हैदराबाद

संस्थापकःनिजामुलमुल्क अथवा बिनकिलिस खाँ
समय:-1724
मुहम्मद शाह के समय में सर्वप्रथम हैदराबाद के स्वतन्त्र राज्य की नींव निजामुलमुल्क ने रखी वह दिल्ली दरबार के षडयंत्रों के वातावरण से क्षुब्ध था अतः शिकार के बहाने दक्षिण गया और हैदराबाद राज्य की स्थापना की। मुहम्मद शाह ने मुबारिस्ता खाँ को दक्कन का वायसराय बनाकर इसे पकड़ने के लिए भेजा। चिनकिलिच खाँ ने मुबारिस खाँ को 1724 ई0 में शकूर खेड़ा के युद्ध में पराजित किया अन्ततः मुहम्मद शाह ने इसके राज्य को मान्यता दे दी तथा इसे आॅसफ खाँ की उपाधि भी की। चिनकिलिच खाँ ने हैदराबाद को अपनी राजधानी बनाया।

अवध

संस्थापक:-
अवध राज्य अंग्रेजी और मराठा राज्य के बीच में एक बफर राज्य था। इस राज्य ने अंग्रेजी साम्राज्य के पोषण में दाय की भूमिका निभाई। 1722 ई0 में सआदत खाँ बुरहानुल मुल्क को अवध का सूबेदार बनाया गया। अपनी मृत्यु से पहले इसने अवध को स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थापित कर लिया था। इस राज्य की राजधानी फैजाबाद थी।
सआदत खाँ ने अवध में एक नया भू-राजस्व बन्दोबस्त लागू किया इसके द्वारा इसने किसानों को जमीदारों के चंगुल से बचाया। नादिरशाह द्वारा इसे दिल्ली बुलाये जाने पर इसने विष खाकर आत्महत्या कर लिया। सआदत के कोई पुत्र नहीं था अतः उसने पुत्री का विवाह अपने भतीजे सफदरजंग के साथ कर दिया। यहीं उसकी मृत्यु के बाद अवध का नवाब बना।
सफदरजंग (1739-54):-सफदरजंग सआदत खाँ का भतीजा एवं दामाद था। 1748 ई0 में दिल्ली के सम्राट अहमदशाह ने इन्हें अपना वजीर नियुक्त किया। इसी कारण इसके उत्तराधिकारी नवाब वजीर कहलाने लगे। अहमदशाह ने इसे इलाहाबाद का क्षेत्र भी प्रदान किया। सफदरजंग ने हिंदुओं और मुसलमानों के साथ निष्पक्षता की नीति अपनाई उसका वजीर एक हिन्दु नवाब राय था। सफदरजंग की मृत्यु के बाद उसका पुत्र सुजाउद्दौला अवध का नवाब बना।
सुजाउद्दौला (1754-75):-इसके काल की तीन महत्वपूर्ण घटनायें हैं-
1. पानीपत के तृतीय युद्ध में इसने अहमदशाह अब्दाली का साथ दिया। ऐसा इसने अपने राज्य की सुरक्षा को ध्यान में रखकर किया।
2. बक्सर के युद्ध में सुजाउद्दौला की पराजय हुई इसके बाद इससे इलाहाबाद की सन्धि की गई। इस सन्धि के द्वारा इसके दो जिले इलाहाबाद तथा कड़ा इससे लेकर मुगल सम्राट शाहआॅलम को दे दिये गये। 1765 ई0 में यह हुई।
बनारस की सन्धि (1773):-
1. इलाहाबाद तथा कड़ा के जिले 500 लाख रूपये में पुनः सुजाउद्दौला को बेच दिये गये।
2. इसी सन्धि से प्रेरित होकर सुजाउद्दौला ने रुहेलखण्ड पर आक्रमण कर उसे 1774 ई0 में अवध राज्य में मिला लिया गया। रुहेला सरदार हाफिज रहमत खाँ युद्ध में मारा गया।
इस परिप्रेक्ष्य में उल्लेखनीय है कि रुहेलों और अंग्रेजों के बीच पहले से ही एक सन्धि थी परन्तु हेस्टिंग्स ने इस सन्धि की उपेक्षा की। बाद में हेस्टिंग्स पर जब महाभियोग इंग्लैंड में चलाया गया तब उसमें एक कारण रुहेलों के प्रति उसकी नीति भी थी।
असफउद्दौला (1775-1797):- इसके काल में भी तीन प्रमुख घटनायें हुई-
1. राजधानी स्थानान्तरण:- असफउद्दौला ने अवध की राजधानी फैजाबाद से लखनऊ स्थानान्तरित कर दी।
2. फैजाबाद की सन्धि (1775):- इस सन्धि के द्वारा वारेन हेस्टिंग्स ने अवध के बेगमों की सम्पत्ति की सुरक्षा की गारण्टी ली थी। अवध की बेगमों में नवाब असफद्दौला की माँ बहू बेगम तथा उसकी दादी बुर्रा बेगम सम्मिलित थीं। इनके पास बहुत सा सोना व चाँदी था। वारेन हेस्टिंग्स ने 1781 ई0 में फैजाबाद की सन्धि की परवाह न करते हुए जाॅन मिडलटन को बेगमों से धन वसूलने का आदेश दिया। हेस्टिंग्स के महाभियोग के आरोपों में एक आरोप अवध को बेगमों के साथ उसके दुव्र्यवहार पर भी था।
3. इमामबाड़ा:- असफउद्दौला ने 1784 ई0 में मुर्हरम मनाने के लिए लखनऊ में इमामबाड़ा का निर्माण कराया। इसमें स्तम्भों का प्रयोग नही किया गया है।
वजीर अली (1797-98)
सआदत अली खाँ (1798-1814):- अवध के इस नवाब के समय में ही तीन प्रमुख घटनायें हैं-

  1. इसने इलाहाबाद अंग्रेजों को दे दिया।
  2. 1801 में सहायक सन्धि की गयी। (पहली सहायक सन्धि हैदराबाद के साथ 1998)
  3. इसे 1814 में ’’राजा’’ की उपाधि दी गयी।

गाजीउद्दीन हैदर अली खाँ (1814-19):- हैदर अली खाँ के बाद नासिरुद्दीन मुहम्मद अली गद्दी पर बैठे उसके बाद अमजद अली 1842-47 अन्तिम अवध का नवाब वाजीद अली शाह हुआ।
वाजिद अली शाह (1847-56):- ये अवध के अन्तिम नवाब थे। लार्ड डलहौजी ने एक गैर सरकारी रिपोर्ट जिसे उसने आउट्म से तैयार करवाया था के आधार पर कुशासन का आरोप लगाकर अवध को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया गया। 1857 के विद्रोह का अवध के प्रति अंग्रेजी व्यवहार एक प्रमुख कारण माना जाता है।

केरल

राजधानी-त्रावण कोट
केरल को आधुनिक बनाने में दो महत्वपूर्ण शासकों मार्तण्ड वर्मा एवं रामवर्मा का योगदान है ये दोनों शासक 18वीं शताब्दी के हैं।
मार्तण्ड वर्मा:- इन्होंने अपने राज्य के सामन्तों को पराजित किया। डच लोगों को हराकर केरल से उनकी राजनीतिक सत्ता समाप्त की। यूरोपीय अफसरों की मदद से एक शक्तिशाली फौज का गठन किया। उसके प्रयासों से त्रावणकोर की सीमायें कोचीन से कन्या कुमारी तक फैल गयी। इसने सड़के और नहरें बनवायी तथा विदेश व्यापार को प्रोत्साहन दिया। इसकी मृत्यु के बाद इसका उत्तराधिकारी रामबर्मा बना।
रामबर्मा:- इसके समय में 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में त्रावणकोर के स्थान पर त्रिवेन्द्रम सांस्कृतिक प्रमुख केन्द्र बन गया। इसी के समय में मलियाली साहित्य की भी उन्नति हुई। राम वर्मा स्वयं एक कवि, विद्वान, संगीतज्ञ, अभिनेता एवं सुसंस्कृत व्यक्ति था। वह अंग्रेजी में धारा प्रवाह बोलता था। यूरोपीय मामलों में भी उसकी दिलचस्पी थी। लंदन कलकत्ता व मद्रास से निकलने वाले अखबारों को वह पढ़ता था।