाचन विवाद को सुनता है।
  • विवाह, तलाक, वसीयत, कम्पनी विवाद आदि विषयों को सुनता है।
  • संविधान एवं विधि की व्याख्या एवं न्यायिक पुनरावलोकन कर सकता है।

2. अपीलीय अधिकारिता:- हाईकोर्ट अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा दिये गये दीवानी और फौजदारी मामलों के निर्णय पर अपील सुनती है। उल्लेखनीय है कि सेशन जज को मृत्यु दण्डादेश देने का अधिकार है, परन्तु इसकी पुष्टि अनिवार्य रूप से हाई कोर्ट से ली जायेगी।
3. अधीक्षण संबंधी अधिकारिता:- हाईकोर्ट को सैन्य अधिकरणों को छोड़कर अन्य समस्त अधीनस्थ न्यायालय के अधीक्षण का अधिकार है। (अनु0 227)

  • हाईकोर्ट को अधीनस्थ न्यायालयों से सीधे वाद मंगाने का अधिकार है। (अनु0 228)
  • हाईकोर्ट को जिला जजों की नियुक्ति एवं पदोन्नति में राज्यपाल को परामर्श देने का अधिकार है (अनु0 233)

नोट:- न्यायिक निर्णय चन्द्रकुमार बनाम भारत संघ केस (1997) में सुप्रीमकोर्ट ने कहा अनु0 226, 227, 228, 32 संविधान का मूल ढाँचा है और इसे समाप्त नहीं किया जा सकता।

  • सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक कार्य की भाषा अंग्रेजी होगी।
  • किसी राज्य हेतु प्रशासकीय न्यायाधीकरण स्थापित करने की शक्ति संसद में है।
  • अनु0 130 के अनुसार सुप्रीमकोर्ट दिल्ली में होगा अथवा अन्य स्थान पर होगा जिसे मुख्य न्यायाधीश समय-समय पर राष्ट्रपति जी के अनुमोदन से करे।
  • हाईकोर्ट में अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी या उस राज्य की भाषा का प्रयोग करने की अनुमति राज्यपाल जी, राष्ट्रपति जी की पूर्वानुमति से दे सकते हैं।
  • रामजन्मभूमि व बाबरीमस्जिद विवाद, मुख्य रूप से स्वात्वाधिकारी मुकदमें के रूप में आया।
  • चलित न्यायालय के मानसिक पुत्र डा0 ए0पी0जे0 अब्दुल कलाम थे।
  • भारत में न्यायिक पुनरावलोकन का सिद्धान्त विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुरूप है।
  • आइवर जैनिंग ने कहा ’’भारतीय संविधान वकीलों का स्वर्ग है।’’ उन्होंने यह बात इसलिए कही क्योंकि संविधान के प्रावधान अत्यन्त जटित है।
  • भारतीय संविधान सभा में वकीलों का आधिपत्य था।
  • दिल्ली ऐसा संघशासित राज्य है जिसका अपना अलग हाईकोर्ट है।
  • हरियााण एवं पंजाब का एक हाईकोर्ट चण्डीगढ़ में है।
  • इलाहाबाद हाईकोर्ट सर्वाधिक जजों वाला या सबसे बड़ा हाईकोर्ट है।
  • ईकोर्ट को केन्द्र एवं राज्य के विधियों का न्यायिक पुनरावलोकन करने का अधिकार है।
  • जिला न्यायाधीश की नियुक्ति राज्यपाल हाईकोर्ट के परामर्श पर करता है। अनु0 233 (1)
  • वर्तमान में 24 हाईकोर्ट है। (मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा 2013)
  • किसी जज के आयु संबंधी विवाद पर निर्णय राष्ट्रपति जी भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श पर करेंगे।
  • अनु0 149(2) के अनुसार न्यायालय विधानमण्डल के कार्यवाहियों की जांच नहीं करेगी।
  • न्यायालय ने शक्ति पृथककरण सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है।
  • न्यायालय ने तमाम प्रगतिशील निर्णय दिये हैं।
  • अनु0 140 के अनुसार संसद विधि द्वारा सुप्रीमकोर्ट को अनुपूरक शक्तियां प्रदान कर सकती है।
  • गुवाहवाटी हाईकोर्ट सर्वाधिक खण्डपीठ वाला, सर्वाधिक अधिकार वाला हाईकोर्ट है। इसके क्षेत्र में सात राज्य हैं। यथा-असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम, मेघालय, नागालैण्ड, त्रिपुरा आदि।

न्यायिक पुनरावलोकन:-

  • न्यायिक पुनरावलोकन सिद्धान्त का स्पष्ट उल्लेख भारतीय संविधान में नहीं हुआ है, परन्तु इसका आधार है-अनु0 13 (2) अनु0 32, 226, 131, 243 और जजों द्वारा संविधान के संरक्षण की शपथ।
  • न्यायिक पुनरावलोकन की अवधारणा सर्वप्रथम 1803 में मारबरी बनाम मेडीसन केस में यू0एस0ए0 में आयी। जिसके मुख्य न्यायाधीश मार्शल थे। भारत में न्यायिक पुनरावलोकन की अवधारणा यू0एस0ए0 से लिया गया है तथा यू0एस0ए0 से सीमित है।
  •  न्यायिक पुनरावलोकन से तात्पर्य न्यायालय की उस शक्ति से है जिस शक्ति के बल पर वह विधायिका द्वारा बने कानूनों, कार्यपालिका द्वारा जारी किये गये आदेशों तथा प्रशासन द्वारा किये गये कार्यों की जांच करती है कि वह मूल ढांचें के अनुरूप है या नहीं। मूल ढांचे के प्रतिकूल होने पर न्यायालय उसे अवैध घोषित करती है।
  • इंदिरा राजनारायण मामले में (1975) न्यायालय ने कहा न्यायिक पुनरावलोकन संविधान का मूल ढांचा है। अतः इसे समाप्त नहीं किया जा सकता। 42/1976 द्वारा अनु0 368 में खण्ड चार एवं पांच जोड़कर न्यायिक पुनरावलोकन को सीमित किया गया। मिनर्वा मिल केा 1980 में नयायालय ने 368 के खण्ड चार और पांच को इस आधार पर अवैध कर दिया कि यह मूल ढांचे का उल्लंघन करता है।
  • फाइनर ने कहा ’’न्यायिक पुर्नविलोकन एक सीमेन्ट है, जो संघीय ढांचे को मजबूत करता है।’’
  • पं0 जवाहर लाल नेहरू एवं अमेरिकी राष्ट्रपति रुजवेल्ट ने न्यायिक पुर्नविलोकन की शक्ति को तीसरे सदन के रूप में पहचाना है और कहा है कि यह लोकतन्त्र के प्रतिकूल होगा।
  • सीमाओं के भीतर हम अपने जजों का आदर करते हैं, परन्तु कोई न्यायाधीश या न्यायालय व्यवस्थापिका का तीसरा सदन नहीं बन सकता-जवाहर लाल नेहरु

जनहितवाद:-

  • जनहितवाद से तात्पर्य उस वाद से है जो आम जनता के हित में लाया जाता है।
  • भारत में जनहितवाद के जनक पी0एन0 भगवती हैं। अन्य समर्थन न्यायामूर्ति कृष्णस्वामी, चन्द्रचूड़, न्यायमूर्ति जे0एस0 वर्मा आदि हैं।
  • भारत में इसकी शुरुआत 1985 में दिल्ली से हुई (पी0एन0 भगवती द्वारा)
  • जनहितवाद के कारण वर्तमान में न्यायिक सक्रियता में वृद्धि हुई है।
  • भारत में जनहितवाद की शुरूआत न्यायिक निर्णय से हुई है।
  • जनहितवाद की शुरुआत अमेरिका से मानी जाती है। सम्भवतः भारतीय जनहितवाद यू0एस0ए0 से प्रभावित है।

उद्देश्य:-

  1.  सार्वजनकि न्याय उपलब्ध करना ताकि निर्बल, दुर्बल, शोषितों को न्याय उपलब्ध हो सके।
  2. न्यायिक प्रक्रिया को सरल बनाना।
  3. सस्ता न्याय उपलब्ध करना।
  • जनहितवाद का आधार अनु0 32 एवं अनु0 226 है।
  • एस0पी0 गुप्ता बनाम भारत संघ केस में सुप्रीमकोर्ट ने कहा किसी निर्बल, दुर्बल और शोषित को न्याय दिलाने के लिए कोई न्यायप्रिय व्यक्ति या संस्था पोस्टकार्ड पर न्यायालय में आवेदन कर न्यायिक कार्यवाही करा सकता है।
न्यायिक सक्रियता:-
  • जब न्यायापालिका सार्वजनिक हित में अपना न्यायिक कार्य करने के साथ-साथ विधायिका, कार्यपालिका ओर प्रशासकीय मामलों में हस्तक्षेप करने लगता है, तो उसे न्यायिक सक्रियता कहते हैं। वर्तमान में न्यायिक सक्रियता के बढ़ने के कारण जनहितवाद है।
  • वर्तमान में न्यायिक सक्रियता लगभग हर क्षेत्रों में हैं। जैसे-
  1. सामाजिक क्षेत्र में न्यायालय ने कहा प्राथमिक शिक्षा पाने का अधिकार चिकित्सा पाने का अधिकार मौलिक अधिकार है।
  2. धार्मिक क्षेत्र में न्यायालय ने कहा पंथनिरपेक्षता संविधान का मूल ढांचा है।
  3. राजनीतिक क्षेत्र में न्यायपालिका ने कहा यदि विद्वेषपूर्ण ढंग से सरकार को बदला गया है तो पुरानी सरकार को बहाल किया जाये।

महान्यायवादी-अनु0 76

  • महान्यायवादी की अवधारण ब्रिटेन से प्रभावित है।
  • महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं।
  • उच्चतम न्यायालय के जज की जो योग्यता है। वही उसकी योग्यता होगी।
  • यह राष्ट्रपति जी के प्रसादपर्यन्त कार्य करता है अर्थात उसका कोई निश्चित कार्यकाल नहीं है। राष्ट्रपति किसी भी समय और किसी भी आधार पर इसे हटा सकता है।
  • यह भारत सरकार का प्रथम विधि अधिकारी है। यह सरकार को तमाम वैधानिक और संवैधानिक मामलों में सुझाव देता है तथा सरकार के वकील के रूप में कार्य करता है।
  • अनु0 88 के अनुसार आवश्यकता पड़ने पर यह संसद की कार्यवाहियों में तथा संसद की समितियों में भाग लेता है, परन्तु मतदान नहीं करता है।
  • महान्यायवादी की सहायता के लिए एक सालिसीटर जनरल तथा दो अतिरिक्त सालीसीटर की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं।
  • महान्यायवादी प्रोटोकाल में 11वें रैंक पर है।

महाधिवक्ता (Advocate General अनु0 165)

अनु0 165 के अनुसार महाधिवक्ता की नियुक्ति राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह से करते हैं। 
 हाईकोर्ट के जज बनने की योग्यता रखने वाला हो-अर्थात्
  1. वह भारत का नागरिक हो
  2. दस वर्ष तक न्यायिक कार्य किया हो अथवा
  3. दस वर्ष तक वकालत किया हो।
  • यह राज्यपाल के प्रसादपर्यन्त वह कार्य करता है।
  • यह राज्य सरकार का प्रथम विधि अधिकारी है। आवश्यकता पड़ने पर यह विधायिका की कार्यवाहियों में तथा विधायिका की समितियों में भाग लेता है, परन्तु मतदान नहीं करता।
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