धार्मिक दशा:-हड़प्पा के लोग एक ईश्वरीय शक्ति में विश्वास करते थे जिसके दो रूप में परम पुरुष एवं परम नारी इस द्वन्दात्मक धर्म का उन्होंने विकास किया धर्म का यह रुप आज भी हिन्दू समाज के विद्यमान है।
1-शिव की पूजा:-मोहनजोदड़ों से मैके को एक मुहर प्राप्त हुई जिस पर अंकित देवता को मार्शल ने शिव का आदि रुप माना आज भी हमारे धर्म में शिव की सर्वाधिक महत्ता है।
2-मातृ देवी की पूजा:- सैन्धव संस्कृति से सर्वाधिक संख्या में नारी मृण्य मूर्तियां मिलने से मातृ देवी की पूजा का पता चलता है। यहाँ के लोग मातृ देवी की पूजा पृथ्वी की उर्वरा शक्ति के रूप में करते थे (हड़प्पा से प्राप्त मुहर के आधार पर)
मूर्ति पूजा:-हड़प्पा संस्कृति के समय से मूर्ति पूजा प्रारम्भ हो गई हड़प्पा से कुछ लिंग आकृतियां प्राप्त हुई है इसी प्रकार कुछ दक्षिण की मूर्तियों में धुयें के निशान बने हुए हैं जिसके आधार पर यहाँ मूर्ति पूजा का अनुमान लगाया जाता है।
हड़प्पा काल के बाद उत्तर वैदिक युग में मूर्ति पूजा के प्रारम्भ का संकेत मिलता है हलाँकि मूर्ति पूजा गुप्त काल से प्रचलित हुई जब पहली बार मन्दिरों का निर्माण प्रारम्भ हुआ।

जल पूजा:- मोहनजोदड़ों से प्राप्त स्नानागार के आधार पर।
सूर्य पूजा:- मोहनजोदड़ों से प्राप्त स्वास्तिक प्रतीकों के आधार पर। स्वास्तिक प्रतीक का सम्बन्ध सूर्य पूजा से लगाया जाता है।
नाग पूजा: मुहरों पर नागों के अंकन के आधार पर।
वृक्ष पूजा:- मुहरों पर कई तरह के वृक्षों जैसे-पीपल, केला, नीम आदि का अंकन मिलता है। इससे इनके धार्मिक महत्ता का पता चलता है।
शवाधान की विधियां:- हड़प्पा संस्कृति से तीन प्रकार के शवाधान के प्रचलन का संकेत मिलता है।
1. पूर्ण  समाधिकरण:- इस प्रकार के शवाधानों में शवों को उत्तर-दक्षिण दिशा में रखकर उनके उपयोग की अनेक वस्तुएं जैसे-मृदभाण्ड, सीसा कंघी आदि दफना दी जाती थी इसे पूर्ण समाधिकरण कहा जाता था। इस प्रकार शवाधान सर्वाधिक प्रचलित था। इस शवाधान से यह भी निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि हड़प्पन लोगों को पारलौकिक शक्ति में विश्वास था।
2. आंशिक समाधिकरण:- इस प्रकार के शवाधान में शव को पहले खुला छोड़ दिया जाता था फिर उसके कुछ हिस्से को दफना दिया जाता था।
3. दाह-संस्कार:- इसमें शवों को जला दिया जाता था।
4. कलश-शवाधान:- इस प्रकार के शवाधान के उदाहरण सुरकोेेेटडा एवं मोहनजोदड़ों से प्राप्त हुए है। इस शवाधान में शवों को जलाने के बाद उनके राखों को दफना दिया जाता था। वैसे मोहनजोदड़ों से कोई कब्र नहीं मिली है।
इन शवाधानों में हड्डियों के प्रमाण नही मिले हैं।
अपवाद:- सामान्यतः शवों को उत्तर-दक्षिण दिशा में दफनाया गया है परन्तु इसके कुछ अपवाद भी हैं जैसे कालीबंगा में दक्षिण-उत्तर दिशा में लोथल में पूरब-पश्चिम दिशा में, जबकि रोपण में पश्चिम-पूरब दिशा में शवों को दफनाये जाने का प्रमाण मिलता है।
पतन:- सिन्धु सभ्यता के पतन के प्रश्न पर इतिहासकारों में मतभेद हैं क्योंकि जिस तेजी से यह सभ्यता अस्तित्व में आई उतनी तेजी से ही यह पतन को प्राप्त हुई इसके पतन के निम्न कारण बताये जा सकते हैं।
1-बाढ़:- इतिहासकार मार्शल, मैके एवं एस0आर0 राव ने सिन्धु सभ्यता के पतन का सबसे प्रमुख कारण बाढ़ माना है। मार्शल ने मोहनजोदड़ों का मैके ने चान्हूदड़ों के पतन का एवं एस0आर0 राव ने लोथल के पतन का प्रमुख कारण बाढ़ को माना। मोहनजोदड़ों की खुदाई से इसके सात स्तर प्रकाश में आये हैं। हर बार मकानों को पहले से ऊँचें स्तर पर बनया गया है यहाँ बालू के प्रमाण भी मिले हैं अतः ऐसा लगता है कि यहाँ बाढ़ लगातार आती रही होगी।
2. आर्यों का आक्रमण: व्हीलर

, गार्डेन, चाइल्ड आदि विद्वानों ने सिन्धु सभ्यता के पतन का प्रमुख कारण आर्यों का आक्रमण माना है यह मूलतः दो सिद्धान्तों पर आधारित है-
1. मोहनजोदड़ो से नर कंकालों का मिलना।
2. ऋग्वेद में दास एवं दस्युओं का उल्लेख होना
अमेरिकी इतिहासकार केनेडी ने यह सिद्ध कर दिया है यह कंकाल मलेरिया जैसी किसी बीमारी से ग्रसित थे। ऋग्वेद में उल्लिखित दास एवं दस्युओं पर आवश्यकता से अधिक जोर देने की आवश्यकता नही है क्योंकि ऋग्वेद की तिथि विवादास्पद है।
3. जलवायु परिवर्तन:- आर0एल0 स्टाइन और अमला नन्द घोष ने इस कारण पर बहुत अधिक बल दिया है। अमला नन्द घोष ने राजस्थान में अपने अध्ययनों में यह सिद्ध कर दिया है कि 200 ई0पू0 के आस-पास यहाँ प्रचुर मात्रा में वर्षा होती थी। परन्तु जंगलों की कटाई आदि के कारण वर्षा में कमी आई फलस्वरूप अब लोगों के रहने के लिए जल का अभाव होने लगा और धीरे-धीरे यह सभ्यता विनष्ट हो गई।
4. भू-तात्विक परिवर्तन:- देल्स एवं राइट्स, एम0आर0 साहनी के अनुसार सिन्धु सभ्यता के पतन में भू-तात्विक परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है। भूकम्प, बाढ़ आदि के कारण नदियों की दिशायें बदल गई, अतः जो नदियां उनका पोषण करती थी वही अब उनके विनाश का कारण बनी।
5. एक समान प्रौद्योगिकी:- ए0एल0 बासम ने इस मत पर जोर दिया है उनके अनुसार एक हजार वर्षों में सैन्धव प्रौद्योगिकी में किसी तरह का परिवर्तन दिखाई नहीं पड़ता बाद में बढ़ती हुई जनसंख्या आदि के कारण पुरानी प्रौद्योगिकी उतनी उपयोगी नही रह गयी होगी इस कारण इस सभ्यता का धीरे-धीरे विनाश हो गया।
6. प्रशासनिक शिथिलता:- मार्शल के अनुसार सिन्धु सभ्यता के अन्तिम चरणों में प्रशासनिक शिथिलता के प्रमाण मिलते है। कालीबंगा मोहनजोदड़ों आदि के मकान अब छोटे बनने लगे थे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि यह नगर पतनावस्था को प्राप्त हो रहा है।
7. भयंकर विस्फोट:- रुसी इतिहासकार द्विमित्रयेव के अनुसार कालीबंगा क्षेत्र के आस-पास एक भयंकर विस्फोट हुआ और इस कारण यह सभ्यता विनष्ट हो गयी।
निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि सिन्धु सभ्यता के पतन का सबसे प्रमुख कारण बाढ़ था परन्तु उपरोक्त सभी कारणों में इस सभ्यता के पतन में किसी न किसी रूप में योगदान किया।
सिन्धु सभ्यता के नगरों का पतन 1750 ई0पू0 से प्रारम्भ हो गया और 1500 ई0पू0 तक पतन को प्राप्त हो गया। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के पतन का प्रारम्भ 2000 ई0पू0 से माना जाता है।
1960 के दशक में इतिहासकारों का एक वर्ग जिसमें मलिक और पौसेल के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। हड़प्पा संस्कृति के पतन की बात नही करते उनका मानना है कि इस संस्कृति के केवल नगरीय तत्व ही विलुप्त हुए समकालीन कुछ ताम्र पाषाणिक संस्कृतियां इस तथ्य को मजबूती प्रदान करती है।