मौर्योत्तर काल

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   मौर्य साम्राज्य के पतन के साथ ही भारतीय इतिहास की राजनीतिक एकता कुछ समय के लिए विखंडित हो गई। अब ऐसा कोई राजवंश नहीं था जो हिंदुकुश से लेकर कर्नाटक एवं बंगाल तक आधिपत्य स्थापित कर सके। दक्षिण में स्थानीय शासक स्वतंत्र हो उठे। मगध का स्थान साकल, प्रतिष्ठान, विदिशा आदि कई नगरों ने ले लिया।

शुंग वंश (184 ईसा पूर्व से 75 ईसा पूर्व तक) [Sunga Dynasty (184BC – 75 BC)]

    अन्तिम मौर्य शासक बृहद्रथ की हत्या कर पुष्यमित्र शुंग ने जिस नवीन राजवंश की नींव डाली, वह शुंग वंश के नाम से जाना जाता है। शुंग वंश के इतिहास के बारे में जानकारी साहित्यिक एवं पुरातात्विक दोनों साक्ष्यों से प्राप्त होती है, जिनका विवरण निम्नलिखित है-

साहित्यिक स्रोत (Literary Sources) :- 

  • पुराण (वायु और मत्स्य पुराण)    –     इससे पता चलता है कि शुगवंश का संस्थापक पुष्यमित्र शुंग था।
  • हर्षचरित    –    इसकी रचना बाणभट्ट ने की थी। इसमें अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ की चर्चा है।
  • पतंजलि का महाभाष्य    –    पतंजलि पुष्यमित्र शुंग के पुरोहित थे। इस ग्रंथ में यवनों के आक्रमण की चर्चा है।
  • गार्गी संहिता    –    इसमें भी यवन आक्रमण का उल्लेख मिलता है।
  • मालविकाग्निमित्र    –    यह कालिदास का नाटक है जिससे शुंगकालीन राजनीतिक गतिविधियों का ज्ञान प्राप्त होता है।
  • दिव्यावदान    –    इसमें पुष्यमित्र शुंग को अशोक के 84,000 स्तूपों को तोड़ने वाला बताया गया है।

पुरातात्विक स्रोत(Archaeological Sources)

  • अयोध्या अभिलेख    –     इस अभिलेख को पुष्यमित्र शुंग के उत्तराधिकारी धनदेव ने लिखवाया था। इसमें पुष्यमित्र शुंग द्वारा कराये गये दो अश्वमेध यज्ञ की चर्चा है।
  • बेसनगर का अभिलेख    –    यह यवन राजदूत हेलियोडोरस का है जो गरुड़-स्तंभ के ऊपर खुदा हुआ है। इससे भागवत धर्म की लोकप्रियता सूचित होती है।
  • भरहुत का लेख    –    इससे भी शुंगकाल के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।

    उपर्युक्त साक्ष्यों के अतिरिक्त साँची, बेसनगर, बोधगया आदि स्थानों से प्राप्त स्तूप एवं स्मारक शुंगकालीन कला एवं स्थापत्य की विशिष्टता का ज्ञान कराते हैं। शुंगकाल की कुछ मुद्रायें-कौशाम्बी, अहिच्छत्र, अयोध्या तथा मथुरा से प्राप्त हुई हैं जिनसे तत्कालीन ऐतिहासिक जानकारी प्राप्त होती हैै।

पुष्यमित्र शुंग (Pusyamitra Sunga)

    पुष्यमित्र मौर्य वंश के अन्तिम शासक बृहद्रथ का सेनापति था। इसके प्रारंभिक जीवन के बारे में जानकारी प्राप्त नहीं है। पुष्यमित्र शुंग ने दो अश्वमेध यज्ञ किये जिसे प्राचीन भारत में राजसत्ता का प्रतीक माना गया था। परवर्ती मौर्यों के कमजोर शासन में मगध का प्रशासन तंत्र शिथिल पड़ गया था तथा देश को आंतरिक एवं वाह्य संकटों का खतरा था। इसी समय पुष्यमित्र शुंग ने मगध साम्राज्य पर अपना अधिकार जमाकर न सिर्फ यवनों के आक्रमण से देश की रक्षा की बल्कि वैदिक धर्म के आदर्शों को, जो अशोक के शासन काल में उपेक्षित हो गये थे, पुनः प्रतिष्ठित किया। इसलिए पुष्यमित्र शुंग के काल को वैदिक पुनर्जागरण का काल भी कहा जाता है।
    बौद्ध रचनाओं से ज्ञात होता है कि पुष्यमित्र बौद्ध धर्म का उत्पीड़क था। पुष्यमित्र ने बौद्ध विहारों को नष्ट किया तथा बौद्ध भिक्षुओं की हत्या की थी। यद्यपि शुंगवशीय राजा ब्राह्मण धर्म के अनुयायी थे, तथापि उनके शासनकाल में भरहुत स्तूप का निर्माण और साँची स्तूप की वेदिकाएँ (रेलिंग) बनवाई गई।
    लगभग 36 वर्ष तक पुष्यमित्र शुंग ने राज्य किया। पुष्यमित्र की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र अग्निमित्र शुंग वंश का राजा हुआ जो अपने पिता के शासनकाल में विदिशा का उपराजा था। पुराणों के अनुसार शुंगवंश का अंतिम शासक देवभूति था।

कण्व वंश (75 ईसा पूर्व से 30 ईसापूर्व तक)

    शुंग वंश का अंतिम राजा देवभूति विलासी प्रवृत्ति का था। अपने शासन के अंतिम दिनों में अपने ही अमात्य वसुदेव के हाथों उसकी हत्या कर दी गई। इसकी जानकारी हर्षचरित से प्राप्त होती है। वसुदेव ने जिस नवीन वंश की स्थापना की वह कण्व वंश के नाम से जाना जाता है। इसमें केवल चार ही शासक हुए-वसुदेव, भूमिमित्र, नारायण और सुशर्मा। इन्होंने 300 ईसा पूर्व तक राज्य किया।

  1. कण्व वंश के बाद मगध पर शासन करने वाले दो वंशों की जानकारी मिलती है।
  2. पुराणों के अनुसार-आन्ध्रभितियों के शासन का उल्लेख है।
  3. अन्य साक्ष्यों में-मित्रवंश का शासन।

चेदि तथा सातवाहन

             प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व में विन्घ्य पर्वत के दक्षिण में दो शक्तियों का उदय हुआ-कलिंग का चेदि तथा दक्कन का सातवाहन।
कलिंग का चेदि या महामेघवाहन वंश

  • इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक खारवेल हुआ जो इस वंश का तीसरा शासक था।
  • यह जैन धर्म का संरक्षक था। जैनियों के लिए उदयगिरि एवं खण्ड गिरि में पहाडि़यों का निर्माण करवाया। ख्गुफा-रानी व अनंत गुफा,
  • उदयगिरि पहाड़ी में स्थित हाथीगुंफा अभिलेख से खारवेल के बारे में विस्तार से जानकारी मिलती है एवं इसी अभिलेख से जनगणना का प्रथम साक्ष्य मिलता है। इसमें कलिंग की आबादी 35,000 बतायी गयी है।

आन्ध्र-सातवाहन वंश

  •     सातवाहन वंश का शासन क्षेत्र मुख्यतः महाराष्ट्र, आंध्र और कर्नाटक था। पुराणों में इन्हें आंध्र भृत्य कहा गया है तथा अभिलेखों में सातवाहन कहा गया है। पुराणों में इस वंश का संस्थापक सिमुक (सिन्धुक) को माना गया है जिसने कण्व वंश के राजा सुशर्मा को मारकर सातवाहन वंश की नींव रखी। सातवाहन वंश से संबंधित जानकारी हमें अभिलेख, सिक्के तथा स्मारक तीनों से प्राप्त होते हैं। अभिलेखों में नागनिका का नानाघाट (महाराष्ट्र, पूना) अभिलेख, गौतमीपुत्र शातकर्णी के नासिक से प्राप्त दो गुहालेख गौतमी पुत्र बलश्री का नासिक गुहालेख, वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी का नासिक गुहालेख, वसिष्ठीपुत्र पुलुमावी का कार्ले गुहालेख, यज्ञ श्री शातकर्णी का नासिक गुहालेख महत्वपूर्ण है।
  •     उपर्युक्त लेखों के साथ-साथ विभिन्न स्थानों से सातवाहन राजाओं के बहुसंख्यक सिक्के भी मिले हैं। इससे राज्य विस्तार, धर्म तथा व्यापार-वाणिज्य की प्रगति के संबंध में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है। नासिक के जोगलथम्बी नामक स्थल से क्षहरात शासक नहपान के सिक्कों का ढेर मिलता है। इसमें अनेक सिक्के गौतमीपुत्र शातकर्णी द्वारा पुनः अंकित कराये गये हैं। इससे नहपान पर सातवाहन शासक के विजय की जानकारी मिलती है। यज्ञश्री शातकर्णी के एक सिक्के पर जलपोत के चिन्ह उत्कीर्ण हैं। इससे पता चलता है कि समुद्र के ऊपर उनका अधिकार था। सातवाहन सिक्के सीसा, ताँबा तथा पोटीन (ताँबा, जिंक, सीसा तथा टिन मिश्रित धातु) में ढलवाये गये थे। इन पर मुख्यतः अश्व, सिंह, वृष, गज, पर्वत, जहाज, चक्र, स्वास्तिक, कमल, त्रिरत्न, क्राॅस से जुड़े चार बाल (उज्जैन चिन्ह) आदि का अंकन मिलता है।
  •     विदेशी विवरण से भी सातवाहन वंश पर प्रकाश पड़ता है। इनमें प्लिनी, टाॅलमी तथा पेरीप्लस आॅफ एरिथ्रियन सी क ेलेखक के विवरण महत्वपूर्ण है। पेरीप्लस के अज्ञात लेखक ने पश्चिमी भारत के बंदरगाहों का स्वंय निरीक्षण किया था तथा वहाँ के व्यापार-वाणिज्य के प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर जानकारी दी है। सातवाहन काल के अनेक चैत्य एवं विहार नासिक, भाजा, कार्ले आदि जगहों से प्राप्त हुए हैं।
  •     अगला प्रमुख शासक शातकर्णी प्रथम था एवं इसने भी 18 वर्ष तक शासन किया। कालांतर में शकों की विजयों के फलस्वरूप सातवाहनों का अपने क्षेत्रों से अधिकार समाप्त हो गया। किन्तु, गौतमी पुत्र शातकर्णी ने सातवाहन वंश की प्रतिष्ठा पुनः स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। गौतमी पुत्र शातकर्णी ने शकों, यवनों, पहलवों तथा क्षहरातों का नाशकर सातवाहन वंश की पुनः प्रतिष्ठा स्थापित की। शातकर्णी ने नहपान को हराकर उसके चाँदी के सिक्कों पर अपना नाम अंकित कराया। नासिक के जोगलथम्बी से प्राप्त सिक्कों के ढेर में चाँदी के बहुत से ऐसे सिक्के हैं जो नहपान ने चलाए थे और इस पर पुनः गौतमीपुत्र की मुद्रा अंकित है।
  •     गौतमी पुत्र शातकर्णी के बाद उसका पुत्र वशिष्ठीपुत्र पुलुमावि राजगद्दी पर बैठा। उसके अभिलेख अमरावती, कार्ले और नासिक से मिले हैं। यज्ञश्री शातकर्णी सातवाहन वंश का अन्तिम शक्तिशाली राजा हुआ। इसकी मृत्यु के बाद सातवाहन साम्राज्य के विघटन की प्रक्रिया जारी हुई तथा यह अनेक छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त हो गया।

विविध तथ्य

  • शातकर्णी प्रथम ने दो अश्वमेध तथा एक राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान किया था। इसने गोदावरी तट पर स्थित प्रतिष्ठान को अपनी राजधानी बनायी।
  • सातवाहन शासक हाल स्वयं एक कवि तथा कवियों एवं विद्वानों का आश्रयदाता था। इसने ’गाथा सप्तशती’ नामक मुक्तक काव्य की रचना हाल ने प्राकृत भाषा में की। हाल की राजसभा में वृहत्कथा के रचयिता गुणाढ्य तथा ’कातंत्र’ नामक संस्कृत व्याकरण के लेखक शववर्मन निवास करते थे।
  • गौतमीपुत्र शातकर्णी ने वेणकटक स्वामी की उपाधि धारण की तथा वेणकटक नामक नगर की स्थापना की।
  • वशिष्ठी पुत्र पुलमावि ने अपने को प्रथम आंध्र सम्राट कहा।
  • गौतमीपुत्र शातकर्णी ने अपने वशिष्ठिपुत्र पुलमावि का विवाह रूद्रदामन की पुत्री से किया था।
  • पुलमावि को दक्षिणापथेश्वर कहा गया है। पुराणों में इसका नाम पुलोमा मिलता है।
  • ब्राह्मणों को भूमिदान या जागीर देने वाले प्रथम शासक सातवाहन ही थे, किन्तु उन्होंने अधिकतर भूमिदान बौद्ध भिक्षुओं को ही दिया।
  • भड़ौच सातवाहन काल का प्रमुख बंदरगाह एवं व्यापारिक केन्द्र था।
  • सातवाहन काल में व्यापार व्यवसाय में चाँदी एवं ताँबे के सिक्कों का प्रयोग होता था जिसे ’काषार्पण’ कहा जाता था।
  • सातवाहन काल में निर्मित दक्कन की सभी गुफाएँ बौद्ध धर्म से सम्बन्धित थीं।
  • सातवाहन राजाओं के नाम मातृप्रधान है लेकिन राजसिंहासन का उत्तराधिकारी पुत्र ही होता था।
  • सामंतवाद् का प्रथम लक्षण सातवाहन काल से ही दिखायी पड़ता है।
  • सातवाहनों की राजकीय भाषा प्राकृत तथा लिपि ब्राह्मी थी।
  • गौतमीपुत्र शातकर्णी ने स्वयं को कृष्ण, बलराम और संकर्षण का रूप स्वीकार किया।
  • गौतमीपुत्र शातकर्णी को ’वेदों का आश्रय’ दाता कहा गया है।

हिन्द-यवन या बैक्ट्रीयाई आक्रमण(Indo-Greek or Bactrian Attack)

  •  मौर्यों के पतन के पश्चात् पश्मिोत्तर भारत में मौर्यों के स्थान पर मध्य एशिया से आयी कई वाह्यशक्तियों ने अपना साम्राज्य स्थापित किया।
  •  मौर्योत्तर काल में भारत पर आक्रमण करने वालों में प्रथम सफल आक्रमण यूथीडेमस वंश के हिन्द-यवन (इंडो-ग्रीक) शासक ’डेमेट्रियस’ ने किया। उसने सिंध और पंजाब पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। उसकी राजधानी ’साकल’ थी। साकल शिक्षा के प्रमुख केन्द्र के रूप में प्रसिद्ध था तथा इसकी तुलना पाटलिपुत्र से की जाती थी। हिन्द-यवन शासकों में सबसे प्रसिद्ध शासक मिनांडर था। वह डेªमेट्रियस का सेनापति था। उसकी राजधानी स्यालकोट या साकल थी। भारत में हिन्द-यवन शासकों ने लेखयुक्त सिक्के चलाये। महायान बौद्ध ग्रंथ मिलिन्दपन्हों में बौद्ध विद्वान नागसेन तथा मिनांडर के बीच दार्शनिक विवादों का उल्लेख है। मिनांडर ने बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया था।
  • जिस समय डेमेट्रियस अपनी भारतीय विजयों में उलझा हुआ था, उसी वक्त यूक्रेटाइडीज नामक व्यक्ति ने बैक्ट्रिया में विद्रोह कर दिया। कालांतर में उसने भारत (सिंध प्रदेश) की भी विजय की और हिंद-यवन राज्य स्थापित किए। इस तरह पश्चिमोत्तर भारत में दो यवन-राज्य स्थापित हो गए-पहला, यूथीडेमस के वंशजों का तथा दूसरा यूक्रेटाइडीज के वंशजों का राज्य। यूक्रेटाइडीज वंश में दो शासक हुए-एंटिआल्किडस तथा हर्मियस इस वंश का अन्तिम हिन्द-यवन शासक था। उसके साथ ही पश्चिमोत्तर भारत से यवनों का शासन समाप्त हो गया।

शक शासक

    शक मूलतः मध्य एशिया की एक खानाबदोश तथा बर्बर जाति थी। लगभग 165 ईसा पूर्व में इन्हें मध्य एशिया से भगा दिया गया। वहाँ से हटाये जाने के कारण वे सिंध प्रदेश में आ गये। भारत में शक राजा अपने को क्षत्रप कहते थे। उनकी शक्ति का केन्द्र सिंध था। वहाँ से वे भारत के पंजाब, सौराष्ट्र आदि स्थानों पर फैल गये। इनकी पाँच शाखाएँ थी।
    कालांतर में शक शासकों की भारत में दो शाखाएँ हो गई थी। एक उत्तरी क्षत्रप जो पंजाब (तक्षशिला) एवं मथुरा में थे और दूसरा पश्चिमी क्षत्रप जो नासिक एवं उज्जैन में थे। पश्चिमी क्षत्रप अधिक प्रसिद्ध थे। उत्तरी क्षत्रप का भारत में प्रथम शासक मोयेज ;डवलमेद्ध या मोग था। नासिक के क्षत्रप (पश्चिमी क्षत्रप) क्षहरात वंश से संबंधित थे जिसका पहला शासक भूमक था। वे अपने को क्षहरात क्षत्रप कहते थे। भूमक के द्वारा चलाये गये सिक्कों पर ’क्षत्रप’ लिखा है। नहपान इस वंश का प्रसिद्ध शासक था। अभिलेखों के आधार पर कहा जा सकता है कि नहपान का राज्य उत्तर में राजपूताना तक था। नहपान के समय भड़ौच एक बंदरगाह था। यहीं से शक शासक वस्तुएँ पश्चिमी देशों को भेजते थे।
    उज्जैन के शक वंश (कार्दमक वंश) का संस्थापक चष्टण था। इसने अपने अभिलेखों में शक संवत् का प्रयोग किया है। उज्जैन के शक क्षत्रपों में सबसे प्रसिद्ध शासक रूद्रदामन (130 ई0 से 150 ई0) था। इसके जूनागढ़ अभिलेख से प्रतीत होता है कि पूर्वी और पश्चिमी मालवा, सौराष्ट्र, कच्छ (गुजरात), उत्तरी कोंकण, आदि प्रदेश उसके राज्य में सम्मिलित थे। रूद्रदामन ने वशिष्ठी पुत्र पुलुमावि को पराजित किया था। रूद्रदामन ने सुदर्शन झाील का पुर्ननिर्माण करवाया था जिसे चन्द्रगुप्त मौर्य ने बनवाया था और जिसकी मरम्मत अशोक ने करवाई थी। रूद्रदामन संस्कृत का प्रेमी था। इसी ने सबसे पहले विशुद्ध संस्कृत अभिलेख (जूनागढ़ अभिलेख) जारी किया। पहले इस क्षेत्र में जो भी अभिलेख पाए गए वे प्राकृत भाषा में थे।
    इस वंश का अंतिम राजा रूद्रसिंह तृतीय था। गुप्त शासक चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने उसे मारकर उसका राज्य गुप्त साम्राज्य में मिला लिया।

पह्लव वंश या पार्थियन साम्राज्य(Pahlavi Dynasty or Parthian Empire)

    उत्तर-पश्चिम भारत पर ईसा पूर्व पहली सदी के अंत में पार्थियन नाम के कुछ शासक शासन कर रहे थे जिन्हें भारतीय स्रोतों में पह्लव नाम से जाना गया है। पह्लव शक्ति का वास्तविक संस्थापक मिथ्रेडेट्स (मिथ्रदात) प्रथम था। मिश्रदात द्वितीय इस वंश का सबसे प्रतापी राजा था जिसने शकों को परास्त किया। पह्लव शासकों में सबसे शक्तिशाली शासक गोण्डोफर्नीज था। उसके शासनकाल के ’तख्तबही’ अभिलेख से ज्ञात होता है कि पेशावर जिले पर उसका अधिकार था। सेंट टाॅमस नामक पादरी इसाई प्रचार के लिए इसी समय भारत आया था। पार्थियन राजाओं के सिक्कों पर धर्मिय (धार्मिक) उपाधि उत्कीर्ण मिलती हैं। पह्लव राज्य का अंत कुषाणों ने किया।

कुषाण वंश (Kushan Dynasty)

  • मौर्योत्तर कालीन विदेशी आक्रमणकारियों में कुषाण वंश सबसे महत्वपूर्ण है। पह्लवों के बाद भारतीय क्षेत्र में कुषाण आए जिन्हें यूची और तोखरी भी कहा जाता है। कुषाणों ने सर्वप्रथम बैक्ट्रिया और उत्तरी अफगानिस्तान पर अपना शासन स्थापित किया तथा वहाँ से शक् शासकों को भगा दिया। अन्ततः उन्होंने सिंधु घाटी (निचले) तथा गंगा के मैदान के अधिकांश क्षेत्र पर अधिकार कर लिया।
  • कुषाण वंश का संस्थापक कुजुल कडफिसेस था। इसने ताँबे का सिक्का चलाया था। सिक्कों के एक भाग पर यवन शासक हर्मियस का नाम उल्लिखित है तथा दूसरे भाग पर कुजुल का नाम खरोष्ठी लिपि में खुदा हुआ है। कुजुल कडफिसेस के बाद विम कडफिसेस शासक बना जिसने सर्वप्रथम सोने का सिक्का जारी किया। इसके सिक्कों पर शिव, नंदी तथा त्रिशूल की आकृति एवं महेश्वर की उपाधि उत्कीर्ण हैं। इसने अपना राज्य सिंधु नदी के पूरब में फैलाया एवं रोम के साथ इसके अच्छे व्यापारिक संबंध थे। विम कडफिसेस के बाद कनिष्क ने कुषाण साम्राज्य की सत्ता संभाली। कनिष्क कुषाण वंश का महानतम शासक था। इसके कार्यकाल का आरम्भ 78ई0 माना जाता है। क्योंकि इसी ने 78 ई0 में शक् संवत आरम्भ किया। इसके साम्राज्य में अफगानिस्तान, सिंध, बैक्ट्रिया तथा पार्थिया के क्षेत्र सम्मिलित थे। कनिष्क ने भारत में अपना साम्राज्य विस्तार मगध तक किया तथा यहीं से वह प्रसिद्ध विद्वान अश्वघोष को अपनी राजधानी पुरुषपुर ले गया। उसने कश्मीर को विजित कर वहाँ कनिष्कपुर नामक नगर बसाया। कनिष्क बौद्ध धर्म की महायान शाखा का संरक्षक था। उसने कश्मीर में चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन किया। कनिष्क कला और संस्कृत साहित्य का संरक्षक था। कनिष्क की राजसभा में पाश्र्व, वसुमित्र और अश्वघोष जैसे बौद्ध दार्शनिक विद्यमान थे। नागार्जुन और चरक भी (चिकित्सक) कनिष्क के राजदरबार में थे।
  • कनिष्क के बाद कुषाण साम्राज्य का पतन प्रारंभ हुआ। उसका उत्तराधिकारी हुविष्क के पश्चात् कनिष्क द्वितीय शासक बना जिसने ’सीजर’ की उपाधि ग्रहण की। कुषाण वंश का अंतिम शासक वासुदेव था जिसने अपना नाम भारतीय नाम पर रख लिया। वासुदेव शैव मतानुयायी था। इसके सिक्कों पर शिव के साथ गज की आकृति मिली हैं।

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