संघीय संसद (INDIAN PARLIAMENT)

हमारे संविधान के अन्तर्गत केन्द्रीय विधान-मण्डल को संसद की संज्ञा दी गयी है और यह संसद द्विसदनात्मक सिद्धान्त के आधार पर गठित की गयी है। संविधान के अनुच्छेद 79 में लिखा है: ’संघ के लिए एक संसद होगी जो राष्ट्रपति और दोनों सदनों से मिलकर बनेगी, जिसके नाम क्रमशः राज्यसभा और लोकसभा होंगे।’ भारत में संसदात्मक लोकतन्त्र को प्रभावपूर्ण बनाने के लिए व्यवस्थापिका और कार्यपालिका का समन्वय करना सिद्धान्तः आवश्यक था। अतः राष्ट्रपति को भी संसद का अभिन्न भाग बनाया गया है।

भारत संसद, एक सम्प्रभु संस्था नहीं (INDIAN PARLIAMENT, NOT A SOVEREIGN BODY)

भारतीय संविधान सभा के सामने महत्वपूर्ण प्रश्न यह था कि संसद की स्थिति के सम्बन्ध में ब्रिटेन की व्यवस्था को अपनाया जाय या अमरीका की व्यवस्था को। ब्रिटेन में संसद की सर्वोच्चता है, जिसके अनुसार संसद किसी भी विषय पर कानून का निर्माण कर सकती है और संसद द्वारा निर्मित कानून को किसी भी सत्ता के सम्मुख चुनौती नहीं दी जा सकती। दूसरी ओर अमरीका की कांग्रेस एक सर्वोच्च संस्था नहीं है। संघात्मक व्यवस्था तथा लिखित एवं कठोर सविधान के कारण अमरीकी कांग्रेस की कानून निर्माण की शक्तियां सीमित हैं। इसके अलावा अमरीका में न्यायिक पुनर्विलोकन की व्यवस्था है और इस कारण अमरीका की कांग्रेस ने जिन कानूनों का निर्माण किया है, उन्हें सर्वोच्च न्यायालय के सामने चुनौती दी जा सकती है। इस व्यवस्था के कारण यह कहा जाता है कि अमरीका में न्यायपालिका की सर्वोच्चता है, व्यवस्थापिका की नहीं।
भारतीय संविधान में ब्रिटिश और अमरीकी पद्धति के बीच का मार्ग अपनाया गया है। संविधान निर्माता ’संसद की प्रभुसत्ता’ के आदर्श से प्रभावित थे और इसे अपनाना चाहते थे, लेकिन इसके साथ ही संघात्मक व्यवस्था, लिखित एवं कठोर संविधान और मौलिक अधिकारों की व्यवस्था के कारण संसद को सभी विषयों में कानून निर्माण की शक्तियां नहीं दी जा सकती थी और न्यायिक पुनर्विलोकन की व्यवस्था को अपनाना आवश्यक था। अतः भारतीय-संविधान में न्यायिक पुनर्विलोकन को अपनाया गया है, लेकिन न्यायिक पुनर्विलोकन की व्यवस्था उतनी सीमा तक नहीं है जितनी सीमा तक यह अमरीकी संविधान में है। दुर्गादास बसु के शब्दों में, ’’भारतीय संविधान में अद्भुत ढंग से अमरीका के न्यायालय की सर्वोच्चता के सिद्धान्त एवं इंग्लैण्ड के संसदीय प्रभुसत्ता के सिद्धान्त के बीच का मार्ग अपनाया गया है।’’
केशवानन्द भारती विवाद में प्रसिद्ध विधिवेत्ता श्री एन. पालकीवाला ने भी भारतीय संसद की सम्प्रभुता को अस्वीकार करते हुए कहा था कि ’’भारतीय संविधान के अन्तर्गत संसद की शक्तियां मर्यादित हैं। संसद न तो बुनियादी नागरिक स्वतन्त्रताओं का हरण कर सकती है और न ही संविधान के अनिवार्य और स्थायी तत्वों को संशोधित कर सकती है।’’ संक्षेप में, भारतीय संसद की सम्प्रभुता पर कतिपय निम्न मर्यादाएं हैं:

  1. लिखित संविधान:-संसद देश के लिखित संविधान की शिशु है। संसद की संप्रभुता हमारे लिखित संविधान के विभिन्न प्रावधानों द्वारा सीमित है। संविधान के अनुच्छेद 245(1) द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि व्यवस्थापन शक्तियों का उपयोग संसद संविधान के अनुसार करेगी। अमरीकी शासन-प्रक्रिया के सदृश भारतीय प्रणाली में भी दो प्रकार के कानूनों में अन्तर पाया जाता है। ये दो प्रकार के कानून साधारण कानून और संवैधानिक कानून के नाम से जाने जाते हैं। साधारण कानून का निर्माण संविधान के अन्तर्गत स्थापित विभिन्न व्यवस्थापिकाओं द्वारा किया जाता है। अतः यह स्वाभाविक है कि संविधान द्वारा स्थापित व्यवस्थापिकाएं संविधान के विरूद्ध कानून का निर्माण नहीं कर सकती।
  2. संघवाद सम्बन्धी प्रावधान:-भारत में संघात्मक शासन-व्यवस्था होने के कारण राज्य सूची के विषयों पर संसद की कानून बनाने की शक्ति सीमित हो गयी है। टी. के. टोपे ने लिखा है कि भारतीय संसद एक संघीय संविधान के अन्तर्गत विधायिका है। ब्रिटिश संसद के तुल्य इसकी शक्तियां असीमित नहीं हैं।
  3. संविधान में संषाोधन:- संविधान के कतिपय अनुच्छेदों के संशोधन हेतु संसद को राज्य विधानमण्डल के पुष्टिकरण पर निर्भर रहना पड़ता है। संविधान के वे अनुच्छेद जिनका सम्बन्ध केन्द्र-राज्य सम्बन्धी से है, यदि उनमें कोई संशोधन करना हो तो संसद को कम-से-कम आधे राज्यों के विधानमण्डलों का समर्थन प्राप्त करना पड़ता है।
  4. न्यायिक पुनर्विलोकन:- संसद द्वारा पारित संविधान-विरूद्ध विधि को भारत का सर्वोच्च न्यायालय अवैध घोषित कर सकता है। बी.के. मुखर्जी के अनुसार, ’’यह निर्णय करना न्यायपालिका का काम है कि अमुक कानून वैध है या नहीं।’’ न्यायालय के इस अधिकार को न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति कहते हैं।’’ यह सर्वविदित है कि ’’गोपालन बनाम मद्रास राज्य, गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य, केशवानन्द भारती’, आदि मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने संसद और निर्मित कानूनों को अवैध घोषित किया अथवा संसद की सत्ता पर प्रतिबन्ध लगाये।

भारतीय संसद: स्मरणीय तथ्य

  • भारतीय संसद राष्ट्रपति और दो सदनों-राज्यसभा और लोकसभा से मिलकर बनती है। लोकसभा जनता द्वारा प्रत्यक्ष रीति से तथा राज्यसभा अप्रत्यक्ष रीति से चुनी जाती है।
  • कोई धन विधेयक राज्यसभा में पेश नहीं किया जा सकता।
  • कोई धन विधेयक है अथवा नहीं इसका फैसला लोकसभा के अध्यक्ष द्वारा किया जाता है।
  • संघ सूची में 97 विषय हैं जिनके बारे में केवल संसद ही विधान बना सकती है।
  • राष्ट्रपति समय-समय पर संसद के प्रत्येक सदन की बैठक के लिए आमन्त्रित करता है।
  • यद्यपि सदनों को बैठक के लिए आमन्त्रित करने की श्ािक्त राष्ट्रपति में निहित है तथापि व्यवहार में इस आशय के प्रस्ताव की पहल सरकार द्वारा की जाती है।
  • राष्ट्रपति प्रत्येक वर्ष के प्रथम अधिवेशन के प्रारम्भ में एक साथ समवेत दोनों सदनों के समक्ष अभिभाषण करता है।

5. राजनीतिक परिसीमाएं:- राजनीतिक दृष्टि से भी संसद लोकमत के प्रतिकूल विधियों का निर्माण नहीं कर सकती। उसे अन्तर्राष्ट्रीय कानून मन्त्रिमण्डल का भी नियन्त्रण रहता है। प्रधानमन्त्री संसद के निम्न सदन का विघटन करवा सकता है।
भारत की समस्त राजनीतिक व्यवस्था में संसद को बहुत अधिक महत्वपूर्ण स्थिति प्राप्त है, लेकिन उपर्युक्त मर्यादाओं के कारण भारतीय संसद को ब्रिटिश संसद के समान सम्प्रभु नहीं कहा जा सकता है।

भारतीय संसद के कार्य एवं शक्तियां

भारतीय संसद सम्प्रभु नहीं है, किन्तु यह विस्तृत शक्तियों का प्रयोग करती है तथा महत्वपूर्ण कार्यों का सम्पादन करती है। इसकी शक्तियों का उल्लेख निम्नलिखित रूपों में किया जा सकता है।

  • (1) विधायी शक्तियां:-संसद का सबसे प्रमुख कार्य राष्ट्रीय हितों को दृष्टि में रखते हुए कानूनों का निर्माण करना है। संसद को संघीय सूची के 97 और समवर्ती सूची के 47 विषयों पर कानून निर्माण का अधिकार प्राप्त है। यद्यपि समवर्ती सूची के विषयों पर संघीय संसद का और विधानमण्डल दोनों के द्वारा ही कानून का निर्माण किया जा सकता है किन्तु इन दोनों द्वारा निर्मित कानूनों में पारस्परिक विरोध होने की स्थिति में संसद द्वारा निर्मित कानून ही मान्य होंगे। संसद के द्वारा अवशेष विषयों पर भी कानून का निर्माण किया जा सकता है, क्योंकि संविधान के द्वारा अवशेष शक्तियां संघ को सौंपी गयी हैं। इसके अतिरिक्त सभी संघीय क्षेत्रों के लिए संसद को सदैव ही सभी विषयों पर कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है।

संविधान के द्वारा संकटकाल के सम्बन्ध में विशेष व्यवस्था की गयी है। संकटकाल की घोषणा के समय संसद राज्यों के लिए राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना सकती है। इन सबके अतिरिक्त सामान्य काल में भी कुछ ऐसी परिस्थितियां हैं जबकि संसद के द्वारा राज्य सूची के विषयों पर भी कानून का निर्माण किया जा सकता है। प्रथम, जब कभी दो या अधिक राज्यों के विधानमण्डल प्रस्ताव पास करके संसद से राज्य सूची के किसी विषय पर कानून बनाने की प्रार्थना करें तो संसद उन राज्यों के सम्बन्ध में ऐसा कर सकती है। द्वितीय, जब कभी राज्यसभा दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पास करे कि राष्ट्रीय हित में संसद को राज्य-सूची के किसी विषय विशेष पर कानून बनाना चाहिए।

  • (2) संविधान के संशोधन की शक्ति:- संविधान के संशोधन के सम्बन्ध में संसद को महत्वपूर्ण शक्ति प्राप्त है। संविधान के अनुसार संविधान में संशोधन का प्रस्ताव संसद में ही प्रस्तावित किया जा सकता है, किसी राज्य के विधानमण्डल में नही। संसद के दोनों सदनों द्वारा संविधान के संशोधन का कार्य किया जाता है और संविधान के अधिकांश भाग में अकेली संसद के द्वारा ही या तो सामान्य बहुमत से या पृथक्-पृथक दोनों सदनों के दो-तिहाई बहुमत से परिवर्तन किया जा सकता है। संविधान की केवल कुछ ही व्यवस्थाएं ऐसी हैं जिनमें संशोधन के लिए भारतीय संघ के आधे राज्यों के विधानमण्डलों की स्वीकृति आवश्यक होती है।

फरवरी 1967 में सर्वोच्च न्यायालय ने गोलकनाथ विवाद में जो निर्णय दिया था, उससे संसद की संविधान में संशोधन शक्ति सीमित हो गयी थी क्योंकि इस विवाद के निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहा था कि संसद ऐसा कोई विधेयक पारित नहीं कर सकती, जो मौलिक अधिकारों को छीनता या कम करता हो। लेकिन 1971 में संविधान का 24वां संशोधन विधेयक पारित हुआ जिसके अनुसार संसद को यह अधिकार होगा कि वह संविधान के किसी भी उपबन्ध में (जिनमें मौलिक अधिकार भी सम्मिलित हैं) संशोधन कर सके। 24वें संशोधन विधेयक में यह भी कहा गया है कि जब कोई संविधान संशोधन विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित होकर राष्ट्रपति के समक्ष उनकी अनुमति के लिए रखा जाय, तो उस पर अपनी अनुमति दे देनी चाहिए। अब राष्ट्रपति भी संसद द्वारा विधिवत् रूप से पारित किये गये संविधान संशोधन विधेयक को अस्वीकृत नहीं कर सकता है।
इस प्रकार संसद को संविधान में संशोधन करने की शक्ति प्राप्त है, लेकिन संसद को यह शक्ति प्राप्त नहीं है कि वह संविधान के मूल ढांचे को बदल सके या नष्ट कर सके।

  • (3) वित्तीय शक्तियां:- भारतीय संसद को राष्ट्रीय वित पर पूर्ण अधिकार प्राप्त है और प्रतिवर्ष वित्तमन्त्री द्वारा प्रस्तावित बजट (राष्ट्रीय आय-व्यय का लेखा) जब तक संसद (लोकसभा) से स्वीकार न करा लिया जाय उस समय तक आय-व्यय से सम्बन्धित कोई कार्य नहीं किया जा सकेगा। लोकसभा के द्वारा बजट में कटौती की जा सकती है, जिसका आशय शासन के प्रति अविश्वास होता है। संसद ही प्राक्कलन और लोक लेखा समिति नियुक्त करती है तथा नियन्त्रक व महालेखा परीक्षक के प्रतिवेदन पर विचार कर उचित कार्यवाही करती है।
  • (4) प्रशासनिक शक्तियां:- भारतीय संविधान के द्वारा संसदात्मक व्यवस्था की स्थापना की गयी है, अतः संविधान के अनुसार संघीय कार्यपालिका अर्थात् मन्त्रिमण्डल संसद (व्यवहार में लोकसभा) के प्रति उत्तरदायी होता है। मन्त्रिमण्डल केवल उसी समय तक अपने पद पर रहता है, जब तक कि उसे लोकसभा का विश्वास प्राप्त हो।
  • (5) निर्वाचन सम्बन्धी शक्तियां:- अनुच्छेद 54 के द्वारा संसद को कुछ निर्वाचन सम्बन्धी शक्तियां प्रदान की गयी हैं। संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए गठित निर्वाचक मण्डल के अंग हैं। अनुच्छेद 66 के अनुसार संसद सदस्य दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन में उपराष्ट्रपति का निर्वाचन करते हैं।
  • (क) संसद के दोनों सदन संविधान द्वारा निर्धारित विशेष प्रक्रिया के आधार पर राष्ट्रपति के विरूद्ध महाभियोग का प्रस्ताव पार कर उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को अक्षमता व दुराचरण के आधार पर पदच्युत करने का प्रस्ताव पास कर सकते हैं। इस प्रकार का प्रस्ताव प्रत्येक सदन में दो-तिहाई बहुमत द्वारा पारित होना चाहिए। उपराष्ट्रपति को हटाने के लिए राज्यसभा द्वारा पारित प्रस्ताव लोकसभा द्वारा अनुमोदित होना चाहिए।
  • (ख) राष्ट्रपति द्वारा घोषित संकटकालीन घोषणा को निश्चित अवधि से अधिक समय तक लागू रखने के लिए संसद के दोनों सदनों की स्वीकृति आवश्यक है।
  • (ग) अन्त में संसद सार्वजनिक विवाद स्थल का कार्य करती है। इस दृष्टि से संसद लोकप्रिय भावना के दर्पण तथा शिक्षक का कार्य करती है।