सिंधु घाटी सभ्यता के समय कला प्रौद्योगिकी एवं लिपि

कला प्रौद्योगिकी
मृदभाण्ड:-मृद भाण्ड लाल या गुलाबी रंग के होते थे। इन्हें कुम्हार के चाक पर बनया जाता था। इन्हें भठ्ठों में पकाया जाता था इन पर कई तरह की चित्रकारियां होती थी जिनमें पशु पक्षी मानव आकृति एवं ज्यामितीय आकृतियां प्रमुख हैं। इनमें ज्यामीतिय चित्र सबसे अधिक प्रचलित थे। लोथल से एक ऐसा मृद भाण्ड मिला है जिसमें एक वृक्ष पर एक चिडि़या बैठा है और उसके मुँह में रोटी का टुकड़ा है नीचे एक लोमड़ी खड़ी है। यह पंचतन्त्र की प्रसिद्ध कथा चालाक लोमड़ी का अंकन है।
मृण्य मूर्ति:- मृण्य मूर्तियां चिकोटी विधि से बनाई गयी है इन मृण्य मूर्तियों में पशु पक्षी आदि की मृण्य मूर्तियां खोखली हैं जबकि मानव मृण्य मूर्तियां ठोस है मानव मृण्य मूर्तियों में सर्वाधिक मृण्य मूर्तियां नारी की प्राप्त हुई है परन्तु यह आश्चर्य जनक तथ्य है की नारी मृण्य मूर्तियां राजस्थान और गुजरात के किसी भी क्षेत्र से प्राप्त नहीं हुई हैं। नारी मृण्य मूर्तियों में कुआंरी नारी का अंकन सर्वाधिक है। परन्तु हड़प्पा से एक ऐसी मुहर प्राप्त हुई है जिसमें एक नारी को उल्टा दर्शाया गया है और उसके गर्भ से एक पौधा निकलते हुए दिखाया गया है। ऐसा लगता है कि हड़प्पा वासी नारी की पूजा पृथ्वी की उर्वरा शक्ति के रूप में करते थे।
प्रस्तर मूर्तियां:-प्रस्तर मूर्तियों में मोहनजोदड़ों से प्राप्त पुजारी का सिर (मंगोलायड प्रजाति का) और हड़प्पा से प्राप्त नृत्यरत एक मानव की मूर्ति सर्वाधिक प्रसिद्ध है जिसका बांया पैर कुछ उठा हुआ है। उसके हाथ की भंगिमायें भी अलग हैं।

धातु की मूर्तियाँ:- धातु की मूर्तियों में ताँबा और कांसे की मूर्तियां प्राप्त हुई है इनमें मोहनजोदड़ों से प्राप्त काँसे की नर्तकी सर्वाधिक प्रसिद्ध है। धातु मूर्तियों को मघूच्छिष्ट विधि या भ्रष्ट मोम विधि या स्वेजांग विधि से बनाई जाती थी। मोहनजोदड़ों से प्राप्त कांसे की नर्तकी प्रोटोआस्ट्रेलायड प्रजाति की है इसी तरह चान्हूदड़ों से काँसें की बैलगाड़ी एवं इक्का गाड़ी काली बंगा से वृषभ मूर्ति प्रसिद्ध है लोथल से प्राप्त ताँबे के कुत्ते की मूर्ति भी आकर्षक है। दैमाबाद से काँसे का रथ प्राप्त हुआ है।
मनके बनाने का कारखाना:- (गुरिया ठमंके) मनके एक प्रकार की गुरिया थी यह सभी धातुओं और मिट्टी जैसे-सेलखड़ी, सोना, चाँदी, ताँबा, काँसा आदि के बनाये जाते थे। इनमें सर्वाधिक संख्या सेलखड़ी के मनकों की है। चान्हूदड़ों और लोथल से मनके बनाने के कारखाने प्राप्त हुए हैं।
मुहरें –सिन्धु सभ्यता में बहुत सी मुहरें प्राप्त हुई हैं इन मुहरों पर सैन्धव लिपि तथा विभिन्न प्रकार के पशु पक्षियों आदि का अंकन मिलता है। मुहरें सबसे अधिक सेलखड़ी या स्टेटाइट की बनी हुई है। इनकी आकृति आयताकार अथवा वर्गाकार (चैकोर) है। ये विभिन्न अन्य आकृतियों में भी मिली हैं।
    मैंके को मोहनजोदड़ों से एक मुहर प्राप्त हुई है जिसपर एक व्यक्ति का चित्र है जो पद्यमासन मुद्रा में बैठा है। इसके दाहिनी ओर बाघ और हाथी तथा बांयी ओर गैंडा और भैसा अंकित है इसके नीचे दो हिरण भी हैं मार्शल महोदय ने इसे शिव का आदि रूप माना है।
लिपि:- सैन्धव लिपियों में 400 चित्राछर है इसके विपरीत मेसोपोटामियां से कीलाक्षर लिपि प्राप्त हुई है वहाँ 900 अक्षर हैं उन्हें पढ़ा जा चुका है परन्तु सैन्धव लिपि को अभी तक पढ़ा नही गया है। हलाँकि इसको पढ़ने का दावा ज्ञण्छण् बर्मा, एस0आर0 राव, आई महादेवन, रेवण्ड हेरस आदि विद्वानों ने किया है। हेरस महोदय ने इसे तमिल भाषा में अनुवादित करने का दावा भी किया है। हलाँकि सबसे पहले केरल के एक सैनिक अधिकारी ने इसे पढ़ने का दावा किया था। इसे न पढ़े जाने का कारण यह है कि इसका कोई द्वि-भाषिक लेख नही मिला है। इसे आद्य द्रविण या आद्य संस्कृत का प्रारम्भिक रूप माना जा सकता है। सैन्धव लिपि बायें से दायें एवं दायें से बायें लिखी जाती थी। इस विधि को बोस्ट्रोफेदन पद्धति या फिर हलायुद्ध, गोमुत्रिका पद्धति भी कहा जाता है।
    यह लिपि सैन्धव मुहरों मृदभाण्डों एवं ताम्र पट्टिकाओं से प्राप्त हुई है।
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