यूरोपीय कम्पनियों का आगमन

    15वीं शताब्दी से लेकर 17वीं शताब्दी के बीच निम्नलिखित यूरोपीय कम्पनियाँ क्रमशः भारत आयी-
पुर्तगीज, डच, अंग्रेज, डेनिश, फ्रांसीसी।
परन्तु इन कम्पनियों के स्थापना का क्रम थोड़ा सा भिन्न था। ये निम्नलिखित क्रम में स्थापित हुई-
पुर्तगीज-अंग्रेज-डच-डेनिश-फ्रांसीसी। 

पुर्तगीज सबसे पहले भारत पहुँचे, बाकी सभी कम्पनियाँ प्रारम्भ में भारत न आकर दक्षिण पूर्व एशिया की ओर गई। इसमें फ्रांसीसी कम्पनी सरकारी थी। ये सभी कम्पनियाँ मूलतः मसाले के लिए भारत आयीं, परन्तु इन्होंने सबसे अधिक व्यापार सूती वस्त्रों का किया। लेकिन इस समय अधिकतर सोना नील के जरिए आता था।

1500 ई0 के लगभग भारत के समूचे व्यापार को करने वाला प्रमुख समुदाय कोरोमण्डल, चेट्टियार समुदाय था इनके साथ एक अन्य दक्षिण-पूर्वी व्यापारी समुदाय चूलिया मुसलमान था।
आगे चलकर सभी देशों ने अपने यहाँ सूती वस्त्रों के आगमन पर प्रतिबन्ध लगा दिया अथवा अधिक मात्रा में आयात कर वसूल किया। लेकिन हालैण्ड ने ऐसा कुछ नहीं किया।
पुर्तगीज अपने को ’’समूद्रों का स्वामी कहते’’ थे। उन्होंने व्यापार में म्ंतजे ।तउंकं व्यवस्था प्रारम्भ की। म्ंतजे का अर्थ परमिट जबकि ।तउंकं का अर्थ उनकी सैनिक शक्ति था।
अंग्रेजों ने घोषित किया की ’’हमारा उद्देश्य व्यापार है विस्तार नहीं’’।
डच अपने साझेदारों को सबसे अधिक मुनाफा देते थे।
इन कम्पनियों की प्रथम दो फैक्ट्रियों का क्रम निम्नलिखित प्रकार है।

    कम्पनियां                फैक्ट्रियां

पुर्तगीज                 -कोचीन, कन्नूर
डच                       -मसूलीपट्टनम,पोतोपल्ली
अंग्रेज                    -सूरत, मसूली पट्टम
फ्रांसीसी                 -सूरत, मसूली पट्टम
डेनिश                    -ट्रांकेबोर, सीरमपुर

प्राचीन काल में भारत का पश्चिमी देशों के साथ व्यापार फारस की खाड़ी से एवं लाल सागर से होता था। इसमें फारस की खाड़ी वाला मार्ग ज्यादा प्रचलित था क्योंकि लाल सागर वाला मार्ग कुहरे से भर जाता था।
1453 ई0 में तुर्की ने कुस्तुनतुनियां पर अधिकार कर लिया। इस कारण से यूरोप वालों का भारत और दक्षिण पूर्व एशिया से मसाले का व्यापार अवरूद्ध हो गया।
इस समय पुर्तगाल का शासक मैनुअल-प्रथम था। जबकि पुर्तगीज राजकुमार हेनरी के प्रयासों से एक नये रास्ते की खोज प्रारम्भ हो गयी। राजकुमार हेनरी को च्तपदबम भ्ंदंतल जीम छंअपहंजमत के नाम से जाना जाता है।

पुर्तगीज

नये रास्ते की खोज में सर्वप्रथम प्रयास पुर्तगीजों ने प्रारम्भ किये। बार्थोलोम्यूडियाज ने 1487 ई0 में केप आॅफ गुड होप (उत्तमाशा अन्तरीप, या तूफानी अन्तरीप) तक की यात्रा की। 1494 ई0 में स्पेन के कोलम्बस ने भारत खोजने के क्रम में अमेरिका की खोज कर दी। 1499 में पिन्जोन ने ब्राजील की खोज की। मैगलेन ने यूरोप के पश्चिमी देशों की यात्रा करते हुए सम्पूर्ण पृथ्वी की यात्रा की।
17 र्म 1498 ई0 को पुर्तगाल का वास्को-डी-गामा एक गुजराती पथ प्रदर्शक अब्दुल मनीद के साथ केरल के कालीकट में कप्पकडापू नामक स्थान पर पहुँचा। यहाँ के शासक जिनकी पैतृक उपाधि जमोरिन थी ने उसका स्वागत किया। परन्तु अरब व्यापारी जो वहाँ पहले से ही मौजूद थे ने इसका विरोध किया। वास्को-डि-गामा कालीकट से मसाले और कपड़े लेकर वापस लौट गया। उसके इस व्यापार में करीब साठ गुना फायदा हुआ। इस खुशी में पुर्तगाल के शासक मैनुअल-प्रथम ने ’वाणिज्य के प्रधान’ की उपाधि धारण की। लिस्बन समस्त यूरोपीय व्यापार का प्रधान केन्द्र बन गया।
1500 ई0 में पेड़ो अल्बरेज केब्रल के नेतृत्व में द्वितीय पुर्तगाली अभियान कालीकट पहुँचा। 1502 में वास्को-डि-गामा पुनः भारत आया। इस तरह यूरोप और भारत के बीच व्यापार के एक नये रास्ते की शुरूआत हो गयी।
भारत में पुर्तगाली फैक्ट्रियाँ:-
सन               फैक्ट्री
1503            कोचीन
1505            कन्नूर
1510            गोवा
1511            मलक्का (द0 पूर्व एशिया में 1641
ई0 में डचों ने जीत लिया
1515            हुरमुज
1534            बसीन
1535            द्वीव
1559            दमन

इनके अतिरिक्त पुर्तगीजों ने चैल, बम्बई, हुगली, श्रीलंका, में भी अपनी फैक्ट्री स्थापित की। हुगली को शाहजहाँ के समय में कासिम खाँ ने 1632 में जीत लिया। इसी तरह 1739 में साष्टी और बसीन को मराठों ने जीत लिया। 1688 में श्रीलंका अंग्रेजों ने जीत लिया।
भारत में पुर्तगीज गर्वनर:- वास्को-डी-गामा के दुबारा वापस जाने के बाद डी-अल्मीडा को भारत में प्रथम पुर्तगीज गर्वनर बनाया गया।

फ्रांसिस-डी-अल्मीडा (1505-09)

यह भारत में प्रथम पुर्तगीज गर्वनर था। इसने व्यापार पर मूलतः जोर दिया। इसकी नीति को Bless Water Policy या नीले पानी की नीति (शान्ति जल नीति) कहा जाता है। अल्मीडा का 1508 ई0 में मिश्र ,टर्की ,गुजरात (शासक महमूद बेगड़ा) ,अरबी के संयुक्त बेडे से युद्ध  हुआ। प्रारम्भ में वह पराजित हुआ तथा उसका पुत्र मारा गया। परन्तु 1509 ई0 में इसका बदला ले लिया। उसने संयुक्त बेडे को पराजित किया। इस विजय ने पुर्तगालियों की नौ-सैनिक क्षमता श्रेष्ट बना दिया। अल्मीडा के बाद अल्फांसो-डी अलबुकर्क दूसरा पुर्तगीज गर्वनर बना। डी-अल्मीडा ने कोचीन फैक्ट्री का दुर्गीकरण व 1505 में केन्नौर में दूसरी फैक्ट्री की स्थापना किया।

अल्फांसो-डी-अलबुर्क (1509-15)

यह भारत में पुर्तगीज शक्ति का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। 1510 में इसने बीजापुर के शासक आदिल शाह से गोवा छीन लिया तथा किले बन्दी करवायी। 1511 ई0 में द0पू0 एशिया की महम्वपूर्ण मण्डी मलक्का पर अधिकार कर लिया। फारस की खाडी के मुख पर स्थित हुरमुज पर 1515 में कब्जा कर लिया। पुर्तगीजों की प्राचीन राजधानी कोचीन थी।
अलबुकर्क ने पुर्तगीजों को भारतीय स्त्रियों से विवाह को प्रोत्साहित किया, क्योंकि वह भारत में पुर्तगीज आबादी बसाना चाहता था। यह मुसलमानों को बहुत तंग करता था। इसने अपने क्षेत्र में सती-प्रथा बन्द कर दी तथा भारतीयों को अपनी सेना में भर्ती किया। इसने धार्मिक न्यायालय स्थापित किये।

नीनो-डी-कुन्हा (1529-38)

इस गर्वनर ने सरकारी कार्यालय कोचीन से गोवा स्थानान्तरित कर दिया। इस तरह गोवा पुर्तगीज राज्य की औपचारिक राजधानी बन गया। इसके समय में मद्रास के निकट सेन्थामों और बंगाल में हुगली में व्यापारिक बस्तियां स्थापित की गयी। इसने 1534 में बसीन पर 1535 में द्वीप पर अधिकार कर लिया। इसी के समय में गुजरात के शासक बहादुरशाह से बसीन के विषय में समझौता हो गया। लेकिन वहाँ दीवार खड़ी करने के प्रश्न पर बहादुर शाह से झगड़ा हो गया। इसी झगड़े में बहादुर शाह की समुद्र में गिरने से मृत्यु हो गयी।
पुर्तगीजों ने 1559 में दमन पर अधिकार कर लिया। सीलोन भी उनके अधिकार में आ गया। बाद में डचों और अंग्रेजों ने क्रमशः इन्हें पराजित किया। 1641 ई0 में डचों ने मलक्का जीत लिया। 1658 में सम्पूर्ण श्रीलंका और 1663 में सम्पूर्ण मालाबार क्षेत्र डचों के अधीन आ गया।
बाबरनामा में इसे अनवर कहा गया है।
अंग्रेज भी पीछे न रहे 1611 ई0 में सूरत के निकट स्वाल्ली के पास उन्होंने पुर्तगीजों को पराजित किया। 1628 में हुरमुज पर कब्जा कर लिया। शाहजहाँ के काल में कासिम खाँ ने 1632 में हुगली पर तथा मराठों ने 1739 ई0 में बसीन पर अधिकार कर लिया। केवल 1961 ई0 तक गोवा दमन और द्वीव उनके अधिकार में बने रहे।
पुर्तगीज व्यापार की विधि:- पुर्तगीज भारतीय क्षेत्र को एस्तादो-द-इंडिया नाम से पुकारते थे। हिन्द महासागर के व्यापार को नियंत्रित करने के लिए उन्होंने म्ंतजे ।तउंकं व्यवस्था प्रारम्भ की। म्ंतजे परमिट व्यवस्था थी जबकि ।तउंकं उनकी नौ सैनिक शक्ति अकबर ने भी पुर्तगीजों से व्यापार के लिए परमिट ली थी। पुर्तगीज अपने को ’’सागर के स्वामी’’ कहते थे। पुर्तगीजों का पतन इसलिए हुआ क्योंकि वे अन्य यूरोपीय शक्तियों से प्रतिद्वन्दिता से पिछड़ गये। दूसरे ब्राजील का पता लग जाने पर उन्होंने वहीं उपनिवेश बसाने पर जोर दिया।

पुर्तगीज आधिपत्य का परिणाम

  1. पुर्तगीजों ने धर्म परिवर्तन पर बहुत जोर दिया। 1560 में गोवा में ईसाई धर्म न्यायालय की स्थापना की।
  2. 1542 में पुर्तगीज गर्वनर मार्टिन डिसूजा के साथ प्रसिद्ध सन्त जेवियर भारत आया।
  3. जापान के साथ व्यापार प्रारम्भ करने का श्रेय पुर्तगीजों को प्राप्त है।
  4. पुर्तगीजों ने सर्वप्रथम प्रिटिंग प्रेस की शुरुआत की।
  5. पुर्तगीजों को भारत में आलू, तम्बाकू, अन्नास, अमरुद, अंगूर, संतरा, पपीता, काजू, लीची, बादाम, मूंगफली, शकर कंद आदि को लाने का श्रेय दिया जाता है।
  6. भारत में अन्तिम गर्वनर जनरल-जोआ-द-कास्त्रों था।
  7. गोथिक स्थापत्य कला पुर्तगाली लायेे।

डच

डच नीदरलैण्ड या हालैण्ड के निवासी थे। 1595-96 ’’कार्नेलियस हाउटमैन’’ के नेतृत्व में पहला डच अभियान दल पूर्वी जगत में पहुँचा। पुर्तगीजों के बाद डच ही भारत आये। डच कम्पनी का मूल नाम Voe Vereenigde Oest Indigehe Conpagnie  था। इस कम्पनी को पूर्व के साथ 21 वर्षों के लिए व्यापार करने की अनुमति प्रदान की गई। इस कम्पनी ने अपनी प्रारम्भिक यात्राएं द0पू0 एशिया में की।

  • 1605 –    इन्होंने अम्बायना जीत लिया।
  • 1619 –    जकार्ता जीत कर बैटेविया नामक नगर बसाया।
  • 1623 –    अम्बायना नरसंहार हुआ। जिसमें 10 अंग्रेज 9 जापानियों का क्रूरता पूर्वक वध कर दिया गया। इसके बाद अंग्रेजों ने अपना ज्यादा ध्यान भारत की ओर केन्द्रित किया।

भारत में फैक्ट्रियाँ:-
1605 –    मसूली पट्टनम-वादेर हेग के द्वारा।
–    पोतोपल्ली
1610 –    पुलीकट-इसे अपना मुख्यालय बनाया और यहीं अपने स्वर्ण सिक्के पगोड़ा ढाले (पगोड़ा रुपया-1:3:5
1616 –    सूरत
–    नागपट्टम में स्थापित की।
1641 –    विमलीपट्टम में एक फैक्ट्री स्थापित की गयी।

पूर्व में:-

  • 1627 –    पीपली-उड़ीसा में सर्वप्रथम डच फैक्ट्री।
  • 1653 –    बंगाल में हुगली के पास चिनसुरा में। इस फैक्ट्री को इन्होंने किलेबन्द किया। इस फैक्ट्री को गुस्ताओं फोर्ट के नाम से जाना जाता है। इसके बाद कासिम बाजार बालासोर पटना में फैक्ट्रियां स्थापित की गयी।

दक्षिण में:-

1660 –    गोलकुण्डा में।
1663 –    कोचीन में।
–    इसी समय उन्होंने क्रागेनूर में।
व्यापार की विधि:- सभी यूरोपीय कम्पनियों में डच अपने साझेदारों को सर्वाधिक लाभांश 18ः देती थी। डचों की सहकारी व्यवस्था को म्ंतजंस कहा जाता था। डचों ने मसालों के स्थान पर भारतीय कपड़ों को अधिक महत्व दिया। ये कपड़े कोरोमण्डल तट, बंगाल, गुजरात आदि से निर्यात किये जाते थे। हलाँकि डच व्यापार के विशेषज्ञ ओम प्रकाश मानते हैं कि प्रारम्भ में डच, मूलरूप से काली मिर्च तथा मसालों के व्यापार में ही रुचि रखते थे। डचों ने कासिम बाजार में रेशम की चक्री का उद्योग स्थापित किया। ये लोग आगरा और मध्य भारत से नील, मध्य भारत से कच्चा रेशम, बिहार और बंगाल से शोरा एवं नमक और गंगा घाटी से अफीम का निर्यात करते थे। भारत से भारतीय वस्त्र को निर्यात की वस्तु बनाने का श्रेय डचों को ही दिया जाता है। 1759 ई0 में अंग्रेजों ने बेडारा के युद्ध में डचों को पराजित कर दिया। इसी के बाद डच भारतीय व्यापार से बाहर हो गये।

अंग्रेज

इंग्लैंण्ड की महारानी एलिजाबेथ-प्रथम के समय में 1600 ई0 में एक कम्पनी की स्थापना हुई जिसका नाम The Governer of the Company of Marchents of London Trading in to the East Indiese रखा गया। इसे पूर्व के साथ 15 वर्षों के लिए व्यापार की अनुमति प्रदान की गई। इसने अपने प्रारम्भिक अभियान द0 पू0 एशिया में किये। 1688 में एक नयी कम्पनी न्यू कम्पनी को भी पूर्व के साथ व्यापार करने की अनुमति प्रदान की गयी। 1698 ई0 में दो और कम्पनियों General Soceity तथा  English Company trading in to the East को भी इसी तरह की अनुमति दी गयी। 1702 में इन कम्पनियों ने आपस में विलय का निश्चय किया। 1708 में इन कम्पनियों का विलय हो गया तब इसका नाम The United Company of Merchant of England trading in to the East Indiese रखा गया। 1833 ई0 के अधिनियम के द्वारा इसका नाम छोटा करके East India Company रख दिया गया।
भारत में फैक्ट्रियाँ:- पूर्व के साथ व्यापार की अनुमति मिलने के बाद इंग्लैण्ड के शासक जेम्स प्रथम ने अपने एक राजदूत हाॅकिन्स को अकबर के नाम का पत्र लेकर भेजा। हाॅकिन्स ने मध्य-पूर्व में तुर्की और फारसी भाषा सीखी। 1608 ई0 में हेक्टर नामक जहाज से वह सूरत पहुँचा। जहाँगीर ने उसे फैक्ट्री खोलने की अनुमति दे दी परन्तु पुर्तगीजों के दबाव से शीघ्र में अनुमति रद्द कर दी गयी। तब अंग्रेज ने दक्षिण जाकर 1611 ई0 में मसली-पट्टम में अपनी फैक्ट्री स्थापित की। इसी बीच 1611 ई0 में स्वाल्ली के प्रसिद्ध युद्ध में अंग्रेजों ने पुर्तगीजों को पराजित कर दिया तब 1612 में उन्हें पुनः सूरत में फैक्ट्री खोलने की अनुमति दी गयी।

  • 1608 –    सूरत (अनुमति रद्द)। (टामस एल्डवर्थ)
  • 1611 –    मसूली पट्टम।
  • 1611 –    स्वाल्ली का युद्ध।
  • 1612 –    सूरत (किलेबन्द फैक्ट्री)

दक्षिण में फैक्ट्रियाँ

  • 1611 –    मसूली पट्टम
  • 1626 –    अर्मागाँव (कर्नाटक)
  • 1632 –   Golden Ferman -गोलकुण्डा के शासक के द्वारा जारी किया गया। इसके 500 पगोज सलाना कर के बदले अंग्रेजों को गोलकुण्डा राज्य के बन्दरगाहों से व्यापार करने की छूट प्राप्त हो गयी।
  • 1639 –    फोर्ट सेंट जार्ज की स्थापना।

–    फ्रांसिस-डे ने चन्द्रगिरि के राजा से मद्रास को पट्टे पर लिया और वहाँ एक किला बन्द कोठी बनवायी। इसी का नाम फोर्ट सेंट जार्ज पड़ा।

बम्बई का द्वीप

1661 ई0 में इंग्लैण्ड के राजा चाल्र्स-द्वितीय का विवाह पुर्तगीज राजकुमारी कैथरीन मेवों के साथ हुआ। जिसके फलस्वरूप पुर्तगीजों ने बम्बई का द्वीप दहेज में चाल्र्स-द्वितीय को दे दिया। चाल्र्स-द्वितीय ने 1668 ई0 में 10 पौंड वार्षिक किराये पर यह द्वीप ईस्ट इंडिया कम्पनी को दे दिया। 1669 ई0 में जेराल्ड औंगियार सूरत और बम्बई का गर्वनर बना। उसने कहा ’अब समय का तकाजा है कि हम अपने हाथों में तलवार लेकर व्यापार का प्रबन्ध करें।’’ 1688 ई0 में इसी नीति का पालन करते हुए सर जाॅन चाइल्ड ने कुछ मुगल बन्दरगाहों पर घेरा डाला। परन्तु औरंगजेब की सेना द्वारा उन्हें पराजित होना पड़ा तथा माॅफी मांगनी पड़ी। एवं हर्जाने के रूप में 1.5 लाख रूपये देना स्वीकार किया।
बंगाल में अंग्रेजी शक्ति का विकास:- 1651 ई0 में बंगाल के सूबेदार शाहसुजा ने 3,000 रूपये वार्षिक कर के बदले अंग्रेजों को बंगाल बिहार और उड़ीसा से व्यापार करने की अनुमति प्रदान की। यह अनुमति इसलिए प्रदान की गयी क्योंकि ग्रेबियन बाॅटन नामक चिकित्सक ने शाहसुजा की किसी बीमारी का इलाज किया।

  • 1656 –    पुनः मंजूरी मिल गयी।
  • 1680 –    औरंगजेब ने आदेश जारी किया कि अंग्रेजों से 1.5% जजिया कर लिया जाय।
  • 1686 –    अंग्रेजों ने हुगली को लूटा परन्तु बुरी तरह पराजित किये गये और एक ज्वर ग्रसित द्वीप में पहुँचे। यहीं से जाॅब चार्नोंक ने समझौते की शुरुआत की। बहुत अनुनय विनय के बाद इन्हें वापस लौटने की अनुमति मिल गयी।
  • 1690 –    जाब चार्नोक ने सूतानाती में एक फैक्ट्री खोली, जो आगे चलकर कलकत्ता बना। इसी कारण चार्नोक को कलकत्ता का जन्मदाता माना जाता है।
  • 1698 –    बंगाल के नवाब अजीमुशान ने जमीदार इब्राहिम खाँ से तीन क्षेत्रों की जमीदारी सूतानाती, कालीकाता और गोबिन्दपुर अंग्रेजों को प्रदान की। यहीं पर 1700 ई0 में फोर्ट विलियम की नींव रखी गयी। चाल्र्स आयर इसका पहला प्रेसीडेन्ट बना।

मुगल दरबार में मिशन:- मुगल दरबार में अंग्रेजों के निम्नलिखित दो मिशन प्रमुख रूप से हुए-
1. नारिश मिशन:- 1698 इंग्लैंण्ड के राजा विलियम -तृतीय ने एक अन्य कम्पनी इंग्लिश कम्पनी टेªडिंग इन-टू-द ईस्ट की स्थापना की। इस कम्पनी ने व्यापारिक सुविधायें प्राप्त करने के लिए सर विलियम नारिस की अध्यक्षता में एक मिशन औरंगजेब के दरबार में भेजा। किन्तु इसका कोई फल न हुआ।
2. जाॅन शर्मन मिशन:-1715-कलकत्ता से ईस्ट-इंडिया कम्पनी ने 1715 में जाॅन सरमन की अध्यक्षता में फर्रुख-सियर के दरबार में एक दूत-मण्डल भेजा। इस मण्डल में-

  1. रोहूर्द:- आरमेनियन दुभाषिया था।
  2. हैमिल्टन:- यह अंग्रेज चिकित्सक था जिसने फर्रुखसियर की फोडे की बीमारी का इलाज किया। इससे प्रसन्न होकर फर्रुखसियर ने 1717 ई0 में एक फरमान जारी किया जिसके द्वारा-

3,000 रू0 वार्षिक कर के बदले में कम्पनी को बंगाल में मुक्त व्यापार की छूट मिल गयी।
10,000 रू0 वार्षिक कर के बदले में सूरत से व्यापार करने की छूट मिल गयी।
बम्बई में कम्पनी द्वारा ढाले गये सिक्कों को सम्पूर्ण मुगल साम्राज्य में चलाने की छूट मिल गयी।
ब्रिटिश इतिहासकार और्म ने इसे कम्पनी का मैग्नाकार्टा कहा। वस्तुतः इस व्यापारिक छूट से कम्पनी को बंगाल में अपने पाँव जमाने में सहूलियत मिली।

डेनिश

अंग्रेज के बाद डेनिश 1616 ई0 में भारत आये।

  • 1620 –    तंजौर जिले के ट्राकेंबोर में पहली फैक्ट्री स्थापित।
  • 1676 –    बंगाल के सीरमपुर में दूसरी फैक्ट्री।
  • 1745 –    इन्होंने अपनी फैक्ट्रियाँ अंग्रेजों को बेंच दी और चले गये।

फ्रांसीसी

फ्रांसीसी कम्पनी का मूल नाम कम्पनी द इण्ड ओरिमंटल था। इसकी स्थापना 1664 ई0 में फ्रांस के शासक लुई XIV के समय उसके प्रधान मंत्री कोल्बर्ट ने की। इसे पूर्व के साथ व्यापार करने की अनुमति दी गयी। पहले ये मेडागास्कर द्वीप पहुँचे परन्तु वहाँ असफल रहे।
भारत में कोठियाँ:-

  • 1668 –    सूरत में फ्रैंकोकैरो द्वारा।
  • 1669 –    मसूली पट्टम (मरकारा)
  • 1672 –    सान्थोमी (मद्रास में)
  • 1673 –    पांडिचेरी-फ्रंकोमार्टिन तथा बेलांग लेस्पिने द्वारा यह पूरी तरह किलाबन्द फैक्ट्री थी। यह क्षेत्र इन्हें एक मुस्लिम सूबेदार शेर खाँ लोदी से प्राप्त हुआ। फ्रेंकोमार्टिन इसका प्रमुख बना। डचों ने 1693 में अंग्रेजों की मदद से पांडिचेरी छीन लिया। 1697 में रिजविक की सन्धि द्वारा वापस लौटा दिया।
  • 1674 –    चन्द्रगिरि-बंगाल के सूबेदार शाइस्ता खाँ ने 1674 ई0 में फ्रांसीसियों को एक जगह दी। यहीं पर वास्तविक रूप से 1690-92 में चन्द्र गिरि की कोठी बनायी गयी।
  • 1721 –    मारीशस
  • 1725 –    माही         केरल
  • 1789 –    कारीकल

कर्नाटक में आंग्ल फ्रांसीसी प्रतिस्पर्धा

अन्तिम दो यूरोपीय कम्पनियों अंग्रेज और फ्रांसीसियों के बीच कर्नाटक में अपने वर्चस्व के लिए संघर्ष प्रारम्भ हुए। इन संघर्षों में अन्ततः अंग्रेज विजयी हुए। कर्नाटक में कुल तीन युद्ध लड़े गये। इसमें प्रथम और तृतीय युद्ध विदेशी कारणों से प्रभावित थे जबकि द्वितीय युद्ध यहाँ के आन्तरिक कारणों से प्रभावित था। करीब 20 वर्षों तक चले इन युद्धों से वान्डियावास में फ्रांसीसियों को पराजय से अंग्रेज सबसे शक्तिशाली बनकर उभरे। इन युद्धों का विवेचन निम्नलिखित है।

कर्नाटक का प्रथम युद्ध (1746-48)

कारण:- आस्ट्रिया के उत्तराधिकार युद्ध का विस्तार मात्र।
युद्ध विराम:- ए-ला-शापेल की सन्धि द्वारा 1748 में।
इस युद्ध की शुरूआत अंग्रेजों ने की जब वारनैट के नेतृत्व में एक अंग्रेजी नौ सेना ने कुछ फ्रांसीसी जल पोत को पकड़ लिया। डूप्ले ने मारीशस स्थित फ्रांसीसी गर्वनर ला-बूर्डो-ने से सहायता मांगी उसने आकर मद्रास पर अधिकार कर लिया। युद्ध बन्दियों में क्लाइव भी था। परन्तु बाद में 40,000 पौंण्ड की रिश्वत लेकर उसने मद्रास अंग्रेजों को वापस कर दिया। लेकिन डूप्ले ने पुनः मद्रास पर अधिकार कर लिया। इसी बीच यूरोप में ए-ला-शापेल की सन्धि हो गयी। जिसके द्वारा भारत में भी इन दोनों कम्पनियों के बीच में युद्ध विराम हो गया।
सेन्ट थोमे का युद्ध (1748):- कर्नाटक का प्रथम युद्ध कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन के क्षेत्र में लड़ा जा रहा था। उसने फ्रांसीसियों को युद्ध न करने की चेतावनी दी परन्तु न मानने पर महफूज खाँ के नेतृत्व में एक सेना भेजी। इस सेना को पैराडाइज के नेतृत्व में एक छोटी से फ्रांसीसी सेना ने पराजित कर दिया। इस युद्ध ने भारतीय सेना की कमजोरी को उजागर किया। साथ ही यह भी प्रमाणित कर दिया कि एक सुसज्जित और प्रशिक्षित छोटी सी सेना बड़ी सेना को पराजित कर सकती है।
कर्नाटक का द्वितीय युद्ध (1749-54):-
यह युद्ध हैदराबाद और कर्नाटक के प्रमुखों में आन्तरिक खींच-तान के कारण प्रारम्भ हुआ परन्तु इसमें सर्वप्रथम हस्तक्षेप फ्रांसीसियों की तरफ से डूप्ले ने किया विजय अन्ततः अंग्रेजों को मिली।
दक्षिण में हैदराबाद की रियासत जिस तरह मुगलों से स्वतंन्त्र थी उसी तरह हैदराबाद के अन्र्तगत कर्नाटक भी स्वतन्त्र रूप से व्यवहार करता था। इस समय हैदराबाद का प्रमुख नासिर जंग था। परन्तु उसकी सत्ता को उसका भांजा मुजफ्फर जंग चुनौती दे रहा था। इसी तरह कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन को उसके बहनोई चांदा साहब विरोध कर रहे थे। डूप्ले ने मुजफ्फर जंग औ चांदा साहब को समर्थन दिया। इन तीनों की सम्मिलित सेना ने 1749 ई0 में अम्बूर के युद्ध में अनवरुद्दीन को पराजित कर मार डाला और चांदा साहब को कर्नाटक का नवाब बना दिया गया। उन्होंने अर्काट को अपनी राजधानी बनाया तथा फ्रांसीसियों को पांडिचेरी के पास 80 गांव अनुदान में दिये। डूप्ले को दक्षिण का अवैतनिक गर्वनर भी बना दिया गया। इसी बीच अनवरुद्दीन के पुत्र मु0 अली ने भागकर त्रिचनापल्ली में शरण ली। चांदा साहब ने त्रिचना पल्ली को घेर लिया। इसी समय कलाइव (एक क्लर्क) ने यह सलाह दी कि यदि कर्नाटक की राजधानी अर्काट पर आक्रमण कर दिया जाय तब चांदा साहब का दबाव मु0 अली पर से कम हो जायेगा। उसने एक छोटी सी सेना के द्वारा अर्काट को जीत लिया। इसी बीच चांदा साहब की हत्या कर दी गयी और इस तरह से मु0 अली कर्नाटक का नवाब बन गया।

हैदराबाद के निजाम के पद को लेकर हुए झगड़े में नासिर जंग ने मुजफ्फर जंग को पराजित कर दिया। इसी बीच आन्तरिक विद्रोह के कारण नासिर जंग की हत्या हो गयी। तब मुजफ्फर जंग को गद्दी पर बैठाया गया परन्तु मुजफ्फर जंग की भी हत्या कर दी गयी। अन्ततः सलाबत जंग हैदराबाद का निजाम बना। सलाबत जंग ने फ्रांसीसियों को उत्तरी सरकार के चार जिले-मुस्तफा नगर राजमुंद्री, चिकाकौल, एल्लौर प्रदान किये।
द्वितीयक कर्नाटक युद्ध की समाप्ति 1755 ई0 के पांडिचेरी की सन्धि से हुई। इस सन्धि के द्वारा दोनों पक्षों में युद्ध विराम हो गया। इस सन्धि की एक प्रमुख शर्त यह भी थी कि डूप्ले को वापस बुला लिया जाय। डूप्ले की जगह गोडेहू को फ्रांसीसी प्रमुख बनाकर भेजा गया।

कर्नाटक का तृतीय युद्ध (1756-63)

कारण:- सप्त वर्षीय युद्ध का विस्तार
युद्ध विराम:– पेरिस की सन्धि 1763
यूरोप में सप्तवर्षीय युद्ध प्रारम्भ होने के बाद भारत में भी उसका प्रभाव हुआ और दोनों सेनाएं एक-दूसरे के सामने आ गयी। यह प्रसिद्ध युद्ध वांडियावास के नाम से जाना जाता है।
वांडिया वास का युद्ध (22 जनवरी 1760):- अंग्रेज सेना पति अमरकूट और फ्रांसीसी सेनापति काउण्ट लाली के बीच। अन्ततः फ्रांसीसियों की पराजय हुई। और भारत में अंग्रेजी राज्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हो गया।
कर्नाटक के तृतीय युद्ध की समाप्ति पेरिस की सन्धि से हुई जिसके द्वारा अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों के जीते हुए क्षेत्रों को वापस कर दिया। लेकिन अब उनकी किलेबन्दी नहीं की जा सकती थी। चन्द्र नगर में फ्रांसीसी स्वतन्त्रता के बाद 1954 तक रहे।