संवैधानिक बिकास

रेग्यूलेटिंग एक्ट, 1973

  • ईस्ट इंडिया पर संसदीय नियंत्रण की शुरूआत |
  • बंगाल के गवर्नर को,बम्बई तथा मद्रास तीनो प्रेसिडेंसीयों का गवर्नर जनरल बनाया गया|
  • गवर्नर जनरल चार सदस्यीय परिषद की सहायता में कार्यरत था |परिषद के सदस्य सीधे सम्राट द्धारा नियुक्त होते थे और सम्राट ही उन्हें पदच्युत कर सकता था |
  • मद्रास और बम्बई के गवर्नर अपनी परिषद सहित गवर्नर जनरल के अधीन थे |
  • कलकत्ता में एक सर्बोच्च न्यायालय की स्थापना की गयी जिसके निर्णय के बिरुद्ध सम्राट के सामने अपील की जा सकती थी |
न्यायाधिकरण अधिनियम, 1781

  • सपरिषद गवर्नर जनरल को सर्बोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से मुक्त रखा गया  |
  • सर्बोच्च न्यायालय की अधिकारिता बंगाल के सभी निवासियों पर निर्धारित की गयी |
  • कम्पनी के अदालतों के बिरुद्ध गवर्नर जनरल को अपील की जा सकती थी |
पिट्स इंडिया एक्ट, 1784

  • कम्पनी की व्यापारिक गतिबिधियों को ‘कोर्ट आफ डायरेक्टर्स’ तथा राजनितिक गतिबिधियों को बोर्ड ‘आफ कंट्रोलर’ के अधीन किया गया |
  • बम्बई तथा मद्रास की प्रेसिडेंसियों को राजनय,युद्ध तथा राजस्व के मामले में गवर्नर जनरल के अदीन किया गया |
  • गवर्नर जनरल की परिषद की सदस्य संख्या चार से तीन कर दी गयी |
चार्टर अधिनियम,1793

  • बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल की शक्तियों को इसके अध्यक्ष के हाथ में केंद्रीकृत किया गया जो की ब्रिटिश मंत्रिमंडल का सदस्य होता था |
  • कम्पनी को अगले 20 बर्षो के लिए एकाधिकार दे दिया गया |
  • बोर्ड के सदस्यों तथा कर्मचारियों का बेतन भारतके राजस्व से देने की ब्यवस्था की गयी |
चार्टर अधिनियम, 1813

  • कम्पनी को अगले 20 बर्षो के लिए एकाधिकार दे दिया गय|किन्तु कुछ ब्रिटिश कंपनियों को अधिकारीयों को भी यह अधिकार दे दिया गया
  • चाय का ब्यापार और चीन के साथ ब्यापार का एकाधिकार कम्पनी के पास ही रहा|
चार्टर अधिनियम, 1833

  • कम्पनी के सभी ब्यापारिक अधिकार समाप्त हो गये तथा कम्पनी को मात्र राजनितिक कार्य का अधिकार मिला,वह भी ब्रिटिश क्राउन के नाम पर |
  • बंगाल का गार्नर जनरल सम्पूर्ण ब्रिटिश भारत का गरर्नर जनरल बना |
  • भारतीय कानूनों को एकीकृत एवं संहिताबद्ध करने के लिए आयोग का गठन |
चार्टर अधिनियम, 1853

  • 1853 का एक्ट अंतिम चार्टर एक्ट था |
  • बंगाल के लिए लेफ्टिनेंट गवर्नर जरनल का पद सृजित किया गाय |
  • विधायी परिषद और कार्यकारी परिषद को अलग किया गया |
  • गवर्नर जनरल परिषद में बिधाई कार्य हेतु दो न्यायाधीश और चार प्रांतीय प्रतिनिधि जोड़े गए |
  • उच्च सरकारी पदों के लिए खुली प्रतियोगी परीक्षा की शुरुआत |
भारतीय शासन अधिनियम,1858

  • कोर्ट आफ डायरेक्टर्स तथा बोर्ड आफ कन्ट्रोलर को समाप्त कर भारत सचिव नमक नए पद का सृजन किया गया |
  • भारत सचिव ब्रिटिश मंत्रिमंडल का सदस्य होता था तथा भारितीय मामलो में ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी होता था |
  • भारतीय सचिव की सहायता के लिए 15 सदस्यीय भारत परिषद का गठन किया गया |
  • गवर्नर जनरल को वायसराय कहा जाने लगा |ब्रिटिश भारत पर वह गवर्नर जनरल के रूप में शासन करता था किन्तु देशी नरेशो से ही वह ब्रिटिश राजा के प्रतिनिधि (वायसराय)के रूप में मिलता था |
  • भारतीय प्रशासन केंद्रीकृत हो गया |सारी शक्तियों गवर्नर जनरल के हाथों में आ गयी जो भारत के सचिव के प्रति उत्तरदायी होता था |
  • इस तरह ईस्ट इंडिया कम्पनी की सत्ता पूरी तरह समाप्त हो गयी |
भारतीय शासन अधिनियम,1861

  •  गवर्नर जनरल की शक्तियों का विस्तार किया गया |उसे अध्यादेश पारित करने की शक्ति प्राप्त हो हूई |
  • गवर्नर जनरल को बंगाल,उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत और पंजाब में बिधान परिषद स्थापित करने शक्ति प्रदान की गयी |
  • इन विधान परिषदों द्धारा पारित विधियाँ गवर्नर जनरल की स्वीकृत के बाद ही प्रवर्तनीय थी |
  • भारत में अंग्रेजी राज की शूरुआत के बाद पहली बार भारतीयों को विधायी कार्य के साथ जोड़ा गया |
भारतीय शासन अधिनियम,1892

  • केंद्रीय तथा प्रांतीय ब्यावास्थापिका परिषद में गैर-सरकारी सदस्यों की संख्या में बृद्धि की गयी |
  • अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली की शूरुआत हूई |
  • ब्यवस्थापिका के सदस्यों को वार्षिक बजट पर बिचार विमर्श करने तथा प्रश्न पूछने की शक्ति दी गयी |
भारतीय शासन अधिनियम,1909 
  • भारत सचिव और गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी में भारतियों को प्रतिनिधित्व दिया गया
  • मुस्लिम ममुदय के लिए पहली बार पृथक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की गयी |यहीं से पृथकवादी दृष्टीकोण का जन्म हुआ |
  • प्रांतीय विधान के आधार में बृद्धि की गयी |इसमें निर्वाचित गैर-सरकारी कर्मचारी सदस्य भी सामिल किये गये |
  • विधान परिषद के सदस्यों को सामान्य हित के मामलों पर प्रस्ताव लेन का अधिकार दिया गया |
भारतीय शासन अधिनियम,1919
  • प्रान्तों में द्धैध शासन की शुरुआत |
  • प्रान्तीये को सुरक्षित एवं हस्तांतरित दो भागो में विभाजित किया गया तथा सुरक्षित विषयों पर गवर्नर अपनी कार्यकारणी के सहयोग से निर्णय लेता था |जब की हस्तांतरित विषयों का प्रशासन वह अपने मंत्रियो के सहयोग से करता था |
  • केंद्र द्धिसद्नात्मक विधायिका की स्थापना की गयी |प्रथम-राज्य परिषद तथा द्धितीय-केन्द्रीय विधान सभा |राज्य परिषद (60 सदस्य)का कार्यकाल 5 वर्ष तथा विधान सभा (सदस्य 144)का कार्यकाल 3 वर्ष था |
  • भारत के लिए उच्चायुक्त की नियुक्ति की गयी जो यूरोप में भारतीय ब्यापार की देखबाल करता था |
  • एक नरेश मंडल की स्थापना की गयी |देसी नरेशो का यह मंडल सामान्य हित पर विचार करता था |
भारतीय शासन अधिनियम,1935
  • यह अधिनियम 1932 के श्वेत-पत्र पर आधारित था |भारतीय संविधान का यह मुख्य आधार बना |
  • अधिनियम में अखिल भारतीय संघ बनाने का प्रावधान रखा गया |
  • प्रान्तों में द्धैध शासन ब्यवस्था को समाप्त केर प्रान्तों में पूर्ण उत्तरदायी सरकार बनाई गयी
  • केंद्र में द्धैधशासन की स्थापना की गयी |सुरक्षा वैदेशिक संबंध एवं धार्मिक मामलो को गवर्नर जनरल के हाथ में केन्द्रित किया गया तथा अन्य मामलो में गवर्नर जनरल की सहायता के लिए मंत्रिमंडल की ब्यवस्था की गयी
  • संघीय न्यायालय की स्थापन अकी गयी जिसके विरुद्ध अपील प्रिवी कौंसिल (लंदन)में की जा सकती थी
  • ब्रिटिश संसद को सर्वोच्च माना गया |
  • सांप्रदायिक निर्वाचन पद्धति को और विस्तार दिया गया |
  • उड़ीसा और सिंध दो नए प्रांत बनाए गए |
  • वर्मा (म्यांमार) को भारत से अलग किया गया |अदन को इंग्लैण्ड के औपनिवेशिक कार्यालय के अधीन किया गया |
  • प्रधानमंत्री (Premier) और मंत्री (Minister)जैसे शब्दों का प्रयोग पहली बार किया गया |
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम,1947
  • भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम,1947 का प्रारूप लार्ड माउंटबेटेन योजना पर आधारित था |इस योजना को 3 जून 1947 को प्रस्तुत किया गया |
  • इसमें भारत और पाकिस्तान दो डोमिनियनों की स्थापना का प्रस्ताव था |
  • दोनों राज्यों की सीमा के निर्धारण हेतु सीमा आयोग का गठन किया गया था जिसके अध्यक्ष सर सिरिल रेड्किल्फ़ थे |
  • इस अधिनियम की प्रवर्तन तिथि 15 अगस्त,1947 थी |
  • 15 अगस्त,1947 से भारतीय शासन अधिनियम,1935 के अंतर्गत स्थापित सभी संवैधानिक पद स्वत: समाप्त हो गया |
  • भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम,1947
  •  के परवर्तन के साथ ही ब्रिटिश क्राउन का भारत पर अधिपत्य समाप्त हो गया |
  • दोनों राज्योकी स्वतंत्र सत्ता को मान्यता दी गयी तथा उन्हें ब्रिटिश कामनवेल्थ से अलग होने अधिकार दिया गया |
  • सिविल सेवको की सेवा शर्तो में कोई परिवर्तन नहीं किया गया तथा उनकी सेवाए उसी प्रकार जरी रही |
  • भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम,1947 में यह व्यवस्था की गयी थी कि दोनों देशो की व्यवस्थापिका द्धारा बनाये गये कानूनों को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती है कि वे भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम,1935  अथवा भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम,1947 से मेल नहीं खाते |
  • भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम,1947 ब्रिटिश संसद द्धारा 18 जुलाई,1947 को पारित किया गया था | 
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